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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 286 में से

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पृष्ठ 179

१८४ रसिकप्रिया
जी के पुत्र हैं और ये वृषभानुजी की पुत्री हैं। इन (बड़े बाप के लाडिली-
लाड़िलों) का भेद कुछ खुलता नहीं कि आखिर बात क्या है। एक ही साथ
दोनो को क्या हो गया, जरा आकर तू भी देख क्यों नहीं जाती।
सूचना-व्याधि के इन दो उदाहरणों में नायक और नायिका दोनो की
दशा का साथ ही वर्णन कर दिया गया है, इसी से प्रकाश और प्रच्छन्न के
पृथक् पृथक् दो दो उदाहरण केशव ने नहीं रखे।
अथ जड़ता-लक्षण- (दोहा)
(३२६) भूलि जाइ सुधि बुधि जहाँ, सुख दुख होइ समान।
तासों जड़ता कहत हैं, केसवदास सुजान। ४८।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न जड़ता, यथा- (सवैया)
(३३०) खरे उपचार खरी सियरी सियरे तें खरोई खरो तन छीजै।
ऐसे में और करें तें कछू उपजै तौ सकेलि कहा हम लीजै।
देखत हौ यह कामकली कुँभिलानियै जाति कहा अब कीजै।
कौन पै जाऊँ, कहा करौ केसव कैसें जियै बह क्यों हम जीजै। ४६।
शब्दार्थ-खरे = अच्छे, अत्यंत लाभदायक। खरी = अत्यंत। सियरी =
शीतलता। सियरे तें = शीतल से। खरोई खरी = अत्यधिक, और अधिक।
छीजै = क्षीण होता है। खरे उपचार० = अच्छे उपचारों से शरीर में अत्यंत
शीतलता होती है, पर यहाँ तो शीतोपचार से और भी शरीर क्षीण होता चला
जा रहा है। सकेलि कहा हम लीजै० = हम क्या भँजा लेंगी, क्या पाएँगी,
हमें क्या मिलेगा ? सकेलना = एकत्र करना, पाना। ऐसे में = ऐसी दशा में
कोई और उपचार करने से कहीं कुछ का कुछ न हो जाय तो हम लोग कौन
सा भाँड़ा भर लेंगी ? कामकली = नायिका। जीजै = जीवित रहें, जियें।
(३३१) श्रीराधिकाजू की प्रकाश जड़ता, यथा- (सवैया)
आँखियानि मिली सखियानि मिली पतियाँ बतियानि मिली तजि मौनै।
ध्यान-बिधान मिली मनहीं मन ज्यों मिलै राँक मनौ मन सौनै।
केसव कैसहूँ बेगि चलौ नतु हैहै वहै हरि जो कछु हौनै।
पूरन प्रेम-समाधि लगे मिलि जैहै तुम्हें मिलिहौ तब कौनै। ५०।
शब्दार्थ-पतियाँ = पत्रिका। पतियां बतियानि = पत्रिका की बातों के
द्वारा। ध्यान-विधान = ध्यान करने के ढंग से।
भावार्थ-(सखी-वचन नायक से) वह स्वयम् अपनी आँखों से तुमसे मिली
(आँखों से देखना जब संभव नहीं रहा तो) सखियों द्वारा मिली (अर्थात् सखियों
४८-केसवदास-केसवराय। ४६-करें-किये। हौ-ही। कामकली-
कामलता। ५०-पतियां०-पतियानि मिली बतियाँ। रांक-एक। मन-मिलि,
मय। चलो-मिलो। नतु-तन। लगे-मिलें।