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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 286 में से

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पृष्ठ 181

१८४ रसिकप्रिया
इंद्रियों को सोष लिया है (तत्तत् विषयों से उन्हें हटा लिया है—आँखों को
देखने से, कानों को सुनने से आदि) । मन को भी साध लिया है और समाधि
का आनंद ले रहे हैं। जब तक वे प्रख्यात सिद्ध न हो जायँ तब तक देखो,
उनका अपयश मत करो । हे देवी, वे तपस्या तुम्हारे ही लिए कर रहे हैं ।
यदि वरदान नहीं देती हो तो कम से कम जीवन-दान तो दो (उनकी दशा
तो यह है कि प्राण निकलने निकलने हो रहे हैं ) ।
अथ मरण-लक्षण—( दोहा )
(३३४) बनै न क्योंहूँ मिलन जहँ, छलबल केसवदास ।
पूरन-प्रेम-प्रताप तें, मरन होत अनयास ।५३।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से ।
भावार्थ—वियोग से जब किसी प्रकार छल बल से भी संयोग नहीं हो
पाता तो पूर्ण प्रेम होने के कारण अनायास मरण हो जाता है ।
(३३५) मरन सु केसवदास पै, बरन्यो जाइ न मित्र ।
अजर अमर जस कहि कहौं, कैसे प्रेत-चरित्र ।५४।
शब्दार्थ—पै = से । अजर अमर० = अजर अमर यश का वर्णन करके
अब प्रेतचरित्र ( मरण का ) वर्णन क्या करूँ ?
(३३६) रति उपजै रमनीन के, पहिलें केसवदास ।
तिनकी इंगित देखि सखि, करत·सुप्रेम-प्रकास ।५५।
शब्दार्थ—रति = प्रेम । रमनी = रमणी, नायिका । तिनकी = उनकी ।
इंगित = चेष्टा ।
(३३७) अति आदर अति लोभ तें, अति संगति तें मित्त ।
साधुनिहूँ के होत हैं, केसव चंचल चित्त ।५६।
सूचना—'रसग्राहकचंद्रिका' टीका में इसके अनंतर यह दोहा है—
आदरादि तें साधुहू क्यों चंचल चित होत ।
त्यों परि सखिसँग दंपतिहिं चंचलता उद्दोत ।
(३३८) सुभग दसा दस मैं कही, उपजै पूरन राग ।
जिहि बिधि उपजै मान मन, बरनौँ सुनहु सभाग ।५७।
शब्दार्थ—उपजै०—जिनसे पूर्ण प्रेम प्रकट होता है ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभशृंगार-
पूर्वानुरागवर्णनं नामाष्टमः प्रभावः ।८।
५३—होत-होहि । ५४- जस०-तासों कहौं। कैं से०-केसव प्रेम चरित्र ।
५५—की-पै । देखि-जान । सखि-पिय । ५७-मन अब । सभाग-समाय ।