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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 286 में से

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पृष्ठ 173

१७६ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रलाप, यथा—( सवैया )
(३१७) खेल न हाँसी न खोरि अठाउ न हेत न बैर हियो कंपै रोसों ।
लेनो न देनो हलाव भलाव न नातो न गोतो कहाँ कहौं तोसों ।
आनि दियो दुख में दुख केसव कैसे हँसौ री कहा कहि कोसों ।
नैन भरिभरि ग्वालि कहै अरी देख्यो तैं कान्ह कहा कह्यो मोसों ।३६।
शब्दार्थ—खोरि = दोष, दुष्टपना । अठाउ = शरारत । हेत = प्रेम ।
लेनो० = लेना देना कुछ नहीं । हलाव० = हला भला भी नहीं है, दुआ सलाम
या भेंट असीस वाली बात भी नहीं । नातो० = नाता गोता भी नहीं, नाता
रिश्ता भी नहीं है । कोसों = बुरा भला कहूँ कोसूं । खेलन० = न तो उनसे
खेल खेलने का ही वास्ता है, न उनसे हँसी-मजाक ही है, न कोई दुष्टपना या
शरारत ही जान पड़ती है न उनसे कोई मेल-मुहब्बत है और न शत्रुता ही है ।
पर उन्होंने जो कुछ कहा है उससे मेरा अंतःकरण रोष से कांप रहा है ।
भरिभरि = आँसू से भली भाँति भरकर । देख्यो तैं० = देखा तूने मुझसे कृष्ण
ने क्या कहा ? लेनो० = न उनसे अपना कुछ लेना देना, न दुआ सलामत, न
नाता-गोता फिर भी उन्होंने मुझसे ऐसी बात कही, तुझसे क्या कहूँ ।
आनि० = मैं अपने ही दुख में दुखी थी, उन्होंने मुझे इस दुख में दुख दिया ।
न हँसते ही बनता है न कोसते ही ( हँसूँ तो किस बात पर और कोसूँ तो
किस बात पर और कोसूँ तो क्या दोष लगाकर कोसूँ ) ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रलाप, यथा— ( सवैया )
(३१८) आलिनि माँझ मिली हुती खेलति जानै को कान्ह धौं आए कहाँ तैं ।
डीठिहि डीठि पर्यो न कछू सठ ढीठ गही हठि पीठि की घातैं ।
गई गड़ि लाजनहीं हिय हौं तौ उठी जरि केसव काँपति यातैं ।
इती रिस मैं कबहुँ न बची पै रही पचि हौं अँखियान के नातैं ।३७।
शब्दार्थ—जानै को = न जानै । डीठिहि० = आँखों से तो कुछ दिखलाई नहीं
पड़ा ( सामने से तो वे आए नहीं ) । सठ = दुष्ट ने । ढीठ = धृष्ट, नायक ।
हठि = बरबस । पीठ की घातैं = पीठ की घात से, पीछे की ओर से । हौं
गड़ि० = मैं लाज के मारे गड़ गई । उठी जरि० = मैं उस ढिठाई के कारण
जल उठीं, इसी से काँप रही हूँ । इती रिस० = इतना रोष तो मैंने कभीं
सहन नहीं किया । केवल आँखों के नाते इतनी परेशानी सह रही हूँ ।
३६—हियो-हिये । कंपै-करि । रोसों-हाँसों । लेनो०-लेन न देन ।
हलाव०-हलाउ भला नहिं, हलाउ भलाउत । दुख में-सुख भी । हँसों-सहौं ।
नैन०-नैननि नीर भरे कहै ग्वालिन । अरी-अलि । ३७—आलिनि-आलि के ।
डीठिहि-डीठहि, सु डीठहि । सठ-सुठि । गई-हौं । हिय हौं तो-जु गई पै ।
केसव-को सब । काँपति-कांपनी । यातैं-वातैं । बची-सही । पचिहौं-बचिहौं ।