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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 286 में से

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पृष्ठ 170

वर्ण के तुल्य हो गया ( जल गया ) । कुंज को कूल = कुंज का तट, छोर ।
हार = माला ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे घनश्याम, मैंने आज भली
भाँति कपूर को घोलकर और उसमें चंदन मिलाकर आपके शरीर पर लगाया ।
पर शरीर छूते ही वह ( जलकर ) आपके शरीर के वर्ण के तुल्य हों गया ।
(अर्थात् जल गया) । शुभ फूलों से फूले हुए उस कुंज की ओर देखने पर भी
प्रतिकूल ही बात हुई ( विषाद हुआ, हर्ष नहीं ) । आप भूले से फिर रहे हैं।
बुलाने पर भी उधर कहाँ जाते हैं, आपका मन किस भ्रम के चक्कर में पड़ा
है ? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि आपका मन आज किसी के मनोहर हार
रूपी झूले में भूलता रहा है। इसी से उसे चक्कर आ रहे हैं (आप किसी की
स्मृति कर रहे हैं) ।
अलंकार--हेतूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू की प्रकाश स्मृति, यथा-( सवैया )
(३१०) बासन बास भए बिष केसव डासन डासन की गति लीने ।
चंदन चाँदनी त्यों चित चाहै न चंद्रक चंद चितारस-भीने ।
पान न खात न पान करै कछु हास-बिलास बिदा करि दीने ।
ऐसी हैं गोकुल के कुल की जिहिं गोकुलनाथ के ये ढँग कीने ।२६।
शब्दार्थ-बासन = वस्त्र । बास = सुगंध । डासन = बिछौना । डास =
मच्छड़ ( काटनेवाला ) । त्यों = उसी प्रकार अथवा ओर । चाहै न = चाहता
नहीं अथवा देखता नही । चंद्रक = कपूर । चंद = चंद्रमा । चितारस-भीने =
बीभत्स, बुरे ( लगते हैं ) । पान करै न = पीती नहीं । बिदा० = छोड़ दिए ।
अथ उद्वेग-लक्षण- (दोहा)
(३१०) दुखदायक ह्वै जात जहँ सुखदायक अनयास ।
सो उद्वेग दसा दुसह, जानहु केसवदास ।३०।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उद्वेग, यथा-(सवैया)
(३१२) चंद नहीं बिषकंद है केसव राहुँ इहीं गुन लीलि न लीनो ।
कुंभज पावन जानि अपावन धोखें पियो पचि जानि न दीनो ।
यासों सुधाधर सेष बिषाधर नाउँ घरयो बिधि है बुधिहीनो ।
सूर सों माई कहा कहियै, जिन पापी लै आप-बराबर कीनो ।३१।
शब्दार्थ-कंद=जड़, मूल । चंद० = यह चंद्रमा नहीं है विष की जड़
है । इहीं गुन = इस ( अवगुण ) के कारण । लीलि न लीनो=एकदम निगल
२६-भए- भयो । त्यों-ज्यों । चंद-बंद । जिहिं-जिनि । ये-जे । ३०-
जानहु-बरनहु । ३१-इहीं-यही, यहै । बुधि-बिधि । जिन-जेहि, यह ।
पापी-पापु जु ।