सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

१८६ रसिकप्रिया
समय खिल रहे हों उ सी समय किसी (प्रकाशपिंड में) चंद्रमा का भ्रम हो जाने
से भूलकर (नखक्षत = द्वितीया का चंद्र) उसे देखते ही संकुचित हो गए हों।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
श्रीराधाकाजू को प्रकाश गुरुमान श्रवण तें, यथा—( सवैया )
(३४३) बूझति ही वह गोपी गुपालहि आजु कछू हँसिकै गुनगाथहिं।
ऐसे में काहू को नाम सखी कहि कैसे धौं आइ गयो ब्रजनाथहि।
खात खवावति ही जु बिरी सु रही मुख की मुख हाथ की हाथहिं।
आतुर ह्वै उनि आँखिन तें अँसुवा निकसे अखरान के साथहि। ५।
शब्दार्थ—बूझति ही = ( श्रीकृष्ण से ) पूछ रही थी। गुनगाथहिं =
उनकी गुणगाथा, उनकी बातें। कहि आइ गयो = मुख से निकल पड़ा। धौं
कैसे० = न जाने कैसे श्रीकृष्ण के मुख से निकल पड़ा, गोत्रस्खलन हो गया।
खाति खवावति ही = खा-खिला रही थी। ही = थी। बिरी = पान के बीड़े।
सु रही० = जो पान वह खा रही थी वह तो मुँह का मुँह में ही रह गया,
दाँतों से या होठों से जहाँ का तहाँ दबाए रह गई और जो हाथ में लेकर
उन्हें खिलाने जा रही थी वह हाथ में ही ज्यों का त्यों रह गया, उन्हें खिला
न सकी। आतुर ह्वै = व्यग्र होकर। उनि० = उनकी आँखों से। अखरान =
नाम के अक्षरों के साथ।
अलंकार—चपलातिशयोक्ति।
अथ नायक को गुरुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४४) लोकलीक उल्लंघि कछु, प्रिया कहै जब बैन।
उपजि परत गुरुमान तहँ, प्रीतम के उर-ऐन। ६।
शब्दार्थ—लोकलीक = लोकमर्यादा। उल्लंघि = उल्लंघन करके ( लोक-
सीमा को पार करके )। ऐन = ( अयन ) घर। उर-ऐन = हृदय रूपी घर में,
हृदय में।
श्रीकृष्ण को प्रच्छन्न गुरुमान, यथा—( कबित्त )
(३४५) ऐसी ऐसी रति राचे सौंहनि के साँचे स्याम,
देखौ आनि बाँचि किधौं कौन की ये चीठी है।
सुनहु सभागै पाई रावरीयै पाग माँहँ,
कागर के रूप काहू आगि की अँगीठी है।
जानति हौं याही मग पायो है जनम जग,
औरहूँ अलोकन की बीथी तुम दीठी है।
५—नाम-नाउ। कहि कैसे-सुनि आयो। आइ०-कैसे कह्यो। ६—
उपजि०-उपजत है।