रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
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...RIT SER...
श्री पं. म दे सिद्धि भट्ट ...
... आयुर्वेद ...
डा. ललित पौड्याल
- एम. बी. (...)
- एम. पी. एच. (...)
२०२५ ...
...
लक्ष्मणजंग ...
...ची की तप्ता. ३
...हुर लागेको डव
... ख्वाउदिम
१ मात्रामा
गाईको दुध वचौथाई - १
नेपाली कुखुराको अण्डा
शुद्ध मह चम्चा - १
सु-गन्धुप तो - १
वा सुकको धुडो आधातोलाको आधा
पीनी महिसितखाने रगेडीखान
दियेमानिको हुन्छ अनुभव सिद्ध।
THE
HARIDAS SANSKRIT SERIES
91
Rasaratna Samuchchaya
by
S'RĪ VĀGBHATĀCHĀRYA
Edited with-
THE SURATNOJJVALĀ HINDI COMMENTARY
and
Notes, Introduction, Indices, Appendices etc.,.
By
PANDIT S'RĪ AMBIKĀDATTA S'ĀSTRĪ
Ayurvedacharya ( A. M. S. ) B. H. U.
PUBLISHED BY
JAYA KRISHNA DÂS HARIDÂS GUPTA
The Chowkhamba Sanskrit Series Office.
Benares City.
1939
PRINTED BY
JAYA KRISHNA DAS GUPTA,
VIDYA VILAS PRESS, BENARES CITY.
1939.
Registered According to Act XXV of 1867.
All Rights Reserved by the Publishers.
* श्रीः *
→* हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला *←
९१
श्रीवाग्भटाचार्यविरचितः
रसरत्नसमुच्चयः ।
काशी-हिन्दू-विश्वविद्यालयेऽधिगतप्राच्यपाश्चात्य
चिकित्साशास्त्रतत्त्वेन श्री कृष्णात्मजेन
आयुर्वेदाचार्य, ए. एम्. एस्. इत्युपाधिधारिणा
पण्डित श्री अम्बिकादत्त-शास्त्रिणा
विरचितया—
पारदगन्धकाभ्रकलाहताम्रादिरसोपरसधातूपधात्वादीनां विज्ञानानुमत-
वर्णनोपेतेन ज्वरादिसमस्तरोगपथ्यापथ्यप्राच्यपाश्चात्यमतानुमत-
निदानाद्यनेकविषयोपबृंहितेन च
विमर्शेण विभूषितया—
सुरत्नोज्जवलाख्य-भाषा-टीकयाऽऽलङ्कृतः ।
तेनैव संशोधितश्च ।
प्रकाशकः—
जयकृष्णदास हरिदास गुप्तः
चौखम्बा संस्कृत सीरिज़ आफिस,
विद्याविलास प्रेस, बनारस सिटी ।
१९९६
हेर्मा प्रकृती ॥
आलुस्वँ आलुवं ममोहूना
रात सुत्नेमान्छी ५०००। जप
गरेपछि सीध्द हून्छ. फेयहरी
लाग्देवाउने जेगेनेरै)
⥤ भूमिका ⥢
वर्तमान् समय में पृथ्वीमण्डल पर अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्रचलित हैं जैसे आयुर्वेद, एलोपेथी, होमियोपेथी, यूनानी, जलचिकित्सा ( हाइड्रोपेथी ), विद्युच्चिकित्सा आदि। इन सब चिकित्साओं की जननी कहलाने का सौभाग्य आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली को ही प्राप्त है, अथवा यों कह सकते हैं कि इन सब का अन्तर्भाव आयुर्वेद के अन्दर ही हो सकता है। जो लोग एलोपेथी ही को वैज्ञानिक कह कर अन्य चिकित्सा को अवैज्ञानिक कहने का साहस करते हैं उनकी धारणा एक दम असत्य है क्योंकि एलोपेथी के अन्दर जितने भी विषय ( Anotomy, Physiology, Surgery, Toxicology, Jurisprudence, Midwifery, Materiamedica, Medicine etc., ) हैं उन सबका वर्णन आयुर्वेद के अन्दर करोड़ों वर्ष पहिले से लिखा हुआ मिलता है। इस लिए हम दावे के साथ कह सकते हैं कि संसार भर की चिकित्साप्रणालियों में सर्वप्रथम तथा सर्वश्रेष्ठ यदि कोई चिकित्सा प्रणाली है तो वह आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली ही है। हमारे आयुर्वेद के अन्दर इस समय कोई शाखा पिछड़ी हुई है तो वह सिर्फ शल्यशालाक्य चिकित्सा ही है। इसका कारण इस शाखा को प्रोत्साहन नहीं मिलना है तथा वैद्यबन्धुओं का आलस्य और आधुनिक भूपालों की उपेक्षा आदि है। अब इसकी सर्वोत्कृष्ट उन्नति होने का समय अत्यन्त निकट ही है। अस्तु आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली आसुरी, मानुषी और दैवी इस तरह तीन भागों में विभक्त है जैसे कहा भी है—
सा दैवी प्रथमा सुसंस्कृतरसैर्या निर्मिता सद्रसै-
श्चूर्णस्नेहकषायलेहरचिता स्यान्मानवी मध्यमा।
शस्त्रच्छेदनलास्यलक्ष्मणकृताऽचाराधमा साऽऽसुरी-
त्यायुर्वेदरहस्यमेतदखिलं तिस्रश्चिकित्सा मताः ॥ १ ॥
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।
शस्त्रैः कषायैर्लोहाद्यैः क्रमेणान्त्याः सुपूजिताः ॥ २ ॥
[ २ ]
इन तीनों में दैवी ( रस ) चिकित्सा सर्व श्रेष्ठ मानी गई है । यह मानना सोलहों आना ( पूर्णतया ) सत्य भी है क्योंकि शल्यचिकित्सा केवल वर्धित या विकृत हुए शरीराङ्ग को काट सकती है । किन्तु उस विकार का पूर्ण निर्मूलन नहीं कर सकती है । जैसे अर्श (Piles), अर्बुद ( Tumours ) आदि का छेदन करने पर भी अनेकों बार उनकी पुनरुत्पत्ति होते देखी गई है किन्तु रसचिकित्सा के द्वारा चिकित्सा करने पर लाभ ( रोगनाश ) देर से होता है किन्तु स्थाई होता है इस लिए रसचिकित्सा सर्वोत्तम है । रसों के सेवन करने से शरीर रोगों से प्रथम ही पृथक् रहता है ।
“प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्”
इस लिए इस चिकित्सा को दैवी चिकित्सा कहना अत्युक्ति नहीं है अपि तु यथार्थ ही है । अत एव रसचिकित्सक सर्व चिकित्सकों में उत्तम “उत्तमो रस वैद्यस्तु मध्यमो मूलिकादिभिः ।
अधमः शस्त्रदाहाभ्याम्”
माना गया है । यद्यपि काष्ठौषधियों द्वारा निर्मित चूर्ण, अवलेह आदि भी शरीर के लिये हितकर हैं तथापि चूर्ण अवलेहादिक की तरह रसों का अधिक प्रयोग नहीं करना पड़ता है तथा रस अरुचिकर कभी भी नहीं होते हैं और शीघ्रातिशीघ्र शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं ।
अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥
इस लिये निर्विवाद सिद्ध हो गया कि रसचिकित्सा अन्य चिकित्साओं में तो श्रेष्ठ है ही परन्तु आयुर्वेदीय ‘अष्ट”अङ्गों’ में भी सर्व प्रथम मानी गई है । इस रस चिकित्सा का आविर्भाव सर्व प्रथम महादेवजी ने किया है । अत एव यह चिकित्सा दैवी है । बाद में रसचिकित्सा के प्रवर्तक कई आचार्य हुए हैं ।
आदिमश्चन्द्रसेनश्च लङ्केशश्च विशारदः ।
कपाली मत्तमाण्डव्यौ भास्करः शूरसेनकः ॥ १ ॥
रत्नकोशश्च शम्भुश्च सात्विको नरवाहनः ।
[ ३ ]
इन्द्रदो गोमुखश्चैव कम्बलिव्र्यांडिरेव च ॥ २॥
नागार्जुनः सुरानन्दो नागबोधिर्यशोधनः ।
खण्डः कापालिको ब्रह्मा गोविन्दो लम्पको हरिः ॥ ३॥
इन आचार्यों ने कई रस ग्रन्थ बनाये हैं। निम्न रसतन्त्र या संहिताओं का नामोल्लेख मिलता है।
| रसेन्द्रसंहिता | सिद्धलक्ष्मीश्वरतन्त्र | चन्द्रसेनसिद्धान्त |
| दत्तात्रेयसंहिता | लम्पटतन्त्र | लङ्केशसिद्धान्त |
| अगस्त्यसंहिता | स्वच्छन्दभैरवतन्त्र | कपिलसिद्धान्त |
| नासत्यसंहिता | मन्थानभैरवतन्त्र | ब्रह्मसिद्धान्त |
| गोरक्षसंहिता | काकचण्डीश्वरतन्त्र(१) | रसरत्नाकर |
| रुद्रयामलतन्त्र | हरीश्वरतन्त्र | रसरत्नप्रदीप |
| महारसायनतन्त्र | महादेवतन्त्र | रसपारिजात |
| कामधेनुतन्त्र | नागार्जुनतन्त्र | रसेन्द्रसारसङ्ग्रह |
| दत्तात्रेयतन्त्र | बालतन्त्र | रसरत्नसमुच्चय आदि। |
इनमें से बहुत से ग्रन्थ लुप्त हैं तथा जो मिलते हैं उनमें यह रस-रत्नसमुच्चय नामक ग्रन्थ भी रसचिकित्सा का एक सर्वाङ्गीण ग्रन्थ है। यद्यपि इस का प्रचार कुछ वर्षों पहिले कम था किन्तु इसके अन्दर अनेक रसों के उत्तमोत्तम योग तथा पारद के अनेक संस्कारों का उत्तम वर्णन होने से अब दिनों दिन इसकी आवश्यकता बढ़ती जा रही है तथा यह ग्रन्थ अब वैद्य समुदाय में अधिक प्रचलित हो रहा है तथा बिहार आदि अनेक स्थानों की सम्मानित परीक्षाओं में भी रखा हुआ है। इस ग्रन्थ में अनेक उत्तमोत्तम योग हैं, जिनका अनुभव करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन योगों का प्रयोग किया जाय तो चिकित्सा में आश्चर्यजनक लाभ हो सकता है। यह ग्रन्थ तीस अध्यायों में विभक्त है।
प्रथमाध्याय-में हिमालयवर्णन, रस ( पारद ) के उत्कर्ष का वर्णन, मूर्च्छित पारद के गुण तथा उसकी उत्पत्ति, भेद और निरुक्ति आदि पारदसम्बन्धी वर्णन है।
( १ ) काशी संस्कृत ग्रन्थमाला नं० ७३ में मुद्रित है।
[ ४ ]
द्वितीयाध्याय-में आठ महारसों के भेद, गुण, शोधन तथा मारण और उनकी उत्पत्ति का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। यथा—
अभ्रवैक्रान्तमाक्षीकविमलाद्रिजसस्यकम् ।
चपलो रसकश्चेति....................................॥
तृतीयाध्याय-में अष्ट उपरसों की उत्पत्ति, भेद, गुण, शोधन तथा उनके प्रयोगों का वर्णन है । यथा—
"गन्धाश्मगैरिकासीसकाङ्क्षीतालशिलाञ्जनम् ।
कङ्कुष्ठं चेत्युपरसाः....................................॥
चतुर्थाध्याय-में रत्नों के भेद, नाम, गुण, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है। यथा—
वैक्रान्तः सूर्यकान्तश्च हीरकं मौक्तिकं मणिः ।
चन्द्रकान्तस्तथा चैव राजावर्तश्च सप्तमः ॥
गरुडोद्गारकश्चैव ज्ञातव्या मणयस्त्वमी ।
पुष्परागो गोमेदश्च पद्मरागः प्रवालकम् ॥
वैदूर्यं च तथा नीलः................................॥
पञ्चमाध्याय-में शुद्धलोह ( स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह अर्थात् मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त ), पूतिलोह ( नाग, वङ्ग ) और मिश्रलोह ( पित्तल, कांसा, भरत, रूक्मलोह ) की उत्पत्ति, भेद, गुणदोष, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है ।
षष्ठाध्याय-में शिष्योपनयन, रसविद्या गुरुलक्षण, शिष्य और अनुचरों का गुण, रसशाला और रसमण्डप का निर्माण, रसलिङ्ग की स्थापना, पूजन और ध्यान, शिष्यदीक्षादानविधि, कालिनीलक्षण और होमविधि का वर्णन है ।
सप्तमाध्याय-में रसशालानिर्माण, उपरस, महारस, अष्ट लोह और उपकरणों की पूजाविधि, पद्महस्तवैद्यादिकों का लक्षण तथा रससाधनीय पदार्थों का वर्णन और परिचारकों के लक्षण का वर्णन है।
अष्टम व नवम अध्याय-में क्रमशः परिभाषावर्णन, व दोलायन्त्र, विद्याधरयन्त्र, घटयन्त्र, पातनयन्त्रादिकों का वर्णन है ।