रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
नवमोऽध्यायः । २५३
नवमोऽध्यायः । २५३
अथ बालुकायन्त्रम्—
सरसां गूढवक्त्रां मृद्वस्त्राङ्गुलघनावृताम् ।
शोषितां काचकलशीं त्रिषु भागेषु पूरयेत् ॥ ३३ ॥
भाण्डे वितस्तिगम्भीरे वालुकासुप्रतिष्ठिता ।
तद्भाण्डं पूरयेत्त्रिभिरन्याभिरवगुण्ठयेत् ॥ ३४ ॥
भाण्डवक्त्रं मणिकया सन्धिं लिम्पेन्मृदा पचेत् ।
चुल्ल्यां तृणस्य चादाहान्मणिकापृष्ठवर्त्तिनः ॥
एतद्धि बालुकायन्त्रं तद्यन्त्रं लवणाश्रयम् ॥ ३५ ॥
प्रथम एक आतसी शीशी को मुल्तानीमिट्टी के अन्दर लिप्त किये हुये वस्त्रों की एक तह (आवरण) चढाकर सुखा लेवे, इस तरह शीशी को सुखा कर सात बार कपड़ मिट्टी लगाकर उसे एक अङ्गुल मोटी बना लेवे' इस आतसी शीशी का मुख पतला होना चाहिए, फिर इसके तीन भाग को रस (पारदकज्जली) से भर कर तीन भाग में बालुका से भरी हुई एक नांदमें (लोहे की या मिट्टी की हो) आतसी शीशी को रख कर उस नांद को शराव अथवा अन्य बड़े कुण्डे से ढक कर सन्धि को कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देना चाहिए, पश्चात् इस यंत्र को चूल्हे पर चढा कर पाक करे' । जब उस शराव पर तृणों को रखने से वे जलने लगें तब पाक हुआ समझना चाहिए । इसको बालुकायंत्र कहते हैं । यदि रेत के स्थान में लवण भर दिया जाय तो उसे लवण यंत्र कहते हैं ॥ ३३-३५ ॥
अथ बालुकायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—
पञ्चाढवालुकापूर्णभाण्डे निक्षिप्य यत्नतः ।
पच्यते रसगोलाद्यं बालुकायन्त्रमीरितम् ॥ ३६ ॥
किसी एक भाण्ड में ५ आढक रेती भर कर उसके अन्दर ही शराव में सम्पुटित हुए पारद को रखकर पकाते हैं, इसको भी बालुका यंत्र कहते हैं ॥ ३६ ॥
अथ लवणयन्त्रम्—
एवं लवणनिक्षेपात्प्रोक्तं लवणयन्त्रकम् ॥ ३७ ॥
इसी तरह यदि बालू के स्थान में लवण भर दिया जाय तो वह लवण यंत्र कहलाता है ॥ ३७ ॥
२५४ रसरत्नसमुच्चये—
अथ प्रकारान्तरम्—
अन्तः कृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धिं भाण्डतलस्य च ॥ ३८ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य क्षारैर्वा पूर्ववत्पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद्रसकर्मणि शस्यते ॥ ३९ ॥
किसी एक ताम्र के पात्र के अन्दर औषधों के साथ पारद को घोट कर लेप करके उस पात्र को सुखाकर एक मिट्टी के अन्दर औंधा करके रख दें । फिर उस ताम्रपात्र के मुख को उस भाण्ड या कूण्डे की तली के साथ मिट्टी तथा लवण की पिष्ठी बनाकर उससे उन दोनों का सन्धिवन्धन करना चाहिए । फिर उस भाण्ड तथा ताम्र पात्र को वालुका अथवा क्षार या लवण से भर कर पकाना चाहिए । इसको भी लवणयंत्र कहते हैं । इस तरह का लवणयंत्र रसकर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३८-३९ ॥
अथ नालिकायन्त्रम्—
लोहनालगतं सूतं भाण्डे लवणपूरिते ।
निरुद्धं विपचेत्प्राग्वन्नालिकायन्त्रमीरितम् ॥ ४० ॥
एक लोह की नली बनवाकर उसमें उपयुक्त औषधों के साथ पारद को भर कर उसका मुख बन्द कर के लवण यंत्र के मध्य में गाड़ दें । फिर लवण यंत्र के मुख को सकोरे द्वारा कपड़मिट्टी से बन्द करके पकाना चाहिए । इसको नालिकायंत्र कहते हैं ॥ ४० ॥
अथ भूधरयन्त्रम्—
वालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद्यन्त्रं तद्भूधराह्वयम् ॥ ४१ ॥
पृथ्वी में एक हाथ गहरा गड्ढा खोद कर उसको वालुका से आधा भर दें, फिर उस वालुका पर औषध युक्त पारद से भरी हुई मूषा रख दें । मूषाका मुख बन्द कर के ऊपर से उस मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों को जला देना चाहिए, इसको भूधर यंत्र कहते हैं ॥ ४१ ॥
अथ पुटयन्त्रम्—
शरावसम्पुटान्तःस्थं करीषेष्वग्निमानवित् ।
पचेच्चुल्ल्यां द्वियामं वा रसं तत्पुटयन्त्रकम् ॥ ४२ ॥