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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पञ्चमोऽध्यायः । १५७

पञ्चमोऽध्यायः । १५७

और ओषधियों के साथ धातुओं का मारण मध्यम होता है तथा गन्धक मनःशिला आदि के साथ धातुओं ( लोह ) का मारण कनिष्ठ होता है और हरताल के साथ से मारण करने से लोहों में अवगुण उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥

अथ स्वर्णमारणम्—
कृत्वा कण्टकवेध्यानि स्वर्णपत्राणि लेपयेत् ।
लुङ्गाम्बुभस्मसूतेन म्रियते दशभिः पुटैः ॥ १४ ॥
शुद्ध किये सोने के सूई से छेदन करने लायक पत्र बनाकर निम्बू के रस में घोटे हुए पारद का मर्दनविधि से उन पर लेप कर देना चाहिये । इस तरह दस पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ १४ ॥

अन्यविधिः—
द्रुते विनिक्षिपेत्स्वर्णे लोहमानं मृतं रसम् ।
विचूर्ण्य लुङ्गतोयेन दरदेन समन्वितम् ॥
जायते कुङ्कुमच्छायं स्वर्णं द्वादशभिः पुटैः ॥ १५ ॥
अथवा स्वर्ण को पिघला कर समान पारे की भस्म मिलाकर बिजौरे निम्बू के रस से घोटकर स्वर्ण के समान हिङ्गुल मिलाकर घोटकर १२ पुट देने से स्वर्ण की केशर के समान लाल भस्म हो जाती है ॥ १५ ॥

अन्यविधिः—
हेम्नः पादं मृतं सूतं पिष्टमम्लेन केनचित् ।
पत्रे लिप्त्वा पुटैः पच्यादष्टभिर्म्रियते ध्रुवम् ॥ १६ ॥
अथवा सुवर्ण से चतुर्थांश पारद भस्म को किसी अम्ल में घोट कर सुवर्ण के पत्रों पर लेप कर दें, फिर पुट देवें । इस तरह आठ पुट देने से निश्चय ही सुवर्ण-भस्म हो जाती है । प्रत्येक पुट में चतुर्थांश पारद भस्म डालनी चाहिये ॥ १६ ॥

स्वर्णद्रावणम्—
मण्डूकास्थिवसाटङ्कहयलालेन्द्रगोपकैः ।
प्रतिवापेन कनकं सुचिरं तिष्ठति द्रुतम् ॥ १७ ॥
**सुवर्णद्रुतिः—**सुवर्ण को गलाकर मेंढक की हड्डी का चूर्ण और चर्बी, सुहागा, घोड़ेकी लाला ( लार ), वीर बहूटी इनके साथ घोट कर फिर अग्नि पर फूंकने से सुवर्ण की बहुत समय तक ठहरने लायक द्रुति हो जाती है ॥ १७ ॥

१५८ रसरत्नसमुच्चये—

अन्यविधिः—
चूर्णं सुरेन्द्रगोपानां देवदालीफलद्रवैः ।
भावितं सदृशं हेम करोति जलवद्द्रुतम् ॥ १८ ॥
अथवा इन्द्रगोप के चूर्ण को देवदाली ( बन्दाल ) के रस से भावित कर इसको सोने में मिलाकर फूंकने से वह जल के समान द्रुत हो जाता है ॥ १८ ॥

स्वर्णभस्मप्रयोगविधिः—
एतद्भस्म सुवर्णजं कटुघृतोपेतं द्विगुञ्जोन्मितं
लीढं हन्ति नृणां क्षयाग्निसदनं श्वासं च कासारुचिम् ।
ओजोधातुविवर्धनं बलकरं पाण्ड्वामयध्वंसनं
पथ्यं सर्वविषापहं गरहरं दुष्टग्रहण्यादिनुत् ॥ १९ ॥
सुवर्णभस्मसेवनविधि—दो रत्ती सुवर्ण भस्म को त्रिकटु और घृत के साथ सेवन करने से मनुष्यों के श्वास, कास, अरुचि, क्षय, अग्निमांद्य, पाण्डु, सर्पविषबाधा, सर्वविषबाधा, दुष्ट ग्रहणी आदि अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं तथा ओज(१) बल और सप्त (२)धातुओं की वृद्धि होती है और यह अत्यन्त हितकर है ॥ १९ ॥

अशुद्धामारित स्वर्णदोषाः—
बलं च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं कोपयतीव काये ।
असौख्यकारं च सदैव हेमापक्वं सदोषं मरणं करोति ॥२०॥

इति स्वर्णाधिकारः—

अशुद्धस्वर्णदोषः—
अशुद्ध और उत्तमविधि से अपक्व सुवर्ण के सेवनकरने से मनुष्यों के बल-


( १ ) हृदि तिष्ठति यच्छुद्धमीषद्रक्तं सपीतकम् ।
ओजः शरीरे सङ्ख्यातं तन्नाशान्न विनश्यति ॥
अष्टबिन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् ।
अग्निषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितञ्च तत् ॥
ओजश्च तेजोधातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ।
हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् ॥

( २ ) रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः ।

पञ्चमोऽध्यायः।
१५९

और वीर्य्य का हरण होता है, शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं तथा बैचेनी और मरण करता है ॥ २० ॥

अथ रजतम्—रजतभेदाः—
सहजं खनिजञ्जातं कृत्रिमं त्रिविधं मतम् ।
रजतं पूर्वपूर्वं हि स्वगुणैरुत्तरोत्तरम् ॥ २१ ॥
चान्दी सहज, खनिज और कृत्रिम भेद करके तीन तरह की होती है । तीनों में पूर्व पूर्व की चांदी अपने २ गुणों में उत्कृष्ट होती है ॥ २१ ॥

सहजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च—
कैलासाद्यद्रिसम्भूतं सहजं रजतं भवेत् ।
तत्स्पृष्टं हि सकृद्व्याधिनाशनं देहिनां भवेत् ॥ २२ ॥
कैलासादि पर्वत में उत्पन्न होने वाली चान्दी सहज होती है । इसके स्पर्श मात्र से मनुष्यों की व्याधियां तुरन्त नष्ट हो जाती हैं ॥ २२ ॥

खनिजरौप्योत्पत्ति गुणाश्च—
हिमालयाद्रिकूटेषु यद्रूप्यं जायते हि तत् ।
खनिजं कथ्यते तज्ज्ञैः परमं हि रसायनम् ॥ २३ ॥
हिमालय आदि पर्वतों के शिखरों की खानों से उत्पन्न चान्दी को विद्वान् लोग खनिज चान्दी कहते हैं और वह उत्तम रसायन है ॥ २३ ॥

कृत्रिमरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च—
श्रीरामपाडुकान्यस्तं वङ्गं यद्रूप्यतां गतम् ।
तत्पादरूप्यमित्युक्तं कृत्रिमं सर्वरोगनुत् ॥ २४ ॥
श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के स्पर्श से जो वङ्ग चान्दी के रूप में परिणत हुआ उसको रामचन्द्रजी के चरण की कृत्रिम चान्दी कहते हैं। यह सर्वरोगों को नष्ट करती है॥२४॥

उत्तमरौप्यलक्षणम्—
घनं स्वच्छं गुरु स्निग्धं दोहे छेदे सितं मृदु ।
शङ्खाभं मसृणं स्फोटरहितं रजतं शुभम् ॥ २५ ॥
श्रेष्ठ रजत के लक्षण—जो चान्दी वजनदार, खच्छ, भारी, स्निग्ध जलाने और काटने पर श्वेत, कोमल, मसृण, शङ्ख के समान और खातों से रहित हो वह औषधि में श्रेष्ठ है ॥ २५ ॥

१६० रसरत्नसमुच्चये—

निकृष्टरौप्यलक्षणम्—

दाहे रक्तं च पीतं च कृष्णं रूक्षं स्फुटं लघु ।
स्थूलाङ्गं कर्कशाङ्गं च रजतं त्याज्यमष्टधा ॥ २६ ॥

जो चान्दी तपाने से लाल, पीत और कृष्ण मालूम हो तथा रूक्ष, हलकी, खात युक्त, मोटे अङ्ग वाली और कठोर हो वह त्याज्य है ॥ २६ ॥

अथ रौप्यगुणाः—

रूप्यं विपाकमधुरं तुवराम्लसारं
शीतं सरं परमलेखनकं च रूप्यम् ।
स्निग्धं च वातकफजिज्जठराग्निदीपि
वल्यं परं स्थिरवयस्करणञ्च मेध्यम् ॥ २७ ॥

चांदी के गुण—
चांदी पाक में मधुर, कषाय, अम्लरस वाली और शीतल, दस्तावर, शरीर के भेद को नष्ट करने वाली, स्निग्ध वात और कफ के रोग को नष्ट करने वाली, जठराग्नि की दीपक, बलदायक, अत्यन्त बुद्धिवर्द्धक और अवस्था बढ़ाने वाली होती है ॥ २७ ॥

अथ गुणान्तरम्—

रौप्यं शीतं कषायाम्लं स्निग्धं वातहरं गुरु ।
रसायनविधानेन सर्वरोगापहारकम् ॥ २८ ॥

चान्दी शीतल, कषाय, अम्ल, स्निग्ध, वातहर, गुरु और रसायन विधि से सब रोगों का नाश करने वाली है ॥ २८ ॥

स्वर्णादिशोधनम्—

तैले तक्रे गवां मूत्रे ह्यारनाले कुलत्थजे ।
क्रमात्तन्निषेचयेत्तप्तं द्रावे द्रावे तु सप्तधा ॥
स्वर्णादिलोहपत्राणां शुद्धिरेषा प्रशस्यते ॥ २९ ॥

स्वर्णादि-लोह पत्रों को प्रतप्त कर तिलतैल, मट्ठा, गोमूत्र, काञ्जी, कुलत्थक्वाथ इन में से प्रत्येक में सात २ वार बुझाना चाहिए । इस तरह सोना और चान्दी के पत्रों की शुद्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २९ ॥