रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
नवमोऽध्यायः । २५५
नवमोऽध्यायः । २५५
एक सकोरे के अन्दर औषधमिश्रित पारद भर कर उस सकोरे को दूसरे सकोरे के साथ सम्पुट करके कपड़मिट्टी कर सुखा लेवे, फिर उस सम्पुट को उपलों की आँच अथवा चूल्हे पर रखकर यथाप्रमाण के अनुकूल समय तक या दो प्रहर तक पकाना चाहिए । इसको पुटयंत्र कहते हैं ॥ ४२ ॥
अथ कोष्ठीयन्त्रम्—
षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्त्वनिपातार्थं कोष्ठीयन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४३ ॥
सोलह अङ्गुल चौड़ी और एक हाथ भर लम्बी तथा समान आकार की एक मूषा बनवाना चाहिए । इसको कोष्ठीयंत्र कहते हैं । यह यंत्र धातु तथा रत्न इत्यादि के सत्त्वों को निकालने के लिये उत्तम होता है ॥ ४३ ॥
अथ वलभीयन्त्रम्—
यत्र लोहमये पात्रे पार्श्वयोर्वलयद्वयम् ।
तादृक् स्वल्पतरं पात्रं वलयप्रोतकोष्ठकम् ॥ ४४ ॥
पूर्वपात्रोपरि न्यस्य स्वल्पपात्रे परिक्षिपेत् ।
रसं सम्मूर्च्छितं स्थूलपात्रमापूर्य काञ्जिकैः ॥ ४५ ॥
द्वियामं स्वेदयेदेवं रसोत्थापनहेतवे ।
एतत्स्याद्वलभीयन्त्रं रसे षाड्गुण्यकारकम् ॥
सूक्ष्मकान्तमये पात्रे रसः स्याद्गुणवत्तरः ॥ ४६ ॥
एक बड़े आकार का कान्तलौह का पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके भीतर की ओर किनारों से कुछ नीचे दोनों पाश्र्वों में दो कड़े लगवा देना चाहिये । फिर एक दूसरा छोटा पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके बाह्य भाग के बीच में दोनों ओर दो कड़े लगवा देना चाहिए, इस छोटे पात्र को बड़े पात्र के अन्दर रख कर दोनों के कड़ों को परस्पर जञ्जीर से बांध दें । बड़े पात्र में काञ्जी और छोटे पात्र में सम्मूर्च्छित पारद डाल कर ऊपर से ढक देना चाहिये । फिर इस यंत्र को चूल्हे पर चढ़ा कर दो प्रहर तक स्वेदन करते हैं इस तरह के स्वेदन से संमूर्च्छित पारद फिर अपने रूप को प्राप्त हो जाता है । यह वलभीयंत्र कहा जाता है । इससे स्वेदित पारदके अन्दर ६ प्रकारके विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता, क्रिया आदि गुण उत्पन्न होते हैं । साधारण लौहे की अपेक्षा सूक्ष्म कान्तलौह
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के बने हुए पात्रमें रसका स्वेदन करने से वह अधिक गुणों वाला हो जाता है॥४४-४६॥
अथ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—
क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुड्यन्तरे खलु ॥ ४७ ॥
तत्र रुध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥ ४८ ॥
इतरस्मिन्घटे तोयं प्रक्षिपेत्स्वादु शीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥ ४९ ॥
एक मिट्टी के घड़े में रस रखकर उसकी ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घड़े के मध्यभाग में छिद्र बनाकर उसमें प्रविष्ट कर देवें। फिर दोनों घड़ों के मुख तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर देना चाहिए। पश्चात् जिस घड़े में पारद रखा हो उसके नीचे अग्नि जला देवें और दूसरे पात्र के ऊपर शीतल जल डालते रहना चाहिए अथवा इस घड़े में मुखबन्धन के पूर्व ही थोड़ा सा शीतल जल भर देना चाहिए। इस तरह अग्नि के ताप से पूर्व घट से पारद उड़ कर तिर्यक् नली के द्वारा वह दूसरे घट के अन्दर पानी में गिर जाता है। वार्त्तिककारों ने इस यन्त्र को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है ॥ ४७-४९ ॥
अथ पालिकायन्त्रम्—
चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोध्वर्दण्डकम् ।
एतद्धि पालिकायन्त्रं बलिजारणहेतवे ॥ ५० ॥
लोहे का एक गोल चषक (प्याला) बनाकर उसके किनारे के पास ही अग्र-भाग में झुका हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ एक दण्ड लगवा देना चाहिए। इसको पालिकायंत्र कहते हैं। यह यंत्र गन्धक के जारण करने में उपयोगी होता है ॥५०॥
अथ घटयन्त्रम्—
चतुष्प्रस्थजलाधारश्चतुरङ्गुलिकाऽऽननः ।
घटयन्त्रमिदं प्रोक्तं तदाप्यायनकं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
एक ऐसा घट लेना चाहिए जिसमें चार प्रस्थ (६४ पल) पानी का समा-
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वेश हो सके तथा चार अङ्गुल चौड़ा जिसका मुख हो, इस प्रकार के घट को घट-यन्त्र कहते हैं तथा इसका दूसरा नाम आप्यायनक भी है। इस यंत्र के द्वारा रसादिक का तर्पण (प्लावन) करते हैं ॥ ५१ ॥
अथ इष्टिकायन्त्रम्—
विधाय वर्त्तुलं गतं मल्लमात्रं निधाय च ।
विनिधायेष्टकां तत्र मध्यगर्तवतीं शुभाम् ॥ ५२ ॥
गर्तस्य परितः कुर्यात्पालिकामङ्गुलोच्छ्रयाम् ।
गर्ते सूतं विनिक्षिप्य गर्तास्ये वसनं क्षिपेत् ॥ ५३ ॥
निक्षिपेद्गन्धकं तत्र मल्लेनाऽऽस्यं निरुध्य च ।
मल्लपालिकयोर्मध्ये मृदा सम्यङ् निरुध्य च ॥ ५४ ॥
वनोत्पलैः पुटं देयं कपोताख्यं न चाधिकम् ।
इष्टिकायन्त्रमेतत्स्याद्गन्धकं तेन जारयेत् ॥ ५५ ॥
पृथ्वी में एक गोलाकार गड्ढा खोदकर उसमें लोहे का अथवा मिट्टी का १ मजबूत सकोरा रख देवें। फिर उस सकोरे पर बीच में छिद्र की हुई एक इष्टिका (ईंट) रखकर उस इष्टिका के छिद्र के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंचाई वाली पाली (थाला या आलवाल) बना करके उस ईंट के छिद्र में पारद डालकर छिद्र के मुख पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए। उस वस्त्र पर गन्धक बिछा कर एक दूसरे सकोरे से उसका मुख बन्दकर देना चाहिए। ईंट के छिद्र के चारों ओर बनाई हुई पालिका तथा उस पर ढके हुए मल्ल (कटोरी या सकोरा) इन दोनों के बीच के अवकाश को ठीक तरह से कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर जंगली उपलों की आंच से कपोत पुट देना चाहिए, ज्यादा आंच नहीं देना चाहिए। इसको इष्टिकायंत्र कहते हैं। इससे पारद इत्यादि धातुओं के साथ गन्धक का जारण करते हैं ॥५२-५५॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टिविद्याधरयन्त्रम्—
स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं सम्यङ् निरुध्य च ।
ऊर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥
एतद्विद्याधरं यन्त्रं हिङ्गुलाकृष्टिकहेतवे ॥ ५६ ॥
एक हण्डिका (जो कि भीतर से चौड़ी हो और जिसके भीतरी भाग में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप किया हुआ होना चाहिए) के ऊपर दूसरी
रस० १७
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-हण्डिका रख कर नीचे की हण्डिका के मुख को ऊपर रखी हुई हण्डिका के पृष्ठ भाग के साथ अच्छी तरह कपड़मिट्टी से बन्द कर के फिर ऊपर की हण्डिका में जल भर देते हैं और चूल्हे पर चढ़ाकर नीचे की हण्डिका को आंच पहुंचाते हैं। इसको विद्याधरयंत्र कहते हैं। इस यंत्र का उपयोग हिंगुल से पारद को निकालने के लिये करते हैं ॥ ५६ ॥
अथ डमरुयन्त्रम्—
यन्त्रस्थाल्युपरि स्थालीं न्युब्जां दत्त्वा निरुन्धयेत्।
यन्त्रं डमरुकाख्यं तद्रसभस्मकृते हितम् ॥ ५७ ॥
एक मिट्टी की हण्डिका लेकर इसके मुख को दूसरी हण्डिका के मुख के साथ सन्धिबन्धन कर देते हैं। इस यंत्र की आकृति डमरू के समान हो जाती है इस लिये इसको डमरूयंत्र कहते हैं। यह डमरूयंत्र पारद की भस्म करने के लिये उपयोगी होता है ॥ ५७ ॥
अथ नाभियन्त्रम्—
मल्लमध्ये चरेद्गर्तं तत्र सूतं सगन्धकम्।
गर्तस्य परितः कुड्यं प्रकुर्यादङ्गुलोच्छ्रितम् ॥ ५८ ॥
ततश्चाऽऽच्छादयेत्सम्यग्गोस्तनाकारमूषया।
सम्यक् तोयमृदा रुद्ध्वा सम्यगत्राच्यमानया ॥ ५९ ॥
एक सकोरे के भीतर गड्ढा बना कर उसमें गन्धक और पारद भर देवे। फिर उस गड्ढे के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंची पाली (अलवाल या मेड़ के समान) बना कर उस पाली को गाय के स्तन की आकृति वाली मूषा से (औंधाकर) ढक करके अच्छी प्रकार बनाई हुई तोयमृत्तिका से अच्छी तरह पाली तथा मूषा की सन्धि या अवकाश को बन्दकर देना चाहिए इसी को नाभियन्त्र कहते हैं ॥ ५८–५९ ॥
तत्र तोयमृल्लक्षणम्—
लेहवत्कृतबब्बूलक्वाथेन परिमर्दितम्।
जीर्णकिट्टरजः सूक्ष्मं गुडचूर्णसमन्वितम्।
इयं हि जलमृत्प्रोक्ता दुर्भेद्या सलिलैः खलु ॥ ६० ॥
पुराणे लोहकिट्ट के चूर्ण (मण्डूर चूर्ण) को चूना और गुड़ के साथ मिला-
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कर इन तीनों को बबूल के क्वाथ से खूब घोटकर लेह के समान बना लेते हैं। इसको जलमृत्तिका कहते हैं। इस मृत्तिका से सन्धिवन्धन करने से जलादिक से यह सन्धि की मिट्टी नहीं छूट सकती है ॥ ६० ॥
तत्र वह्निमृत्स्ना—
खटिकापटुकित्तैश्च महिषीदुग्धमर्दितैः ।
वह्निमृत्स्ना भवेद्घोरवह्नितापसहा खलु ॥ ६१ ॥
एतया मृत्स्नया रुद्धो न गन्तुं क्षमते रसः ।
विदग्धवनिताप्रौढप्रेम्णा रुद्धः पुमानिव ॥ ६२ ॥
खड़िया, निमक और मण्डूर के चूर्ण को भैंस के दुग्ध से अच्छी प्रकार घोटकर वह्निमृत्स्ना बनाई जाती है, यह वह्निमृत्तिका अत्यन्त तेज अग्नि के ताप को सहन कर सकती है। इस मृत्तिका से कपरोटी करके रोका हुआ पारद अत्यन्त तेज आंच लगने पर भी हावभाव कटाक्षादि करने में चतुर नायिका के प्रगाढ प्रेम से रुके हुए पुरुष की तरह कहीं उड़कर नहीं जा सकता है ॥ ६१-६२ ॥
शेषनाभियन्त्रवर्णनम्—
नन्दी नागार्जुनश्चैव ब्रह्मज्योतिर्मुनीश्वरः ।
वेत्ति श्रीसोमदेवश्च नापरः पृथिवीतले ॥ ६३ ॥
ततो जलं विनिक्षिप्य वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
नाभियन्त्रमिदं प्रोक्तं नन्दिना सर्ववेदिना ॥
अनेन जीर्यते सूतो निर्धूमः शुद्धगन्धकः ॥ ६४ ॥
इस यंत्र की विधि को नन्दी, नागार्जुन, ब्रह्मज्योति, मुनीश्वर और सोमदेव ये ही पांचों रस-शास्त्र के आचार्य जानते हैं। इसको इस पृथ्वी में दूसरा कोई नहीं जानता है। फिर इस प्रकार उस यन्त्र को चूल्हे पर चढा कर के आलवाल तथा मूषा के चारों तरफ़ के बचे हुए सकोरे के अवकाश में जलभर के नीचे आग जला देनी चाहिए। सर्व प्रकार की रस की क्रियाओं के ज्ञाता नन्दी ने इसको नाभियंत्र कहा है। इस यंत्र के द्वारा शुद्धगन्धक के साथ पारद का निर्धूम जारण हो जाता है ॥ ६३-६४ ॥
अथ ग्रस्तयन्त्रम्—
मूषां मूषोदराविष्टामारद्यन्तःसमवर्तुलाम् ।
२६० रसरत्नसमुच्चये—
चिपिटां च तले प्रोक्तं ग्रस्तयन्त्रं मनीषिभिः ॥
सूतेन्द्ररन्धनार्थं हि रसविद्भिरुदीरितम् ॥ ६५ ॥
प्रारम्भ से अन्त तक एक समान लम्बी, चौड़ी और गोल तथा तल भाग में कुछ चिपटी हो ऐसी एक मूषा बनवा कर उसमें पारद इत्यादि को भर कर ऐसी ही एक दूसरी मूषा के साथ सन्धिवन्धन कर देना चाहिए। इसको रसशास्त्र के पण्डित ग्रस्तयंत्र कहते हैं। इस यंत्र से पारद का पाक या भस्म करते हैं ॥ ६५ ॥
अथ स्थालीयन्त्रम्—
स्थाल्यां ताम्रादि निक्षिप्य मल्लेनाऽस्यं निरुध्य च ।
पच्यते स्थालिकाधस्तात्स्थालीयन्त्रमिदं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
एक मिट्टी की हण्डिका में ताम्र अथवा अन्य धातु भरकर (अम्लरस या क्वाथ के साथ) सकोरे से हण्डिका का मुख कपड़मिट्टी से अच्छी तरह बन्दकर के हण्डिका के नीचे अग्नि जलाते हैं। इसको स्थालीयन्त्र कहते हैं ॥ ६६ ॥
अथ धूपयन्त्रम्—
विधायाष्टाङ्गुलं पात्रं लौहमष्टाङ्गुलोच्छ्रयम् ।
कण्ठाधो द्व्यङ्गुले देशे गलाधारे हि तत्र च ॥ ६७ ॥
तिर्यग्लोहशलाकाश्च तन्वीस्तिर्यग्विनिक्षिपेत् ।
तनूनि स्वर्णपत्राणि तासामुपरि विन्यसेत् ॥ ६८ ॥
पत्राधो निक्षिपेद्धूमं वक्ष्यमाणमिहैव हि ।
तत्पात्रं न्युब्जपात्रेण च्छादयेदपरेण हि ॥ ६९ ॥
मृदा विलिप्य सन्धिञ्च वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
तेन पत्राणि कृत्स्नानि हतान्युक्तविधानतः ॥ ७० ॥
रसश्चरति वेगेन द्रुतं गर्भे द्रवन्ति च ।
गन्धालकशिलानां हि कज्जलया वा मृताहिना ॥ ७१ ॥
धूपनं स्वर्णपत्राणां प्रथमं परिकीर्त्तितम् ।
तारार्थं तारपत्राणि मृतवङ्गेन धूपयेत् ॥ ७२ ॥
धूपयेच्च यथायोग्यैरन्यैरुपयसैरपि ।
धूपयन्त्रमिदं प्रोक्तं जारणाद्रवसाधने ॥ ७३ ॥
आठ अङ्गुल चौड़ा और आठ ही अङ्गुल ऊंचा एक लोह का पात्र बनवा कर