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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः । ९५

तृतीयोऽध्यायः । ९५

रसस्य बन्धनाथार्य जारणाय भवत्वलम् ।
ये गुणाः पारदे प्रोक्तास्ते चैवात्र भवन्विति ॥ ११ ॥
इति देवगणैः प्रीतैः पुरा प्रोक्तं सुरेश्वरि ।
तेनायं गन्धको नाम विख्यातः क्षितिमण्डले ॥ १२ ॥
इस तरह पार्वतीजी के प्रश्न करने पर शिवजी कहने लगे हे देवि ? किसी
समय श्वेतद्वीप नामक देश में सर्वरत्नों से शोभायमान, निखिल कामदेव की
सामग्री वाले क्षीरसमुद्र के तट पर श्रेष्ठ सिद्धाङ्गनाओं, अप्सराओं, विद्याधरियों
योगिनियों और देवताओं की स्त्रियों के साथ नाना प्रकार की रासक्रीड़ा तथा
मनोहर गीत, नृत्य, वाद्य आदि क्रीड़ा करते करते तुम्हारा रजःस्राव हो गया ।
हे सुश्रोणि ? वह रज अत्यन्त सुगन्धित और मनोहर तथा उस रज के अधिक
निकलने से तुम्हारे वस्त्र लाल हो गये, तब तुम उन रञ्जित वस्त्रों को वहीं छोड़
कर क्षीर समुद्र में स्नान कर देवताओं की स्त्रियों के साथ कैलास पर्वत पर चली
आईं । उधर वे रज के वस्त्र तरङ्गों के द्वारा क्षीरसमुद्र में मिल गये । हे भद्रे ? इस
तरह तुम्हारा आर्तव शोणित क्षीर सागर में प्रविष्ट हो गया । जिस समय क्षीर
सागर का मथन होने लगा उस समय यह रज सभी दानवों को अपनी सुगन्ध से
प्रसन्न करता हुआ अमृत के साथ बाहर निकला, तब देव समाज ने कहा कि यह
संसार में गन्धक कहलाएगा और पारद के बन्धन तथा जारण के लिये समर्थ
होगा और जो गुण पारद में हैं वे सब इस में भी होंगे । हे सुरेश्वरि ? प्रसन्न
हुए देवताओं ने इस तरह गन्धक के विषय में कहा है । तभी से यह खनिज
संसार में गन्धक के नाम से विख्यात हुआ ॥ ३-१२ ॥
अथ गन्धकभेदाः—
स चापि त्रिविधो देवि शुकचञ्चुनिभो वरः ।
मध्यमः पीतवर्णः स्याच्छुक्लवर्णोऽधमः प्रिये ॥ १३ ॥
चतुर्धा गन्धको ज्ञेयो वर्णैः श्वेतादिभिः खलु ।
श्वेतोऽत्र खटिका प्रोक्तो लेपने लोहमारणे ॥ १४ ॥
तथो चामलसारः स्याद्यो भवेत्पीतवर्णवान् ।
शुकपिच्छः स एव स्याच्छ्रेष्ठो रसरसायने ॥ १५ ॥
रक्तश्च शुकतुण्डाख्यो धातुवादविधौ वरः ।

९६ | रसरत्नसमुच्चये—

दुर्लभः कृष्णवर्णश्च स जरामृत्युनाशनः ॥ १६ ॥

हे देवि ! वह गन्धक तीन प्रकारका है । प्रथम तोते की चोञ्च के समान लाल वर्ण वाला होता है वह उत्तम है। दूसरा पीले वर्ण का होता है वह मध्यम होता है। तृतीय श्वेत वर्ण का होता है वह अधम है। कुछ लोगों का मत है कि श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार तरह का होता है । इन में श्वेत गन्धक को खटिक कहते हैं । क्यों कि यह खड़िया के समान सफेद होता है । यह लेप करने में तथा लौह मारण में काम आता है और जो गन्धक पीले वर्ण का होता है उसे आमला सार गन्धक कहते हैं । इसी का एक दूसरा भेद होता है, उस का नाम शुक पिच्छ है, वह रस और रसायन में श्रेष्ठ होता है । जो गन्धक तोते की चोञ्च समान होता है वह सोना, चांदी इत्यादि धातुओं के बनाने में श्रेष्ठ होता है। जो कृष्ण वर्ण का गन्धक होता है वह जरा और मृत्यु को नष्ट करता है किन्तु वह दुर्लभ है ॥ १३-१६ ॥

अथ गन्धकगुणाः—

गन्धाश्मातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णो मतः ।
कण्डूकुष्ठविसर्पदद्रुदलनो दीप्तानलः पाचनः ॥
आमोन्मोचनशोषणो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः ।
गौरीपुष्पभवस्तथा कृमिहरःसत्त्वात्मकः सूतजित् ॥ १७ ॥
बलिना सेवितः पूर्वं प्रभूतबलहेतवे ॥ १८ ॥

गन्धक श्रेष्ठ रसायन है तथा स्वाद में मधुर तथा पाक में कटु एवं उष्ण है । यह खुजली, कुष्ठ, विसर्प ( फैलने वाली खुजली ) और दद्रु को नष्ट करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है, अग्नि दीप्त करता है, आंव को दूर करता है तथा उस का शोषक है, विषनाशक तथा पारद के गुणों का उत्कर्ष बढ़ाता है । प्लीहावृद्धि, आध्मान और कृमियों को नष्ट करता है । सत्त्वस्वरूप गन्धक पारद को जीतने वाला है। पूर्वकाल में शक्ति प्राप्ति के लिये राजा बली ने इस का सेवन किया था ॥ १७-१८ ॥

अथ बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिः—

वासुकिं कर्षतस्तस्य तन्मुखज्वालया द्रुता ।
वसा गन्धकगन्धाढ्या सर्वतो निःसृता तनोः ॥ १६ ॥
गन्धकत्वं च सम्प्राप्ता गन्धोऽभूत्सविषःस्मृतः ।

तृतीयोऽध्यायः । ९७

तस्माद्वलिवसेत्युक्तो गन्धकोऽतिमनोहरः ॥ २० ॥

समुद्र के मन्थन के समय वासुकी को खींचते हुए उस के मुख की ज्वाला से मिली हुई राजा बली के शरीर से गन्धक की गन्ध से मिली हुई जो वसा (चर्बी) निकली वही गन्धक के स्वरूप को प्राप्त होकर विषगन्धक कहलाई । इस अत्यन्त मनोहर गन्धक को बलिवसा कहते हैं ॥ १९–२० ॥

अथ गन्धकशुद्धिः—
पयः स्विन्नो घटीमात्रं वारिधौतो हि गन्धकः ।
गव्याज्यविद्रुतो वस्त्राद्गालितः शुद्धिमृच्छति ॥ २१ ॥
एवं संशोधितः सोऽयं पाषाणानंबरे त्यजेत् ।
घृते विषं तुषाकारं स्वयं पिण्डत्वमेव च ॥ २२ ॥
इति शुद्धो हि गन्धाश्मा नापथ्यैर्विकृतिं व्रजेत् ।
अपथ्यादन्यथा हन्यात्पीतं हालाहलं तथा ॥ २३ ॥

गन्धक को एक घण्टे तक दुग्ध में स्वेदन कर जल से धो डालें । फिर उसे चूल्हे पर कढ़ाई में द्रव कर के वस्त्र से छान डालें । इस प्रकार से शुद्ध हुए गन्धक के पाषाण के टुकड़े तथा अन्य मल निकल जाते हैं। और विष बिन्दुओं के रूप में घी के ऊपर तैरने लगता है । स्वयं गन्धक ठंडक से पिण्ड के स्वरूप का हो जाता है । इस तरह से शुद्ध गन्धक के सेवन करने पर अपथ्य होने पर भी विकार उत्पन्न नहीं होता । किन्तु अशुद्ध गन्धक सेवन करने पर अपथ्य हो जाय तो वह हालाहल विष की तरह मनुष्य को मार डालता है । गन्धक को पिघला (द्रुत) कर भृङ्गराज के रस मेँ छोड़ने से शुद्ध हो जाता है । इस तरह सात बार करना चाहिए । प्रत्येक समय में भृङ्गराज का रस बदलना चाहिये और गन्धक को उष्ण जल से धोना चाहिए ॥ २१–२३ ॥

मतान्तरम्—
गन्धको द्रावितो भृङ्गरसे क्षिप्तो विशुध्यति ।
तद्रसैः सप्तधा भिन्नो गन्धकः परिशुध्यति ॥ २४ ॥

अथवा गन्धक को द्रुत करके सात बार भृङ्गराज (भांगरे) के रस में बुझाने से भी शुद्धि हो जाती है अथवा भृङ्गराज के स्वरस से आप्लावित करके सूर्योदय से सूर्यास्त तक घोटे’ । इस तरह सात बार घोटने से वह शुद्ध हो जाता ॥ २४ ॥

रस० ७

९८
रसरत्नसमुच्चये-

अथ मतान्तरम्-

स्थाल्यां दुग्धं विनिक्षिप्य मुखे वस्त्रं निबध्य च ।
गन्धकं तत्र निक्षिप्य चूर्णितं सिकताकृतिम् ॥ २५ ॥
छादयेत्पृथुदीर्घेण खर्परेणैव गन्धकम् ।
ज्वालयेत्खर्परस्योर्ध्वं वनच्छाणैस्तथोपलैः ॥ २६ ॥
दुग्धे निपतितो गन्धो गलितः परिशुध्यति ।
शतवारं कृतञ्चैव निर्गन्धो जायते ध्रुवम् ॥ २७ ॥

एक हण्डिका में दुग्ध (जितने में गन्धक डूब सके) भर कर पतले शुद्ध वस्त्र से उसका मुख बांध देना चाहिए तथा उस वस्त्र पर गन्धक का बारीक चूर्ण कर रख दें और ऊपर से शराव द्वारा ढक दें, बाद में सकोरे पर जङ्गली उपलों (छाणों) की अग्नि जलादें। इससे गन्धक पिघल कर वस्त्र से छन कर दुग्ध में पड़ जाता है और शुद्ध हो जाता है। इस तरह सौ बार करने से गन्धक निःसन्देह गन्ध रहित हो जाता है ॥ २५–२७ ॥

अथ प्रयोगः-

इत्थं विशुद्धस्त्रिफलाज्यभृङ्गमध्वन्वितः शाणमितो हि लीढः ।
गृध्राक्षितुल्यं कुरुतेऽक्षियुग्मं करोति रोगोज्झितदीर्घमायुः ॥ २८ ॥

इस तरह उपर्युक्त विधि से शतवार शुद्ध किया हुआ गन्धक एक शाण (चोअन्नी भर) लेकर उसमें त्रिफला चूर्ण, मधु, भांगरे का रस और घृत मिला कर प्रतिदिन सेवन करने से दोनों नेत्र गिद्ध की आंख के समान दूर की वस्तुओं को देखने में समर्थ हो जाते हैं और रोग रहित होकर मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ २८ ॥

अथ गन्धकद्रुतिः-

कलांशव्योषसंयुक्तं गन्धकं श्लक्ष्णचूर्णितम् ।
अरत्निमात्रे वस्त्रे तद्विप्रकीर्य विवेष्ट्य तत् ॥ २६ ॥
सूत्रेण वेष्टयित्वाऽथ यामं तैले निमज्जयेत् ।
धृत्वा संदंशतो वर्त्तिमध्यं प्रज्जवालयेच्च तम् ।
द्रुतो निपतितो गन्धो बिन्दुशः काचभाजने ॥ ३० ॥

शुद्ध गन्धक में षोडशांस त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का चूर्ण मिला कर