रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पञ्चमोऽध्यायः । १८९
पञ्चमोऽध्यायः । १८९
सीसकगुणाः—
अत्युष्णं सीसकं स्निग्धं तिक्तं वातकफापहम् ।
प्रमेहतोयदोषघ्नं दीपनं चामवातनुत् ॥ १७१ ॥
सीसा अत्यन्त उष्ण, स्निग्ध और तिक्तरसयुक्त होता है, तथा वात, कफ, प्रमेह, जल से जन्य रोग अथवा उदकमेह और आमवात को नष्ट करता है तथा अग्नि प्रदीप्त करता है ॥ १७१ ॥
अथ नागशुद्धिः—
सिन्दुवारजटाकौन्तीहरिद्राचूर्णकं क्षिपेत् ।
द्रुते नागेऽथ निर्गुण्ड्यास्त्रिवारं निक्षिपेद्रसे ॥
नागः शुद्धो भवेदेवं मूर्च्छास्फोटदिनाचरेत् ॥ १७२ ॥
नाग को कड़ाही में डालकर अग्नि पर कड़ाही को रख दें, जब नाग द्रवित हो जाय तब उसमें निर्गुण्डी की जड़ का चूर्ण, रेणुका का चूर्ण और हरिद्रा का चूर्ण डालकर कुछ देर तक घोटना चाहिए, पश्चात् निर्गुण्डीपत्र के स्वरस या क्वाथ में बुझावें, इस तरह तीन बार करने से नाग की शुद्धि हो जाती है और वह मूर्च्छा तथा फोड़े फुन्सी आदि विकारों को उत्पन्न नहीं करता है ॥ १७२ ॥
अथ नागभस्म—
तिर्यगाकारचुल्ल्यान्तु तिर्यग्वक्त्रं घटं न्यसेत् ॥
तं च वक्त्रं विना सर्वं गोपयेद्द्लतो मृदा ॥ १७३ ॥
भ्रष्ट्रयन्त्राभिधे तस्मिन् पात्रे सीसं विनिक्षिपेत् ।
पलविंशतिकं शुद्धमधस्तीव्रानलं क्षिपेत् ॥ १७४ ॥
द्रुते नागे क्षिपेत्सूतं शुद्धं कर्षमितं शुभम् ।
घर्षयित्वा क्षिपेत्क्षारमेकैकं हि पलं पलम् ॥ १७५ ॥
अर्जुनस्याक्षवृक्षस्य महाराजगिरेरपि ।
दाडिमस्य मयूरस्य क्षिप्त्वा क्षारं पृथक् पृथक् ॥ १७६ ॥
एवं विंशतिरात्राणि पचेत्तीव्रेण वह्निना ।
विघट्टयन्दृढं दोर्भ्यां लोहदर्य्या प्रयत्नतः ॥ १७७ ॥
रक्तं तज्जायते भस्म कपोतच्छायमेव वा ।
नागं दोषविनिर्मुक्तं जायतेऽतिरसायनम् ॥ १७८ ॥
१९० रसरत्नसमुच्चये—
टेढ़े आकार वाले बने हुए चूल्हे पर एक घड़े को तिर्यक् मुख करके रख दें, फिर उस घड़े के मुख को छोड़कर सर्वाङ्ग पर चिकनी मिट्टी का लेप कर दें, यही आष्ट्रसंज्ञकयन्त्र कहलाता है। इस यन्त्र में २० पल ( १ सेर ) शुद्ध सीसा डाल-कर नीचे तेज आंच लगानी चाहिए। जब सीस द्रुत हो जाय तब उस यन्त्र में एक कर्ष श्रेष्ठ तथा शुद्ध पारद डालकर लोहे की कलच्छु से घोटें, कुछ देर बाद उस यन्त्र में अर्जुन वृक्ष की छाल, बहेड़े की छाल, अमलतास या शाकविशेष, दाड़िम ( अनार ) और अपामार्ग, इन सबका एक २ पल ( ४ तोला ) क्षार डाल कर तीव्र अग्नि से २१ दिन तक पकाना चाहिए। साथ में लोहे की कलच्छू द्वारा दोनों हाथों से खूब घोटते रहना चाहिए। इस विधि से नाग की लाल या कबूतर के वर्ण ( धूसर वर्ण ) के समान भस्म हो जाती है। इस विधि से नाग सब दोषों से रहित होकर निरुत्थ भस्म के रूप में अत्यन्त गुणकारक रसायन हो जाता है ॥ १७३-१७८ ॥
मतान्तरम्—
हतमुत्थापितं सीसं दशवारेण सिध्यति ।
तन्मृतं सीसकं सर्वदोषमुक्तं रसायनम् ॥ १७४ ॥
सीस की उपर्युक्तविधि से भस्म बनाकर ऊर्ध्वपातनयन्त्र में उसका उत्था-पन करें, इस तरह दस बार करने से सीस की सब दोषों से रहित रसायन के उपयोगी निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १७९ ॥
अथ नागस्य निरुत्थभस्मीकरणम्—
अश्वत्थचिञ्चात्वग्भस्म नागस्य चतुरंशतः ।
क्षिपेन्नागं पचेत्पात्रे चालयेल्लोहचाडुना ॥ १८० ॥
यावद्भस्म तदुद्धृत्य भस्मतुल्यां मनःशिला ।
जम्बोरैरारनालैर्वा पिष्ट्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ १८१ ॥
स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा विंशत्यंशशिलायुतम् ।
अम्लेनैव तु यामैकं पूर्ववत्पाचयेत्पुटे ॥
एवं षष्टिपुटैः पक्को नागः स्यात्सुनिरुत्थकः ॥ १८२ ॥
शुद्ध नाग को कड़ाही में द्रवित कर के उसमें नाग से चतुर्थांश पीपल और इमली की त्वचा की राख डालकर लौह दण्ड से एक प्रहर तक खूब घोटना