रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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उटाह ( Utah )
यहां पर मृत्तिका जाति के हिंगुल से बहुत मात्रा में पारद निकालने का अध्य-वसाय होता रहा है। यहां पर सोने की खान में से ही पारद के खनिजों के निकास का पता लगा है। इस खान में टिमानाइट ( Tiemannite Hgsse ) और ओना-फ़्राइट ( Ono frite Hgsse ) नामक पारदीय खनिजों से भी थोड़ा पारद निकाला गया । १९०६ में १११३ फ्लास्क पारद निकाला गया था ।
वाशिंगटन Washington )
यहां के प्रान्तों में भी पारद की पर्याप्त निकासी हुई है तथापि १९१२ के उपरान्त पारद के भाव के गिर जाने से और निकासी का खर्च बढ़ जाने से इस का व्यवसाय मन्द पड़ गया है। स्पेन की सरकार अपने यहां पारद की निकासी अधिक बढ़ाने के लिये नवीन आविष्कारों का बाहुल्य से उपयोग कर रही है। ऐसी दशा में अमेरिका के संयुक्त राज्य के पारद व्यवसाय को अवश्य हानि पहुंचेगी। यहां पर १०% फीसदी वर्तमान में पारद निकासी पर कर लगता है । सन् १९१४ से १९२१ तक नीचे लिखी सारणी के अनुसार संयुक्त राज्य में पारद निकाला गया है। यह मान ७५ पाउण्ड फ्लास्क का है ।
| सन् | केलिफ़ॉर्निया | टेक्सास | निवादा | ओरेगन | ऐरजौना इडाहो, वाशिंगटन | टोटल | फ्लास्क |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १९१४ | ११३०३ | ३१९६ | २०८९ | — | — | १६५६८ | " |
| १९१५ | १४२८३ | ४४२३(अ) | २३२७ | (क) | — | २१०३३ | " |
| १९१६ | २१०४६ | ६३०६(ब) | २१९८ | ३७८ | ५(ख) | २९९३२ | " |
| १९१७ | २३९३८ | १०७९१ | ९९७ | ३१३ | १२०(ग) | ३६१९९ | " |
| १९१८ | २२६६४ | ८४५१ | १०४४ | ७०२ | २२(घ) | ३२८८३ | " |
| १९१९ | १९२०५ | ५०१९ | ७५६ | ४३५ | — | २१४१९ | " |
| १९२० | ९८४९ | ३४३६ | ८३ | २४ | — | १३३९२ | " |
| १९२१ | ३०५५ | ३१२३ | १०० | — | १ | ६३३९ | " |
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५० रसरत्नसमुच्चये-
( अ ) इसमें ऐरिजोना की निकासी भी सम्मिलित है ।
( ब ) इसमें भी ऐरिजोना और ओरेगन की निकासी मिली हुई है ।
( क ) टेक्सास के साथ निकासी दी गई है ।
( ख ) केवल ऐरिजोना की उत्पत्ति है ।
( ग ) एरिजोना ४० वाशिंगटन ७५ इडाहो ५ फ्लास्क है ।
( घ ) केवल इडाहो की निकासी है ।
दक्षिण अमेरिका ( South America )
ब्राजिल ( Brazil ) यहां पारद के खनिज पेट्रोलियम वाले शिलाजतु की भूमि में छोटे छोटे कणों के रूप में बिखरे पाये जाते हैं या सुवर्ण युक्त स्फटिक के साथ हिंगुल मिला पाया जाता है ।
चिली ( Chile )
इस देश में हिंगुल, रेड पाउडर ( Red Powder oxide ), गिरिसिन्दूर, प्राकृतिक पारद, टेट्रे हाईड्रैट ( Tetrahedrite ) आदि पारद के खनिज पाये जाते हैं । इन के सहयोग में रौप्यमाक्षिक, सुवर्णमाक्षिक, गरिक, कठिन स्फटिक आदि मिले रहते हैं । इसी जिले में प्राकृतिक पारद रजतमिश्रक चिरकाल से पारद निकालने के लिये ज्ञात रहा है । इसके आसपास के स्थानों में हिंगुल भी पाया जाता है ।
कोलम्बिया ( Columbia )
इस देश में हिङ्गुल सूक्ष्म चूर्ण के रूप में इधर उधर फैला हुआ पाया जाता है । रौप्यमाक्षिक और हिंगुल के साथ साथ प्राकृतिक पारद भी मिला पाया जाता है । सुवर्ण और रजत के प्राकृतिक पारदीय मिश्रक भी यहां पर प्राप्त होते हैं । यहां के खनिज हल्की जाति के होने के कारण पारद निकालने का व्यवसाय चिरकाल तक नहीं चल सकता है ।
डचगायना ( Dutchguina )
इस देश में ९ मील के फैलाव में हिङ्गुल का विस्तार मालूम हुआ और परीक्षा के लिये जो कूप खोदा गया उसमें २० फुट की गहराई पर उत्तम श्रेणी का खनिज प्राप्त हुआ । इस के उपरान्त यहाँ का विशेष विवरण प्रकाशित नहीं हुआ न व्यापार के लिये यहां कोई अध्यवसाय ही किया गया है ।
यूकोडर ( Ecuador )
यहां पर पारद निकालने का व्यवसाय बहुत प्राचीन काल से चलता है । आज कल खान में खनिज शेष नहीं है तथापि आसपास की भूमि में प्राकृतिक पारद पाया जाता है । कहीं कहीं पर हिङ्गुल भी मिला है ।
पेरू ( Perul )
पेरू के आदिम निवासी लोग हिङ्गुल को रङ्गसाज़ी में व्यवहार करते थे; ऐसी
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किंवदन्ती प्रसिद्ध है। यहां पर पारद के खनिजों का बहुत बड़ा व्यापार रहा है। सन् १५६६ से १६७० के लगभग स्पेन राज्य ने २८०००० डयूकॅटस (लगभग ११७००० पाउन्ड) देकर यहां की पारद की खान खरीद ली थी। यह खान २२० फुट लम्बी, १११ फुट चौड़ी और ४४५ फुट गहरी थी। बाद में निरन्तर कार्य होते रहने से यहां की गहराई १४०४ फुट तक होगई थी। इस खान का काम बे सिलसिले रहा, पर खुदाई का काम खूब होता रहा है। यहां पर एक स्थान की खुदाई मुरब्बा ४००० गज और उपरितल पर गहराई १०० से २० फुट की है। सन् १६०१ से १९०३ तक इस खान से माल इस प्रकार निकाला गया है।
| समय | टोटल पारद की उत्पत्ति | वार्षिक उत्पत्ति क्विन्टल्स मेट्रिकरन में | वार्षिक उत्पत्ति फ़्लास्क के हिसाब में |
|---|---|---|---|
| १६०१—१७८९ | १०४०४६९ | २१८ | ६४२४ |
| १७९०—१८४३ | ६५७६६ | ५५ | १६३० |
| १८४४—१९०३ | ९०००० | ७०६ | २२६ |
यहां पर की गहराई की नाप करने के लिये २१३ फुट गहरा कूप खोदने के लिये प्रयत्न किया गया किन्तु वह १६७ फुट पर जाकर विफल हुआ, तब अन्यत्र प्रयत्न किया गया। वहां पर ९८५ फुट गहराई तक पहुंच कर फिर पूर्व खनित भूमि के अन्तराल में पहुंचने का प्रयत्न किया जा रहा है। यदि यह खुदाई पूर्ण हो गई तो ३९३७ फुट की गहराई होगी। इस प्रयत्न के लिये भट्टियां (Furnaces) तय्यार हो गई हैं। इस खान के पास में उष्ण जल के कई स्रोत हैं।
जुनिन (Junin)
इस विभाग के योलि (youli) ज़िले में स्फटिक की शिराओं में और रेणु पाषाणों में हिङ्गुल जमा हुआ पाया जाता है। हिङ्गुल के सहयोग में रौप्य माक्षिक पाया जाता है। यहां पर हिङ्गुल प्राप्ति के स्थान के समीप उष्ण जल का स्रोत है और उसकी तह पर प्राकृतिक गन्धक पाया जाता है। इस जिले में एक स्थान अनकाचस (Ancachs) कहलाता है। वहां पृथ्वी की शिराओं में गेलेना, यशद, रौप्य-माक्षिक और सुवर्णमाक्षिक के साथ साथ हिङ्गुल भी पाया जाता है।
हुवानुको (Huanuco)
इस विभाग के चोन्टा (Chonta) ज़िले में तीन जमाव हैं जिनमें रौप्यमाक्षिक, यशद, गेलेना, हिंगुल, टेट्राहिड्रेट (Tetrahedrite) आदि रेणु-पाषाण और स्फटिक-पाषाणों के साथ पाये जाते हैं।
वीनेजुए (Venezue)
सन् १९०४ में यह सूचना प्रकाशित हुई थी कि यहां उष्ण स्रोत के जमाव के
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साथ साथ हिङ्गुल भी पाया जाता है । हिंगुल के साथ रौप्यमाक्षिक भी मिलता है ।
ब्योरेवार विवरण का कारण
ऊपर के पारदीय खनिज के ब्योरेवार विवरण के लिखने का उद्देश्य यह है कि रसशास्त्रोक्त पारद गन्धक सम्बन्धी अनेक बातों पर विचार करने के लिये उपयुक्त सामग्री प्राप्त हो सके और साथ ही हमारे देश के भ्रमणशील वैद्य उपयुक्त उष्णस्रोतों के पूज्य धार्मिक कुण्डों व तीर्थों पर जाकर गन्धक व हिंगुल या तत्सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकें । बद्रीनाथ की यात्रा में और बिहार आदि अन्य प्रान्तों में अनेक उष्णस्रोत हैं और वहां पर धर्मार्थी प्रतिवर्ष तीर्थ करने जाते हैं । यदि उनका ध्यान इस तरफ आकर्षित होने लगे तो सम्भव है अनेक प्रकार के अमूल्य खनिजों का पता लग जावे और भविष्य में विदेशियों का मुँह न ताकना पड़े तथा हमारे ही देश में हमारे रसशास्त्र की सामग्री एकत्रित करने की सुलभता हो सके ।
पारद के दोष
प्राकृतिक पारद, हिङ्गुलोत्थ पारद तथा उसके रसकर्पूरादि यौगिक दाहक विष हैं । पारद में अन्य धातु भी मिले रहते हैं । इन्हीं दोषों को दिखाने के लिये । इस ग्रन्थ में “विषं वह्निर्मलञ्चेति दोषा नैसर्गिकास्त्रयः” इस तरह अशुद्ध पारद मारक होने से विष दोष तथा दाहक होने से वह्नि दोष और धात्वन्तर के संयोग होने से मल दोष से युक्त पारद माना गया है । इन दोषों से युक्त पारद के अथवा पारदीय यौगिक के सेवन करने से “रसे मरणसन्तापमूर्च्छोनां हेतवः क्रमात्” इस क्रम से मरण, सन्ताप और मूर्च्छा आदि उपद्रव होते हैं ।
यही बात आजकल के वैज्ञानिक भी मानते हैं घोष की मेटेरिया मेडिका (Materia Medica) के पृष्ठ नं० ४४६ में पारद प्रयोग के एक्यूट टाक्सिक एक्शन (Acute Toxic Action तात्कालिक पारदविष प्रभाव) के शीर्षक में लिखा है कि पारद के यौगिक विशेष कर रसकर्पूरादि (रसकर्पूर = कोरोसिव सबलिमेंट) रसपुष्प (केलोमल, सुधानिधि रस) और मुग्धरस (ग्रे पाउडर) ये सेवन करने से कोष्ठ में भयङ्कर प्रभाव करते हैं जिससे वमन (Vomitign), विरेचन (Purging), शूल (Pain) रक्तातिसार (Bloody Stools), मूर्च्छा (Callapse) तथा अन्त में मरण (Death) भी होता है ।
Acute Toxic Action—Acute poisoning is not common. Mercurials aspecialli the mercuric salts produce severe gastro-enteritis with Vomiting pains purging and bloody stools callapse and even death
Materia Medica and Therapeutics By R. Ghosh Page 446.
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इसी लिये पारद के संस्कारों की हमारे प्राचीन रसशास्त्रों में पूर्ण व्यवस्था की गई है जिससे ये दोष कम हों तथा द्रव्यान्तर संयोग से रोगनाशक व शक्तिप्रद गुण उत्पन्न हो जावें । पारद का विषप्रभाव तो स्वाभाविक है । जब खान से पारद निकलता है उस समय उसके साथ में संखिया, एण्टिमनी भी निकलते हैं । ये दोनों द्रव्य भयङ्कर विष हैं तथा उड़न शील भी हैं इस लिये पारद की शुद्धि करते समय इनकी अशुद्धियों को दूर करने का भी अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।
पारद में दो यौगिक दोष नाग (Lead) और वङ्ग ( Tin ) के माने गये हैं। यथा—
यौगिकौ नागवङ्गौ द्वौ तौ जाड्याध्मानकुष्ठदौ ?
ये आधुनिक दृष्टि से भी ठीक हैं । घोष की मेटेरिया मेडिका ऐण्ड थेराप्युटिक्स नामक ग्रन्थ में लिखा है कि पारद में लेड ( Lead ) टिन ( Tin ) तथा अन्य धातुओं की अशुद्धियां भी मिली रहती हैं यथा—Impurites—Lead Tin and other metals ) ।
अन्य धातुओं के विषय में लाडर ब्रण्टन नाम के विद्वान् ने अपने फार्माकोलोजी थेराप्युटिक्स एण्ड मेटेरिया मेडिका नामक ग्रन्थ के पृष्ठ ६९१ पर लिखा है कि "Other metals especially Lead Arsenic and Antimony may be present.
अर्थात् अन्य अशुद्धियों में लेड ( नाग ) आर्सेनिक ( संखिया ) एण्टिमनी ( स्रोतोऽञ्जन ) हो सकते हैं । इन अवतरणों से स्पष्ट है कि पारद में अन्य धातु मिले रहते हैं अत एव मल दोष को मानना सर्वथा सत्य तथा ज्ञातव्य है ।
पारद के सप्तकञ्चुक
उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त पारद में सप्तकञ्चुक दोष भी माने गये हैं । इनको रसशास्त्र में औपाधिक माना गया है ।
औपाधिकाः पुनश्चान्ये कीर्तिताः सप्तकञ्चुकाः ।
पर्पटी पाटिनी भेदी द्रावी मलकरी तथा ।
अन्धकारी तथा ध्वांक्षी विज्ञेयाः सप्तकञ्चुकाः ॥
सप्तकञ्चुक क्या है ?—आधुनिक रसायन और खनिज विज्ञान के परिशीलन से पता चलता है कि पारद प्रायः सब धातुओं से भारी है । जब यह अन्य धातुओं के साथ मिलता है जैसा कि इसी ग्रन्थ में कहा है—
काष्ठौषध्यो नागे नागो वङ्गेऽथ वङ्गमपि शुल्वे ।
शुल्वं तारे तारं कनके कनकञ्च लीयते सूते ॥
तब उसे पारदीय मिश्रक ( Allooy of Mercury ) कहते हैं ।
इस अवस्था में पारद के अन्दर मिली हुई धातुएँ प्रायः पारद के ऊपर आवरण की भांति तैरती रहती हैं । इस प्रकार के आवरण को कञ्चुक कह सकते हैं । पारद
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रसरत्नसमुच्चये—
के कञ्चुक दोषों का प्राच्य पाश्चात्य ढङ्ग से रसतरङ्गिणी में अच्छा वर्णन कर दिया गया है ।
यथा—
धातवो रससंश्लिष्टा यदा विष्णुपदामृतम् ।
गृह्णन्ति हि तदा तेषां कश्चिद्भागोऽवशीर्यते ॥
ततश्चूर्णत्वमापन्ना रसमाच्छादयन्ति ते ।
तेनावरणसाम्येन धातवः सुतसङ्गताः ॥
कञ्चुकाख्यां भजन्तीति प्राच्यपाश्चात्यसम्मतिः ।
कैश्चिदेते कञ्चुकाख्या दोषा औपाधिकाः स्मृताः ॥
(रसतरङ्गिणी पृष्ठ २७)
पारद के मिश्रक अत्यधिक दबाव पर ( on very High pressure ) विश्लिष्ट हो जाते हैं अर्थात् पारद अलग निकल आता है। सम्भवतः इसी ज्ञान के आधार पर आयुर्वेद के रस शास्त्रज्ञों ने पारद को शुद्ध करने के लिये अनेक प्रकार की शोधन विधियों का आविष्कार किया है। साधारणतया पारद लेटिन गेबर ( The Latin Geber ) के लेखानुसार वङ्ग, सुवर्ण, ताम्र, रजत और लोहे के साथ मिलता है, तथा इसके बाद के लेखकों के मतानुसार पारद यशद ( Zinc ), नाग ( Lead ) और पेलेदियं ( Palladium ) नामक धातु के साथ भी मिलता है। लौह के साथ कठिनता से मिलता है। बाज़ार में ये मिश्रक व्यापार के लिये आते हैं। पारद तथा वङ्ग (Tin) का मिश्रक दर्पण पर कलई करने के काम आता है। सुवर्ण और रजत के द्वारा बने हुए पारदीय मिश्रक सोनहरी, रूपहरी, गिल्ट की कारीगरी में उपयुक्त होते हैं। यशद और वङ्ग के साथ बने हुए पारदीय मिश्रक विद्युत् यन्त्रों की रबर पर चढ़ाने के लिये तैय्यार होते हैं। इसी प्रकार भिन्न २ मात्रा से बने हुए रजत, ताम्र, वङ्ग और कभी २ सुवर्ण तथा प्लेटिनम के द्वारा बने हुए पारदीय मिश्रक दांतों की खातों के भरने के काम में आते हैं। इन के अतिरिक्त पोटासियं ( Potassium ) सोडियम् ( Sodium ) अमोनियम् ( Ammonium ) केडमियम् ( Cadmium ) के अमाल्गम् ( Amalgams ) भी तैय्यार होते हैं।
आधुनिक विद्वानों ने पारद पर वायु विशेष ( गेस ) का भी कञ्चुक ( आवरण ) माना है। यह आवरण अत्यन्त सूक्ष्म होता है और विशिष्ट यन्त्र द्वारा ही परीक्षित या दृष्टिगत हो सकता है ।
"J. J. Jaak and R. Sissingh have shown that a layer of absor-bed gas only one Molecule thick can be dected optically on the surface of Mercury. (Monograph on Mercury ores Pages 15 )
इन दोषों के अतिरिक्त हमारे अन्य रस ग्रन्थों में पारद के अन्दर अन्य दोष भी