रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
प्रथमोऽध्यायः । ३३
प्रथमोऽध्यायः । ३३
अब पारद के वे खनिज लिखे जाते हैं जो अत्यल्प मात्रा में पाये जाते हैं किन्तु ब्रिवस्टर कौन्टी (Brewster county), टेक्सास (Texas) में इतनी मात्रा में मिलते हैं कि जिनसे खान का व्यवसाय किया जा सकता है—
( १ ) टेर्लिङ्ग्वाइट (Terlinguaite Hg 2 clo)
यह खनिज पारद, क्लोरिन और ओक्सिजन का यौगिक (Oxychloride of Mercury) है। यह गन्धक के से पीले रवों में पाया जाता है। वायु में रखने से इसका रङ्ग पीले से गहरा जैतून जैसा हरा (Olive Green) हो जाता है। इसकी कठोरता २ से ३ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ८.७२५. है।
( २ ) इग्लेस्टोनाइट (Eglestonite Hg 4 Cl 2 O)
यह छोटे २ भूरे पीले रङ्ग के रवों में पाया जाता है। इसके कणों में रोजन (सूखा गन्धा विरोजा) की सी द्युति नजर आती है। यह धूप में रखने से शीघ्र काला पड़ जाता है। इसकी कठोरता २ से ३ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ८.३२७.।
( ३ ) क्लेनाइट (Kleinite MercuryAmmoniumchloride.)
यह पारद और नौसादर का प्राकृतिक यौगिक है। इसके रवे गन्धक जैसे पीले होते हैं और उनमें विकृत स्थानों पर नारंगी के वर्ण के दाग होते हैं। इसकी कठोरता ३ से ४ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ७.९८. है। यह भी टेर्लिङ्ग्वाइट के साथ ही पाया जाता है।
( ४ ) मोजेसाइट (Mosesite)
यह खनिज भी प्राकृतिक पारद और नौसादर का यौगिक है। एवं टेर्लिङ्ग्वाइट के साथ ही पाया जाता है।
( ५ ) मान्ट्रोयडाइट (Montroydite)
यह नारङ्गी के से लाल रवों में पाया जाता है जिनमें कांच की सी चमक रहती है। इसकी कठोरता २ से भी कम है। यह खनिज उपर्युक्त चारों खनिजों के साथ पाया जाता है। उक्त पांचों खनिज रस शास्त्रोक्त “सुपीतः शुकतुण्डकः” इस जाति के पारदीय खनिजों के साथ समता रखते हैं। ये गन्धक से पीले और नारंगी से लाल वर्ण के होते हैं। सभी ये खनिज पारद प्राप्ति के साधन हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी पारदीय खनिज हैं जो बहुत ही अत्यल्पाल्प मात्रा में पाये जाते हैं। उनके नाम ये हैं-
( १ ) टिमेनाइट (Tiemanite Hg Se.)
यह सिलेनियं और पारद का खनिज है।
( २ ) ओनोफ्राइट (onofrite HgS, Se.)
यह गन्धक, सिलेनियं और पारद का यौगिक है।
( ३ ) कोलोरेडोआइट (Coloradoite Hg Te.)
यह टेलुरियं नामक खनिज और पारद का यौगिक है।
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-रसरत्नसमुच्चये-
( ४ ) लेहर बेकाइट ( Lehrbachite a Selenide of Lead and mercury )
यह सेलेनाइड, सीसा ( नाग Lead ) और पारद का यौगिक है ।
( ५ ) आयोडोराइट ( Iodyrite )
यह अत्यल्प मात्रा में चीली ( Chile ) नामक स्थान पर आयोडाइड, रजत, और पारद का यौगिक पाया जाता है । आयुर्वेद के रस-शास्त्रों में हिंगुल के शीर्षक में जो वर्णन मिलता है वह समस्त पारद के खनिजों के विषय में समझना चाहिये । पारद के मुख्य खनिज तो स्पष्ट रूप से लिख दिये हैं और गौण खनिज उन्हीं के अन्तर्गत करने का प्रयत्न किया गया है । आज कल भी प्रधान खनिजों से ही पारद निकालने का व्यवसाय चलता है । शेष खनिज किसी देशविशेष के स्थानविशेष में मिलते हैं । उनका उपयोग पारद निकालने के लिये कभी २ किया जाता रहा है ।
इसका वर्णन रस शास्त्रियों ने एक श्लोक के अर्धभाग में कर दिया है ।
“पिण्डरूपमिदं साक्षात् दृश्यते दृष्टि सौख्यदम्।” ( रसकामधेनु पृ० २७३ )
इन सब अवतरणों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राप्य रसग्रन्थों में हिंगुल के वर्णन में जितना भी साहित्य मिलता है वह सब ठीक है, केवल ग्रन्थ संग्राहात्मक होने के कारण सिलसिले वार खनिजों का स्वरूप समझना कठिन हो गया है । तथापि जितनी सामग्री उपलब्ध है उससे यह निर्णय सहज में निकाला जा सकता है कि प्राचीन भारतीय रस-शास्त्रियों को पारद प्राप्ति के प्रायः सारे खनिज विदित थे ।
उन्होंने उनका इतना ही वर्णन किया है कि जितना औषधि निर्माता के ज्ञान के लिये आवश्यक है । आधुनिक काल में भी औषधियों के गुणधर्म बतलाने वाली पुस्तकों ( मेटेरिया मेडिका आदि ) में औषधि निर्माणोपयोगी खनिजों का वर्णन संक्षेप में दिया गया है । परन्तु खनिज सम्बन्धी वैज्ञानिक ग्रन्थों में बहुत विस्तार के साथ सूक्ष्मातिसूक्ष्म वर्णन पाया जाता है । सम्भवतः इसी प्रकार यहां के खनिज शास्त्रों में भी विशद वर्णन रहा हो पर दैव दुर्विपाक से आज कल उपलब्ध नहीं है ।
रस शास्त्रियों ने औषधोपयोगी खनिजों का संक्षेप में परिचय देकर उनके शोधन मारण और औषधि गुण धर्म पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयास किया है । वैद्यों का यह अभिमान ठीक हो सकता है कि गत भारतीय संस्कृति के समय में जब देश की उन्नत दशा रही हो, सर्वत्र ज्ञान प्रसार करने का कार्य यहाँ के विद्वान् करते रहे हों, पर आज कल की पारतन्त्र्य दशा में उक्त अभिमान छोड़कर रसशास्त्रोक्त खनिजों का वर्तमान कालिक उपलब्ध ज्ञान प्राप्त करना वैद्य मात्र के लिये परमावश्यक है । क्योंकि जो औषधि के द्रव्य बाज़ार में आ रहे हैं वे प्रायः कृत्रिम और अशुद्ध मिलते हैं । पन्सारी उनमें अनेक वाह्य अशुद्धियां मिलाकर बेचते हैं । ऐसी दशा में पूर्णतया