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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः । १२३

तृतीयोऽध्यायः । १२३

पुष्पाञ्जनगुणाः—
पुष्पाञ्जनं सितं स्निग्धं हिमं सर्वाक्षिरोगनुत् ।
अतिदुर्धरहिध्माघ्नं विषज्वरगदापहम् ॥ १०५ ॥
पुष्पाञ्जन श्वेत, स्निग्ध और शीतल होता है। समग्र नेत्रके रोगों को नष्ट करता है। दुःसाध्य हिचकी, विषवाधा तथा ज्वर को नष्टकरता है ॥ १०५ ॥

नीलाञ्जनगुणाः—
नीलाञ्जनं गुरु स्निग्धं नेत्र्यं दोषत्रयापहम् ।
रसायनं सुवर्णघ्नं लोहमार्दवकारकम् ॥ १०६ ॥
नीलाञ्जन गुरु, स्निग्ध, नेत्रहितकारी, दोषत्रयनाशक, रसायन और सुवर्ण भस्म करने में श्रेष्ठ (सहायक) और लोहे को मृदु करता है ॥ १०६ ॥

अथ शोधनम्—
अञ्जनानि विशुध्यन्ति भृङ्गराजनिजद्रवैः ॥ १०७ ॥
सब प्रकार के अञ्जन भृङ्गराज के स्वरस में घोटने से शुद्ध हो जाते हैं ॥ १०७ ॥

अञ्जनसत्त्वाहरणम्—
मनोह्वासत्त्ववत्सत्त्वमञ्जनानां समाहरेत् ॥ १०८ ॥
प्रायः सब अञ्जनों का सत्त्व मनः शिला की सत्त्वपातनविधि से प्राप्त होता है ॥ १०८ ॥

स्रोतोऽञ्जनलक्षणम्—
वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति ।
घृष्टं तु गैरिकच्छायं स्रोतोऽजं लक्षयेद्बुधः ॥ १०९ ॥
जो अञ्जन दीमकगृह के शिखर के स्वरूप का हो और तोड़ने पर नील कमल की प्रभा समान ज्ञात हो तथा घिसने से गैरिक के समान लाल हो वह स्रोतोऽञ्जन कहलाता है ॥ १०९ ॥

अञ्जनरसबन्धनम्—
गोशकृद्रसमूत्रेषु घृतक्षौद्रवसासु च ।
भावितं बहुशस्तच्च शीघ्रं बध्नाति सूतकम् ॥ ११० ॥
अञ्जन को गोर्वर के रस, गोमूत्र, घृत, शहद, वसाइन द्रव्यों में क्रमशः बहुत बार भावना देकर शुद्ध करने से वह शीघ्र ही पारद का बन्धन करता है ॥ ११० ॥

रसाञ्जनस्य विशेषशोधनम्—
सूर्यावर्तादियोगेन शुद्धमेति रसाञ्जनम् ॥ १११ ॥

१२४ रसरत्नसमुच्चये—

रसाञ्जन आगे कहे हुए सूर्यावर्तादियोगों से शुद्ध होता है ॥ १११ ॥

स्रोतोऽञ्जनसत्त्वपातनविधिः—

राजावर्तकवत्सत्त्वं ग्राह्यं स्रोतोऽञ्जनादपि ॥ ११२ ॥
इत्यञ्जनाधिकारः।

स्रोतोऽञ्जन का सत्त्वपातन राजावर्त के सत्त्वपातन की विधि से निकालना चाहिए ॥ ११२ ॥

अथ कङ्कुष्ठनिरूपणम्—

कङ्कुष्ठोत्पत्तिवर्णनं भेदाश्च—

हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते ।
तत्रैकं नालिकाख्यं हि तदन्यद्रेणुकं मतम् ॥ ११३ ॥

कङ्कुष्ठ की उत्पत्ति हिमालय पर्वत के समीपवर्ति शिखरों से होती है। यह नालिकाख्य और रेणुक नाम से दो तरह का होता है ॥ ११३ ॥

द्विविधकङ्कुष्ठलक्षणम्—

पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् ।
श्यामपीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं हि रेणुकम् ॥ ११४ ॥

प्रथम नालिक नामक कङ्कुष्ठ पीतवर्ण, भारयुक्त तथा स्निग्ध होता है और वह औषध कार्यमें श्रेष्ठ है। रेणुककङ्कुष्ठ कुछ कृष्ण और पीतवर्ण युक्त, लघु तथा सत्त्व-रहित होता है वह औषधकार्य में इष्ट नहीं है ॥ ११४ ॥

कङ्कुष्ठोत्पत्तौ मतान्तराणि—

केचिद्वदन्ति कङ्कुष्ठं सद्योजातस्य दन्तिनः ।
वर्चश्च श्यामपीताभं रेचनं परिकथ्यते ॥ ११५ ॥
कतिचित्तेजिवाहानां नालं कङ्कुष्ठसंज्ञकम् ।
वदन्ति श्वेतपीताभं तदतीव विरेचनम् ॥ ११६ ॥

कुछ लोग कङ्कुष्ठ को हस्ती के सद्य उत्पन्न हुए बच्चे का मल कहते हैं और वह कृष्ण तथा पीत दोनों रंग का होता है तथा दस्तकारक होता है। कुछ लोग तेजस्वी अश्त्वों से उत्पन्न हुए बच्चे के नाभि नाल को कङ्कुष्ठ मानते हैं, इसका वर्ण कुछ सफेद और पीत होता है और वह अत्यन्त विरेचक होता है॥११५-११६॥

विमर्श:— कङ्कुष्ठ खनिज द्रव्य नहीं है। यह हिमालय के ऊपर या सन्निकट प्रदेश में उत्पन्न हुइ वनस्पति के रस से बनाया जाता है। इस रस को धातु या बांस की