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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः । ११७

तृतीयोऽध्यायः । ११७

उपलेर्दशभिर्देयं पुटं रुद्ध्वाथ पेषयेत् ।
एवं द्वादशधा पाच्यं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥ ७९ ॥

ढाक ( पलाश ) की जड़ का शहद के समान गाढा क्वाथ बनाकर इससे तीन वार शुद्ध हरताल को भावित कर पश्चात् भैंस के मूत्र में घोटकर गोला बना-कर सम्पुट में रख कर कपड़ मिट्टी द्वारा बन्दकर दस जङ्गली उपलों से पुट देना चाहिए । इस तरह द्वादश पुट देने से हरताल शुद्ध तथा मृत हो जाती है । इसको योग बनाने में लेना चाहिये ॥ ७८-७९ ॥

सत्त्वपातनम्—

कुलित्थक्वाथसौभाग्यमहिष्याज्यमधुप्लुतम् ।
स्थाल्यां क्षिप्त्वा विदध्याच्च मल्लेन छिद्रयोगिना ॥ ८० ॥
सम्यङ् निरुध्य शिखिनं ज्वालयेत्क्रमवर्धितम् ।
एकप्रहरमात्रं हि रन्ध्रमाच्छाद्य गोमयैः ॥ ८१ ॥
यामान्ते छिद्रमुद्घाट्य दृष्टे धूमे च पाण्डुरे ।
शीतां स्थालीं समुत्तार्य सत्त्वमुत्कृष्य चाहरेत् ॥ ८२ ॥
सर्वपाषाणसत्त्वानां प्रकाराः सन्ति कोटिशः ।
ग्रन्थविस्तरभीत्याऽत्र लिखिता न मया खलु ॥ ८३ ॥

शुद्ध हरताल तथा सुहागा समान भाग लेकर कुलत्थ क्वाथ, भैंस का घी और शहद के साथ घोटकर गोला बना लें, उस गोले को एक हण्डिका में रख कर मध्यछिद्र युक्त सकोरे से हण्डिका ढक दें । पश्चात् अच्छी प्रकार सन्धि बन्धन कर अग्नि जलानी चाहिए । एक प्रहर तक अग्नि मन्द मध्य तथा तीव्र देनी चाहिये तथा शराव के मध्य छिद्र को आर्द्र गोबर से ढक देनी चाहिए । एक प्रहर के अन्त में गोबर को हटाकर छिद्र से देखना चाहिए, यदि देखने से श्वेत ( पाण्डुर ) धूम दिखाई दें तब अग्नि बन्दकर स्वाङ्ग शीत होने पर स्थाली उतारना चाहिए ( एक प्रहर अग्नि देना साधारण कहा है ) फिर सन्धि तोड़कर हण्डिका में लगे हुए सत्त्व को ग्रहण करें । इसी तरह अन्य खनिज पाषाणपदार्थों के सत्त्व निकालने के अनेक प्रकार हैं उन्हें यहां ग्रन्थ विस्तार के भय से नहीं लिखे हैं ॥ ८०-८३ ॥

अथ मतान्तरम्—

पलालकं रवेर्दुग्धैर्दिनमेकं विमर्दयेत् ।

२१८ | रसरत्नसमुच्चये—

क्षिप्तवा षोडशिकातैले मिश्रयित्वां ततः पचेत् ॥ ८४ ॥
ऽनावृतप्रदेशे च सप्तयामावधि ध्रुवम् ।
स्वाङ्गशीतमधःस्थञ्च सत्त्वं श्वेतं समाहरेत् ॥ ८५ ॥
छागलस्याथ बालेन बलिना च समन्वितम् ।
तालकं दिवसद्वन्द्वं मर्दयित्वाऽतियत्नतः ॥ ८६ ॥
युक्तं द्रावणवर्गेण काचकूप्यां विनिःक्षिपेत् ।
त्रिधा ताञ्च मृदा लिप्त्वा परिशोष्य खरातपे ॥ ८७ ॥
ततः खर्परकच्छिद्रे तामूर्ध्वां चैव कूपिकाम् ।
प्रवेश्य ज्वालयेदग्निं द्वादशप्रहरावधि ॥
कूपिकण्ठस्थितं शीतं शुद्धं सत्त्वं समाहरेत् ॥ ८८ ॥
पलार्धप्रमितं तालं बद्ध्वां वस्त्रे सिते दृढे ।
बलिनाऽऽलिप्य यत्नेन त्रिवारं परिशोष्य च ॥ ८९ ॥
द्राविते त्रिपले ताम्रे क्षिपेत्तालकपोटलीम् ।
भस्मनाच्छादयेच्छीघ्रं ताम्रेणाऽऽवेष्टितं सितम् ॥
मृदुलं सत्त्वमादद्यात्प्रोक्तं रसरसायने ॥ ९० ॥

इति तालकाधिकारः—

एक पल (चार तोले) भर शुद्ध हरताल को मदार के दुग्ध से एक दिन तक घोटकर एक पल तिल के तैल में मिश्रण कर खुले स्थान में वालुका यन्त्र द्वारा सात प्रहर तक पाक करना चाहिए । स्वाङ्ग शीत होने पर नीचे निकले हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करें अथवा छाग के पुच्छ के बाल और गन्धक को हरताल के साथ दो दिन तक घोटकर उसमें द्रावक वर्ग के पदार्थ (शहद्, घी, सुहागा) मिलाकर काच कूपी ( आतसी शीशी ) में भर कर तीन कपड़ मिट्टी करके धूप में सुखालें फिर मध्यछिद्र युक्त मिट्टी के कुण्डे में बालु भर कर आतसी शीशी रख दें ( आधी शीशी बालु से ढकी रहनी चाहिए ) पश्चात्, २ प्रहर तक अग्नि देना चाहिये । स्वाङ्ग शीत होने पर कूपिकण्ठ में लगे हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करे । अथवा आधे पल ( २ तोला ) शुद्ध हरताल को श्वेत मजबूत वस्त्र में बांधकर पोटली बनालें । उस पोटली को तीन वार गोमूत्र में पिसे हुए गन्धक से लेपकर धूप में सुखाले । फिर तीन पल द्रव हुए ताम्र में पोटली रखकर