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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

चतुर्थोऽध्यायः । १४३

चतुर्थोऽध्यायः । १४३

शिलया लिप्तमूषायां वज्रं क्षिप्त्वा निरुध्य च ॥ ३८ ॥
अष्टवारं पुटेत्सम्यग्विशुष्कैश्च वनोत्पलैः ।
शतवारं ततो ध्मात्वा निक्षिप्तं शुद्धपारदे ॥
निश्चितं म्रियते वज्रं भस्म वारितरं भवेत् ॥ ३९ ॥
सत्यवाक् सोमसेनानिरेतद्वज्रस्य मारणम् ।
दृष्टप्रत्ययसंयुक्तमुक्तवान् रसकौतुकी ॥ ४० ॥

अथवा कुलत्थ क्वाथ और बड़हल के फलों के रस में मनःशिला को घोटकर पिष्टि बनालें, पश्चात् उस पिष्टि से मूषा को भीतर से लिप्तकर उसमें हीरे को रख कर मूषा का मुख बन्द कर के सुखा कर जंगली कण्डों की अग्नि में पुट देना चाहिए । इस तरह आठ पुट देकर हीरे को निकाल कर प्रतप्त करके शुद्ध पारद में १०० बार बुझाने से निश्चय ही वज्र की जल में तैरने लायक भस्म हो जाती है। यह हीरे की मारणविधि सत्य बोलने वाले और प्रत्यक्ष अनुभवी, रसक्रिया कौतुकी सोमसेनानी ने कही है ॥ ३८ ॥

मतान्तरेण मारणम्

विलिप्तं मत्कुणस्यास्रैः सप्तवारं विशोषितम् ।
कासमर्दरसापूर्णे लोहपात्रे निवेशितम् ॥ ४१ ॥
सप्तवारं परिध्मातं वज्रभस्म भवेत्खलु ।
ब्रह्मज्योतिर्मुनीन्द्रेण क्रमोऽयं परिकीर्तितः ॥ ४२ ॥
नीलज्योतिर्लताकन्दे घृष्टं घर्मे विशोषितम् ।
वज्रं भस्मत्वमायाति कर्मवज्ज्ञानवह्निना ॥ ४३ ॥

अथवा सात बार हीरे को खट्मल के रुधिर से लिप्तकर सुखा लें, पश्चात् हीरे को अत्यन्त तप्त कर कसौंदी के रस से पूर्ण लौहपात्र में बुझाना चाहिए । इस तरह सात बार तप्त कर बुझाने से हीरे की भस्म हो जाती है यह विधि ब्रह्मज्योति नाम के मुनियों के स्वामी ने कही है। अथवा केवल नीलापराजिता या ज्योतिष्मती या क्षीरकाकोली के कन्द के साथ हीरे को घोट कर धूप में सुखाने से जिस प्रकार सत्यज्ञान रूप वह्नि से कर्म नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार हीरे की भस्म हो जाती है, ॥ ४१–४३ ॥

१४४ रसरत्नसमुच्चये—

मतान्तरेण मारणम्—

मदनस्य फलोद्भूतरसेन क्षोणिनागकैः ।
कृतकल्केन संलिप्य पुटेद्विंशतिवारकम् ॥
वज्रचूर्णं भवेद्वर्यं योजयेच्च रसादिषु ॥ ४४ ॥
तद्वज्रं चूर्णयित्वाथ किञ्चिट्टङ्कणसंयुतम् ।
खरभूनागसत्त्वेन विंशेनावर्तयेद्ध्रुवम् ॥
तुल्यस्वर्णेन तद्ध्मातं योजनीयं रसादिषु ॥ ४५ ॥

अथवा मैन फल के रस में केञ्चुओं को पीसकर उनका हीरे पर लेपकर पुट देना चाहिए। इस तरह २० पुट देने से रसादि कार्यों में उपयोग करने लायक श्रेष्ठ भस्म हो जाती है। इस हीरक भस्म में थोड़ा सुहागा और बीसवें भाग की मात्रा में केञ्चुओं का सत्त्व मिलाकर घोट लें, फिर समान भाग सुवर्ण मिलाकर मूषा यन्त्र में फूंकने से हीरे का उत्तम रस तैय्यार हो जाता है, इसका रसादि कार्यों में प्रयोग करना चाहिए ॥ ३४-४५ ॥

अथ प्रयोगविशेषेण गुणविशेषकथनम्—

त्रिगुणेन रसेनैव सम्मर्द्य गुटिकीकृतम् ।
मुखे धृतं करोत्याशु चलदन्तविबन्धनम् ॥ ४६ ॥

हीरे की भस्म में त्रिगुण शुद्ध पारद मिलाकर घोट लें, फिर उसकी गोली बनाकर मुख में धारण करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते हैं ॥ ४६ ॥

अथ वज्ररसायनम्—

त्रिंशद्भागामितं हि वज्रभसितं स्वर्णं कलाभागिकं ।
तारं चाष्टगुणं सिताऽमृतवरं रुद्रांशकं चाभ्रकम् ।
पादांशं खलु ताप्यकं वसुगुणं वैक्रान्तकं षड्गुणं
भागोऽप्युक्तरसै रसोऽयमुदितः षाड्गुण्यसंसिद्धये ॥ ४७ ॥
इति वज्राधिकारः,

३० भाग हीरे की भस्म, १६ भाग सुवर्णभस्म, ८ भाग चांदीभस्म, ११ भाग शुद्ध मीठा विष या श्वेत पारद भस्म, ४ भाग अभ्रकभस्म, ८ भाग सुवर्णमाक्षिक भस्म और ६ भाग वैक्रान्त भस्म इन सबको खरल में कसोञ्जी आदि भेषज रसों के साथ घोट कर मात्रापूर्वक सेवन करने से षाड्गुण्य सिद्धि प्राप्त होती है ॥४७॥

चतुर्थोऽध्यायः । १४५

अथ नीलनिरूपणम्—नीलभेदाः—

जलनीलेन्द्रनीलं च शक्रनीलं तयोर्वरम् ॥ ४८ ॥
नीलम के जलनील और इन्द्रनील ये दो भेद हैं इन दोनों में इन्द्रनील उत्तम होती है, ॥ ४८ ॥

जलशक्रनीलयोःस्वरूपम्—

श्वैत्यगर्भितनीलाभं लघु तज्जलनीलकम् ।
कार्ष्ण्यगर्भितनीलाभं सभारं शक्रनीलकम् ॥ ४९ ॥
जो नील बीच में श्वेत हो और बाहर से नीलवर्ण युक्त हो और हलकी हो वह जलनील कहलाती है और जो मध्य में काले रङ्ग की हो और बाहर से अत्यन्त नील वर्ण युक्त हो तथा भारी हो वह इन्द्रनील कहलाती है ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठनीललक्षणम्—

एकच्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् ।
मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नीलमुत्तमम् ॥ ५० ॥
जो नील एक सी छायावाली या अपने में अन्य वस्तु का प्रतिबिम्ब न बना सके, भारी, स्निग्ध, स्वच्छ, आकार में पिण्डस्वरूप हो और मृदु तथा दीप्त तेज युक्त इन सात लक्षणों से युक्त हो वह इन्द्रनील श्रेष्ठ है ॥ ५० ॥

श्रेष्ठनीललक्षणम्—

कोमलं विहितं रूक्षं निर्भारं रक्तगन्धि च ।
चिपिटाभं ससूक्ष्मं च जलनीलं हि सप्तधा ॥ ५१ ॥
जो नील कोमल, रूक्ष, भार रहित, लालवर्णयुक्त या रक्त की गन्ध आती हो, चपटी हो तथा अत्यन्त सूक्ष्म हो, तथा आधी में एक रङ्ग और आधी में अन्य रङ्ग हो, इस तरह सात लक्षण जिसमें हों वह जलनील कहलाती है ॥ ५१ ॥

अथ गुणाः—

श्वासकासहरं वृष्यं त्रिदोषघ्नं सुदीपनम् ।
विषमज्वरदुर्नामपापघ्नं नीलमीरितम् ॥ ५२ ॥
नीलम—श्वास, कास, त्रिदोष, विषमज्वर और अर्श को नष्ट करती है तथा


४७ वें श्लोक में कहे हुए षड्गुण—
गुणाः—विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परताक्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमति वर्तते ॥ इति चरकः
रस० १०

१४६ रसरत्नसमुच्चये—

वृष्य और अग्निदीपक है। नील को शरीर में धारण करने से पाप भी नष्ट होते हैं॥५२॥

अथ गोमेदः—गोमेदधिरुक्तिः—

गोमेदः समरागत्वान्गोमेदं रत्नमुच्यते ॥ ५३ ॥

गायके मेद के समान वर्ण होने से या रत्नों के समान वर्ण होने से गोमेद को गोमेदरत्न कहते हैं ॥ ५३ ॥

प्रशस्तगोमेदलक्षणम्—

सुस्वच्छंगोजलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं समं गुरु ।
निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा ॥ ५४ ॥

जो अत्यन्त स्वच्छ और गोमूत्र के समान कान्ति युक्त हो, स्निग्ध तथा समानाकार हो, पत्ररचना रहित, मसृण, तोल में भारी तथा प्रकाशमान हो इस तरह आठ लक्षणों वाली गोमेद शुभ होती है ॥ ५४ ॥

हेयगोमेदलक्षणम्—

विच्छायं लघु रूक्षाङ्गं चिपिटं पटलान्वितम् ।
निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम् ॥ ५५ ॥

जो गोमेद तेज रहित, लघु, स्पर्श में रूक्ष, चिपटाकार, पत्र रचना युक्त, प्रभारहित और पीले काच के समान हो वह अशुभ है ॥ ५५ ॥

अथ गुणाः—

गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षयपाण्डुक्षयङ्करम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम् ॥ ५६ ॥

गोमेद कफ, पित्त, पाण्डु, तथा क्षय को नष्ट करती है और दीपन, पाचन, रुचिवर्द्धक, बुद्धिप्रबोधक तथा चर्म हितकर है ॥ ५६ ॥

अथ क्षेपकश्लोकाः—
रत्नमारणनिषेधः—

रत्नानां शोधनं श्रेष्ठं मारणं न गुणप्रदम् ।
भस्मना वीर्यहानिः स्यात्तस्मात्तानि च शोधयेत् ॥ १ ॥

कुछ विद्वानों का मत है कि रत्नों का शोधन कर गुलाब पुष्पों के स्वरस (गुलाबजल) में घोट कर पिष्टि बनाकर प्रयोग करना चाहिए । इनकी भस्म करने से विशेष लाभ नहीं होता है अपि तु इन की भस्म बनाने से इन के प्रभाव की हानि होती है ॥ १ ॥