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सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 984 में से

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पृष्ठ 654

तृतीय तरंग ४९७
भूपमद्भुतसौभाग्यं श्रीर्वद्वरभसाऽभजत् ।
विहाय हरिबांहूश्च चतुरः सागरांश्च यम् ॥१२६॥
१२६. अद्भुत सौभाग्यशाली जिसके आश्रय में विष्णु के चारों बाहु और चारों
समुद्र को छोड़कर, लक्ष्मी स्वतः सवेग आयी ।
लक्ष्मीं कृत्वोपकरणं गुणे येन प्रवर्धिते ।
श्रीमत्सु गुणिनोऽद्यापि तिष्ठन्त्युद्गुरकंधराः ॥१२७॥
१२७. जिसने लक्ष्मी को उपकरण (बनाकर) गुण (ॉ) का वर्धन किया, जिसके
कारण गुणी (जन) धनियों में उन्नत स्कन्ध बैठते हैं ।
म्लेच्छोच्छेदाय वसुधां हरेरवतरिष्यतः ।
शकान्विनाश्य येनाऽऽदौ कार्यभारो लघूकृतः ॥१२८॥
१२८. म्लेच्छों¹ के नाश हेतु पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हरि के कार्य भार को
आदि में ही जिसने शकों का विनाश कर लघु (हल्का) कर दिया ।
नानादिगन्तराख्यातं गुणवत्सुलभं नृपम् ।
तं कविर्मातृगुप्ताख्यः सर्वस्थानस्थमासदत् ॥१२९॥
१२९. नाना दिगन्तरों से प्रख्यात एवं गुणवानों के लिये सुलभ, उस नृप के पास जो
कि सार्वजनिक सभा भवन में स्थित था-कवि मातृगुप्त पहुँचा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२७ में 'गुणे' का 'गुणो',
'प्रवर्धिते' का 'प्रवर्धने' तथा 'त्युद्गुर' का पाठभेद
'त्युद्वत' मिलता है ।
श्लोक संख्या १२८ में 'लघू' का पाठभेद 'लघु'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२८ (१) म्लेच्छनाश : यहाँ पर कल्हण ने
कल्कि अवतार की ओर संकेत किया है । भगवान्
कल्कि अवतार लेकर म्लेच्छों का संहार करेंगे । गीत
गोविन्द ने इसका उल्लेख किया है ।
म्लेच्छनिविद्रनिधने कलयसि करवालम् ।
केशव धृतकल्किशरीर ॥
१२९ (१) मातृगुप्त : कुछ विद्वान् मातृगुप्त
को कवि कालिदास मानते हैं । इन्ही विद्वानों ने यह
भी माना है कि जिस विक्रमादित्य के सभा में नव
रत्नों का होना कहा जाता है वह छठी शताब्दी का
विक्रमादित्य हर्ष था । डाक्टर भाऊदा जी का तर्क है
कि कालिदास और मातृगुप्त का शाब्दिक अर्थ एक
ही है । काली का अर्थ माता होता है । दास का
अर्थ गुप्त होता है । इस प्रकार कालिदास ही
मातृगुप्त हैं ।
कल्हण ने कालिदास का राजतरंगिणी में कहीं
भी उल्लेख नहीं किया है । प्राकृत काव्य सेतु बन्ध
जो प्रवरसेन के अनुरोध पर कालिदास ने लिखा
था उसका भी उल्लेख नहीं मिलता । इसी
प्रकार मिलाया गया है कि प्रवरसेन द्वितीय का
उत्तराधिकारी मातृगुप्त दिलाया गया है ।
क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा में मातृगुप्त
की कविताओं का उल्लेख किया है । श्री वल्लभदेव
की सुभाषितावली में भी मातृगुप्त के पदों का उल्लेख
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