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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 646, कुल 984 में से

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पृष्ठ 646

तृतीय तरंग ४९१
और पहले बौद्ध तथा कालान्तर में हिन्दू हो गये
थे । दशवी शताब्दी में काबुल तथा सीमान्त
पश्चिमोत्तर देश के रहने वाले उन्ही तुर्कों को शाही
कहा गया । तरंग ५:२३३ द्रष्टव्य है ।
भारतीय हूण राजा तोरमाण कश्मीर के राजा
तोरमाण से भिन्न है। कुछ इतिहासकारों ने खोज-
खाँचकर कश्मीरी तोरमाण को भारतीय तोरमाण
का पौत्र होने का अनुमान लगाया है।
कश्मीरी तोरमाण ने भी भारतीय तोरमाण
राजा तुल्य मुद्रा टंकणित करवाया था । दोनों की
मुद्राओ में समानता होने के कारण कुछ इतिहास-
कार उन्हें एक मानते हैं । कल्हण के अनुसार हूण-
राज नरेन्द्रदित्य का वंशज था । कश्मीरी तोरमाण
युधिष्ठिर प्रथम का वंशज था ।
कश्मीर में तोरमाण नाम की ताम्र मुद्रायें
बहु संख्या मे मिली है । मुद्रायें मध्य छठवी शताब्दी
की टंकणित है । उनकी लिपि गुप्त कालीन है ।
तोरमाण तुरको नाम है । तुर्क एवं तुरुष्क एक
ही जाति थी । मुसलिम काल के पूर्व तुर्किस्तान से
आने वाले तुर्क बुद्ध धर्मावलम्बी थे । कालान्तर में
हिन्दू बन गये । कुछ इतिहासकारों का मत है कि
काबुल तथा सिन्ध के मध्य रहनेवालो के लिये शाही
शब्द का प्रयोग होने लगा था ।
हसन लिखता है—( ६ ) सन् विक्रमी ९८ में
हिरन वारिस तख्त होकर अपने भाई को तोरमान
वोहदः वज़ारत बख्शा । कुछ अरसा खूब गुजरी ।
लेकिन आखिर मे तोरमान का मिज़ाज़ भाई की
अताअत व फरमा बरदारी से मनहरफ् हो गया ।
सिक्का अपने नाम जारी कर लिया । हिरन को
उसकी यह हरकत बहुत नापसन्द आयी । और
तूरमान को जेल भेज दिया । तूरमान की वोवी
अंजना जो सूरज वंशी राजाओं के चश्म व चिराग़
थी अपने शौहर के हादशा के वक्त फरार हो
गयी । और मुकाम अन्दर कोट में एक कुम्हार के
घर रहने सहने लगी । यह औरत अपने खाविन्द से
हामिला थी । इसलिये वज़ हमल के वक्त इसके
पेट से एक लडका पैदा हुआ । जिसका नाम इसने
परवरसेन रखा । कुम्हार की बीबी इस लडके की
अपनी औलाद की तरह परवरिश किया करती थी ।
सन् बलूग़त तक लोग उसे कुलाल का बेटा ही
ख़्याल करते रहे । बचपन से ही बुजुर्गी के
निशानात उसकी पेशानी से नमूदार थे । बच्चो
के साथ खेल व कूद के दौरान में खुद एक ऊँची
जगह पर बैठता और अपने आप को राजा के खिताब
से पुकारता था । दूसरे लड़को को वज़ारत मोरमरी
और दीगर मुलाज़मतो के अहदसे बख़्शे हुए थे ।
इसका शग़ल हमेशा तोरन्दाजो और निशाना बाज़ी
था । हुसन इत्तफाक से अंजना का भाई जयेन्द्र
अपनी बहन को तलाश में जगह जगह फिरता था ।
एक दिन वह अन्दर कोट में भी जहाँ परवरसेन
बच्चों में खेल रहा था आ पहुँचा । क्या देखता
है कि एक लडका बड़ी शान-शौकत से एक टोला
पर बैठा हुआ है । और अपने मातहत बच्चो पर
हुक्मरानी कर रहा है । जयेन्द्र के दिल में तबज़
मुहब्बत और शफ़्कत ने जोश मारा लेकिन वहाँ कुछ
न कह सका । रात को उस लड़के के पीछे
कुम्हार के घर मे आया । अपने बहन की जो
मुद्दत से जुदा हो गयी थी । पहचान लिया । दोनो
एक दूसरे के साथ गले मिलकर रोये ।
परवरसेन ने इस रोने-धोने का सबब अपनी
मा से पूछा । उसने जवाब दिया कि यह मेरा भाई
है। तेरा बाप तूरमार अपने भाई के जुल्म से कैदी
बना हुआ है । अब मै उसी के फिराक़ में रोती हूँ ।
परवरसेन अपने बाप की हालत सुनकर गुस्सा से
आगबबूला हो गया । इन्दर जे के घर रात दिन
कुश्ती और पहलवानी में बसर करने लगा ।
इस असनाए में हिरन ने बाज़ मुतक़द्दर हस्तियो
के सिफारिश के पेश नज़र तूरमान की रिहाई के
अहकाम जारी कर दिये । तूरमान कुछ मुद्दत बैठ
के हमराह उल्फत और मुहब्बत से ज़िन्दगी गुज़ार