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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 984 में से

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पृष्ठ 641

४८८ राजतरंगिणी
दोःस्तम्भसंभृतासक्तौ कृपाणमणिदर्पणे ।
संक्रान्तेवोन्मुखी यस्य भुवनश्रीन्र्यभाव्यत ॥ ९८ ॥
९८. जिसके बाहु स्तम्भ से लगे कृपाण मणि दर्पण में उत्सुक भुवन श्री प्रतिबिम्बित
हो रही थी ।
समातृचक्रं निर्माय यः पूर्वं प्रवरेश्वरम् ।
पुण्याः पुराणाधिष्ठाने प्रतिष्ठा विविधा व्यधात् ॥ ९९ ॥
९९. जिसने पुराणाधिष्ठान१ में प्रथम मातृचक्र सहित प्रवरेश्वर का निर्माण करके
विविध पुण्य प्रतिष्ठा की ।
गृह्याङ्गनमिव क्षोणीं गणयन्वशवर्तिनीम् ।
त्रिगर्तेवीं ग्रामसंख्ये प्रवरेशाय यो ददौ ॥ १०० ॥
१००. जिसने वशवर्तिनी पृथ्वी को गृह आंगन तुल्य गिनते हुए, ग्रामो सहित त्रिगर्त२
भूमि प्रवरेश्वर को दी ।
और बीरेश्वर का मन्दिर अपनी यादगार में छोडा ।
इलाका कामड, की पैदावार उसके इखराजात के
लिए वकफ की । तीस बरस हुकूमत करके दुनिया
से रुखसत हुआ । दो बेटे हिरन और तोरमान नामी
अपने पीछे छोडे ।
९८ (१) बाण ने हर्ष चरित में इसी प्रकार
की शब्दावली का प्रयोग किया है—'कृपाणदर्पणेपु'
९९ (१) पुराणाधिष्ठान : योगवासिष्ठ रामायण
में अधिष्ठान नगर का उल्लेख मिलता है । कल्हण ने
प्रतिष्ठान शब्द का प्रयोग किया है । कल्हण के समय
अधिष्ठान पुराने नगर के रूप में रह गया था ।
अतएव पुराणाधिष्ठान किंवा पुराधिष्ठान की संज्ञा
दी गयी । यह स्थान पण्डरेथन है । महाराज यशस्कर
के समय वह पुराणाधिष्ठान की संज्ञा नहीं प्राप्त
कर सका था । मालूम होता है उस समय वहाँ
यथेष्ट आबादी थी और नवीन नगर में वह
मिला था ।
अधिष्ठान का अर्थ नगर होता है । पुराणा-
धिष्ठान का अर्थ पुराना नगर होगा ।
श्लोक १:१०४ की टिप्पणी पृष्ठ १३८ तथा
५:२६७ द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०० में 'संख्ये' का 'मध्ये' तथा
'ददौ' का पाठभेद 'दधौ' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०० (१) बाण ने इसी प्रकार की शब्दावली
का प्रयोग किया हो 'अंगनवेदी वसुधा—।'
(२) त्रिगर्त : कांगड़ा क्षेत्र को त्रिगर्त
कहते हैं । यह क्षेत्र चम्बा पर्वतमाला तथा व्यास
नदी के ऊर्ध्व भाग में है । त्रिगर्त प्राचीन काल
में जालन्धर राज्यान्तर्गत था । इन्द्रचन्द्र कटोच
राजाओं में कांगडा के थे । जिनका उल्लेख तरंग
७:१५० में कल्हण ने किया है । इसका पुनः उल्लेख
८:१५३१ किया गया है ।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में त्रिगर्त का उल्लेख
किया है । पाणिनि का काल मध्य छठवी शताब्दी
बी. सी. कहा जाता है । कुछ सूत्रों में स्पष्ट और
कुछ सूत्रों में गौण रूप से 'प्राच्यभर्गादियोधेयादिभ्यः'
उल्लेख किया गया है । भर्गादि में, भर्ग, करूष,
कश्मीर, शाल्व देश आते है । योधेयादि में त्रिगर्त