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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 645, कुल 984 में से

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पृष्ठ 645

४९० राजतरंगिणी
ईशो नृपाणां निश्शेषक्ष्माकेदारकुटुम्बिनाम् ।
स समास्त्रिंशतं भूपृदनिस्त्रिंशाशयोऽभवत् ॥ १०१ ॥
१०१. समस्त पृथ्वी क्षेत्र को कुटुम्बी१ समझने वाले नृपों का अधीश्वर निष्क्रूर राजा
ने तीस वर्ष शासन किया।
हिरण्यतोरमाणाख्यौ व्यधत्तामथ तत्सुतौ ।
साम्राज्ययुवराजत्वभाजने रञ्जनं क्षितेः ॥ १०२ ॥
१०२. साम्राज्य एवं युवराज पद के पात्र हिरण्य तथा तोरमाण१ संज्ञक उसके दोनों
पुत्रों ने क्षिति का रंजन किया।

त्रिगर्त के ६ संघ राज्यों का पाणिनि ने वर्णन
किया है । उनके नाम—कौडोपरथ, दांडिक,
कौष्टकी, जालमानि, ब्राह्मगुप्त और जानकि है ।
महाभारत में त्रिगर्त तथा कुलूत अर्थात् उलूक
पर्वतमालाओ में निर्वासित गणों और राजाओं
का वर्णन किया गया है । (सभा-पर्व २७: ५–१६)
कुलूत अर्थात् वर्तमान कुलू अंचल की राजधानी
नगर थी । कश्यादि गण ( ४ २:९ ) पाणिनि वर्णित
नगर यही रहा होगा । कुलूत के दक्षिण मण्डो तथा
सुकेत के राज्य थे। यवादि गण—अष्टाध्यायी
(८:२९) में 'मंडमती' का उल्लेख है । सुकेत
सम्भवतः सुकूट्ट है। इसका उल्लेख सभा पर्व में
कुलिन्दो के सन्दर्भ मे आया है। सतलज के दक्षिण
टोस नदी का क्षेत्र कुलिंद प्राचीन काल में कहा
जाता था । कुलिंद, कुलूत तथा कुणिद एक ही
शब्द के विकृत रूप हैं। अष्टाध्यायी (४.१:१७८ )
में योधेयों के साथ त्रिगर्त सघ का उल्लेख मिलता
है। द्रष्टव्य है आदि पर्व १५५:२ ; सभा पर्व
२७ १८, २३ ७,५२ १८—१९, वन पवे २७-
१५ २६, २७१:१२ ; उद्योग पर्व १६४:८,
१६६ ११, ५ १८, १६०:९, विराट पर्व : अ०
३०, ३२, ३३ ; भीष्म पर्व ५७:७, प्र० ५६, ६१,
७२, १०२ ; द्रोण पर्व : अ० ४, १८:१६ ; कर्ण
पर्व . अ० ८, १७,१९, ३०, १८१, १५७ ; शल्य
पर्व प० २७ ; आश्वमेधिक पर्व: अ. ७४
१०१ (१) कुटुम्बः बाण के हर्ष चरित में
इस प्रकार का पद मिलता है—'चतुरुदधि-
केदारकुटुम्बी ।
इस श्लोक का भाव निम्नलिखित श्लोक में
और स्पष्ट हो जाता है :
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
१०२ (१) तोरमाण . श्री विल्सन अभिषेक
काल सन् ८७ ई. ३ मास तथा राज्य काल ३० वर्ष
२ मास देते हैं ।
श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय सन् ८८ ई.
तथा राज्य काल ३० वर्ष २ मास रखा है ।
श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल लौकिक सं०
३१६२ तथा राज्य काल ३० वर्ष रखा है ।
श्री बाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४०३९ तथा
सन् २६९ ई० देते हैं ।
कलि गताब्द ३२१३ वर्ष ६ मास आता है ।
टायर के अनुसार यह समय सन् ८८ ईस्वी ९ मास
होना चाहिए । कनिंघम ने सन् ४१५ ई. समय
रखा है ।
आइने अकबरी 'हेरेन' नाम देती है । राज्य
काल ३० वर्ष दिया गया है ।
तूरमाण यह तुर्की नाम है । यह उन प्रारम्भिक
तुर्कों में पाया जाता है जिन्होंने भारत विजय किया था