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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 984 में से

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पृष्ठ 652

तृतीय तरंग ४९५
संभाव्य सत्त्वावष्टम्भात्तमसामान्यवंशजम् ।
सादृश्याद्भगिनीभर्तुर्भागिनेयमशङ्कत ॥ ११७ ॥
११७. प्रबल साहस के कारण उसे असामान्य कुलोत्पन्न समझकर भगिनीपति के
सादृश्य से भगिनी पुत्र की शङ्का (जयेन्द्र) ने की।
सस्वरस्तत्त्वजिज्ञासारसेनानुससार तम् ।
प्राप्तस्तद्गृहमौत्सुक्यात्स्वसारं च व्यलोकयत् ॥ ११८ ॥
११८. वस्तु स्थिति जानने की जिज्ञासा रस से उत्सुकता पूर्वक अनुसरण कर (जयेन्द्र)
शीघ्र उसके घर गया और अपनो वहन को देखा।
सा स चान्योन्यमुन्मन्यू पश्यन्तौ भ्रातरौ चिरात् ।
निश्वासद्विगुणोष्मणि मुहुरश्रुण्यमुञ्चताम् ॥ ११९ ॥
११९. उन दोनों भाई बहन ने देर तक एक दूसरे को उत्कण्ठा पूर्वक देखा और पुनः
निश्वास' के कारण अत्यधिक अश्रुपात किया।
कुलाल्या दारको मातः कावेताविति पृष्टवान् ।
अकथ्यतेत्थं वत्सैषा माताऽयं मातुलश्च ते ॥ १२० ॥
१२०. दारक (पुत्र) के यह पूछने पर 'माता ! ये दोनों कौन है' कुलाली ने इस प्रकार
कहा—'वत्स, यह तुम्हारी माता एवं यह मातुल है।'
पितुर्बन्धेन सक्रोधं तं कालापेक्षयाऽक्षमम् ।
शिक्षयित्वा जयेन्द्रोऽथ कार्यशेषाय निर्ययौ ॥ १२१ ॥
१२१. पिता के बन्धन से क्रुद्ध एवं काल की अपेक्षा से असमर्थ उसको जयेन्द्र
शिक्षा देकर अवशिष्ट कार्य हेतु चला गया ।
उत्पिञ्जोत्पादनासज्जे तस्मिन्भ्राता यदृच्छया ।
बन्धात्त्यक्तो नृतरणिस्तोरमाणोऽस्तमाययौ ॥ १२२ ॥
१२२. वह जब विद्रोह हेतु तैयार हुआ। उसी समय स्वेच्छा से भाई (हिरण्य) ने
मानव सूर्य (तोरमान) को बन्धन मुक्त कर दिया, जो अस्त हो (मर) गया।
पाठभेद :
पादटिप्पणियाँ :
श्लोक संख्या ११८ के 'स्तस्त्व' का पाठभेद
११९ (१) निश्वास : कल्हण ने इसी प्रकार
की उपमा राज० त० १:१५७ में दी हैं ।
'स्तर्क' मिलता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२२ में 'त्पादनासज्जे' का,
श्लोक संख्या ११९ में 'निश्वास' का पाठभेद
'त्पादनसज्जे' तथा 'बन्ध्यात्य' का पाठभेद 'बन्धा-
'निःश्वासात्' मिलता है ।
न्मु' मिलता है।