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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये
भेजा । ( म० भा० ३८:१३-२८ )
तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने
के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक
मिला । वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास
जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस
कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंश
के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ०
३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० )
भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप
धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था ।
तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल
नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण
हुआ । ( भा० १२:६ )
महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी
गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प
देकर परिक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म
रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग
परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति
माँगने लगे । परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार
किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने
मित्रो को दे दिया ।
परिक्षित ने फल फोड़ा । उसमे से एक लाल
कीड़ा निकला । उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक
कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ
दिन पूरा हो रहा है । कहीं यही न तक्षकराज
बन जाय ?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन
पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा
तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया ।
परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया ।
पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध
देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का
होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय'
का 'शतं' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ
पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० :
४:२४:३२ )

( ३ ) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के
गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा-
जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया
था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रोपदी के
पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी
प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक
वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन
के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा
था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच
पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के
केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा
जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रो आदि की हत्या
सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण
विसर्जन किया ।
द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की ।
अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि
युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग
देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर
आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ )
अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे
हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ
भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश
हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्माशीर नामक अस्त्र का प्रयोग
किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही
अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी ।
व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवो के
शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को
लौटाना स्वीकार नही किया । किन्तु मणि देने पर
उद्यत हो गया ।
उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र
छोड़ा । अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा ।
उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया । भगवान् ने
शिशु की रक्षा की । विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु-
रात" पड़ गया । महाँ भारत के अनुसार कुरु वंश
के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था । अतएव
परिक्षित नाम पड़ा था । ( म० अश्व० ७० : १० )

४२२ राजतरंगिणी
उद्घाटिततमोरिः स ततः पितृवनावने ।
ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥
१००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित
योगिनियों को देखा।
तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवादितम् ।
ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥
१०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान
उस श्मशान पर गया ।
अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे ।
सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥
१०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर
सब अंगो को जोड़ रही थीं।
उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः ।
वीरालाभान्समन्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥
१०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना वश उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष)
के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया ।
एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ ।
कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥
१०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म्म ( शिश्न ) लाकर, उसे
सर्वांग पूर्ण कर दिया ।
जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। अलग-अलग कर दिया गया है। इससे अर्थ में
अपहृतताडनाइण्डघण्टानाशण्ठटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है।
मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां माह्यमस्पृशन् ॥ पाठभेद :
पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद 'मावर्य्य' मिलता है।
श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग'
'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलना है। 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुद्यमदेवताः
पादटिप्पणियाँ : तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्' मिलता है।
श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा
स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक 'पुंलक्ष्म्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है।
साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद

द्वितीय तरंग ४१९
गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये
भेजा। (म० आ० ३८:१३-२८)
तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने
के लिये प्रस्थान किया। मार्ग में कश्यप मान्त्रिक
मिला। वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास
जा रहा था। तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस
कर दिया। निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस
के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी। (म० आ०
३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१०)
भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप
धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था।
तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल
नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण
हुआ। (भा० १२:६)
महाभारत मे यह कथा दूसरी प्रकार से दी
गयी है। तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प
देकर परिक्षित के पास भेजा। एक फल में सूक्ष्म
रूप कीड़ा बनकर बैठ गया। तपस्वी वेशधारी नाग
परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति
मांगने लगे। परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार
किया। एक बड़ा फल स्वयं ले लिया। शेष अपने
मित्रो को दे दिया।
परिक्षित ने फल फोड़ा। उसमे से एक लाल
कीड़ा निकला। उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक
कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है। सातवाँ
दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज
बन जाय?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन
पर लेकर जैसे खेलने लगा। परन्तु तत्काल वह कोड़ा
तक्षक नाग बन गया। उसके शरीर से लिपट गया।
परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया।
पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध
देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का
होता है। (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय'
का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसो
पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है। (विष्णु० :
४:२४:३२)
(३) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के
गर्भ में था। महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा-
जित हो गया था। केवल अश्वत्थामा शेष रह गया
था। वह पाण्डवद्रोही था। रात्रि में द्रोपदी के
पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। उसने इसी
प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक
वीरों का नाश किया। प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन
के समीप गया। दुर्योधन घायल था। तड़प रहा
था। भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच
पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के
केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा
जीवित बच गये थे। द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या
सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। सुखपूर्वक प्राण
विसर्जन किया।
द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई। उसने प्रतिज्ञा की।
अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि
युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग
देगी। भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर
आक्रमण कर दिया। (म. सौ. ८,९ ११)
अश्वत्थामा चिरंजीवी था। भीमसेन का उसे
हराना कठिन था। अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ
भीम की सहायता के लिए गये। पाण्डवों के नाश
हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग
किया। उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही
अस्त्र छोड़ा। पृथ्वी जलने लगी।
व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के
शरण जाने के लिये कहा। उसने अपने अस्त्र को
लौटाना स्वीकार नहीं किया। किन्तु मणि देने पर
उद्यत हो गया।
उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र
छोड़ा। अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा।
उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया। भगवान् ने
शिशु की रक्षा की। विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु-
रात" पड़ गया। यहाँ भारत के अनुसार कुरु वंश
के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था। अतएव
परिक्षित नाम पड़ा था। (म० अश्व० ७० : १०)

४१८
राजतरंगिणी
द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातर्गर्भे परिक्षितम् ।
जीवयन्कृष्णमाहात्म्यादाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥
९५. द्रोण-पुत्रास्त्र १ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित २ को कृष्ण के माहात्म्य से
जीवित ३ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।”
उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य
नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे
गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार
सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी ।
बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का
उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि
शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन
जीवित हो सकता है ।
बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि
मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि
देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग
से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया ।
बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया ।
अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश
हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक
पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया ।
अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म०
आश्व० ७९-९०)
महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी
है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी
विमाता उलूपी के अस्त्रों-शस्त्रो द्वारा अर्जुन को युद्ध
में मूच्छित किया था । वह घटना सुनकर चित्रांगदा ने
सपत्नी उलूपी को निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी
भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक
मणि दी । बभ्रु वाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर
मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व०
८१:९-१०, ९०:१ )
९५ (१) द्रोणपुत्र : अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य
है । अश्वत्थामा चिरंजीवितों में एक है ।
(२) परिक्षित : उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न
अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण
की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य-
सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु
३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा
भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन,
उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज
बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ
किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था
में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था ।
( दे० भा० २:८ )
कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में
प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि
की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के
लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित
की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर
जूआ, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा स्वर्ण पाच
स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म
तथा पृथ्वी को संतोष हुआ । (आ० : १ : १६:१७)
मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये ।
उन्हें प्यास लगी । जल ढूढ़ने लगे । ऋचीक मुनि के
आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का
आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके ।
राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत
सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला
गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ )
शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात
हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले
की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी ।
शमीक के पुत्र का नाम कही-कही 'गविजात' भी
दिया गया है ।
शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को
दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य

द्वितीय तरंग ४१९
गौरमुख से शाप की बात परीक्षित को बताने के लिये
भेजा । ( म० आ० ३८:१३-२८ )
तक्षक नाग यथा समय परीक्षित को दंश करने
के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक
मिला । वह नाग का विष उतारने परीक्षित के पास
जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस
कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस
के कारण परीक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ०
३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० )
भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप
धर कर परीक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था ।
तक्षक परीक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल
नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण
हुआ । ( भा० १२:६ )
महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी
गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प
देकर परीक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म
रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग
परीक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति
माँगने लगे । परीक्षित ने उनके फल को स्वीकार
किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने
मित्रों को दे दिया ।
परीक्षित ने फल फोड़ा । उसमें से एक लाल
कीड़ा निकला । उसे देखकर परीक्षित ने व्यंगपूर्वक
कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ
दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज
बन जाय ?' परीक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन
पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा
तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया ।
परीक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया ।
पुराणों के अनुसार परीक्षित जन्म से मगध
देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का
होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय'
का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ
पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० :
४:२४:३२ )
( ३ ) जीवित करना—परीक्षित उत्तरा के
गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा-
जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया
था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रौपदी के
पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी
प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक
वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन
के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा
था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच
पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के
केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा
जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या
सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण
विसर्जन किया ।
द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की ।
अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि
युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग
देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर
आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ )
अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे
हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ
भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश
हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग
किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही
अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी ।
व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के
शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को
लौटाना स्वीकार नहीं किया । किन्तु मणि देने पर
उद्यत हो गया ।

४२० राजतरंगिणी
कचं भस्मीकृतं दैत्यैर्नागांस्ताक्ष्यैण भक्षितान् ।
पुनर्जीवयितुं को वा दैवादन्यः प्रगल्भते ॥९६॥
९६. दैत्यों द्वारा भस्मी कृत कच१ एवं ताक्ष्यै२ भक्षित नागों को पुनः जीवित करने के
लिये दैव के अतिरिक्त और कौन समर्थ हुआ ?

एक मत है कि परिक्षित जन्म लेते ही अपने रक्षक
भगवान् की खोजने लगा । अस्तु 'परि+इक्ष' नाम
प्राप्त किया । ( भा० १ : १२ : १० ) इस सन्धि
के अनुसार नाम 'परीक्षित' होना चाहिए। परन्तु
महाभारत में सर्वत्र नाम परिक्षित ही व्यवहृत हुआ
है। कल्हण ने भी नाम 'परिक्षित' ही दिया है। मैंने
भी यही नाम दिया है।
भागवत पुराण में यह कथा और तरह से हो
गयी है। अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध
लेने के लिये द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी।
अर्जुन ने अश्वत्थामा को बन्दी बना लिया। उसे द्रौपदी
के सम्मुख उपस्थित किया। द्रौपदी ने अश्वत्थामा
को ब्राह्मण पुत्र के कारण उसे छोड़ देने के लिये
अर्जुन से कहा। उसने अश्वत्थामा के चूडामणि को
ले लेना पर्याप्त प्रतिशोध माना।
( भाग० १०:७१:४५, ४६, ४७ )
९६ ( १ ) कच : कच देवगुरु बृहस्पति के
पुत्र थे। उनकी माता का नाम नही पता चलता ।
कच देवयानी कथा प्रसिद्ध है ।
कच असुर गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी
विद्या सीखने के लिये सुरों द्वारा भेजे गये थे। कच
ने इसे रहस्यमय ढंग से गोपनीय रखा।
दैत्यों ने समझ लिया कि कच संजीवनी विद्या
प्राप्त करने के लिये आया था। कच को मार डालने
का निश्चय दैत्यों ने किया।
एक दिन कच गुरु की गाय चरा रहा था।
राक्षसों ने कच का टुकड़े-टुकड़े कर डाला। शृगालों
को खिला दिया। शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का
प्रयोग किया। तत्काल कच शृगालों के शरीर से
सजीव निकल आये।

दूसरी बार वह एक अरण्य में गया था। असुरों
ने कच के टुकड़े टुकड़े काटकर समुद्र में फेंक दिये
किन्तु शुक्राचार्य से देवयानी ने पुनः जीवित करने का
निवेदन किया। संजीवनी प्रयोग से पुनः कच का
शरीर जीवित हो गया।
तीसरी बार असुरों ने कच को मारकर उसका
चूर्ण बना डाला। उस चूर्ण को सुरा में मिलाकर
शुक्राचार्य को पिला दिया। ज्ञात होने पर शुक्राचार्य
ने संजीवनी विद्या के प्रभाव से उसे पुकारा। उसने
गुरु के उदर से ही उत्तर दिया—'वह उदर में है।'
शुक्राचार्य ने कहा—'बाहर आओ।' वह बाहर आने
के लिये तैयार न हुआ। उत्तर दिया: 'मैं गुरु हत्या
का दोषी कैसे हो सकता हूँ।'
देवयानी कच से अत्यन्त प्रेम करती थी। उसने
पिता से कच की रक्षा के लिये आग्रह किया।
शुक्राचार्य ने कहा—'कच के प्राप्त होने पर मेरी मृत्यु
हो जायगी।' देवयानी ने दोनों में से किसी का
मरना स्वीकार नहीं किया। विवश होकर शुक्राचार्य
ने उदर स्थित कच को संजीवनी विद्या सिखायी। उसे
समझा दिया। वह पहले जी जायगा। तत्पश्चात्
बाहर आकर मरे हुए उसे संजीवनी विद्या के प्रयोग
से जिला दे। कच ने यही किया।
किन्तु गुरु कन्या होने के कारण कच ने देवयानी
को बहन तुल्य माना। उससे विवाह करना अस्वीकार
कर दिया। देवयानी ने उसे शाप दिया। संजीवनी
विद्या उसे फलप्रद नहीं होगी। कच ने गुरु
कन्या और बहन समझकर उसे प्रतिशाप नहीं
दिया। परन्तु कहा—मैं यह विद्या दूसरे को सिखा
दूँगा। वह प्रयोग करेगा। मेरा प्रयोजन सिद्ध हो
जायगा।

द्वितीय तरंग ४२१
इत्युक्तवा भाविनोऽर्थस्य द्रष्टुं सिद्धिं समुद्यतः ।
तत्रैव बद्धवसतिः कङ्कालं स ररक्ष तम् ॥९७॥
९७. इस प्रकार कह कर भावी अर्थ की सिद्धि देखने को समुद्यत उसने वहीं पर
निवास करते हुए उस कंकाल को रक्षित किया।
अथार्धरात्रे निर्निद्रस्तस्यैवाद्भुतचिन्तया ।
धूपाधिवासमीशानो घ्रातवान्दिव्यमेकदा ॥ ९८ ॥
९८. एक समय उसी अद्भुत चिन्ता में निद्रारहित ईशान ने अर्धरात्रि में दिव्य
धूपगन्ध का अनुभव किया।
उच्चण्डलाडनादण्डोद्घृष्टघण्टौघटांकृतैः ।
चण्डैर्डमरुनिर्घोषैर्घर्घरं श्रुतवान्ध्वनिम् ॥ ९९ ॥
९९. दीर्घ ताडन दण्ड ताडित घण्टों के नादों एवं भयंकर डमरु निर्घोषों से घर्घर
ध्वनि सुना।
(२) तार्क्ष्य : जीमूतवाहन द्वारा नागों के जीवित
करने का उल्लेख कथासरित्सागर में सरल शैली
में कश्मीरी कवि सोमदेव ( ग्यारहवीं शताब्दी )
ने वर्णन किया है। सोमदेव कवि क्षेमेन्द्र का सम-
कालीन था।
तार्क्ष्य नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं। ऋग्वेद
में तार्क्ष्य एक अश्व का नाम है। (ऋ० १:८९:६;
१०:१७८) त्रसदस्यु का यह वंश माना गया है।
(ऋ० ८:२२:७ ) तार्क्ष्य को एक पक्षी या वायम
कहा गया है। उसे वैपश्चित नामक पक्षियों का
राजा कहा गया है। अरिष्टनेमि का एक पैतृक
नाम तार्क्ष्य है। तार्क्ष्य एक आचार्य भी थे ( ए. ब्रा.
३:१:६, सां. ब्रा. ७:१९ ) कश्यप प्रजापति का
नामान्तर तार्क्ष्य है। दक्ष ने इसे अपनी कन्याएँ दी
थीं। सरस्वती से इनका सम्भाषण हुआ था। ( म.
व. १८४: तथा १८६ )
यह कश्यप तथा विनता का पुत्र तथा गरुड का
भाई था। ( म० आ० ६५:४० ) भगवान् शिव का
भी एक नाम तार्क्ष्य कहा गया है। ( अनु०:१७:९८)
तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, अरुणी तथा वारुणी
विनता के पुत्र हैं। कद्रू के पुत्र शेष, अनन्त आदि
नाग हैं। विनता एवं कद्रू सपत्नियां हैं। उनमें
वैमनस्य तथा शत्रुता स्वाभाविक है। उनकी लड़ाई
प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी सन्तानें भी परस्पर
एक दूसरे से शत्रुता रखती थीं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९८ में 'मेकदा' का पाठभेद
'मेकतः मिलता है।
श्लोक संख्या ९९ में 'उच्च' का 'उच्च'
'लाडना' का 'वादना' 'ताडना', 'वदना' तथा
'डमरु-निर्घोषै' का पाठभेद 'डमरुघोप्यैश्च'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
९९ (१) लाडन दण्ड : ताडन का अर्थ आघात
करना होता है। ताडन दण्ड घण्टा बजाने की मुगरी
अथवा लकड़ी का बना दण्ड अर्थात् दण्ड समान वस्तु
थी। जापानी घंटा में डण्डा रस्सी में बँधा रहता
है। वह गोल घंटा पर आघात करता है। भारतीय
मन्दिरों तथा चर्च में घण्टों में लोलक भीतर लगे
रहते हैं। एक घण्टा साधारण मोटे चद्दर अष्ट धातु
का होता है। उसे मुगरी या लकड़ी से ठोक कर
बजाते हैं।

४२२ राजतरंगिणी
उद्घाटिततमोरेः स ततः पितृवनावभो ।
ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥
१००. तदुपारन्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित
योगिनियों को देखा ।
तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवाहितम् ।
ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥
१०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान
उस श्मशान पर गया ।
अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे ।
सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥
१०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर
सब अंगो को जोड़ रही थीं ।
उल्लसद्दूरसंभोगवाञ्छा मद्यपदेवताः ।
वीरालाभात्समान्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥
१०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना बस उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष)
के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया ।
एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ ।
कुतोऽप्यानीय पुंलक्ष्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥
१०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म ( शिश्न ) लाकर, उसे
सर्वांग पूर्ण कर दिया ।
जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। अलग-अलग कर दिया गया है। इससे अर्थ में
अचलह्यावनादण्डघण्टानाखण्डशंकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है।
मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां साहसस्पृशाम् ॥ पाठभेद :
पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद
'माकर्ण्य' मिलता है।
श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग'
'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलता है। 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुख्यदेवताः
पादटिप्पणियाँ : तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्'
श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री मिलता है।
स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा
साथ ही किया है। यहां पर दोनो श्लोकों का अनुवाद 'पुंलक्ष्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है।

द्वितीय तरंग ४२३
अथ पुर्यष्टकभ्राम्यदनाक्रान्तान्यविग्रहम् ।
योगेनाकृष्य योगिन्यस्तत्र सन्धिमतेन्यधुः ॥ १०५ ॥
१०५. सन्धिमति के पुर्यष्टक को आकृष्ट कर योगिनियों ने उस (शरीर) में
रख दिया।
ततः सुप्तोत्थित इव प्रत्तदिव्यविलेपनः ।
समभुज्यत ताभिः स यथेच्छं चक्रनायकः ॥ १०६ ॥
१०६. तत्पश्चात् सुप्तोत्थित सदृश दिव्य लेपन लिप्त उस चक्र नायक१ ने उनसे समुप-
भोग किया।
ईशानस्तस्य देवीनां वितीर्णाऽङ्गर्हति पुनः।
क्षपायां क्षीयमाणायां चकितः पर्यशङ्कत ॥ १०७ ॥
१०७. रात्रि के क्षीयमाण होने पर, चकित ईशान ने देवियों द्वारा उसके (सन्धि-
मति के) सम्पृक्त अंगों के हरण की आशंका की।
नदंस्तद्रक्षया धीरः स च तत्स्थानमाययौ ।
तच्च योगेश्वरीचक्रं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १०८ ॥
१०८. वह धीर उसकी रक्षा हेतु, नाद करता हुआ उस स्थान पर आ गया और वह
योगिनी समूह तत्क्षण अन्तर्हित हो गया।
श्लोक संख्या १०५ में 'पुर्यष्टक' का 'पुर्यष्टकं'
'भ्राम्यद' का 'भ्राम्यन्म' तथा 'योगिन्य.' का
'योगेश्यः', 'योगेस्य' 'योगेभ्यः' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०५ (१) पुर्यष्टक—पुर्यष्टक का विशद
वर्णन रूप, कार्यकलापादि का 'योगवासिष्ठ रामायण'
में मुख्यतः लीला उपाख्यान में किया गया है।
द्रष्टव्य है—योगवासिष्ट कथा'
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०६ में 'सुप्तो' का 'स्वप्तो' तथा
'प्रत्तदि' का पाठभेद 'प्रमुदि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०६ (१) चक्रनायक : जोनराजने चक्रनायक
के स्थान पर योगिनी नायक शब्द का प्रयोग किया है।
योगिनीनायको दूरात् परिज्ञाय नृपात्मजम् ।
योगिनीनिकटं प्रापुर्विकटप्रकटौजसः ॥३४८॥
चक्रनायक एक आयुर्वेदिक औषधि होती है।
भैरवी चक्र में उसके नेता के रूप में चक्रनायक एवं
चक्रेश दोनों शब्द मिलता है। वह तान्त्रिक चक्र
का अधिष्ठाता माना जाता है। चक्रनायक का भी
अर्थ व्याघ्रगन्ध नामक गंध द्रव्य होता है।
योग तथा तन्त्र साहित्य मे चक्रों का वर्णन मिलता
है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत,
विशुद्ध, आज्ञाषट्चक्र व्यक्ति के रीढ़ प्रदेश पर शरीर
के अति निम्नभाग से मूर्धा तक जाता है। मूर्धा पर
सहस्रधारा होती है। शुभाशुभ के निर्णय हेतु स्वर
तथा सर्वतोभद्रादि ८४ चक्रों का उल्लेख मिलता है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १०७में 'ईशानस्तस्य' का 'ईशानतस्य'
तथा 'र्णाङ्गहर्ति' का पाठभेद 'र्णाङ्गाहृति' मिलता है।

४२२ राजतरंगिणी
उद्घाटिततमोरीः स ततः पितृवनावभो ।
ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥
१००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित
योगिनियों को देखा ।
तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवाहितम् ।
ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥
१०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान
उस श्मशान पर गया ।
अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे ।
सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥
१०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर
सब अंगो को जोड़ रही थीं।
उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः ।
वीरालाभात्समान्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥
१०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना बस उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष)
के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया ।
एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ ।
कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥
१०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म ( शिश्न ) लाकर, उसे
सर्वांग पूर्ण कर दिया ।
जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है । अलग-अलग कर दिया गया है । इससे अर्थ में
अचलह्वाडनादण्डघण्टानाखण्डटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है ।
मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां साहसमस्पृशाम् ॥ पाठभेद :
पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद
श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा 'माकर्ण्य' मिलता है ।
'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलता है । श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग'
पादटिप्पणियाँ : 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुग्धमदेवताः
श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्'
स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक मिलता है ।
साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा
'पुंलक्ष्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४२३
अथ पुर्यष्टकभ्राम्यदनाक्रान्तान्यविग्रहम् ।
योगेनाकृष्य योगिन्यस्तत्र संधिमतेन्यधुः ॥ १०५ ॥
१०५. सन्धिमति के पुर्यष्टक को आकृष्ट कर योगिनियों ने उस (शरीर) में
रख दिया।
ततः सुप्तोत्थित इव प्रत्तदिव्यविलेपनः ।
समभुज्यत ताभिः स यथेच्छं चक्रनायकः ॥ १०६ ॥
१०६. तत्पश्चात् सुप्तोत्थित सदृश दिव्य लेपन लिप्त उस चक्र नायक¹ ने उनसे समुप-
भोग किया।
ईशानस्तस्य देवीनां वितीर्णोऽङ्गहृति पुनः ।
क्षपायां क्षीयमाणायां चकितः पर्यशङ्कत ॥ १०७ ॥
१०७. रात्रि के क्षीयमाण होने पर, चकित ईशान ने देवियों द्वारा उसके (सन्धि-
मति के) सम्पृक्त अंगों के हरण की आशंका की।
नदंस्तद्रक्षया धीरः स च तत्स्थानमाययौ ।
तच्च योगेश्वरीचक्रं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १०८ ॥
१०८. वह धीर उसकी रक्षा हेतु, नाद करता हुआ उस स्थान पर आ गया और वह
योगिनी समूह तत्क्षण अन्तर्हित हो गया ।
श्लोक संख्या १०५ में 'पुर्यष्टक' का 'पुर्यष्टकं'
'भ्राम्यद' का 'भ्राम्यन्म' तथा 'योगिन्यः' का
'योगेश्यः', 'योगेश्य' 'योगेभ्यः' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०५ ( १ ) पुर्यष्टक—पुर्यष्टक का विशद
वर्णन रूप, कार्यकलापादि का 'योगवासिष्ठ रामायण'
में मुख्यतः लीला उपाख्यान में किया गया है।
द्रष्टव्य है—'योगवासिष्ठ कथा'
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०६ में 'सुप्तो' का 'स्वप्तो' तथा
'प्रत्तदि' का पाठभेद 'प्रमुदि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०६ (१) चक्रनायक : जोनराजने चक्रनायक
के स्थान पर योगिनी नायक शब्द का प्रयोग किया है।
योगिनीनायको दूरात् परिज्ञाय नृपात्मजम् ।
योगिनीनिकटं प्रापुर्बिकटप्रकटौजसः ॥३४८॥
चक्रनायक एक आयुर्वेदिक ओषधि होती है।
भैरवी चक्र में उसके नेता के रूप में चक्रनायक एवं
चक्रेश दोनों शब्द मिलता है। वह तान्त्रिक चक्र
का अधिष्ठाता माना जाता है। चक्रनायक का भी
अर्थ व्याघ्रनख नामक गंध द्रव्य होता है।
योग तथा तन्त्र साहित्य में चक्रों का वर्णन मिलता
है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुरक, अनाहत,
विशुद्ध, आज्ञाषट्चक्र व्यक्ति के रीढ़ प्रदेश पर शरीर
के अति निम्नभाग से मूर्धा तक जाता है। मूर्धा पर
सहस्रधारा होती है। शुभाशुभ के निर्णय हेतु स्वर
तथा सर्वतोभद्रादि ८१ चक्रों का उल्लेख मिलता है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १०७ में 'ईशानस्तस्य' का 'ईशानतस्य'
तथा 'र्णाङ्गहृति' का पाठभेद 'र्णाङ्गाह्णति' मिलता है।

४२४ राजतरंगिणी
अथाऽश्रूयत वाक्तासां मा भूदीशाम भीस्तव ।
नास्त्यङ्गहानिरस्माकं वृते चास्मिन्न वञ्चना ॥ १०९
१०९. अनन्तर उनकी वाणी सुनायी पड़ी-हे ईशान ! तुम्हें भय न हो। हम लोगों के
छुने इसमें ( शरीर में ) अंग हानि एवं वंचना नहीं है।'
अस्मद्वराद्दिव्यवपुः संधितः संधिमानसौ ।
आर्यत्वादार्थराजश्च ख्यातो भुवि भविष्यति ॥ ११० ॥
११०. "हम लोगों के वर से संयुक्त दिव्य शरीर यह सन्धिमान¹ आर्य² होने के
कारण पृथ्वी पर प्रसिद्ध 'आर्य राज'³ होगा।"
ततो दिव्याम्बरः स्रग्वी दिव्यभूषणभूषितः ।
ववन्दे संधिमान्प्रह्वः प्राप्तपूर्वस्मृतिर्गुरुम् ॥ १११ ॥
१११. तदुपरान्त दिव्याम्बर एवं माला धारी, दिव्य भूषण-भूषित, विनत सन्धि-
मान ने पूर्व स्मृति प्राप्त कर, गुरु की वन्दना की।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११० में 'राजश्च' का 'राजाख्यः'
'राजास्य' तथा 'भुवि' का पाठभेद 'राजा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११० (१) सन्धिमान : अंगों को योगिनियों
द्वारा सन्धि करने पर योगिनियों ने उसे सन्धिमान
नाम से सम्बोधित किया । इसी प्रकार जरासन्ध के
शरीर से दोनों भागों को जरा ने एक में जोडा तो
जोडने वाले के नाम के साथ उसका नाम जरासन्ध
पड़ गया था ।
कल्हण ने इसके पश्चात् सन्धिमति के स्थान पर
'मन्धिमान' नाम का ही प्रयोग किया है । सन्धिमति
नाम का पुनः उल्लेख नहीं मिलता ।
(२) आर्य : स्त्रियाँ आर्य शब्द पति के
लिये आदर प्रदर्शन हेतु प्रयोग करती हैं। योगिनियाँ
भी स्त्री थी । उन्होंने सन्धिमति के साथ पतियत्
व्यवहार किया था अतएव उन्होंने आदर सूचक श्रेष्ठ
शब्द 'आर्य' से सन्धिमान का सम्बोधन किया है ।
अपने को इसी रूपद्वारा स्वीकार कर लिया था।
तथाव नाम नहीं लिया ।
प्रतीत होता है। कल्हण काल में भी पत्नी
अपने पति का नाम नहीं लेती थी । यह प्रथा अब
भी प्रचलित है। कल्हण ने बड़ी चातुरी के साथ
योगिनियों के मुख से 'सन्धिमति' मूल नाम के स्थान
पर 'सन्धिमान' तथा 'आर्य' कहलवाकर इस प्रथा का
निर्वाह किया है।
(३) आर्य राज : योगिनियों ने अपने पति
स्वरूप सन्धिमति को 'आर्य' शब्द से सम्बोधन किया
था। अतएव उसका नाम 'सन्धिमति', 'सन्धिमान'
के स्थान पर 'आर्यरात्र' रख दिया। उनका पति
काश्मीर का राजा होगा। इससे यह भाव प्रकट
होता है।
आर्यराज का अर्थ होता है आर्यों का राजा।
प्राचीन काल में कुल के कर्ता के लिये आर्य
सम्बोधन प्रयुक्त किया जाता था । कुल की
पत्नियां अपने पति को 'आर्य पुत्र' शब्द से सम्बोधित
करती थी । कल्हण ने इसका प्रयोग पुनः तरंग ८
में किया है। ( रा० त० ८ : ३२४७ ) प्राकृत में
आर्य शब्द 'अज्ज' हो गया था। आधुनिक 'जी' शब्द
अज्ज का अपभ्रंश है। जो नाम के अन्त में लगाना
आदर सूचक माना जाता है।

द्वितीय तरंग ४२५
ईशानोऽपि तमालिङ्ग्य स्वप्नेष्वपि सुदुर्लभम् ।
भूमिकामललम्बे कामिति को वक्तुमर्हति ॥ ११२ ॥
११२. ईशान ने स्वप्न में भी सुदुर्लभ उसे आलिंगन कर, किस आनन्द की प्राप्ति
की, यह कहने में कौन समर्थ है ?
असारं च विचित्रं च संसारं ध्यायतोर्मिथः ।
विवेकविशदा तत्र प्रावर्तत तयोः कथः ॥ ११३ ॥
११३. वहां पर परस्पर असार एवं विचित्र संसार का चिन्तन करते हुए, उन दोनों
की विवेक-विशद कथा चली।
अथ वार्तां विदित्वेमां कुतोऽपि नगरौकसः ।
सबालवृद्धाः सामात्यास्तमेवोद्देशमाययुः ॥ ११४ ॥
११४. किसी प्रकार इस बात को जानकर सबाल-वृद्ध, नगर निवासी, अमात्य सहित।
उस स्थान पर आ गये ।
पूर्वाकृतिविसंवादाद् भ्रमो नाऽयं स इत्यथ ।
तेनाच्छिद्यत संवादि निखिलाम्पृच्छता वचः ॥ ११५ ॥
११५. पूर्वाकृति से भिन्न होने के कारण यह, वह (मन्त्री) नहीं है, उस भ्रम को संवादी
निखिल लोगों से बातें पूछते हुए उसने दूर कर दिया ।
अर्थनां शासितुं राष्ट्रं पौराणामपराजकम् ।
सोऽन्वमन्यत कृच्छ्रेण निस्स्पृहः शासनाद्गुरोः ॥ ११६ ॥
सन्धिमान् आर्यराजा
११६. नृप हीन राष्ट्र के शासन हेतु, पुरवासियों की प्रार्थना करने पर, गुरु के
आदेश से निस्पृह उसने कष्ट पूर्वक अनुमति दे दी।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११२ में 'लतम्बे' का पाठभेद
'ललम्बे' मिलता है ।
श्लोक संख्या ११५ में 'संवादि' का पाठभेद
'संवाप्ति' मिलता है ।
श्लोक संख्या ११६ में 'अर्थनां' का पाठभेद
'अर्थानां' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१. आइने अकबरी में सन्धिमति का नाम 'अरि-राज' और राज्य काल ४७ वर्ष दिया गया है ।
२. हसन सन्धिमान के विषय में लिखता है—
'राजा सन्धीमान अलमारूफ व आर्य राज ३०३१ क०
५४
में बातफ़ाक अराकीने शहर कश्मीर पर मुतमक्कन
हुआ । इन्तज़ाम सल्तनत और फ़ौज और रैयत के
साथ अदल व इन्साफ़ से पेश आने में बदिल व जान
कोशिश करता । जिस मुकाम पर उसे सूली दी
गयी थी वहाँ उसने सन्दशूर का मन्दिर बनवाया।
ईशा बरारी में अपने मुरशिद की ताज़ीम व तक-
रीम के पेश नज़र ईशेश्वर का मन्दिर बनवाया।
मुक़ाम बेद में बेदा देवी का मन्दिर और मौज़ा
बमरू में भीमा देवी की यादगार क़ायम की ।
परगना फाग की आबादी और सर सब्ज़ी के लिये
दरयाए सन्दलार से एक महर जारी की । जिसका
नाम भारी कुल रखा । परगना लार में आरी नाम

४२६ राजतरंगिणी

का गाँव आबाद करके नहर धार्य कुल के अख़रा-
जात के लिये वक़्फ़ कर दिया ।

'आख़िरकार गद्दार दुनिया में एतबार न रख-
कर अक्सर औकात इबादत और मन्दिरों के बुतो
की पूजापाठ मे सर्फ़ किया करता था । रोज़ाना
हर सुबह एक हज़ार शिव लिंग बनवाकर उनकी
पूजा करता । वह चीज़ ममालूहु मुल्को और अमूर
सल्तनत को कमाहक़ देख-भाल से माना हुई ।
लोग इस बात से बहुत तंग हुए । आर्यराज ने भी
अपने दिल में इस अम्र का अहसास कर लिया ।
मुल्क से सर करदः लोगों को अपने रूबरू बुलाया ।
और कहा "अब तक मै तुम्हारे कहने सुनने से अमूर
सल्तनत सरंजाम देता था । अब मुनासिब होगा
कि किसी और शख्स को इस काम के लिए तैयार
कर लो और मुझे माज़र समझो ।

'बाज़ अजी हिरन की खाल पहन ली और
बोमज़ू को गार में चला गया । और कुछ अरसा
बाद लोगों की नज़रो से ग़ायब हो गया । तब से
लोग इस ग़ार को गार आर्य राय कहने लगे । ४७
वरस हकूमत मे गुजारे आर्य राय को हकूमत के
तेरह बरस बाद सन् विक्रमी शुरू हुआ । सन्
कलयुग ३०४४ बरस गुज़रे । तवालत के खौफ़ मे
इन्हें तर्क किया गया ।

'राज सन्धीमान के आख़िरी अहद हकूमत मे
लोगों मे मशहूर हो गया कि राजा अन्ध युधिष्ठिर
का पोता गोपादित्त नाम राजा कन्दहार के ज़ेर
साया औक़ात बसर करता है । उसका एक बेटा है ।
मेघवाहन नाम जो इन्तहाई दर्जा का लायक व
फ़ायक है । इन्ही दिनों प्रयाग के राजा जोतिश
ने अपनी बेटो अमरितपरमा के स्वयंवर का इश्तः
हार दिया हुआ था । इस चीज़ के पैशनज़र मेघ-
वाहन बाप की इजाज़त से जश्न स्वयंवर मे हाज़िर
हुआ । अमरित परमा ने उसे देखते ही इन्तहाई
पसन्द किया । और फूलो की माला उसकी गरदन
में डाल दी । मेघवाहन साज़ वो सामान और
पसन्दीदः दुलहिन के साथ कन्दहार में रहने लगा ।
कश्मीर के अवाम सन्धीमान की कमज़ोरी के बायस
पहले ही से दिलगीर थे । जब उन्होंने राजा मेघवाहन
का नाम सुना तो उसके खिदमत में कदमींर के करने
का पैग़ाम भेजा । इन ६ राजाओं की हकूमत एक
सौ बयानवे बरस शुमार होता है ।"

हज़रत सुलेमान और मन्दिमान-हमन एक
अजीब कहानी उपस्थित कर सुलेमान को सन्धिमान
प्रमाणित करने का प्रयास करता है ।

'मुला अहमद रतनागर के तरजुमा में हुक्म
तराज है कि दामोदर के मशरूख होने के बाद उसका
वेटा नरेन्द्र हुक्मरानी के तकिया पर बैठा । इसके
थोड़े दिनों के बाद एक शख्स सन्दीमान नामी जो
मुल्क मगरिब के आबिदों और जाहिदो में से था ।
सर ज़मीन कश्मीर मे वारिद हुआ । इस शख्स ने
रयाज़त के जोर से ऐसा रुतबा पाया था कि उसका
विमान यानी उड़न खटोला हवा पर जाता था !
ज़िन्द और परिन्दे उसके लहकाम के फ़रमा बरदार
थे और उसके साथ साथ जाते । जब उसके तहत
में शहबाज़ की तरह कश्मीर की तमाम हदूद की
सैर कर ली तो बिल आखिर कोह लारिक जेह
यानी कोह सुलेमान की चोटी पर ठहर गया । इस
हाल को देख कर आम और खास लोग वहा जमा
हो गये । और उसकी शान व शौकत और आब व
दाब को देखकर दंग रह गये ।

'राजा नरेन्द्र इस खबर के सुनते ही फौरन्
हाज़िर खिदमत हुआ । राजा सन्दिमान की शोशू
नबी और रज़ामन्दी हासिल की। इसके अलावा
जिस शख्स ने भी उसके सामने अपनी कोई मुराद
रखी बह उसमे कामयाब व बामुराद हुआ । चूंकि
शहर सन्दमत नगर के गर्क हो जाने से कश्मीर की
सतह हदूद वैजवारह तक हमेशा सैलाबी रहतो थी इस
वजह से लोग ग़लात की तंगी और कहूत के बार
हमेशा आजिज़ रहते थे । इसलिए उन्होने लगाना
के रूबरू इल्तजा की कि -

द्वितीय तरंग ४२७
प्रापय्योपवनोपान्तं तं दिव्याकृतिशोभिनम् ।
सत्तूर्यं स्नापयामासुर्गभिषेकाम्बुभिर्द्विजाः ॥ ११७ ॥
११७. उपवन के समीप ले जाकर, ब्राह्मणों ने दिव्याकृति शोभित उसे तूर्य नाद पूर्वक
अभिषेक जल से स्नान कराया ।

निकाल दिया जाये । सन्दिमान ने जिन्नों की एक
जमाअन को उन पत्थरों के उठाने पर जो जलजला
की वजह से खादून यार के मुकाम पर दरया में
लुढ़क गये थे । हुक्म दिया । हुक्म पाते ही जिन्नों
ने दरया की गहराई से पत्थरों को निकाल लिया ।
जिससे रुका हुआ पानी फिर से जारी हो गया ।
और थोड़े ही अरसा में कश्मीर की अन्दरूनी सतह
जाहिर हो गयी ।
'राजा नरेन्दर ने ग्रांजनाव की दोस्ती और
रफाकत को अपने ऊपर पसन्द किया । और मुल्क
कश्मीर की हुकूमत से दस्तबरदारी अख्तियार
कर ली । मन्धिमान को भी उसकी यह ख्वाहिश
पसन्द आई और हमेशा अपने साथ रहने और पास
बैठने की इजाज़त से उसे सर्फराज किया ।
'कहते हैं तुरकिस्तान के शाहज़ादो में से तीन
आदमी हुश्क, कनिष्क और जुश्क राजा सन्धिमान के
इस तख्त पर हमराह थे । इस बिना पर अपनी
पैदाइश असलियत के बमूजिब इन तीनों शहजादो
को मुल्क कश्मीर बतौर जागीर बख्शा । इस मुल्क
के बहुत से लोगों को अपना मरवोदा बना लिया ।
एक हफ्ता तक कश्मीर के सैर व सपाहत करके
वापसी अख्तियार किया ।
'मतरजुमा यानी मुल्ला अहमद कहता है कि
इससे साफ मालूम होता है कि सन्दिमान हज़रत
सुलेमान होंगे। क्योकि मशरिक के लोग उसे सन्दि-
मान यानी रियाज़त कीश इन्सान कहते हैं और तमाम
दुनिया में सबको मालूम है कि हज़रत सुलेमान का
तख्त ही हवा पर उड़ती था । उसके तांबे में जिन
और परी थे । और तफीर लफ़्ज़ी के बिना पर
० ० के लोग हज़रत सुलेमान को सन्दीमान कहते

  • राजा सन्धीमान ० ० से लेकर इस वक्त तक कोह लारुक
    ज़ेर को कोह सुलेमान या कोह सन्दोमान कहा जाता
    है । नीज़ खता कश्मीर का दूसरा नाम 'बाग
    सुलेमान' भी है ।'
    मैं प्रथम तरंग पर इस विषय में लिख चुका
    हूँ कि सुलेमान का काल ९००-९३३ वर्ष ईसा पूर्व था
    और कनिष्क का काल सन् ७८-१०७ है । इस
    प्रकार दोनों के समयों में १०४८ वर्ष का अन्तर पड़ता
    है । सन्धिमान का काल हमन ने क० ३०३१ संवत्
    तथा कनिष्क का क० १७९८ संवत् बतलाया
    है । सन्धिमान १२३३ वर्ष पूर्व कनिष्क का
    होना स्वीकार करता है । दोनों के कालों में
    १२३३ वर्षों का अन्तर है । सुलेमान ९०० वर्ष ईशा
    पूर्व हुए थे अतएव सन्धिमान तथा सुलेमान के समयों
    में २२८१ वर्षों का अन्तर पड़ जाता है । हम्न इन
    अन्तरों का किसी प्रकार भी स्पष्टीकरण करने में
    असमर्थ होता है । अतएव सुलेमान और सन्धिमान
    एक ही व्यक्ति हैं यह धारणा सर्वथा भ्रामक एवं
    मिथ्या है ।
    (३) राजा का निर्वाचन : राजा के
    निर्वाचन का उल्लेख पूर्व वैदिक काल में मिलता है ।
    ऋग्वेद में उल्लेख आता है ।
    'तां ईं विशो न राजानं वृणाना वोभतश्चदो अप
    बुधादतिष्ठन् ।' ( १०:१२४:८ )
    विश द्वारा राजा का निर्वाचन किया गया था ।
    अथर्ववेद में भी विशों द्वारा राजा के निर्वाचन की
    कामना की गयी है ।
    'त्वां विशो वृणतां राज्याय ।' ( ३:४:२ )

पादटिप्पणियाँ
११७ श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईशा
पूर्व २३ वर्ष ९ मास और समाप्त काल सन् १३५
ई. तथा राज्य काल ४७ वर्ष दिया है ।

४२८ राजतरंगिणी
नवराजोचिताचारे न स शिक्षामपैक्षत ।
दृढकर्मा समस्तास्तु निस्तुषाः प्रक्रिया व्यधात् ॥ ११८ ॥
११८. अनुभवी उसने नये नृप के उचित आचार हेतु शिक्षा की अपेक्षा नहीं की,
उसने समस्त प्रक्रियाओं को सरल कर दिया।
स राजोचितनेपथ्यः पौराशीर्घोषशोभिनीम् ।
सौधोन्मिपल्लाजवर्षां ससैन्यः प्राविशत्पुरीम् ॥ ११९ ॥
११९. राज्योचित परिधानयुक्त उसने सेना के साथ, पुरवासियों के आशीर्घोष से
रम्य एवं सौधों से उन्मिषित लाजवृष्टि पूर्ण पुरी में प्रवेश किया।
तस्मिन्विरजसि प्राज्यमाक्रामति नृपासनम् ।
आचक्राम प्रजा व्यापन्न दैवी न च मानुषी ॥ १२० ॥
१२०. महान् नृपासन पर रजोगुण रहित उसके आसीन होने के पश्चात् प्रजा
पर दैवी एवं मानुषी आपत्ति नहीं आयी।
अहरन्हृदयं तस्य शृङ्गारहितविभ्रमाः ।
नितम्बिन्यो वनभुवः शमिनो न तु योषितः ॥ १२१ ॥
१२१. शमी उसके हृदय को शृङ्गार हित विभ्रम शालिनी एवं नितम्बिनी¹ वनभूमियों
ने अपहरण किया, न कि (एवंभूत) योषिताओं ने।
श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व २४ (१) नितम्ब : इस श्लोक में नितम्ब एवं
वर्ष तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। शृंगारहित विभ्रम श्लिष्ट है।
श्री स्टीन ने अभिषेक का समय लौकिक संवत् नितम्ब का अर्थ पर्वत का निम्न प्रदेश तथा
३०४१ तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। रमणी का नितम्ब अर्थात् कटि प्रदेश का निम्न
श्री शास्त्री ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३९४२ भाग होता है।
तथा सन् १७५ ई० दिया है। शृंगारहितविभ्रम का एक अर्थ शृंगो से
पाठभेद : शोभमान और अपर अर्थ शृंगार के लिये विलास-
श्लोक संख्या ११८ में 'पैक्षत' का पाठभेद शालिनी रमणी होता है।
'पेक्षत' मिलता है। शृंगार एवं शान्त रस परस्पर विरोधी है।
श्लोक संख्या ११९ में 'सौधोन्मि' का 'सौधोमि' परन्तु यहाँ कल्हण ने दोनो के अपुष्ट रूप का एक
तथा 'ससैन्य' का पाठभेद 'ससैन्या' मिलता है। साथ चित्रण किया है। इसी प्रकार भर्तृहरि ने
पादटिप्पणियां : निम्नलिखित श्लोक में इसको अभिव्यक्त किया है।
१२१ : इस श्लोक का एक अर्थ यह भी होता है— "मात्सर्यमुत्सार्य विचार्यकार्य-
"शमी उसके हृदय को शृंगों से शोभायमान सुन्दर मार्याः समर्यादमिदं वदन्तु।
उपत्यका वाली वनभूमियों ने अपहृत किया न कि सेव्या नितम्बा किमु भूधराणामुत
शृंगार के लिये विलासवती नितम्बिनी योषिताओने।" स्मितस्मेरविकासिनीनाम् ॥"

द्वितीय तरंग ४२९
वनप्रसूनसंपर्कपुण्यगन्धैस्तपस्विनाम् ।
कर्पूरधूपसुरभिः करैः स्पृष्टः स पिप्रये ॥ १२२ ॥
१२२. कर्पूर १ एवं धूप २ से सुरभित वह, तपस्वियों के वनपुष्प संपर्क से पुण्यगन्ध-
शाली करों का स्पर्श प्राप्तकर, प्रसन्न हुआ ।
भूतेशवर्धमानेशविजयेशादपश्यतः ।
नियमो राजकार्येषु तस्याऽभूत्प्रतिवासरम् ॥ १२३ ॥
१२३. भूतेश १, वर्धमानेश २, तथा विजयेश ३ का जब दर्शन नहीं करता था, उस समय
प्रति दिन राज्य कार्य ही उसका नियम हो गया था ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १२२ में 'स्पृष्टः' का पाठभेद
'पृष्टः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२२ (१) कपूर—कपूर का शिव की पूजा में
बहुत महत्व है । कर्पूर से भगवान् के वर्ण की उपमा
दी गयी है । कपूर से आरती करने की प्रथा सर्वत्र
भारत में प्रचलित है । कपूर का गुण शीतलता है ।
वह सुगन्धित होता है । उसकी सुगन्धि सात्त्विक
होती है । कुछ विचित्र गति है । कपूर शीतल
होते हुए भी गुणकारी होते हुए भी अपने में अग्नि
छिपाये बैठा रहता है । अग्निस्पर्श से वह ज्योतिर्मय
हो जाता है । स्पर्श गुण से कितना अन्तर वस्तु
परिस्थितियों में हो जाता है । कपूर उसका ज्वलन्त
उदाहरण है । शीतल होते हुए भी दाहक हो
जाता है ।
इस समय कपूर के तीन वर्ग हैं । जापानी और
चीन का बना भीमसेनी अथवा बरास द्वारा निर्मित
और भारतीय अथवा पत्री कपूर । यह उड़नशील
वनस्पति से बना पदार्थ है । जापानी नाम से प्रसिद्ध
कपूर का पौधा चीन, जापान, फारमूसा तथा
दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में मिलते हैं । इसका
पौधा देहरादून, सहारनपुर, नीलगिरि तथा मैसूर में
मिलता है । नेपाल में भी इसके वृक्ष होते हैं ।
भारत में यह कपूर की पत्तियों तथा जापानादि में
पचास वर्ष के ऊपर के वृक्षों के काष्ठ के आसवन
से निकाला जाता है । भीमसेनी कपूर सुमात्रा तथा
बोर्नियो ( वरुण द्वीप ) में होता है । इसको पहचान
यह है कि जल में डालने से यह डूब जाता है । आज
कल कृत्रिम कपूर का व्योहार बढ़ गया है । कपूर
का गुण वातनाशक होता है । कफघ्न भी होता है ।
विसूचिका तथा त्वचा रोग में विशेष लाभकारी
और कृमी नाशक होता है ।
काश्मीर उपत्यका में कपूर का बाहर से ही
आयात होता था ।
( २ ) धूप-देव निमित्त सुगन्धि के लिये जलाये जाने
वाले सभी पदार्थों का समावेश धूप शब्द में हो जाता
है । धूप गन्ध का प्रयोग प्रायः एक साथ मिलता है ।
धूप के पाँच भेद—निर्यास, चूर्ण, गन्ध, काष्ठ एवं
कृत्रिम होता है । काश्मीर में सूखे पर्वतीय
पादपों की जड़ तथा देवदार काष्ठ का चूर्ण आदि
मिला कर बनाया जाता है । पर्वतीय एक पादप
का नाम ही काश्मीर में धूप या धूप है । धूपवत्ती,
अगरबत्ती विभिन्न सुगन्धियाँ इसी वर्ग में आती हैं ।
१२३ ( १ ) भूतेश : टिप्पणी पृष्ठ १४९
द्रष्टव्य है ।
( २ ) वर्धमानेश : स्थानीय जनश्रुति के
अनुसार यह स्थान वितस्ता नदी के दक्षिण तट पर है ।
श्रीनगर का गणपतयार मुहल्ला या गणेश घाट है ।
वितस्ता माहात्म्य में इसका उल्लेख है । माहात्म्य के
अनुसारवर्धमानेश्वर गणपति तीर्थ के समीप था । सन्
१८८८ में पड़ोस के रहने वाले पुरोहितों ने मल्यार

४३०
राजतरंगिणी

हरायतनसोपानक्षालनाम्भःकणाञ्चितैः ।
संस्पृष्टः पवनैः सोऽभूदानन्दास्पन्दविग्रहः ॥ १२४ ॥
१२४. हरायतन सोपानों के धोने वाले (समुत्थित) जल कण से व्याप्त पवन के
संस्पर्श से उसका शरीर आनन्द के कारण स्पन्दित हो जाता था ।

पूर्वपूजापनयने निराडम्बरसुन्दरः ।
तेनैव द्रष्टुमज्ञायि स्नापितो विजयेश्वरः ॥ १२५ ॥
१२५. उसने पूर्व पूजा सम्भार को हटने पर बिना आडम्बर के सुन्दर स्नापित
विजयेश्वर दर्शन को दर्शन माना ।

लिङ्गपीठलुठत्स्नानकुम्भाम्भःक्षोभभूध्वनिः ।
शयानस्याऽप्यभूत्तस्य वल्लभो वल्लकीद्विपः ॥ १२६ ॥
१२६. शयन करते हुए भी उस वीणा द्वेषी को लिङ्ग पीठ पर लुंठित होते स्नान कुंभ
जल के क्षोभ¹ की प्रचुर ध्वनि प्रिय हुई ।


घाटके निकट मन्दिर का निर्माण कराया । इस मन्दिर
में स्थापित शिव लिंग प्राचीन मन्दिर का ही शिव
लिंग है । वह एक मस्जिद के शमादान अर्थात् दीवट
के काम में लाया जाता रहा । मस्जिद की दीवार
प्राचीन वर्धमानेश्वर मन्दिर के अलंकृत शिलाखण्डों
तथा भग्नावशेषों से बनायी गयी है । पश्चिम बंगाल
वर्धमान का शुद्ध नाम वर्द्धमान है । यह रेलवे का बहुत
बड़ा जंकशन तथा आसनसोल कलकत्ता के बीच है ।
(३) विजयेश : टिप्पण पृष्ठ ४ विजयेश
द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२५ में 'निराडम्बर' का 'विरा-
डम्बर,' 'निजडम्बर' तथा 'स्नपितो' का पाठभेद
'स्नापितो' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२५ उक्त श्लोक का भावानुवाद श्री स्तीन
तथा श्री पण्डित ने किया है । अन्य अनुवादकों ने भी
उक्त दोनों अनुवादकों का ही अनुकरण किया है ।
कश्मीर में यह प्रथा है कि पहले दिन के चढ़े हुए
फूल पत्तो शृंगारादि को दूसरे दिन अति प्रातः काल
में उतार लेते हैं ।

आडम्बर शब्द का प्रयोग कल्हण ने पुनः तरंग
८:२७२६ में किया है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२६ में 'वल्लभो' का पाठभेद
'वल्लभी' तथा 'वल्लभा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२६(१) क्षोभ : कल्हण ने इस शब्द का तथा
आर्य राज के इस पुण्य भावना का उल्लेख राजा
जयसिंह के सन्दर्भ में किया है ।
आसीद्यार्यरराजस्य शयानस्याप्यतिप्रियः ।
कामं लिङ्गाभिषेकाम्भःसंक्षोभप्रभवो ध्वनिः ॥
८:२३९८ ॥
शिव लिंग को स्नान कराया जाता है तो दृश्य
दिखायी पड़ सकता है । कल्हण की दृष्टि का यह एक
उदाहरण है । काशी विश्वनाथ में तथा उदयपुर के
एक लिंग की जब आरती एवं शृंगार के पूर्व स्नान
कराया जाता है तो लिंग की मूर्धा से जल अरघा
पर गिरता है । अरघा से पुनः जल लुढ़कता नीचे
गिरता है । इस समय जल से एक प्रकार का कल-
कल शब्द उद्भूत होता है । कल्हण ने उसी का
आंखो देखा वर्णन किया है।

द्वितीय तरंग ४३१
तापसैर्भस्मरुद्राक्षजटाजूटाङ्कितैर्बभौ ।
तस्य माहेश्वरो पर्षदिव भूमिपतेः सभा ॥ १२७ ॥
१२७. भस्म, रुद्राक्ष एवं जटाजूट युक्त तपस्वियों में उस पृथ्वोपत्ति की सभा
शिव की सभा तुल्य शोभित हुई।
शिवलिङ्गसहस्रस्य प्रतिष्ठाक्रमेणि प्रभोः ।
प्रतिज्ञा प्रत्यहं तस्य नाऽभूद्विघटिता क्वचित् ॥ १२८ ॥
१२८. उसकी प्रति दिन सहस्रों' शिवलिङ्ग प्रतिष्ठा कर्म की प्रतिज्ञा कहीं भी
विघटित (भंग) नहीं हुई।
प्रमादात्तदनिर्वृत्तौ शिलामुत्कीर्य कल्पिता ।
सहस्रलिङ्गी तद्भृत्यैः सर्वतोऽद्याऽपि दृश्यते ॥ १२९ ॥
१२९. प्रमाद से कभी उसके न होने पर भृत्यों द्वारा शिला पर' उत्कीर्ण सहस्र
शिव लिंग चारों ओर आज भी दिखायी पड़ते हैं।
लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है। मोहेन्दो जोरो
में मृत्तिका टेबलेट् पर लिंग, शक्ति तथा पृथ्वी
उत्कीर्ण प्राप्त हुए हैं। विश्व में लिंग पूजा चार हजार
वर्षों से भी प्राचीन है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२९ में 'प्रमादा' का पाठभेद
'प्रसादा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१२९ (१) शिला—शिव लिंग = कश्मीर में
शैव सम्प्रदाय प्रचलित था। शिव की पूजा का वहाँ
के जीवन में प्रमुख स्थान था। आज भी कश्मीरी
शिव भक्त हैं।
आधुनिक काल में स्वर्गीय महाराज रणवीर सिंह
कश्मीर नरेश ने ईशावर में एक सहस्र पाषाण शिव
लिंग स्थापित करने तथा जम्मू में रण-वीरेश्वर मन्दिर
में कोटि लिंग विभिन्न रूपों के स्थापित करने का
विचार किया था।
शिव लिंग गंगा की मिट्टी अथवा चींटी द्वारा
चाली हुई मिट्टी अथवा शुद्ध मिट्टी से बनाते हैं।
पार्थिव पूजा करने वाले पूजन के व्रत का आजन्म पालन
करते हैं। पूजन के पूर्व अन्न ग्रहण अथवा किसी
प्रकार का कार्य नही करते।
महेन्दो जोरो में भी मिट्टी के वस्तु पर लिंग-
शक्ति तथा पृथ्वी उत्तीर्ण मिले हैं। स्पष्ट है कि
शिव लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है।
१२८ (१) सहस्र लिंग—कश्मीर में सहस्र
लिंग प्रतिष्ठा तथा पूजा का विशेष महत्व प्राचीन
काल से ही रहा है। यह प्रथा अब भी प्रचलित
है। पूर्णिमादि पर एक सहस्र लिंग मृत्तिका के
बनाये जाते हैं। और शंकराचार्य पर्वत की मूल
से प्राप्त मिट्टी से शिव लिंग प्रातः काल प्रतिष्ठित
किये जाते हैं। सायं काल वितस्ता किंवा समीपस्थ
स्रोतस्विनियों अथवा सरोवरों में उनका विसर्जन कर
दिया जाता है। शिवरात्रि के दिन काशी में कुछ
लोग अब भी एक सहस्र शिव लिंग गंगा की मिट्टी से
बनाते हैं। तथा पूजन पश्चात् उनका गंगा में विस-
र्जन किया जाता है।
यहाँ पर अर्थ पार्थिवपूजन ही लगाना चाहिए।
सहस्र लिंग की प्रति दिन राजा प्राण-प्रतिष्ठा करता था।
पूजन करता था। वह दृढ़ निश्चयी था। कभी प्रतिज्ञा
भंग नहीं हुई।

४३२ राजतरंगिणी
तासु तासु स वापीषु लिङ्गव्याजादरोपयत् ।
स्वपुण्यपुण्डरीकाणां जन्मनेऽक्षपरम्पराम् ॥ १३० ॥
१३०. उसने अनेक वापियों में लिंग व्याज से स्वपुण्य पुण्डरीकों की अक्ष १ (बीज)
परम्परा आरोपित की।
स्थाने स्थाने जलान्तश्च बहुसंख्यैर्निवेशितैः ।
अनयन्नर्मदाभङ्गिं शिवलिङ्गैस्तरङ्गिणीः ॥ १३१ ॥
१३१. स्थान स्थान पर जल मध्य प्रचुर संख्या में सन्निवेशित शिव लिंगो से तरंगि-
णियों को उसने नर्मदा १ सदृश बना दिया।
लिदर पर स्थित खोवर पुर परगना के शिलगाम लिंग सदृश शिलाखण्ड मिलते हैं। प्रायः भारतवर्ष
में एक शिला सहस्र लिंग कही जाती है। वह में सर्वत्र वहीं से लिंग स्थापनार्थ जाते हैं। नर्मदा में
सहस्र शिव लिंग तुल्य प्रतीत होती है। वह सहस्र जिस प्रचुरता से शिव लिंग जल में पड़े मिलते हैं
शिव लिंग शिला सन्धिमति की है अथवा दूसरे की उसी प्रकार सरिताओं में लिंग की प्रतिष्ठा कर
निश्चय पूर्वक कहना कठिन है। सन्धिमान ने कश्मीर की सरिताओं को ही नर्मदा
नीलमत पुराण शिव पूजा के महत्त्व तथा उसका का रूप दे दिया था।
कश्मीर के धार्मिक जीवन में क्या स्थान था इस पर कश्मीर की यात्रा में प्रायः प्रत्येक पवित्र
प्रकाश डालता है। सरोवरों तथा नागों में मैने जल के अन्दर शिव-
पक्षिस्ने शकात्स्वेको नापरोऽभ्विरितस्ततः। लिंग रखा देखा। यह प्रथा कश्मीर की विशेषता
सिन्धुसंगमगेनाशु प्रस्रस्य स्वपिंतं शिवम् ॥३१६॥ प्रतीत होती है। जल में लिंग कश्मीर में इस प्रकार
भुक्त्वा रात्री ततः कार्यं नृत्यगीतैः प्रजागरम् । मैंने रखे देखा कि वे ऊपर से दिखायी पड़ते हैं।
श्रोतव्यः शिवधर्मश्च प्रादुर्भावश्च तद्भूतः ॥५॥ उन पर पुष्पादि भी चढ़ाया जाता है। श्रीनगर के
पाठभेद : घाटों पर भी इस प्रकार के जलस्थ लिंग दिखाई
पड़ जाते हैं।
श्लोक संख्या १३० में 'स्वपुण्य' का 'स पुण्य' कल्हण इस प्रकार के लिंग का पुनः उल्लेख
'सुपुण्य' तथा 'वाप्यां' का पाठभेद 'पुण्डरीकाक्ष' (रा. त. ७ : १८४) करता है :
'क्षानां' मिलता है। पत्युर्नार्याऽप्यपहारात् प्रवृदावमरेश्वरे ।
पादटिप्पणियाँ : त्रिशूलवागलिङ्गादिप्रतिष्ठाश्च विनिर्ममे ॥
१३० (१) अक्ष : कमल का बीज शिव लिंग नर्मदा में शिव लिंग की अधिकता से मिलने का
तुल्य होता है। शिव लिंग स्वरूप कमल बीजो को कारण है। नर्मदा मारबल रोक्स से बढ़ती आती
जलाशयों में आरोपित कर करोड़ों शिव लिंग स्वरूप है। मारबल के पत्थर लुढ़कते-लुढ़कते और जल-
कमल बीज उत्पन्न करने की विराट कल्पना राजा ने प्रवाह के कारण लिंग स्वरूप हो जाते हैं। हरद्वार
की। कमल बीज की माला बनायी जाती है। से ऊपर भी शिव लिंगाकार पत्थर दिखाई देते हैं।
होम में इसकी हवि भी दी जाती है। कश्मीर म किन्तु वे सुन्दर नहीं होने।
इसकी सुमरनी बनायी जाती है। शालिग्राम के रूप में विष्णु रूप से उनकी
१३१ (१) नर्मदा : शिव लिंग-नर्मदा में शिव पूजा की जाती है।