राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४१९
गौरमुख से शाप की बात परीक्षित को बताने के लिये
भेजा । ( म० आ० ३८:१३-२८ )
तक्षक नाग यथा समय परीक्षित को दंश करने
के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक
मिला । वह नाग का विष उतारने परीक्षित के पास
जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस
कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस
के कारण परीक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ०
३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० )
भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप
धर कर परीक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था ।
तक्षक परीक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल
नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण
हुआ । ( भा० १२:६ )
महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी
गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प
देकर परीक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म
रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग
परीक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति
माँगने लगे । परीक्षित ने उनके फल को स्वीकार
किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने
मित्रों को दे दिया ।
परीक्षित ने फल फोड़ा । उसमें से एक लाल
कीड़ा निकला । उसे देखकर परीक्षित ने व्यंगपूर्वक
कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ
दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज
बन जाय ?' परीक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन
पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा
तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया ।
परीक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया ।
पुराणों के अनुसार परीक्षित जन्म से मगध
देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का
होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय'
का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ
पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० :
४:२४:३२ )
( ३ ) जीवित करना—परीक्षित उत्तरा के
गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा-
जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया
था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रौपदी के
पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी
प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक
वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन
के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा
था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच
पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के
केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा
जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या
सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण
विसर्जन किया ।
द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की ।
अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि
युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग
देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर
आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ )
अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे
हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ
भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश
हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग
किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही
अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी ।
व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के
शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को
लौटाना स्वीकार नहीं किया । किन्तु मणि देने पर
उद्यत हो गया ।