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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 984 में से

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पृष्ठ 572

द्वितीय तरंग ४२९
वनप्रसूनसंपर्कपुण्यगन्धैस्तपस्विनाम् ।
कर्पूरधूपसुरभिः करैः स्पृष्टः स पिप्रये ॥ १२२ ॥
१२२. कर्पूर १ एवं धूप २ से सुरभित वह, तपस्वियों के वनपुष्प संपर्क से पुण्यगन्ध-
शाली करों का स्पर्श प्राप्तकर, प्रसन्न हुआ ।
भूतेशवर्धमानेशविजयेशादपश्यतः ।
नियमो राजकार्येषु तस्याऽभूत्प्रतिवासरम् ॥ १२३ ॥
१२३. भूतेश १, वर्धमानेश २, तथा विजयेश ३ का जब दर्शन नहीं करता था, उस समय
प्रति दिन राज्य कार्य ही उसका नियम हो गया था ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १२२ में 'स्पृष्टः' का पाठभेद
'पृष्टः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२२ (१) कपूर—कपूर का शिव की पूजा में
बहुत महत्व है । कर्पूर से भगवान् के वर्ण की उपमा
दी गयी है । कपूर से आरती करने की प्रथा सर्वत्र
भारत में प्रचलित है । कपूर का गुण शीतलता है ।
वह सुगन्धित होता है । उसकी सुगन्धि सात्त्विक
होती है । कुछ विचित्र गति है । कपूर शीतल
होते हुए भी गुणकारी होते हुए भी अपने में अग्नि
छिपाये बैठा रहता है । अग्निस्पर्श से वह ज्योतिर्मय
हो जाता है । स्पर्श गुण से कितना अन्तर वस्तु
परिस्थितियों में हो जाता है । कपूर उसका ज्वलन्त
उदाहरण है । शीतल होते हुए भी दाहक हो
जाता है ।
इस समय कपूर के तीन वर्ग हैं । जापानी और
चीन का बना भीमसेनी अथवा बरास द्वारा निर्मित
और भारतीय अथवा पत्री कपूर । यह उड़नशील
वनस्पति से बना पदार्थ है । जापानी नाम से प्रसिद्ध
कपूर का पौधा चीन, जापान, फारमूसा तथा
दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में मिलते हैं । इसका
पौधा देहरादून, सहारनपुर, नीलगिरि तथा मैसूर में
मिलता है । नेपाल में भी इसके वृक्ष होते हैं ।
भारत में यह कपूर की पत्तियों तथा जापानादि में
पचास वर्ष के ऊपर के वृक्षों के काष्ठ के आसवन
से निकाला जाता है । भीमसेनी कपूर सुमात्रा तथा
बोर्नियो ( वरुण द्वीप ) में होता है । इसको पहचान
यह है कि जल में डालने से यह डूब जाता है । आज
कल कृत्रिम कपूर का व्योहार बढ़ गया है । कपूर
का गुण वातनाशक होता है । कफघ्न भी होता है ।
विसूचिका तथा त्वचा रोग में विशेष लाभकारी
और कृमी नाशक होता है ।
काश्मीर उपत्यका में कपूर का बाहर से ही
आयात होता था ।
( २ ) धूप-देव निमित्त सुगन्धि के लिये जलाये जाने
वाले सभी पदार्थों का समावेश धूप शब्द में हो जाता
है । धूप गन्ध का प्रयोग प्रायः एक साथ मिलता है ।
धूप के पाँच भेद—निर्यास, चूर्ण, गन्ध, काष्ठ एवं
कृत्रिम होता है । काश्मीर में सूखे पर्वतीय
पादपों की जड़ तथा देवदार काष्ठ का चूर्ण आदि
मिला कर बनाया जाता है । पर्वतीय एक पादप
का नाम ही काश्मीर में धूप या धूप है । धूपवत्ती,
अगरबत्ती विभिन्न सुगन्धियाँ इसी वर्ग में आती हैं ।
१२३ ( १ ) भूतेश : टिप्पणी पृष्ठ १४९
द्रष्टव्य है ।
( २ ) वर्धमानेश : स्थानीय जनश्रुति के
अनुसार यह स्थान वितस्ता नदी के दक्षिण तट पर है ।
श्रीनगर का गणपतयार मुहल्ला या गणेश घाट है ।
वितस्ता माहात्म्य में इसका उल्लेख है । माहात्म्य के
अनुसारवर्धमानेश्वर गणपति तीर्थ के समीप था । सन्
१८८८ में पड़ोस के रहने वाले पुरोहितों ने मल्यार