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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 984 में से

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पृष्ठ 565

४२२ राजतरंगिणी
उद्घाटिततमोरीः स ततः पितृवनावभो ।
ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥
१००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित
योगिनियों को देखा ।
तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवाहितम् ।
ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥
१०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान
उस श्मशान पर गया ।
अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे ।
सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥
१०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर
सब अंगो को जोड़ रही थीं।
उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः ।
वीरालाभात्समान्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥
१०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना बस उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष)
के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया ।
एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ ।
कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥
१०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म ( शिश्न ) लाकर, उसे
सर्वांग पूर्ण कर दिया ।
जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है । अलग-अलग कर दिया गया है । इससे अर्थ में
अचलह्वाडनादण्डघण्टानाखण्डटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है ।
मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां साहसमस्पृशाम् ॥ पाठभेद :
पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद
श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा 'माकर्ण्य' मिलता है ।
'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलता है । श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग'
पादटिप्पणियाँ : 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुग्धमदेवताः
श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्'
स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक मिलता है ।
साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा
'पुंलक्ष्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है ।