राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 567, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४२४ राजतरंगिणी
अथाऽश्रूयत वाक्तासां मा भूदीशाम भीस्तव ।
नास्त्यङ्गहानिरस्माकं वृते चास्मिन्न वञ्चना ॥ १०९
१०९. अनन्तर उनकी वाणी सुनायी पड़ी-हे ईशान ! तुम्हें भय न हो। हम लोगों के
छुने इसमें ( शरीर में ) अंग हानि एवं वंचना नहीं है।'
अस्मद्वराद्दिव्यवपुः संधितः संधिमानसौ ।
आर्यत्वादार्थराजश्च ख्यातो भुवि भविष्यति ॥ ११० ॥
११०. "हम लोगों के वर से संयुक्त दिव्य शरीर यह सन्धिमान¹ आर्य² होने के
कारण पृथ्वी पर प्रसिद्ध 'आर्य राज'³ होगा।"
ततो दिव्याम्बरः स्रग्वी दिव्यभूषणभूषितः ।
ववन्दे संधिमान्प्रह्वः प्राप्तपूर्वस्मृतिर्गुरुम् ॥ १११ ॥
१११. तदुपरान्त दिव्याम्बर एवं माला धारी, दिव्य भूषण-भूषित, विनत सन्धि-
मान ने पूर्व स्मृति प्राप्त कर, गुरु की वन्दना की।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११० में 'राजश्च' का 'राजाख्यः'
'राजास्य' तथा 'भुवि' का पाठभेद 'राजा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११० (१) सन्धिमान : अंगों को योगिनियों
द्वारा सन्धि करने पर योगिनियों ने उसे सन्धिमान
नाम से सम्बोधित किया । इसी प्रकार जरासन्ध के
शरीर से दोनों भागों को जरा ने एक में जोडा तो
जोडने वाले के नाम के साथ उसका नाम जरासन्ध
पड़ गया था ।
कल्हण ने इसके पश्चात् सन्धिमति के स्थान पर
'मन्धिमान' नाम का ही प्रयोग किया है । सन्धिमति
नाम का पुनः उल्लेख नहीं मिलता ।
(२) आर्य : स्त्रियाँ आर्य शब्द पति के
लिये आदर प्रदर्शन हेतु प्रयोग करती हैं। योगिनियाँ
भी स्त्री थी । उन्होंने सन्धिमति के साथ पतियत्
व्यवहार किया था अतएव उन्होंने आदर सूचक श्रेष्ठ
शब्द 'आर्य' से सन्धिमान का सम्बोधन किया है ।
अपने को इसी रूपद्वारा स्वीकार कर लिया था।
तथाव नाम नहीं लिया ।
प्रतीत होता है। कल्हण काल में भी पत्नी
अपने पति का नाम नहीं लेती थी । यह प्रथा अब
भी प्रचलित है। कल्हण ने बड़ी चातुरी के साथ
योगिनियों के मुख से 'सन्धिमति' मूल नाम के स्थान
पर 'सन्धिमान' तथा 'आर्य' कहलवाकर इस प्रथा का
निर्वाह किया है।
(३) आर्य राज : योगिनियों ने अपने पति
स्वरूप सन्धिमति को 'आर्य' शब्द से सम्बोधन किया
था। अतएव उसका नाम 'सन्धिमति', 'सन्धिमान'
के स्थान पर 'आर्यरात्र' रख दिया। उनका पति
काश्मीर का राजा होगा। इससे यह भाव प्रकट
होता है।
आर्यराज का अर्थ होता है आर्यों का राजा।
प्राचीन काल में कुल के कर्ता के लिये आर्य
सम्बोधन प्रयुक्त किया जाता था । कुल की
पत्नियां अपने पति को 'आर्य पुत्र' शब्द से सम्बोधित
करती थी । कल्हण ने इसका प्रयोग पुनः तरंग ८
में किया है। ( रा० त० ८ : ३२४७ ) प्राकृत में
आर्य शब्द 'अज्ज' हो गया था। आधुनिक 'जी' शब्द
अज्ज का अपभ्रंश है। जो नाम के अन्त में लगाना
आदर सूचक माना जाता है।