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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

४३२ राजतरंगिणी
तासु तासु स वापीषु लिङ्गव्याजादरोपयत् ।
स्वपुण्यपुण्डरीकाणां जन्मनेऽक्षपरम्पराम् ॥ १३० ॥
१३०. उसने अनेक वापियों में लिंग व्याज से स्वपुण्य पुण्डरीकों की अक्ष १ (बीज)
परम्परा आरोपित की।
स्थाने स्थाने जलान्तश्च बहुसंख्यैर्निवेशितैः ।
अनयन्नर्मदाभङ्गिं शिवलिङ्गैस्तरङ्गिणीः ॥ १३१ ॥
१३१. स्थान स्थान पर जल मध्य प्रचुर संख्या में सन्निवेशित शिव लिंगो से तरंगि-
णियों को उसने नर्मदा १ सदृश बना दिया।
लिदर पर स्थित खोवर पुर परगना के शिलगाम लिंग सदृश शिलाखण्ड मिलते हैं। प्रायः भारतवर्ष
में एक शिला सहस्र लिंग कही जाती है। वह में सर्वत्र वहीं से लिंग स्थापनार्थ जाते हैं। नर्मदा में
सहस्र शिव लिंग तुल्य प्रतीत होती है। वह सहस्र जिस प्रचुरता से शिव लिंग जल में पड़े मिलते हैं
शिव लिंग शिला सन्धिमति की है अथवा दूसरे की उसी प्रकार सरिताओं में लिंग की प्रतिष्ठा कर
निश्चय पूर्वक कहना कठिन है। सन्धिमान ने कश्मीर की सरिताओं को ही नर्मदा
नीलमत पुराण शिव पूजा के महत्त्व तथा उसका का रूप दे दिया था।
कश्मीर के धार्मिक जीवन में क्या स्थान था इस पर कश्मीर की यात्रा में प्रायः प्रत्येक पवित्र
प्रकाश डालता है। सरोवरों तथा नागों में मैने जल के अन्दर शिव-
पक्षिस्ने शकात्स्वेको नापरोऽभ्विरितस्ततः। लिंग रखा देखा। यह प्रथा कश्मीर की विशेषता
सिन्धुसंगमगेनाशु प्रस्रस्य स्वपिंतं शिवम् ॥३१६॥ प्रतीत होती है। जल में लिंग कश्मीर में इस प्रकार
भुक्त्वा रात्री ततः कार्यं नृत्यगीतैः प्रजागरम् । मैंने रखे देखा कि वे ऊपर से दिखायी पड़ते हैं।
श्रोतव्यः शिवधर्मश्च प्रादुर्भावश्च तद्भूतः ॥५॥ उन पर पुष्पादि भी चढ़ाया जाता है। श्रीनगर के
पाठभेद : घाटों पर भी इस प्रकार के जलस्थ लिंग दिखाई
पड़ जाते हैं।
श्लोक संख्या १३० में 'स्वपुण्य' का 'स पुण्य' कल्हण इस प्रकार के लिंग का पुनः उल्लेख
'सुपुण्य' तथा 'वाप्यां' का पाठभेद 'पुण्डरीकाक्ष' (रा. त. ७ : १८४) करता है :
'क्षानां' मिलता है। पत्युर्नार्याऽप्यपहारात् प्रवृदावमरेश्वरे ।
पादटिप्पणियाँ : त्रिशूलवागलिङ्गादिप्रतिष्ठाश्च विनिर्ममे ॥
१३० (१) अक्ष : कमल का बीज शिव लिंग नर्मदा में शिव लिंग की अधिकता से मिलने का
तुल्य होता है। शिव लिंग स्वरूप कमल बीजो को कारण है। नर्मदा मारबल रोक्स से बढ़ती आती
जलाशयों में आरोपित कर करोड़ों शिव लिंग स्वरूप है। मारबल के पत्थर लुढ़कते-लुढ़कते और जल-
कमल बीज उत्पन्न करने की विराट कल्पना राजा ने प्रवाह के कारण लिंग स्वरूप हो जाते हैं। हरद्वार
की। कमल बीज की माला बनायी जाती है। से ऊपर भी शिव लिंगाकार पत्थर दिखाई देते हैं।
होम में इसकी हवि भी दी जाती है। कश्मीर म किन्तु वे सुन्दर नहीं होने।
इसकी सुमरनी बनायी जाती है। शालिग्राम के रूप में विष्णु रूप से उनकी
१३१ (१) नर्मदा : शिव लिंग-नर्मदा में शिव पूजा की जाती है।