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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

द्वितीय तरंग ३९३
पत्नीप्रीतिं सुतस्नेहं पितृदाक्षिण्यमातुरः ।
कुक्षिम्भरिः क्षुदुत्तप्तो विसस्माराखिलो जनः ॥२१॥
२१. कुक्षिम्भरि' एवं क्षुधातप्त निखिल आतुर जनों ने पत्नी-प्रेम, सुत-स्नेह तथा
पितृ समादर को विस्मृत कर दिया था।
क्षुत्तापाद् व्यस्मरल्लज्जामभिमानं कुलोन्नतिम् ।
अशनाहंक्रियाघ्रातो लोकोऽलक्ष्मोकटाञ्चितः ॥२२॥
२२. दारिद्र्य दृष्टि ग्रस्त एवं अशन हेतु ही क्रिया प्रवृत्त लोक, क्षुधा ताप से लज्जा,
स्वाभिमान, एवं कुल गौरव को विस्मृत कर दिया था।
क्षामं कण्ठगतप्राणं याचमानं सुतं पिता ।
पुत्रो वा पितरं त्यक्त्वा चकार स्वस्य पोषणम् ॥२३॥
२३. क्षाम' तथा कण्ठगत प्राण वाले याचना करते पुत्र को पिता ने, क्षामादियुक्त
पिता को पुत्र ने त्याग कर, अपना ही पोषण किया।
स्नाय्वस्थिशेषे वीभत्से स्वदेहेऽहंक्रियावताम् ।
अभूद्भोज्यार्थिनां युद्धं प्रेतानामिव देहिनाम् ॥२४॥
२४. स्नायु एवं अस्थि मात्रावशिष्ट वीभत्स स्वदेह निमित्त क्रिया करने वाले भोज्यार्थी
प्राणियों का प्रेतों तुल्य युद्ध होता था।
रूक्षाभिभाषी क्षुत्क्षामो घोरो दिक्ष्वक्षिणी क्षिपन् ।
एक एको जगज्जीवैरियेष स्वात्मपोषणम् ॥२५॥
२५. कटुभाषी, क्षुधा-क्षाम एवं भयंकर दिशाओं में दृष्टिपात करने वाला एक-एक
व्यक्ति जगत् जीवों से आत्म पोषण की इच्छा करता था।
तस्मिन्महाभये घोरे प्राणिनामतिदुस्सहे ।
ददृशे लोकनाथस्य तस्यैव करुणार्द्रता ॥२६॥
२६. प्राणियों के उस अति दुस्सह एवं घोर महाभय में केवल उसी लोकनाथ
(राजा) की करुणार्द्रता देखी गयी।
पादटिप्पणियाँ : मिलता है ।
२१ (१) कुक्षिम्भरि : उदर पूति की चिन्ता पादटिप्पणियाँ :
मात्र जिनको रहती है, उनको कुक्षिम्भरि अर्थात् २३ (१) साम : अत्यन्त दुर्बल, भूख से कृश
कुक्षि भरने वाला कहा जाता है । हुए, कंकाल मात्र प्राणियों के लिये क्षाम शब्द का
पाठभेद : प्रयोग किया गया है ।
श्लोक संख्या २२ में 'स्मरत्' का 'व्यस्मरन् तथा पाठभेद :
'लोकोऽलद्मी' का पाठभेद 'लोको लदमो' मिलता है। श्लोक संख्या २६ में 'मतिदुःसहे' का पाठभेद
: , श्लोक संख्या २३ में 'पुत्रो' का पाठभेद 'गुतो' 'मितिदुःसहे' मिलता है।
५०

३९४ राजतरंगिणी
निवारितप्रतीहारः स रत्नौषधिशोभिना ।
दर्शनेनैव दीनानामलक्ष्मीक्रममच्छिनत् ॥२७॥
२७. प्रतिहार¹ रहित उस राजा ने रत्नौषधि² के सदृश शोभायमान दर्शन मात्र से ही
दीनों के दारिद्र्य कष्ट को दूर किया ।
सपत्नीको निजैः कोशैः संचयैर्मन्त्रिणामपि ।
क्रीतान्नः स दिवारात्रं प्राणिनः समजीवयत् ॥२८॥
२८. अपने तथा मन्त्रियों के भी संचित कोषों द्वारा अन्न खरीदने वाले सपत्नीक उस
राजा ने रात-दिन प्राणियों को जीवित किया।
अटवीषु श्मशानेषु रथ्यास्वावसथेषु च ।
क्षुत्क्षामः क्ष्माभुजा तेन नहि कश्चिदुपेक्ष्यत ॥२९॥
२९. अटवी में, श्मशान में, रथ्या में, गृह में, किसी भी क्षुत्क्षाम¹ की उस राजा ने
उपेक्षा नहीं की ।
श्लोक संख्या २७ में 'शोभिना' का पाठभेद और औषधि, रत्न की ओषधि आदि अनुवाद किया
'शोभिनः' मिलता है। गया है। यह भ्रामक है।
पादटिप्पणियाँ : रत्नौषधि आयुर्वेद के अनुसार पार्थिव औषधि
२७ (१) प्रतिहार : इस शब्द का अर्थ द्वार- है। रत्न स्वतः औषधि होता है। ज्योतिष में ग्रहों
पाल, दरबान तथा साथ चलने वाला भृत्य होता है। की दशा ठीक करने के लिये विभिन्न प्रकार के रत्नों
यहाँ पर राजा की सज्जनता, सरलता, सहृदयता और को धारण करने की व्यवस्था की गयी है। इसी
वह प्रजा पीड़ा से कितना दुःखी हो गया था, इसका प्रकार आयुर्वेद के अनुसार विभिन्न बीमारियों से
उल्लेख कल्हण ने किया है। राजा बिना किसी के नीरोग होने के लिये रत्न पहनने का विधान किया
साथ लिये, अकेला अपनी प्रजा के पास जाता था । गया है। मेरे एक मित्र को पथरी की बीमारी थी ।
उनके दुःख में दुःखी होता था। दारिद्र्य पीड़ित प्रजा, उन्हें दहाने फिरंग पहनने को कहा गया। उससे
उसके दर्शन मात्र से सन्तोष प्राप्त करती थी । उन्हें अभूतपूर्व लाभ हुआ ।
यह स्मरण कराता है, महात्मा गान्धी की रत्नौषधि का कर्मकाण्ड में भी विधान है।
नोआखाली तथा पूर्वीय बंगाल सन् १९४७ ई० की मकान की नींव तथा कूप के तल में, घट में रत्नों
यात्रा का । महात्मा गान्धी एकाकी नाव पर, पैदल, को रखते हैं, उस पर मकान तथा कूप रचना करते
विपद ग्रस्त ताड़ित जनता में विचरण करते थे । हैं। इस रत्न की संज्ञा ही रत्नौषधि दी गयी है ।
उस महान् विभूति को देखकर अनायास विपन्न पूर्व पाठभेद :
बंगाल के हिन्दुओं में आत्मविश्वास तथा सन्तोष श्लोक संख्या २९ में 'दुपेक्ष्यत' का पाठभेद
उत्पन्न हो जाता था। 'ह्रपेक्ष्यते', 'दुपेक्ष्यत' तथा 'दुपेक्ष्यते' मिलता है।
(२) रत्नौषधि : अनुवादकों को रत्नौषधि के पादटिप्पणियाँ :
सम्बन्ध में भ्रम हुआ है। रत्नरुपी ओषधि, रत्न २९ (१) क्षुत्क्षाम : क्षुधा से दुर्बल, क्षुधा से
हतकाय अर्थ में इस शब्द का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय तरंग ३९५
ततो निःशेषितधनः क्षीणानां वीक्ष्य मेदिनीम्।
क्षपायामेकदा देवीमेवमृचे स दुःखितः॥३०॥
३०. तदनन्तर धनहीन दुःखी उस राजा ने अन्न विहीन पृथ्वी को देखकर एक समय
रात्रि में देवी¹ (पत्नी) से इस प्रकार कहा-
देव्यस्मदपचारेण ध्रुवं केनाऽपि दुस्तरा।
जाता निरपराधानां जनानां व्यापदीदृशी ॥३१॥
३१. देवि ! निश्चय ही हमारे किसी दुस्तर दुष्कर्म के कारण निरपराध लोगों पर
ऐसी विपत्ति आयी है।
धिङ्मामधन्यं यस्याग्रे लोकोऽयं शोकपीडितः ।
पश्यन्नशरणामुर्वीमनुग्राह्यो विपद्यते ॥३२॥
३२. मुझ अधन्य को धिक्कार है कि जिसके सम्मुख, शरण रहित, पृथ्वी को देखते हुए,
अनुग्राह्य एवं शोक पीड़ित यह लोक विपत्ति ग्रस्त हो रहा है।
प्रजा निश्शरणा एता अन्योन्यं बान्धवोज्झिताः ।
अरक्षतो भयेऽमुष्मिन् किं कार्यं जीवितेन मे ॥३३॥
३३. परस्पर में बान्धवों को त्यागने वाली यह प्रजा शरण रहित हो रही है। इस महा-
भय में रक्षा न करने वाले मेरे इस जीवन से क्या प्रयोजन ?
यथाकथञ्चिल्लोकोऽयं दिनान्येतानि यत्नतः ।
मयाऽतिवाहितः सर्वो न च कोऽपि व्यपद्यत ॥३४॥
३४. यथा कथञ्चित् इतने दिनों तक यत्न पूर्वक मैंने इस सर्वलोक की रक्षा की
और कोई भी मृत नहीं हुआ ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३० में 'ततो' का 'अतो' तथा
'दुःखितः' का पाठभेद 'सुदुःखितः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३० (१) देवी : राजा ने रानी को आदर
सूचक देवी शब्द का प्रयोग किया है। प्रकट होता
है। उसकी रानी उत्तम चरित्र वाली विदुषी,
तथा पति के कार्यों की सहायक थी। उचित सलाह
देती थी। आपत्तिकाल में धैर्य दिलाती थी। आदर्श
धर्मांगिनी थी। देवी का शब्दार्थ देवपत्नी, दुर्गा,
सरस्वती, अग्रमहिषी, पटरानी, पूज्य एवं प्रतिष्ठित
महिला होता है।
पाठभेदः
श्लोक संख्या ३१ में 'देव्यस्म' का पाठभेद
'देव्यस्स' मिलता है।
श्लोक संख्या ३२ में 'लोकोऽयं' का पाठभेद
'लोकेयं' मिलता है।
श्लोक संख्या ३३ में 'अरक्षतो' का पाठभेद
'अरक्षितो' तथा 'अरक्षिता' मिलता है।
श्लोक संख्या ३४ में 'वाहितः सर्वो' का पाठभेद
'वाहिताः सर्वे' तथा 'वारिताः सर्वे' मिलता है।

३९६ राजतरंगिणी
अतिक्रान्तप्रभावेयं कालदौरात्म्यपीडिता ।
निष्किञ्चनाऽद्य संजाता पृथिवी गतगौरवा ॥३५॥
३५. काल दौरात्म्य से पीड़ित तथा विगत प्रभाव वाली गौरव रहित यह पृथ्वी आज
निष्किञ्चन हो गयी है ।
तदिमाः सर्वतो मग्ना दारुणे व्यसनार्णवे ।
उपायः कतमस्तावत्समुद्धर्तुं क्षमः प्रजाः ॥३६॥
३६. अतएव चारों ओर से दारुण दुःख सागर में मग्न इस प्रजा का उद्धार करने
में कौन सा यत्न समर्थ है ?
निरालोको हि लोकोऽयं दुर्दिनग्रस्तभास्करः ।
कालरात्रिकुलैर्विष्वक्परीत इव वर्तते ॥३७॥
३७. सूर्य के दुर्दिन ग्रस्त होने के कारण प्रकाश रहित यह लोक, कालरात्रि कुलों
से सर्वतः मानो घिरा हुआ है ।
हिमसंघातदुर्लङ्घ्यक्षितिभृद्बद्धनिर्गमाः ।
बद्धद्वारकुलायस्थखगवद्विवशा जनाः ॥३८॥
३८. हिम संघात के कारण दुर्लङ्घ्य पर्वत से रुद्ध मार्ग वाले लोग अवरुद्ध द्वार युक्त
नीड में स्थित पक्षियों के सदृश विवश हो गये हैं।
शूराश्च मतिमन्तश्च विद्यावन्तश्च जन्तवः ।
कालदौरात्म्यतः पश्य जाता निहतयोग्यताः ॥३९॥
३९. 'देखो ! शूर, मतिमान् एवं विद्यायुक्त प्राणी काल कौटिल्य के कारण लुप्त योग्यता
वाले हो गये हैं ।
आशाः काश्चनपुष्पकुड्मलकुलच्छन्ना न काः क्ष्मातले
सौजन्यामृतवर्षिभिस्तिलकितं सेव्यैर्न किं मण्डलम् ।
पन्थानः सुचिरोपचाररुचिरैर्व्याप्ता न कैः संस्तुतै-
स्तेषामत्र न सन्ति निह्नुतगुणाः कालेन ये मोहिताः ॥४०॥
४०. इस पृथ्वी तलपर ऐसी कौन सी दिशाएं हैं जो स्वर्ण पुष्प कुड्मल समूह संकुल
नहीं हैं ? सौजन्यरूपी अमृत की वृष्टि करने वाले स्वामियों से कौन सा मण्डल शोभित नहीं
है ? चिर काल तक सेवा से शोभायमान एवं प्रशंसित किन लोगों से मार्ग पूर्ण नहीं हैं ? जो
छिपे हुए गुण वाले एवं काल से मोहित हैं; उन लोगों का ही गुण अब यहां नहीं है ?
श्लोक संख्या ३५ में 'संजाता' का पाठभेद श्लोक संख्या ३८ में 'हिमसंघातदुर्लङ्घ्य' का
'सम्पन्ना' मिलता है । 'हिमसंघातदुर्लभ' तथा 'जनाः' का पाठभेद 'जनः'
श्लोक संख्या ३७ में 'विष्वक्' का पाठभेद मिलता है ।
'विश्वक्' तथा 'विव्यक्ता' मिलता है । श्लोक संख्या ४० में 'काः' का 'कः'; 'सुचिरो-

द्वितीय तरंग ३९७
तदेष गलितोपायो जुहोमि ज्वलने तनुम् ।
न तु द्रष्टुं समर्थोऽस्मि प्रजानां नाशमीदृशम् ॥४१॥
४१. अतएव साधन रहित मैं, शरीर की आहुति देता हूं । क्यों कि प्रजा का इस
प्रकार नाश देखने में समर्थ नहीं हूं ।
धन्यास्ते पृथिवीपालाः सुखं ये निशि शेरते ।
पौरान्पुत्रानिव पुरः सर्वतो वीक्ष्य निर्वृतान् ॥४२॥
४२. वे पृथिवीपाल धन्य हैं जो सर्व प्रकार से सुखी पुरजनों को पुत्रवत् सम्मुख
देखकर सुख की नींद लेते हैं । सुख पूर्वक शयन करते हैं ।
इत्युक्त्वा करुणाविष्टो मुखमाच्छाद्य वाससा ।
निपत्य तल्पे निश्शब्दं रुरोद पृथिवीपतिः ॥४३॥
४३. ऐसा कहकर, करुणाविष्ट, पृथिवीपति वस्त्र से मुख ढककर, तल्पपर गिर,
निश्शब्द रोने लगा ।
निवातस्तिमितैर्दीपैरुद्ग्रीवैः कौतुकादिव ।
वीक्ष्यमाणाऽथ तं देवी जगाद जगतीभुजम् ॥४४॥
४४. उत्थित ग्रीवा वाले निश्चल दीपों से मानों कौतुक वश देखी जाती हुई
देवी, (रानी) तब उस पृथिवीपति से बोली—
पचार' का 'प्रचुरोपचार'; 'स्तेषामत्र' का 'रेषा- अपना निवास स्थान छोड़कर उत्तरो भारत में आ
मत्र' 'सन्ति' का 'वसन्ति' और 'ये' का पाठभेद 'ते' जाते थे । वहीं वे अपनी शक्ति, पौरुष एवं बुद्धि का
मिलता है । परिचय देते थे । निवास करते थे । इस प्रकार का
पादटिप्पणियाँ : उल्लेख पुनः कल्हण ने तरंग ८:२२२७ में किया है।
४० (१) अनुवादको ने अन्य प्रतियोको आधार पाठभेद :
मानकर अनुवाद किया है अतएव अन्तिमपद का
अनुवाद पाठभेद के कारण इस प्रकार होगा- श्लोक संख्या ४१ में 'गलितोपायो' का पाठभेद
'गलिताशयो' मिलता है ।
'जिनका गुण छिपा है तथा जो काल से मोहित
है, वही यहाँ निवास करते हैं ।' श्लोक संख्या ४३ में 'निश्शब्दं' का पाठभेद
कल्हण ने इस श्लोक में शिक्षित, विद्वानों 'निश्शंकु' मिलता है ।
सुसंस्कृत एवं कलाविद् कश्मीरियो पर अकाल का श्लोक संख्या ४४में 'निवात' का 'निर्वातः' तथा
क्या प्रभाव पड़ा था, वर्णन करता है । त्रस्त काश्मीरी 'भुजम्' का 'पतिम्' पाठभेद मिलता है ।

३९८ राजतरंगिणी
राजन्प्रजानां कुकृतैः कोऽयं मतिविपर्ययः ।
येनेतर इव स्वैरमधीरोचितमीहसे ॥४५॥
४५. 'हे राजन् ! प्रजाओं की कुकृतियों से यह कौन सा मतिविपर्यय हो गया है ?
जिससे इतर जन की तरह अधीरोचित स्वेच्छा-वृत्ति की कामना कर रहे हैं ?
यद्यसाध्यानि दुःखानि छेतुं न प्रहविष्णुता ।
तन्महीपाल महतां महत्त्वस्य किमङ्कनम् ॥४६॥
४६. हे महीपाल ! असाध्य दुःखों को दूर करने के लिये, यदि असमर्थता है, तो
बड़े लोगों के महत्त्व का चिह्न ही क्या ?
कः शक्रः कतमः स्रष्टा वराकः कतमो यमः ।
सत्यव्रतानां भूपानां कर्तुं शासनलङ्घनम् ॥४७॥
४७. 'इन्द्र' कौन है ? स्रष्टा$^२$ कौन-? बेचारा यम$^३$ कौन-? जो कि सत्यव्रती
नृपों के शासन का उल्लंघन कर सके ?
श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृतैः' का पाठभेद
'सुकृत्यैः' मिलता है ।
श्लोक संख्या ४७ में 'भूपानां' का 'भूतानां'
तथा 'शासनलङ्घनम्' का पाठभेद 'शासनलङ्घनाम्'
तथा 'न प्रमविष्णुता' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४७ (१) इन्द्र : इन्द्र का सर्वाधिक दर्शन वेद
में मिलता है । वैदिक आर्यों के ओजपूर्ण देवता इन्द्र
हैं । इन्द्र ने मेघों को विदीर्ण किया था । इनके लिये
त्वष्टा ने वज्र बनाया था । इन्द्र ने स्रष्टा, सूर्य,
द्यु तथा उषस को उत्पन्न किया है । वृत्रासुर का वध
किया है । जल एवं नदियां प्रवाहित किया है ।
गायों तथा सोम को जीता है । दस्यु का संलक्षण
किया है । ऋग्वेद (१:३३ : १४-१५) ।
साम गानसे इन्द्र को स्फूर्ति प्राप्त होती है ।
आंगिरस तथा इन्द्र एक साथ रहते हैं ।
(सा० १ : ११) वृहि को मार कर सात
सिन्धु को मुक्त किया था । (ऋ०: २: १२)
इन्द्र की उपासना न करने वालों को अनिन्द्र कहा
जाता है । उनकी निन्दा की गयी है । (ऋ०७:१२:
१६) ।
प्रत्येक मन्वन्तरों में इन्द्र की कल्पना की गयी
है। इन्द्र भूः, भुवः एवं स्वः तीनों लोकों का
अधिपति है । एक सौ यज्ञ करने पर इन्द्रत्व की प्राप्ति
होती है। यद्यपि इनके मन्त्रणा दायक हैं । इन्द्र की
पौराणिक कल्पनायें परस्पर भिन्न है । इनका उल्लेख
गरुड़, वृत्त वध, त्रिपुर, सुकर्माख्यान, यज्ञविर्भाग
महताख्यान, सागर मंथन, वृत्रोत्पत्ति, ब्रह्म-
हत्या, मुच्वित्त, पुरंजय वाहन, जयापजय, यज्ञ,
हवनादि, के सन्दर्भ में आता है । इन्द्र के सम्बन्ध में
भारतीय साहित्य में इतनी गाथायें हैं कि उनका
संकलन स्वतः एक विशाल ग्रन्थ का रूप ले लेगा ।
(२) स्रष्टा:—सृष्टि के रचयिता, सर्जन एवं
निर्माण करने के अर्थ में स्रष्टा शब्द का प्रयोग किया
जाता है । यह शब्द ब्रह्मा के लिये प्रयुक्त किया
गया है । परन्तु अनेक स्थलों पर ब्रह्मा विष्णु तथा
शिव के लिये एक साथ प्रयुक्त किया गया है।
महाभारत के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से देवता,
ऋषि, नाग एवं असुरों का निर्माण हुआ था । उन चारों

द्वितीय तरंग १९९

प्राणियों को ब्रह्मा ने 'ॐ' का उपदेश दिया था ।
( म० धारव० २६:८ ) पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा
के हृदय से बकरी, उदर से गाय, भैसादि ग्राम्य पशु
समूह, तथा पद से अश्व, गधा, ऊँट आदि वन्य पशु
उत्पन्न हुए थे । मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के
दक्षिण अंगूठा से दक्ष, हृदय से मदन, अधर से लोभ,
अहंभाव से मद, नेत्र से मृत्यु, स्तनाग्र से धर्म, भ्रूमध्य
से क्रोध, बुद्धि से मोह, कंठ से प्रमोद, हथेली
से भरत, एवं शरीर से सतरूपा नामक पत्नी उत्पन्न
हुई थी । मत्स्य पुराण एवं महाभारत के अनुसार
ब्रह्मा के शरीर से मृत्यु नामक नारी उत्पन्न
हुई थी । ( म० द्रो०:१:म:१५० )

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के चार मुखों से वेदों
तथा समस्त वैदिक साहित्य एवं ग्रन्थों का निर्माण
हुआ था । ब्रह्मा के, पुराणों के अनुसार, चतुर्मुख हैं ।
(१) पूर्व मुख से गायत्री छंद, ऋग्वेद, त्रिवृत रथन्तर
एवं अग्निष्टोम, (२) दक्षिण मुख से-यजुर्वेद,
पंचदश ऋक् समूह, बृहत्साम, एवं उक्थ यज्ञ, (३)
पश्चिम मुख से-सामवेद, सप्तदश ऋक्समूह, वैरूप
साम, एवं अतिरात्र यज्ञ, एवं (४) उत्तर मुख से-
अथर्ववेद, एकविंश ऋक् समूह, आप्तोयम अनुष्टुप्
छन्द एवं वैराज साम उत्पन्न हुए थे ।

ब्रह्मा के मानस पुत्र, मरीचि, अग्नि, अंगिरस,
पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, दक्ष, भृगु एवं वसिष्ठ थे ।
( ब्रह्म० ब्रह्माण्ड:२:९ )

महाभारत में सृष्टि निर्माण का क्रम दिया गया
हैं । शंकर ने यज्ञ किया । ब्रह्मा ने अपने वीर्य की
आहुति दी । उस यज्ञ से प्रजापतियों का जन्म
हुआ । ( म० अनु० ८५:९९-१२० ) पद्म पुराण
और प्रकार उपस्थित करता है । सर्वप्रथम तमोगुणी
प्रजा उत्पन्न हुई । वह पांच प्रकार यथा-तम,मोह,
महामोह, तामिस्र एवं अन्धतामिस्र थी । तत्पश्चात्
आठ सृष्टियो का निर्माण किया उनमें उत्पन्न
प्राणी-तिर्यक् स्रोतस् (पशु), ऊर्ध्वस्रोतस् (देव) अर्वाक्,
स्रोतस् (मानव) अनुग्रह, भूत, प्राकृत, वैकृत, एवं
कौमार थे । देव राक्षस किन्नर मनुष्य यक्ष एवं पिशाच
गणों की उत्पत्ति ब्रह्मा ने मनःसामर्थ्य से की थी ।
ब्रह्मा का प्रथम शरीर तमोगुणी था । उसके जघन
से असुरों का निर्माण हुआ । तमोगुण का त्याग कर
ब्रह्मा ने सतोगुणी शरीर धारण किया । परित्याग
किये तमोगुणी शरीर से रात्रि का निर्माण हुआ ।
सतोगुणी शरीर से देवों का निर्माण हुआ । इस
शरीर का भी ब्रह्मा ने त्याग किया । इससे दिन की
उत्पत्ति हुई । इसके तृतीय शरीर से पितर उत्पन्न
हुए । उसके त्यक्त भाग से सन्ध्या काल का जन्म
हुआ । ब्रह्मा के चतुर्थ शरीर से मानवों की उत्पत्ति
हुई । उसके त्यक्त भाग से उषा काल का निर्माण
हुआ । इसके पाँचवें शरीर से यक्ष एवं राक्षस
उत्पन्न हुए ।

(३) यमः- यम के पिता वैवस्वत तथा माता
सरण्यू थी यम यमी दोनों युगल सन्तान थे (ऋ० १०
१४:१७:१०:१४.१) उन्हें यमो मिथुनौ, कहा जाता
है । जुड़वा के अर्थ में प्रयुक्त होता है । यम यमी एक
साथ जुड़वा पैदा हुए थे । [ऋ० १:६६:४:१:२६४
:१५:२:३९:२] यम वैदिक काल से मृत्यु के देवता
माने गये हैं [ १:१६५:४ ] वे पहले प्राणी हैं।
जिनकी मृत्यु हुई थी [ अ० १८:३:१३ ] ऋग्वेद में
यम यमी का संवाद प्रसिद्ध हैं । उसमें भाई एव बहन
के विवाह का निषेध किया गया है। मृतकों को
विश्राम स्थान प्रदान करता है । ( ऋ० १०:१४
:१८ तथा १०:१६) वह प्रथम मनुष्य था (अ०
८:३:१३ ) यमको दक्षिण दिशा का राजा कहा गया
है ( श. ब्रा० २:२:४:२ ) यम के दूत दो श्वान हैं।
उनके चार नेत्र हैं । उनकी नासिका चौड़ी है ।
उनका नाम उलूक तथा कपोत है । [ऋ० १०:१६५
:४ ) उन्हें शबल एवं उदुंबल भी कहा गया है ।
(ऋ० १०:१३:४ )

वेदों के पश्चात् यम का रूप बदलता गया है ।
उसे विवस्वत् तथा संध्यापुत्र कहा गया है
(ह-वं १:९:४ मार ७४:७मा० ६:३:४०) यमके बरवों

४०२ राजतरंगिणी
वर्षैः षट्त्रिंशता शान्ते पत्यौ विरहजो ज्वरः ।
तत्यजे ज्वलनज्वालानलिनप्रच्छदे तया ॥ ५६ ॥
छत्तीस वर्षों के साथ पति के गत हो जाने पर, उसने विरह ज्वर को अग्नि की ज्वाला
रूपी नलिन२ प्रच्छद पर त्याग दिया।

नाम कँमूह है। यह आदविन परगना में एक बड़ा
गाँव है। विशोका नदी के वाम पश्चिम तट पर
स्थित है। ग्राम की सबसे बड़ी मुस्लिम जियारत
के समीप सितम्बर सन् १८९५ ई० में थीस्टीन को
मन्दिर के भग्नावशेष के बड़े पत्थर दिखाई पड़े थे।
विजयेश्वर से दक्षिण दिशा में लगभग ७ मील
दूर स्थित है। इसके पूर्व विशाका नदी, पश्चिम में
तरीगाम, वचरू, उत्तर में ब्रजल्रू और दक्षिण में
छोटा नाला है।
(२) रामुष : वर्तमान ग्राम सुपियान और
श्रीनगर की मुख्य सड़क पर मध्य मार्ग में रामुह
नाम से स्थित है। कुछ समय पहले दर ब्राह्मणों
को यह जागीर थी। यह श्रीनगर का प्रसिद्ध ब्राह्मण
वंश था। अक्तूबर सन् १८९१ ई० में थीस्टीन को
ग्राम के नाग के समीप बहुत सी प्राचीन मूर्तियाँ
मिली थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में इस ग्राम का
पुनः वर्णन तरंग ८ श्लोक २८१३ में किया है।
यह स्थान छोटी नदी रामषू के पश्चिम अर्थात्
वाम तट पर है। यह नदी उत्पलपुर के समीप
वितस्ता में मिल जाती है। दक्षिण में मीरगुन्ड
उत्तर में पोरगपुर, पश्चिम में चरार पड़ता है।
पूर्व में नदी पर मितरगम, तथा जेगम अर्थात्
जेगार है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५६ में 'ज्वलन' का पाठ भेद
'दलन' मिलता है।
५६ (१) अग्नि ज्वाला : रानी का राजा के
साथ अथवा पत्नी का पति के साथ सती होने का
यह सर्व प्रथम उदाहरण राजतरंगिणी में प्राप्त होता
है। कश्मीर के इतिहास में जहाँ तक अध्ययन कर

सका हूँ यह सप्रमाणिक प्रथम उदाहरण है। इसके
पूर्व राजाओं के साथ रानियों तथा किसी और दूसरी
महिला के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता।
कश्मीर में सती प्रथा का आरम्भ एक प्रकार से यही
से होता है। यह समस्त हिन्दू, मुसलिम तथा लार्ड
विलियम वैंटिंग के शासन के समय तक भारत में
चलता रहा।
सम्राट् अकबर ने सती प्रथा को गैर कानूनी
ठहराया था। राजाज्ञा से बन्द कर दिया था।
राजा जलोक ने स्वेच्छया सपत्नीक स्वर्गारोहण
किया था। अतएव उसे सती प्रथा का कश्मीर में
आरम्भ काल कहना उचित नहीं है।
वैदिक काल में सती प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं
मिलता। यह विषय अत्यन्त विवादास्पद है। वेद
सती प्रथा को मान्यता देता है या नहीं। मैने
अपनी पुस्तक 'वेद क्या' लिखते समय ऋग्वेद का
पूरा अध्ययन किया परन्तु मुझे कही सती प्रथा का
स्पष्ट उदाहरण नही मिला।
एक प्रथा निसन्देह वैदिक काल में प्रचलित थी।
दिवंगत पति के साथ विधवा चिता के समीप जाती
थी। कहीं-कहीं उदाहरण मिलता है। शव के
साथ भी जाती थी। तत्पश्चात् मृत व्यक्ति का भाई
अथवा अन्य सम्बन्धी उसे उठाता था। साथ लोटा
लाता था। विवाह कर लेता था। आज भी पंजाब
के जाटों में यह प्रथा प्रचलित है। छोटा भाई बड़े
भाई की विधवा स्त्री को स्त्रीवत् रख लेता है।
अनेक जातियों में यह प्रथा अभी तक प्रचलित है।
देवी पार्वती सती रूप से दक्ष यज्ञ में प्राण दे
दी थी। सती होने के पश्चात् वह उमा हो गयी।
इससे सती नाम तथा सती होने की महत्ता बढ़ गयी।

द्वितीय तरंग ४०३

सती उस समय से पवित्र समझी जाने लगी।
यह प्रथा आदिम जातियों से आरम्भ हुई है। मृत
के साथ स्त्री भी स्वर्ग जाए ताकि उनका वहां
मिलन होता रहे अथवा वह पति की स्वर्ग में इस
लोक की तरह सेवा करती रहे, उनका साथ न छूटे,
इसलिये मुख्यतः राजा के कब्र में उनकी रानियां,
राजा के पार्षद, अस्त्र-शस्त्र, अश्व, भोज्य तथा अन्य
दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां गाड़ दी जाती थी।
इसलिये उन्हें गाड़ दिया जाता था कि परलोक में
दिवंगत के साथ रहकर उसे सुख पहुँचाती रहे।
चीन में यह प्रथा बहुत समय तक प्रचलित थी। यहाँ
की समाधियो में दिवंगत के शव के साथ इस प्रकार
की गढ़ी स्त्रियाँ आदि मिली है।
यूरोप मे भी यह प्रथा प्रचलित थी। दियोदोरम
सिकुलस, स्ट्राबों तथा सन्त जेरामो ईसा पूर्व चौथी
शताब्दी में इस प्रथा के प्रचलित रहने का उल्लेख
करते हैं।
कालान्तर में सती की पूजा होने लगी। मेवाड़
में गाँव गाँव में सतियों का चौरा दिखायी पड़ेगा।
काशी में श्मशान तथा अन्य स्थानों पर सती का चौरा
बना दिखायी पड़ता है। सती के चौरा की पूजा होती
रहेगी इस मानवीय गर्व मिश्रित दुर्बलता के कारण
स्त्रियाँ स्वतः सती हो जाती थी। यह पुण्य कार्य माना
जाने लगा। पति भक्ति की यह चरम सीमा आँकी
गयी। मान्यता मिलती थी कि सती होने वाली स्वर्ग
जाती है। स्वर्ग प्राप्ति की कामना इस प्रथा को मजबूत
बनाने में सहायक हुई थी। यह यहाँ तक बढ़ गयी
थी कि यदि पति कही दूर मर जाता था तो पत्नी
अकेली स्वतः सती हो जाती थी।
बौद्धो ने सती प्रथा को प्रोत्साहित नही किया
था। जैन धर्म मे सती होने की प्रथा नही है।
राजपूतों में यह प्रथा विशेष रूप से प्रचलित थी।
राजपूत वीर शत्रु सेना की प्रबल शक्ति देख-
कर जौहर करते थे। घर में स्त्रियां अपने बच्चों
को गोद में लिये सती हो जाती थी। चित्तौर में

सहस्त्रों की संख्या में सामूहिक रूप से महिलायें
मुस्लिम आक्रामकों से अपनी पवित्रता की रक्षा करने
के लिये अनेक बार सती हो गयी है। जगत् में सबसे
अधिक महिलाएँ मेवाड़ में सती हुई हैं। यहाँ सती के
स्मारक बिखरे पड़े हैं। मुख्यतः प्रवेश द्वारों पर जहां उनके
पति शत्रुओं से लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए थे।
चित्तौर दुर्ग में रानी पद्मिनी सहस्रो महिलाओ के साथ
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय जिस भूश्याक
पर सती हुई थी वहीं मैंने अपनी आँखों से देखा है कि
पत्थर अग्नि ज्वाला में फट गये हैं तथा धूयें के काले
चिन्ह वर्तमान हैं।
ब्रिटिशराज भारत में स्थापित होने के पश्चात्
लार्ड विलियम बैण्टिक ने चार दिसम्बर सन् १८२० ई०
को सती तथा सती होने के सहायक होने वालों को
दण्डनीय घोषित कर सती प्रथा को अवैधानिक कार्य
करार दिया था। उस समय से यह प्रथा बंद हो
गयी है। तथापि कभी न कभी किसी महिला के सती
होने का समाचार प्राप्त होता रहता है।
तथापि सन् १८३९ ई० में पंजाब के सिख
राजा रणजीत सिंह के साथ उनकी ३६ विधवाएँ
सती हो गयी थी। केवल रानी जिन्दा अपने छोटे
बच्चे के लालन पालन करने के व्याज से सती न
हो सकी थी।
सन् १८२१ ई० में जिस वर्ष सती सम्बन्धी
कानून बना ५७५ विधवायेँ बंगाल और केवल
कलकत्ता की सीमा में ३१०, स्त्रियां सती हो गयी
थी। उनमें १०१ साठ वर्ष; २२६ चालीस से साठ वर्ष;
२०८ बीस से चालीस वर्ष तथा ३२ महिलायें बीस
वर्ष उम्र तक की थी।
सन् १७७७ ई० में राणा जंगबहादुर की पिता
के साथ नेपाल में उनकी अनेक रानियां सती हो
गयी थी। नेपाल में यह प्रथा बीसवी शताब्दी के
प्रारम्भ तक दिखायी पड़ती है।
निस्सन्देह विश्व की अनेक जातियों के इतिहास
इस प्रथा के साक्षी हैं। महान् व्यक्तियों की चिता

४०४ राजतरंगिणी
सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् ।
स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥
५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को
लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी' नाम से कहते है।
के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र,
अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा
जीते जी कब्र के साथ गाड़ दिये जाते थे।
ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम-
र्थन सती प्रथा के पक्ष में लिया जाता है। किन्तु
वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है।
भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं
लिखा है।
आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु
प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके
साथ प्राण त्याग दी है। जर्मनी के अधिनायक
हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा
ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त में आत्म हत्या
की थी। दोनों का शव एक साथ एक ही स्थान
पर फूंका गया था।
इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो
मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी। उनके
साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी
के साथ ही मरना पसन्द किया था। भावना सती
प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार
की है।
५६ (३) नलिन: कल्हण ने चिता की
ज्वाला को उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में
नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के
लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतरया उसका लेप
करते हैं। कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस
प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है।
कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल-
प्रद बताया है। रानी के विरह ज्वर की उष्णता
नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद
'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५७ (१) वाक्पुष्टाटवीः वाक्पुष्टा अटवी
कहां हैं। इसका पता नहीं चलता। जोनराज ने
वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर)
के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरिगुह्वर
में एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे
अलाउद्दीन का सामना हुआ था। अतएव यह स्थान
किसी पर्वत के समीप रहा होगा। जोनराज ने
वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक
३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस
स्थान का महत्त्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस
घटना की शेष रह गयी थी।
राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोलारमाददन् ।
योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥
पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान सुहृ-
नर वाव परगना में वुट्टर ग्राम होना चाहिए। इस
स्थान पर गुलाव गढ़ दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर
पहुंचते हैं। श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित-
म्बर सन् १८९१ में की थी। किन्तु वहाँ पर
उन्हें स्थानीय लोगों में उक्त कथा के विषय में कुछ
जानकारी नहीं मिल सकी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापवागता' का पाठभेद
'नानागतरथागता' मिलता है।

द्वितीय तरंग ४०५
चारुचारित्रिया तत्र तया सत्रेऽवतारिते ।
नानापथागतानाथासार्थैरद्यापि भुज्यते ॥ ५८ ॥
५८. सच्चरित्रा उस देवी द्वारा वहाँ स्थापित सत्र¹ में नाना पथों से आये अनाथ
आज भी भोजन करते हैं ।
आभ्यामभ्यधिकं कर्तुं शक्तिः कस्येति निश्चितम् ।
विचिन्त्यारोचकी धाता नापत्यं निर्ममे तयोः ॥ ५६ ॥
५९. इन दोनों से अधिक करने की निश्चय ही किस की शक्ति है ? यह सोचकर
अरोचकी विधाता ने उन दोनों के लिये सन्तति का विधान नहीं किया ।
वेधाः परां धुरमुपैति परीक्षकाणा-
मिच्छोः फलप्रजनने न कृतश्रमो यः ।
विस्मारितोद्धुरसुधारसयोग्यतात् तत्
तस्मादुदेत्य किमियाभ्यधिकं विदध्यात् ॥ ६० ॥
६०. विधाता परीक्षकों की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, जिस ने इक्षु¹ के फल देने
में परिश्रम नहीं किया । सुस्वादु सुधा रस को भी विस्मरित कर देने की योग्यता वाले,
उससे बढ़कर और वह क्या कर सकता था ।
पादटिप्पणियाँ :
५८(१) : सोम यज्ञ का समय जो १३
से १०० दिनों के अन्दर पूर्ण होता है उसके लिये
प्राचीन समय में यह शब्द प्रयुक्त किया जाता था ।
इसका अर्थ आश्रय स्थान, शरण स्थान तथा वह
स्थान है, जहाँ गरीबों को भोजन दिया जाता है ।
अतिथणी तथा सत्र में सूक्ष्म भेद है । सत्र प्रायः
उसी दान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ गरीबों को
बना भोजन दिया जाता है जैसे लंगर अथवा
क्षेत्र । काशी में क्षेत्र विद्यार्थी तथा संन्यासियों का
मुफ्त भोजन स्थान है । सत्र और क्षेत्र समानार्थक
हैं । कहावत है—क्षेत्रे भोजं मठे निद्रा ।
पादटिप्पणियाँ
राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ४२वाँ श्लोक है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ६० में 'सुवारस' वा 'मुदारम्',
'मुदारस', 'मुधारम्'; 'योग्यत्वात्' का 'योग्यतात्',
'योग्यता तु', 'योग्यता तत्', 'योग्यतः तत्' 'योग्य-
तात्तान' तथा 'दुदेत्य' का पाठभेद 'उत्पादयित्वा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ
राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४३ वाँ श्लोक है ।
६०. (१) इक्षु : इसे ईंख और पूर्वी उत्तर-
प्रदेश तथा बिहार में ऊख कहते हैं । दोनों ही शब्द
इक्षु के अपभ्रंश हैं । इक्षु शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख
अथर्ववेद (१ : ३४ : ७) में प्राप्त होता है । तत्प-
श्चात् संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है । (मै
सं. : ३ . ७ : ९; ४ : २ : ९; वा. स. २५ : १ :
मै. सं : ३ : १६ : १; तथा कठक अश्वमेध ३ :
८ ) वैदिक साहित्य से यह पता नही चलता कि इसको
खेती होती थी अथवा यह वन में उत्पन्न होता था ।
कश्मीर की उपत्यका किंवा वादी में ईख
प्रायः नहीं होती है । इसकी पैदावार इस समय
जम्मू काश्मीर राज्य के जम्मू प्रदेश में तहसील रन-
बीर सिंह पूरा में खूब होती है । इस समय यहाँ
६ हजार एकड़ में ईख की खेती होती है । जम्मू के

४०४ राजतरंगिणी
सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् ।
स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥
५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को
लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी¹ नाम से कहते हैं।
के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र, नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी ।
अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा पाठभेद :
जीते जी कब्र के साथ गाड दिये जाते थे । श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद
ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम- 'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है ।
र्थन सती प्रथा के पक्ष मे लिया जाता है । किन्तु
वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है। पादटिप्पणियाँ :
भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं ५७ (१) वाक्पुष्टाटवी : वाक्पुष्टा अटवी
लिखा है । कहाँ है। इसका पता नहीं चलता । जोनराज ने
आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर )
प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरि गह्वर
साथ प्राण त्याग दी हैं। जर्मनी के अधिनायक मे एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे
हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा अलाउद्दीन का सामना हुआ था । अतएव यह स्थान
ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त मे आत्म हत्या किसी पर्वत के समीप रहा होगा । जोनराज ने
की थी । दोनो का शव एक साथ एक ही स्थान वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक
पर फूंका गया था । ३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस
इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो स्थान का महत्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस
मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी । उनके घटना की शेष रह गयी थी ।
साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोहारसाददन् ।
के साथ ही मरना पसन्द किया था । भावना सती योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥
प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान खूंद
की हैं । नर वाव परगना में वूटू ग्राम होना चाहिए । इस
५६ (३) नलिन : कल्हण ने चिता की स्थान पर गुलाब गड दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर
ज्वाला की उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में पहुँचते है । श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित-
नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के म्बर सन् १८९१ मे की थी । किन्तु यहाँ पर
लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतया उसका लेप उन्हें स्थानीय लोगों से उक्त कथा के विषय मे कुछ
करते हैं । कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस जानकारी नहीं मिल सकी ।
प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है। पाठभेद :
कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल- श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापथागता' का पाठभेद
प्रद बनाया है। रानी के विरह ज्वर को उष्णता 'नानागतपथागता' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४०५
चारुचारित्रया तत्र तया सत्रेऽवतारिते ।
नानापथागतानाथासार्थैरद्यापि भुज्यते ॥ ५८ ॥
५८. सच्चरित्रा उस देवी द्वारा वहाँ स्थापित सत्र १ में नाना पन्थों से आये अनाथ
आज भी भोजन करते हैं ।
आभ्यामभ्यधिकं कर्तुं शक्तिः कस्येति निश्चितम् ।
विचिन्त्यारोचकी धाता नापत्यं निर्ममे तयोः ॥ ५६ ॥
५९. इन दोनों से अधिक करने की निश्चय ही किस की शक्ति है ? यह सोचकर
अरोचकी विधाता ने उन दोनों के लिये सन्तति का विधान नहीं किया ।
वेधाः परां धुरमुपैति परीक्षकाणा-
मिच्छोः फलप्रजनने न कृतश्रमो यः ।
विस्मारितोद्दरसुधारसयोग्यतात् तत्
तस्मादुदेत्य किमिवाभ्यधिकं विदध्यात् ॥ ६० ॥
६०. विधाता परीक्षकों की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, जिस ने इक्षु१ के फल देने
में परिश्रम नहीं किया । सुस्वाद सुधा रस को भी विस्मरित कर देने की योग्यता वाले,
उससे बढ़कर और वह क्या कर सकता था ।
पादटिप्पणियाँ :
५८ ( १ ) : सोम यज्ञ का समय जो १३
से १०० दिनों के अन्दर पूर्ण होता है उसके लिये
प्राचीन समय में यह शब्द प्रयुक्त किया जाता था ।
इसका अर्थ आश्रय स्थान, शरण स्थान तथा वह
स्थान है, जहाँ गरीबों को भोजन दिया जाता है।
धत्तिणी तथा सत्र में सूक्ष्म भेद है। सत्र प्रायः
उसी दान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ गरीबों को
बना भोजन दिया जाता है जैसे लंगर अथवा
क्षेत्र । काशी में क्षेत्र विद्यार्थी तथा सन्यासियों का
मुफ्त भोजन स्थान है । सत्र और क्षेत्र समानार्थक
हैं । कहावत है—क्षेत्रे भोजं मठे निद्रा ।
पादटिप्पणियाँ
राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५८वां श्लोक है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ६० में 'सुवारस' का 'मुदारम्',
'मुदारस्', 'मुवारम्'; 'योग्यतात्तत्' का 'योग्यतात्तु',
'योग्यता तु', 'योग्यता तत्', 'योग्यताः तत्' 'योग्य-
वात्तान्' तथा 'दुदेत्य' का पाठभेद 'उत्पादयित्वा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियां
राजतरंगणी सूक्तिसंग्रह का यह ५३ वाँ श्लोक है ।
६०. ( १ ) इक्षु : इसे ईख और पूर्वी उत्तर-
प्रदेश तथा बिहार में ऊख कहते हैं । दोनो ही शब्द
इक्षु के अपभ्रंश हैं । इक्षु शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख
अथर्ववेद ( १ : ३४ : ७ ) में प्राप्त होता है । तत्प-
श्चात् संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है । ( मै
सं. : ३ : ७ : ९; ४ : २ : ९; वा. स. २५ : १ :
तैं. स : ३ : १६ : १; तथा कठक अश्वमेध ३ :
८ ) वैदिक माहित्य से यह पता नही चलता कि इसकी
खेती होतो थी अथवा यह वन में उत्पन्न होता था ।
कश्मीर की उपत्यका किंवा वादी में ईख
प्रायः नही होती है । इसकी पैदावार इस समय
जम्मू काश्मीर राज्य के जम्मू प्रदेश मे तहसील रन-
बीर सिंह पूरा में खूब होती है । इस समय यहाँ
६ हजार एकड़ मे ईख की खेती होती है । जम्मू के

४०६ राजतरंगिणी
दीर्घदुर्दिननष्टार्कं राष्ट्रमात्मापनागतः ।
ज्ञात्वा राज्यग्निसाद्देहं सा चकारेति केचन ॥ ६१ ॥
६१. अपने दुष्कृत्य के कारण बहुत दिनों तक रवि रहित राष्ट्र को जानकर उस रानी
ने देह को अग्निसात् कर दिया। ऐसा कुछ लोगों का विचार है।
ततोऽन्यकुलजो राजा विजयोऽष्टावभूत्समाः ।
पत्तनेन परीतं यश्चकार विजयेश्वरम् ॥ ६२ ॥
६२. तदुपारन्त अन्य कुलोत्पन्न राजा विजय आठ वर्ष रहा, जिसने विजयेश¹ को
नगर से घिरवाया।

नहरी क्षेत्र में भी ईख की उपज होने लगी है। इस
राज में कुल ईख १.६ हजार हेक्टर मे बोया
जाता है। उत्पादन ११.२३ हजार मेट्रिक टन
का होता है। मैने सन् १९६३ मे जम्मू प्रदेश की
यात्रा मे यह खेती देखी है। ईख अच्छी होती है।
शर्करा अर्थात् चीनी का उत्पादन सर्वप्रथम
भारत मे ही प्रारम्भ हुआ था। यूनानी भारत में
आये। उन्हे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि डण्ठल
से शहद निकलती है। जो महत्त्व भारत में शर्करा
का प्राचीन काल में था वही पश्चिम तथा यूरोप
मे मधु का था।
कश्मीर उपत्यका में ईख का अभाव था।
वहाँ उसका माधुर्य दुर्लभ पदार्थों मे समझा
जाता था। आम भारत मे साधारण चीज है।
किन्तु वही श्रीनगर में दुर्लभ पदार्थ है।
इक्षु यद्यपि मधुर था परन्तु विधाता ने उसे फल
नहीं दिया है। यदि उसमे फल होता तो सम्भवतः
गन्ने के माधुर्य से भी अधिक माधुर्य होता। ईख के रस
को सुधारस से भी ऊँचा स्थान कल्हण देता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६१ मे 'नष्टार्कम्' का पाठभेद
'नष्टार्क' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
६२. (१) · श्री विल्सन ने अभिषेक का काल
ईसापूर्व ६६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन्
९० ई० और राज्य काल ८ वर्ष दिया है।

श्री स्टीन ने ग्रहण के आधार पर गणना कर
राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् २९९६ तथा
राज्य काल आठ वर्ष दिया है। प्रो एम० पी०
पण्डित ने ईसा पूर्व ६९ वर्ष तथा राज्य काल ८ वर्ष
दिया है। श्री याली ने यह समय सप्तर्षि संवत्
३८६१ तथा सन् ९१ ई० दिया है।
१ आइने अकबरी में राजा विजय को 'बेजोरो'
लिखा है। राज्य काल ८ वर्ष दिया गया है।
हसन लिखता है—राजा विजय २९६८ क०
में अराकीने सल्तनत के इत्तफाक और मशविरह
से सरवराद्राय सल्तनत हुआ। शहर के बड़े लोगो
में से था। बेजबारह का शहर तामीर करके अपना
पायतख्त बनाया। विजय शूर का मन्दिर इन्तहाई
रफअत और संगीनी के साथ बुलन्द किया। मुद्दत
हकूमत आठ बरस।
(२) विजयेश : टिप्पणी विजयेश्वर ८४
तथा १०५ द्रष्टव्य है।
श्री विल्सन ने (पृष्ठ ३०) लिखा है कि
विजयेश का मन्दिर राजा विजय ने राजधानी के
अन्दर बनवाया। यह बात प्रमाणित नही होती।
विजय ने विजयेश का मन्दिर ब्रिजवोर अर्थात् विजय
क्षेत्र मे बनाया। यही परम्परा, जनश्रुति तथा अन्य
उपलब्ध प्रमाणो से प्रमाणित होता है। विल्सन को
इस विषय मे भ्रम हो गया है।

द्वितीय तरंग ४०७
सुतो महीमहेन्द्रस्य जयेन्द्रस्तस्य भूपतेः ।
क्ष्मामाजानुभुजो राजा बुभोजाथ पृथुप्रथः ॥ ६३ ॥
६३. उस मही महेन्द्र भूपति का पुत्र आजानुबाहु, इन्द्र तुल्य राजा जयेन्द्र ने पृथ्वी
का भोग किया ।
पादटिप्पणियाँ :
६३ ( १ ) जयेन्द्र : श्री विल्सन ने अभिषेक
काल ईसापूर्व ६० वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल
स० ९८ई० और राज्य काल ३७ वर्ष माना है ।
श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय कल्हण के
आधार पर गणनाकर लौकिक संवत् ३००४ वर्ष
तथा राज्यकाल ३७ वर्ष रखा है ।
एस. पो. पण्डित ने यह समय ईसापूर्व ६१ वर्ष
तथा राज्यकाल ३७ वर्ष माना है । श्री यातो ने यह
समय सप्तर्षि संवत् ३८९८ तथा सन् १२८ ई०
दिया है ।
आइने अकबरी में जयेन्द्र को 'चुन्दर' लिखा
है । राज्यकाल ३७ वर्ष दिया गया है ।
आइने अकबरी में सन्धिमति के विषय में सबसे
अधिक लिखा है । अबुलफजल कहता है—राजा जयेन्द्र
इस दृष्टि में लौकिक संवत् ३००४ में राजा हुआ ।
वह भूमि पर महेन्द्र अर्थात् इन्द्र तुल्य था । वह
आजानुबाहु था । राजा पृथु तुल्य प्रतापी था ।
सन्धिमति : उसका मन्त्री महा मेधावी सन्धि-
मान था । वह शिवभक्त था । महात्मन् ईशान का
शिष्य था । उसकी कीर्ति कश्मीर मण्डल में व्याप्त
हो गई थी । राजा एवं राजन्य वर्ग कान के कच्चे
होते हैं ।
राजदरबारियों ने मन्त्री की मेधा उसकी कीर्ति
तथा प्रिय होने का दूसरा अर्थ लगाना आरम्भ किया ।
राजा के सम्मुख उसके गुण दोष रूप में बढ़ा-चढ़ाकर
किये जाने लगे । उसकी बढ़ती ख्याति तथा शक्ति
राजा के लिए घातक सिद्ध होगी यह बात राजा के
मन में बैठा दी गयी । राजा मन्त्री से शंकित रहने
लगा । उसके प्रति द्वेष भावना उत्पन्न हो गई । चपल
कर्ण राजा ने उसका राज दरबार में आना बन्द कर
दिया । उससे क्रोधित होकर उसकी सब सम्पत्ति छीन
कर उसे दरिद्र बना दिया ।
हसन लिखता है—राजा जयेन्द्र सन्दमत वजीर
के इमदाद व इनायत से २९९४ क० में बापके
कायम मुकाम तख्त नशीन हुआ । कुछ मुद्दत अदल व
इन्साफ में गुजारी । बिल आखीर अपने वजीर से
नाराज होगया । और अरसा दस साल तक उसे कैद
व बन्द में मवतिला रखा । और जिस कदर भी उसके
पास असबाब था लूट लिया । लेकिन अवाम वजीर
की नेक नियती से खुश थे और अपनी जगह परचमी
गोरषा करते कि किसी न किसी दिन वजीर ही
बादशाह होगा । यह चीज भी राजा के कान में
पहुँच गयी । हुकम दिया कि वजीर को सूली दे दें ।
चुनाच शाही हुकम के बमूजिब वजीर को सूली पर
चढ़ा दिया गया । और गरीब जानसे रुखसत हुआ ।
लेकिन इसके बाद ही राजा पर वहशत व दीवानगी
सवार हो गयी और चन्द दिनों बाद खुद भी दुनिया
से रुखसत हो गया । मुद्दत हकूमत ३७ साल ।
चूंकि राजा जयेन्द्र बे औलाद था । इसलिए
उसकी वफात के चन्द दिनों तक सल्तनत कश्मीर
बादशाह के बगैर रही । ईशानदेव नामक एक
आबिद वजाहिद इन्शान को जो वजीर सन्दमत का
मुरी था और अरसा दराज से मुकाम इशः बरारी
में गोशः नशीन था । जब वजीर मजकूर को सूली
की खबर सुनी तो उसके लाश को जलाने की नीयत
से दार के नीचे आया । वजीर के जिस्म को सूली
से उतार कर गुस्ल देने के लिये तैयार हुआ ।
कैफियत ( कफ ) ईशानदेव ने जब उसके माथे पर
नजर डाली तो देखा कि उसपर यह तीन फिकरह
लिखे हुए हैं—

४०८ राजतरंगिणी
अलोलकीर्तिकल्लोलदुकूलवलनोज्ज्वलाम् ।
बभार यद्भूजस्तम्भो जयश्रीसालभञ्जिकाक् ॥ ६४ ॥
६४. जिसके भुजस्तम्भ ने, निश्चल कीर्तिकल्लोलरूपी दुकूल के वलन से शोभायमान
जयश्री शालभंजिका' को धारण किया था।


१-जब तक यह शख्स जिन्दा रहेगा मुफलिस रहेगा।
२-दस साल तक कैद में रहकर दार पर मरेगा।
३-उसके बाद राज लेगा।
ईशान देव ने दिल में सोचा कि इन तीन फिकरो में से दो का मजमून ब अमल आ गया है। और तीसरे फिकरह का मजमून भी यकीमन् अमल में आयेगा। लिहाजा उसकी लाश वही छोड़कर एक पोशीदह जगह तलाश की। वहाँ उसे रखकर खुदा की कुदरत का मुन्तज़िर रहने लगा।
एक रात देखा कि मैदान नूरानी हो गया है। और चन्द जोगनी आई हैं। उन्होंने वजीर की लाश को सूली से उतार लिया है। और उससे बातचीत में मशगूल हैं। ईशानदेव तमाम रात काँपता रहा और हैरान था कि यह कौन हैं। सुबह के वक्त जब जोगिनी जाने लगीं और उन्होंने लाश मजकूर को बदस्तूर दार पर लटकाना चाहा तो ईशानदेव ने तलवार हाथ में लेकर जोगनियों को डराया और बाद में जोर जोर से शोर व गोगा मचाया यह देख कर औरतें गायब हो गयीं उनमें से एक ने कहा—
“ईशान देव इस शख्स को खुदा ने हमारी वजह से जिन्दा किया है। हम पर तू क्यों तलवार उठाता है। वह राजा सन्धीमान है। और एक दिन बहुत बडा राजा होगा। जब वजीर जिन्दा हो गया तो अपने पीर के पैरों में पड़ा। उस वक्त लोग हरतरफ से जमा हुए और वजीर को जिन्दा देखकर निहायत हैरान हुए। लोग उसे पहले से जानते थे। उसे देखने ही पहचान गये। चेदाचीन में दायर उसके अखलाक बरीमाना को देखकर उसे मुल्क कश्मीर की हुकूमत कबूल करने को कहा। पहले तो उसने इन्कार किया। बिलाखिर अपने पीर के कहने से सल्तनत कबूल करने पर राजी हो गया।
(पृष्ठ ५४-५५)

पाठभेद :
श्लोक संख्या ६४ में 'अलोल' का 'आलोल' 'दुकूल' का 'दुकूल' 'धो' का 'द्यो' तथा 'साल-भञ्जिकाम्' का पाठभेद 'शालभञ्ज्रिकाम्' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
६४ (१) शालभंजिकाः-अर्थ पुतली होता है। इसका अर्थ वेश्या भी होता है। साँची स्तूपों के घेरे पर शालभंजिका मूर्तियाँ उत्कीर्ण मिलती हैं। मेरे एक मित्र ने शालभंजिका का अर्थ पर्वों तथा पवित्र उत्सवों अथवा यात्रा के समय लाज वर्षा करने वाली कमनीय बालाओं से किया है। किन्तु इसका वर्णन मुझे कहीं नहीं मिल सका।
वृक्ष को पकड़ कर स्त्रियाँ खड़ी होती थी। उसके तले उत्सव मनाती थीं। इस प्रकार वृक्षों को पकड़ने वाली स्त्रियों को शालभंजिका कहा गया है। कालान्तर में इसी प्रकार की मूर्ति काष्ठ तथा पाषाण पर बनायी जाने लगी। उसे शालभंजिका की संज्ञा दे दी गयी।
निःसन्देह यहाँ इसका तात्पर्य निर्जीव पुतली से है। पुतली चालक के संकेत पर ही कार्य करती है। इसी प्रकार जयश्री इस राजा के अभिप्रायानुसार कार्य करती है। अर्थात् उसे विजय प्राप्त होता ही है।
शालभंजिका का एक अर्थ और मिलता है। यह काष्ठ की स्त्री प्रतिमा घटसहित बनायी जाती थी। उत्सवों तथा शुभ कार्य काल में द्वार पर मजा

द्वितीय तरंग ४०९
तस्याभूदद्भुतोदन्तो भवभक्तिविभूषितः ।
राज्ञः संधिमतिर्नाम मन्त्री मतिमतां वरः ॥ ६५ ॥
६५. उस राजा का अद्भुत वृत्तान्त युक्त, शिवभक्ति विभूषित, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ
सन्धिमति नामक मन्त्री हुआ।
नास्त्युपायः स संसारे कोऽपि योऽपोहितुं क्षमः ।
भूपालमत्तकरिणामेषां चपलकर्णताम् ॥ ६६ ॥
६६. संसार में कोई भी ऐसा उपाय नहीं है, जो इन भूपाल रूपी मत्त गजों की चपल
कर्णता१ को दूर करने में समर्थ हो।
अत्यद्भुतमतिः शङ्क्यः सोऽयमुक्त्वेति यद्विटैः ।
तस्मिन्धीसचिवे द्वेषस्तेनाग्राह्यत भूभुजा ॥ ६७ ॥
६७. "अत्यन्त अद्भुत मतिमान् भी यह आशंकनीय है", यह कहकर, विटों ने,
राजा को उस धीमान् मन्त्री के प्रति द्वेषयुक्त कर दिया।


[बायाँ स्तम्भ]
कर रख देते थे। यह पुतली किंवा प्रतिमा शाल
वृक्ष की बनती थी अतएव उसे शालभंजिका कहा
जाता था।
एक मत और है। शालभंजिका एक उत्सव प्रति
वर्ष मनाया जाता था। यदि शालभंजिका का अर्थ
वेश्या किंवा गणिका से लिया जाय तो काशी में
गणिकाओं का लोलार्क छठ के दिन बीसवीं शताब्दी
के दूसरे दशक तक मेला लगता था। काशी की
सभी गणिका कीनाराम के स्थल पर तथा मार्गों में
गाती थीं। उनका स्वागत सत्कार होता था। आज
से पचास वर्ष पूर्व तक यह उत्सव धूमधाम से होता
था। अब यह बन्द हो गया है। सुधारवादी प्रवाह
में तिरोहित हो गया है। केवल स्मृति मात्र शेष
रह गयी है। वृत्त शालभंजिका संस्कृत का एक
प्रसिद्ध नाटक है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६५ में 'दन्तो' का 'दान्तो', 'राज्ञः'
का 'राज्ञा' तथा 'संधिमति' का पाठभेद 'संधिगति'
मिलता है।
५२


[दायाँ स्तम्भ]
श्लोक संख्या ६६ में 'योऽपोहितुं' का पाठ-
भेद 'यो पिहितुं' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ४७४वां श्लोक है।
६६(१) चपलकर्णता—कल्हण ने यहाँ चपल
शब्द का प्रयोग साभिप्राय किया है। चाटुकार तथा
दरबारियों की बातें सुनकर राजाओं की वृत्ति का
चंचल हो जाना अर्थात् राजा का चपलकर्ण हो
जाना स्वाभाविक है। हाथी का चंचल कर्ण उसका
स्वभाव है। मत्त हाथी का कान सर्वदा चंचल
रहता है। यहां 'चपलकर्ण' श्लिष्ट है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६७ में 'शङ्क्य.' का पाठभेद
'शक्यः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
६७(१) श्री स्टीन ने श्लोक संख्या ६६ एवं
६७ का एक ही में अनुवाद किया है। रणजीत
सीताराम पण्डित ने अलग अलग अनुवाद ...

४१० राजतरंगिणी
निवारितप्रवेशोऽथ सकोपस्तमहेतुकम् ।
निनाय हृतसर्वस्वं यावदायुर्र्दारिद्र्ताम् ॥ ६८ ॥
६८. उस कुपित राजा ने मन्त्री का प्रवेश निषिद्ध कर दिया१। और निष्कारण
सर्वस्व हरण कर उसे यावज्जीवन के लिये दरिद्र बना दिया ।
तस्य भूपतिविद्वेषग्रीष्मोष्मपरिशोषिणः ।
आप्याय्यं राजपुरुषा वार्तयाऽपि न चक्रिरे ॥ ६६ ॥
६९. भूपति के विद्वेष रूपी ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से परिशोषित उसे, राजपुरुषों ने वार्ता
से भी सन्तुष्ट नहीं किया ।
गिरं गभीरो गृह्णाति क्ष्माभृद्यावत्तदग्रगाः ।
उक्तानुवादिनस्ताम्व्यक्तं प्रतिरवा इव ॥ ७० ॥
७०. जब१ गम्भीर राजा कुछ कहता है तो, उसी समय उक्ति की पुनरुक्ति करने वाले
उसके अग्रगामी (राजा के साथ आगे चलने वाले चाटुकार) प्रतिध्वनि सदृश शब्द
करते हैं ।
स तु राजविरुद्धत्वदारिद्र्याभ्यां न विव्यथे ।
गतप्रत्यूहया प्रीतः प्राप्तया हरसेवया ॥ ७१ ॥
७१. समुपलब्ध निर्विघ्न हर सेवा से प्रसन्न वह (सन्धिमति) राजा की विरुद्धता
एवं दारिद्र्य से दुःखी नहीं हुआ ।
किया है । मैने भी दोनो श्लोको का अनुवाद अलग किन्तु काम नहीं कर सकता था । राजा की अकृपा
हो दिया है । इसमें अर्थ समझने मे कठिनाई का यह प्रतीक था ।
नहीं होती । राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४५वां श्लोक है ।
पाठभेद : ७० ( १ ) इसका द्वितीय अर्थ यह होता है—
श्लोक संख्या ६८ में 'सकोपस्त' का पाठभेद 'जब गम्भीर पर्वत ध्वनि प्राप्त करता है तो उसके
'स कोपात्त' मिलता है । पार्श्ववती प्रतिध्वनि के रूप में स्पष्ट दोहरा देते हैं ।"
पादटिप्पणियाँ : अग्रगा का अर्थ पर्वत के सम्मुख स्थित पहाड़
६८ (१) प्रवेश निषिद्ध—देशी राज्यों में से भी होता है । पर्वत से उठती ध्वनि को सम्मुख
यह प्रथा भारतीय राज्यो के विलय पूर्व ( १६४७- स्थित पहाड़ी दोहरा देती है अर्थात् ध्वनि को प्रति-
४८ ) तक जारी थी । इसे 'ड्योढ़ी बन्द' करना ध्वनित करती है । अग्रग का अर्थ मार्गदर्शक भी
कहते थे । राजप्रासाद के ड्योढ़ी [ देहली ] के होता है ।
भीतर प्रवेश नहीं किया जा सकता था । राजस्थान क्ष्माभृत् का अर्थ पर्वत तथा राजा दोनों
में यह प्रथा दूसरे प्रकार मे प्रचलित थी । यदि राजा होता है ।
अप्रसन्न होता था तो आज्ञा दे देता था 'घर बैठो' । पाठभेद :
घर मे राज्य कर्मचारी रहता था । वेतन पाता था । श्लोक संख्या ७१ में 'दारिद्र्याभ्यां' का 'दारि-

An exact, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text shown in the image:

द्वितीय तरंग ४११
अथ भाव्यर्थमाहात्म्यात्प्रपथे प्रतिमन्दिरम् ।
राज्यं संधिमतेर्भावीत्यश्रुताऽपि सरस्वती ॥ ७२ ॥
७२. भावी घटना के माहात्म्य से प्रत्येक घर में अश्रुत¹ भी वह वाणी फैल गयी—
“राज सन्धिमति का होने वाला है।”
नाचोदिता वाक्चरतीत्याप्तेभ्यः श्रुतवान्नृपः ।
ततः संभृतसंत्रासः कारावेश्मनि तं न्यधात् ॥ ७३ ॥
७३. “बिना कही बात नहीं फैलती है।” इस प्रकार विश्वस्तों से राजा ने सुना
और संत्रस्त होकर, उसे कारागार¹ में रख दिया।
तत्र तस्योग्रनिगडैः पीडिताङ्घ्रेर्विशुष्यतः ।
पूर्णोऽभूद्दशमो वर्षो भूपतेश्चायुषोऽवधिः ॥ ७४ ॥
७४. वहां उग्र निगड बन्धन से पीड़ित चरणयुक्त शुष्क उस मंत्री का दसवां वर्ष
तथा राजा के आयु की अवधि पूर्ण हो गयी।
निष्पुत्रः स महीपालो मुमूर्षुद्दाहमादधे ।
रोगोत्थया पीडया च चिन्तया च तदीयया ॥ ७५ ॥
७५. निष्पुत्र एवं मुमूर्षु वह महीपाल रोगोत्पन्न पीड़ा और उस चिन्ता से दग्ध
होने लगा।
द्राम्यां' और 'हरसेवया' का पाठभेद 'हरिसेवया'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
७१ (१) हर एकादश रुद्रो में से एक है।
यहाँ पर शिव के अर्थ में प्रयोग किया गया है।
कम्बुज कम्बोडिया में हरि-हर की पूजा व्यापक रूप
से प्रचलित थी। अर्धनारीश्वर के समान एक ही
मूर्ति में दक्षिण ओर हरि तथा वाम अर्धांग में हर
अर्थात् शिव की आकृति सवेशभूषा रहती थी। कम्बो-
डिया के एंग कोरवाट में इस प्रकार की अनेक मूर्तियाँ
मैंने अपने पर्यटन काल सन् १९५७ में देखी थी।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७२ में 'प्रतिम' का पाठ भेद
'नवम' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
७२ ( १ ) अश्रुत सरस्वती—इसका शाब्दिक
अर्थ दो है। वह वाणी जो, सुनायी नही पड़ती।
किवदन्ती या अफवाह के अर्थ में भी इस शब्द का
प्रयोग किया गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७३ में 'संभृत' का 'सद्भूत' तथा
'न्यधात्' का पाठभेद 'व्यधात्' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
७३(१) कारावेश्म—कारागार को उस समय
कारावेश्म कहते थे।
प्राचीन भारत में कारागार व्यवस्था बहुत
विकसित हो चुकी थी। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में
कारागार का जो रूप प्रस्तुत किया है वह बहुत ही
विकसित कहा जायगा। उसमें बन्दियों के भोजन,
वस्त्र, बेड़ी, मुलाकात, जेल का शासन, जेल रक्षको
अर्थात् वार्डरों का भ्रष्टाचार आदि पर आजकल के पटु
कारागार विशेषज्ञ की तरह प्रकाश डाला गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७५ में 'मादधे' का पाठभेद

४१२ राजतरंगिणी
ऊष्मायमाणो विद्वेषवह्निना ज्वलताऽनिशम् ।
न विना तद्वधं मेने भवितव्यप्रतिक्रियाम् ॥ ७६ ॥
७६. विद्वेषाग्नि से रात्रि-दिन जलते रहने के कारण नितरां पीड़ित होते हुए उस राजा
ने उसके (सन्धमति) वध के बिना, भवितव्यता की प्रतिक्रिया असम्भव समझा ।
भाव्यर्थस्याऽबुधाः कुर्युदुपायं स्थगनाय यम् ।
स एवाऽनावृतं द्वारं ज्ञेयं दैवेन कल्पितम् ॥ ७७ ॥
७७. मूर्ख जन भवितव्यता को अन्यथा करने हेतु, जिस उपाय को करते हैं, वही
भाग्य निर्मित अनावृत द्वार है ।¹
दग्धाङ्गारकदम्बके विलुठतः स्तोकोन्मिषत्तेजसो
वेधा वह्निकणस्य शक्तिमतुलामाधातुकामो हठात् ।
तन्निर्वापणमिच्छतः प्रतनुते पुंसः समीपस्थिते
संतापद्रुतभूरिसर्पिषि घटे पानीयकुम्भभ्रमम् ॥ ७८ ॥
७८. जब विधाता दग्ध अंगार समूह में चिनगाते हुए स्वल्प तेज वाले वह्निकण को
हठात् अतुल शक्ति सम्पन्न करने की इच्छा करता है, तब उस अग्नि को बुझाने के इच्छुक
पुरुष में उसके निकटस्थ ताप-तरल प्रचुर घृत घट में जल कुम्भ का भ्रम कर देता है ।¹
अथ राजाज्ञया क्रूरैर्वधकर्माधिकारिभिः ।
निशि संधिमतिः शूले समारोप्य विपादितः ॥ ७९ ॥
७९. राजा की आज्ञा से क्रूर वध कर्माधिकारियों ने रात्रि में सन्धिमति को शूलपर¹
चढ़ाकर हत्या कर दी ।

'माददे' मिलता है । अनुवादकों ने किया है । श्री रणजीत सीताराम
राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४६वां श्लोक है । पण्डित के मत से इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ कुछ
श्लोक संख्या ७७ में 'स्याऽबुधाः' का पाठभेद अस्पष्ट होता है परन्तु तात्पर्य समझ में आ जाता है ।
'य बुधाः' मिलता है । ७९ ( १) शूलः - शूली की प्रथा प्राचीन
पादटिप्पणियाँ : भारत में प्रचलित थी । स्थानभेद के कारण शूल
७७(१) कल्हण पुरानी बातों को नवीन शैली से अर्थात् शूल देने के प्रक्रिया में भी अन्तर था । शूलीपर
कहता है । यही शैली उसने भाग्य वर्णन में चढ़ाने के लिए कल्हण ने समारोप शब्द का प्रयोग
अपनायी है । कल्हण की कवि रूप में वह सबसे बड़ी किया है ।
विशेषता है । श्री विल्फोर्ड का मत है कि जिस शूली पर मरना
पाठभेद : सन्धिमति का कहा जाता है वह वास्तव में 'क्रास'
श्लोक संख्या ७८ में 'स्थिते' का पाठभेद था । ( एशियाटिक रिसर्च भाग १० ) किन्तु यह
'स्थितेः' मिलता है । बात गलत है । शूली की प्रथा भारत में बहुत
पादटिप्पणियाँ : प्राचीन है । महाभारत में माण्डव्य ऋषि को
७८( १) इस श्लोक का अर्थ कई प्रकार से शूलीपर चढ़ाने का वर्णन मिलता है । 'क्रास' के