राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४०३
सती उस समय से पवित्र समझी जाने लगी।
यह प्रथा आदिम जातियों से आरम्भ हुई है। मृत
के साथ स्त्री भी स्वर्ग जाए ताकि उनका वहां
मिलन होता रहे अथवा वह पति की स्वर्ग में इस
लोक की तरह सेवा करती रहे, उनका साथ न छूटे,
इसलिये मुख्यतः राजा के कब्र में उनकी रानियां,
राजा के पार्षद, अस्त्र-शस्त्र, अश्व, भोज्य तथा अन्य
दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां गाड़ दी जाती थी।
इसलिये उन्हें गाड़ दिया जाता था कि परलोक में
दिवंगत के साथ रहकर उसे सुख पहुँचाती रहे।
चीन में यह प्रथा बहुत समय तक प्रचलित थी। यहाँ
की समाधियो में दिवंगत के शव के साथ इस प्रकार
की गढ़ी स्त्रियाँ आदि मिली है।
यूरोप मे भी यह प्रथा प्रचलित थी। दियोदोरम
सिकुलस, स्ट्राबों तथा सन्त जेरामो ईसा पूर्व चौथी
शताब्दी में इस प्रथा के प्रचलित रहने का उल्लेख
करते हैं।
कालान्तर में सती की पूजा होने लगी। मेवाड़
में गाँव गाँव में सतियों का चौरा दिखायी पड़ेगा।
काशी में श्मशान तथा अन्य स्थानों पर सती का चौरा
बना दिखायी पड़ता है। सती के चौरा की पूजा होती
रहेगी इस मानवीय गर्व मिश्रित दुर्बलता के कारण
स्त्रियाँ स्वतः सती हो जाती थी। यह पुण्य कार्य माना
जाने लगा। पति भक्ति की यह चरम सीमा आँकी
गयी। मान्यता मिलती थी कि सती होने वाली स्वर्ग
जाती है। स्वर्ग प्राप्ति की कामना इस प्रथा को मजबूत
बनाने में सहायक हुई थी। यह यहाँ तक बढ़ गयी
थी कि यदि पति कही दूर मर जाता था तो पत्नी
अकेली स्वतः सती हो जाती थी।
बौद्धो ने सती प्रथा को प्रोत्साहित नही किया
था। जैन धर्म मे सती होने की प्रथा नही है।
राजपूतों में यह प्रथा विशेष रूप से प्रचलित थी।
राजपूत वीर शत्रु सेना की प्रबल शक्ति देख-
कर जौहर करते थे। घर में स्त्रियां अपने बच्चों
को गोद में लिये सती हो जाती थी। चित्तौर में
सहस्त्रों की संख्या में सामूहिक रूप से महिलायें
मुस्लिम आक्रामकों से अपनी पवित्रता की रक्षा करने
के लिये अनेक बार सती हो गयी है। जगत् में सबसे
अधिक महिलाएँ मेवाड़ में सती हुई हैं। यहाँ सती के
स्मारक बिखरे पड़े हैं। मुख्यतः प्रवेश द्वारों पर जहां उनके
पति शत्रुओं से लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए थे।
चित्तौर दुर्ग में रानी पद्मिनी सहस्रो महिलाओ के साथ
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय जिस भूश्याक
पर सती हुई थी वहीं मैंने अपनी आँखों से देखा है कि
पत्थर अग्नि ज्वाला में फट गये हैं तथा धूयें के काले
चिन्ह वर्तमान हैं।
ब्रिटिशराज भारत में स्थापित होने के पश्चात्
लार्ड विलियम बैण्टिक ने चार दिसम्बर सन् १८२० ई०
को सती तथा सती होने के सहायक होने वालों को
दण्डनीय घोषित कर सती प्रथा को अवैधानिक कार्य
करार दिया था। उस समय से यह प्रथा बंद हो
गयी है। तथापि कभी न कभी किसी महिला के सती
होने का समाचार प्राप्त होता रहता है।
तथापि सन् १८३९ ई० में पंजाब के सिख
राजा रणजीत सिंह के साथ उनकी ३६ विधवाएँ
सती हो गयी थी। केवल रानी जिन्दा अपने छोटे
बच्चे के लालन पालन करने के व्याज से सती न
हो सकी थी।
सन् १८२१ ई० में जिस वर्ष सती सम्बन्धी
कानून बना ५७५ विधवायेँ बंगाल और केवल
कलकत्ता की सीमा में ३१०, स्त्रियां सती हो गयी
थी। उनमें १०१ साठ वर्ष; २२६ चालीस से साठ वर्ष;
२०८ बीस से चालीस वर्ष तथा ३२ महिलायें बीस
वर्ष उम्र तक की थी।
सन् १७७७ ई० में राणा जंगबहादुर की पिता
के साथ नेपाल में उनकी अनेक रानियां सती हो
गयी थी। नेपाल में यह प्रथा बीसवी शताब्दी के
प्रारम्भ तक दिखायी पड़ती है।
निस्सन्देह विश्व की अनेक जातियों के इतिहास
इस प्रथा के साक्षी हैं। महान् व्यक्तियों की चिता