राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ राजतरंगिणी
सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् ।
स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥
५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को
लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी' नाम से कहते है।
के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र,
अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा
जीते जी कब्र के साथ गाड़ दिये जाते थे।
ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम-
र्थन सती प्रथा के पक्ष में लिया जाता है। किन्तु
वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है।
भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं
लिखा है।
आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु
प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके
साथ प्राण त्याग दी है। जर्मनी के अधिनायक
हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा
ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त में आत्म हत्या
की थी। दोनों का शव एक साथ एक ही स्थान
पर फूंका गया था।
इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो
मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी। उनके
साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी
के साथ ही मरना पसन्द किया था। भावना सती
प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार
की है।
५६ (३) नलिन: कल्हण ने चिता की
ज्वाला को उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में
नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के
लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतरया उसका लेप
करते हैं। कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस
प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है।
कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल-
प्रद बताया है। रानी के विरह ज्वर की उष्णता
नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद
'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५७ (१) वाक्पुष्टाटवीः वाक्पुष्टा अटवी
कहां हैं। इसका पता नहीं चलता। जोनराज ने
वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर)
के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरिगुह्वर
में एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे
अलाउद्दीन का सामना हुआ था। अतएव यह स्थान
किसी पर्वत के समीप रहा होगा। जोनराज ने
वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक
३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस
स्थान का महत्त्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस
घटना की शेष रह गयी थी।
राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोलारमाददन् ।
योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥
पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान सुहृ-
नर वाव परगना में वुट्टर ग्राम होना चाहिए। इस
स्थान पर गुलाव गढ़ दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर
पहुंचते हैं। श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित-
म्बर सन् १८९१ में की थी। किन्तु वहाँ पर
उन्हें स्थानीय लोगों में उक्त कथा के विषय में कुछ
जानकारी नहीं मिल सकी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापवागता' का पाठभेद
'नानागतरथागता' मिलता है।