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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 537

४०२ राजतरंगिणी
वर्षैः षट्त्रिंशता शान्ते पत्यौ विरहजो ज्वरः ।
तत्यजे ज्वलनज्वालानलिनप्रच्छदे तया ॥ ५६ ॥
छत्तीस वर्षों के साथ पति के गत हो जाने पर, उसने विरह ज्वर को अग्नि की ज्वाला
रूपी नलिन२ प्रच्छद पर त्याग दिया।

नाम कँमूह है। यह आदविन परगना में एक बड़ा
गाँव है। विशोका नदी के वाम पश्चिम तट पर
स्थित है। ग्राम की सबसे बड़ी मुस्लिम जियारत
के समीप सितम्बर सन् १८९५ ई० में थीस्टीन को
मन्दिर के भग्नावशेष के बड़े पत्थर दिखाई पड़े थे।
विजयेश्वर से दक्षिण दिशा में लगभग ७ मील
दूर स्थित है। इसके पूर्व विशाका नदी, पश्चिम में
तरीगाम, वचरू, उत्तर में ब्रजल्रू और दक्षिण में
छोटा नाला है।
(२) रामुष : वर्तमान ग्राम सुपियान और
श्रीनगर की मुख्य सड़क पर मध्य मार्ग में रामुह
नाम से स्थित है। कुछ समय पहले दर ब्राह्मणों
को यह जागीर थी। यह श्रीनगर का प्रसिद्ध ब्राह्मण
वंश था। अक्तूबर सन् १८९१ ई० में थीस्टीन को
ग्राम के नाग के समीप बहुत सी प्राचीन मूर्तियाँ
मिली थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में इस ग्राम का
पुनः वर्णन तरंग ८ श्लोक २८१३ में किया है।
यह स्थान छोटी नदी रामषू के पश्चिम अर्थात्
वाम तट पर है। यह नदी उत्पलपुर के समीप
वितस्ता में मिल जाती है। दक्षिण में मीरगुन्ड
उत्तर में पोरगपुर, पश्चिम में चरार पड़ता है।
पूर्व में नदी पर मितरगम, तथा जेगम अर्थात्
जेगार है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५६ में 'ज्वलन' का पाठ भेद
'दलन' मिलता है।
५६ (१) अग्नि ज्वाला : रानी का राजा के
साथ अथवा पत्नी का पति के साथ सती होने का
यह सर्व प्रथम उदाहरण राजतरंगिणी में प्राप्त होता
है। कश्मीर के इतिहास में जहाँ तक अध्ययन कर

सका हूँ यह सप्रमाणिक प्रथम उदाहरण है। इसके
पूर्व राजाओं के साथ रानियों तथा किसी और दूसरी
महिला के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता।
कश्मीर में सती प्रथा का आरम्भ एक प्रकार से यही
से होता है। यह समस्त हिन्दू, मुसलिम तथा लार्ड
विलियम वैंटिंग के शासन के समय तक भारत में
चलता रहा।
सम्राट् अकबर ने सती प्रथा को गैर कानूनी
ठहराया था। राजाज्ञा से बन्द कर दिया था।
राजा जलोक ने स्वेच्छया सपत्नीक स्वर्गारोहण
किया था। अतएव उसे सती प्रथा का कश्मीर में
आरम्भ काल कहना उचित नहीं है।
वैदिक काल में सती प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं
मिलता। यह विषय अत्यन्त विवादास्पद है। वेद
सती प्रथा को मान्यता देता है या नहीं। मैने
अपनी पुस्तक 'वेद क्या' लिखते समय ऋग्वेद का
पूरा अध्ययन किया परन्तु मुझे कही सती प्रथा का
स्पष्ट उदाहरण नही मिला।
एक प्रथा निसन्देह वैदिक काल में प्रचलित थी।
दिवंगत पति के साथ विधवा चिता के समीप जाती
थी। कहीं-कहीं उदाहरण मिलता है। शव के
साथ भी जाती थी। तत्पश्चात् मृत व्यक्ति का भाई
अथवा अन्य सम्बन्धी उसे उठाता था। साथ लोटा
लाता था। विवाह कर लेता था। आज भी पंजाब
के जाटों में यह प्रथा प्रचलित है। छोटा भाई बड़े
भाई की विधवा स्त्री को स्त्रीवत् रख लेता है।
अनेक जातियों में यह प्रथा अभी तक प्रचलित है।
देवी पार्वती सती रूप से दक्ष यज्ञ में प्राण दे
दी थी। सती होने के पश्चात् वह उमा हो गयी।
इससे सती नाम तथा सती होने की महत्ता बढ़ गयी।