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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 984 में से

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पृष्ठ 547

४१० राजतरंगिणी
निवारितप्रवेशोऽथ सकोपस्तमहेतुकम् ।
निनाय हृतसर्वस्वं यावदायुर्र्दारिद्र्ताम् ॥ ६८ ॥
६८. उस कुपित राजा ने मन्त्री का प्रवेश निषिद्ध कर दिया१। और निष्कारण
सर्वस्व हरण कर उसे यावज्जीवन के लिये दरिद्र बना दिया ।
तस्य भूपतिविद्वेषग्रीष्मोष्मपरिशोषिणः ।
आप्याय्यं राजपुरुषा वार्तयाऽपि न चक्रिरे ॥ ६६ ॥
६९. भूपति के विद्वेष रूपी ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से परिशोषित उसे, राजपुरुषों ने वार्ता
से भी सन्तुष्ट नहीं किया ।
गिरं गभीरो गृह्णाति क्ष्माभृद्यावत्तदग्रगाः ।
उक्तानुवादिनस्ताम्व्यक्तं प्रतिरवा इव ॥ ७० ॥
७०. जब१ गम्भीर राजा कुछ कहता है तो, उसी समय उक्ति की पुनरुक्ति करने वाले
उसके अग्रगामी (राजा के साथ आगे चलने वाले चाटुकार) प्रतिध्वनि सदृश शब्द
करते हैं ।
स तु राजविरुद्धत्वदारिद्र्याभ्यां न विव्यथे ।
गतप्रत्यूहया प्रीतः प्राप्तया हरसेवया ॥ ७१ ॥
७१. समुपलब्ध निर्विघ्न हर सेवा से प्रसन्न वह (सन्धिमति) राजा की विरुद्धता
एवं दारिद्र्य से दुःखी नहीं हुआ ।
किया है । मैने भी दोनो श्लोको का अनुवाद अलग किन्तु काम नहीं कर सकता था । राजा की अकृपा
हो दिया है । इसमें अर्थ समझने मे कठिनाई का यह प्रतीक था ।
नहीं होती । राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४५वां श्लोक है ।
पाठभेद : ७० ( १ ) इसका द्वितीय अर्थ यह होता है—
श्लोक संख्या ६८ में 'सकोपस्त' का पाठभेद 'जब गम्भीर पर्वत ध्वनि प्राप्त करता है तो उसके
'स कोपात्त' मिलता है । पार्श्ववती प्रतिध्वनि के रूप में स्पष्ट दोहरा देते हैं ।"
पादटिप्पणियाँ : अग्रगा का अर्थ पर्वत के सम्मुख स्थित पहाड़
६८ (१) प्रवेश निषिद्ध—देशी राज्यों में से भी होता है । पर्वत से उठती ध्वनि को सम्मुख
यह प्रथा भारतीय राज्यो के विलय पूर्व ( १६४७- स्थित पहाड़ी दोहरा देती है अर्थात् ध्वनि को प्रति-
४८ ) तक जारी थी । इसे 'ड्योढ़ी बन्द' करना ध्वनित करती है । अग्रग का अर्थ मार्गदर्शक भी
कहते थे । राजप्रासाद के ड्योढ़ी [ देहली ] के होता है ।
भीतर प्रवेश नहीं किया जा सकता था । राजस्थान क्ष्माभृत् का अर्थ पर्वत तथा राजा दोनों
में यह प्रथा दूसरे प्रकार मे प्रचलित थी । यदि राजा होता है ।
अप्रसन्न होता था तो आज्ञा दे देता था 'घर बैठो' । पाठभेद :
घर मे राज्य कर्मचारी रहता था । वेतन पाता था । श्लोक संख्या ७१ में 'दारिद्र्याभ्यां' का 'दारि-