सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 535

३९८ राजतरंगिणी
राजन्प्रजानां कुकृतैः कोऽयं मतिविपर्ययः ।
येनेतर इव स्वैरमधीरोचितमीहसे ॥४५॥
४५. 'हे राजन् ! प्रजाओं की कुकृतियों से यह कौन सा मतिविपर्यय हो गया है ?
जिससे इतर जन की तरह अधीरोचित स्वेच्छा-वृत्ति की कामना कर रहे हैं ?
यद्यसाध्यानि दुःखानि छेतुं न प्रहविष्णुता ।
तन्महीपाल महतां महत्त्वस्य किमङ्कनम् ॥४६॥
४६. हे महीपाल ! असाध्य दुःखों को दूर करने के लिये, यदि असमर्थता है, तो
बड़े लोगों के महत्त्व का चिह्न ही क्या ?
कः शक्रः कतमः स्रष्टा वराकः कतमो यमः ।
सत्यव्रतानां भूपानां कर्तुं शासनलङ्घनम् ॥४७॥
४७. 'इन्द्र' कौन है ? स्रष्टा$^२$ कौन-? बेचारा यम$^३$ कौन-? जो कि सत्यव्रती
नृपों के शासन का उल्लंघन कर सके ?
श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृतैः' का पाठभेद
'सुकृत्यैः' मिलता है ।
श्लोक संख्या ४७ में 'भूपानां' का 'भूतानां'
तथा 'शासनलङ्घनम्' का पाठभेद 'शासनलङ्घनाम्'
तथा 'न प्रमविष्णुता' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४७ (१) इन्द्र : इन्द्र का सर्वाधिक दर्शन वेद
में मिलता है । वैदिक आर्यों के ओजपूर्ण देवता इन्द्र
हैं । इन्द्र ने मेघों को विदीर्ण किया था । इनके लिये
त्वष्टा ने वज्र बनाया था । इन्द्र ने स्रष्टा, सूर्य,
द्यु तथा उषस को उत्पन्न किया है । वृत्रासुर का वध
किया है । जल एवं नदियां प्रवाहित किया है ।
गायों तथा सोम को जीता है । दस्यु का संलक्षण
किया है । ऋग्वेद (१:३३ : १४-१५) ।
साम गानसे इन्द्र को स्फूर्ति प्राप्त होती है ।
आंगिरस तथा इन्द्र एक साथ रहते हैं ।
(सा० १ : ११) वृहि को मार कर सात
सिन्धु को मुक्त किया था । (ऋ०: २: १२)
इन्द्र की उपासना न करने वालों को अनिन्द्र कहा
जाता है । उनकी निन्दा की गयी है । (ऋ०७:१२:
१६) ।
प्रत्येक मन्वन्तरों में इन्द्र की कल्पना की गयी
है। इन्द्र भूः, भुवः एवं स्वः तीनों लोकों का
अधिपति है । एक सौ यज्ञ करने पर इन्द्रत्व की प्राप्ति
होती है। यद्यपि इनके मन्त्रणा दायक हैं । इन्द्र की
पौराणिक कल्पनायें परस्पर भिन्न है । इनका उल्लेख
गरुड़, वृत्त वध, त्रिपुर, सुकर्माख्यान, यज्ञविर्भाग
महताख्यान, सागर मंथन, वृत्रोत्पत्ति, ब्रह्म-
हत्या, मुच्वित्त, पुरंजय वाहन, जयापजय, यज्ञ,
हवनादि, के सन्दर्भ में आता है । इन्द्र के सम्बन्ध में
भारतीय साहित्य में इतनी गाथायें हैं कि उनका
संकलन स्वतः एक विशाल ग्रन्थ का रूप ले लेगा ।
(२) स्रष्टा:—सृष्टि के रचयिता, सर्जन एवं
निर्माण करने के अर्थ में स्रष्टा शब्द का प्रयोग किया
जाता है । यह शब्द ब्रह्मा के लिये प्रयुक्त किया
गया है । परन्तु अनेक स्थलों पर ब्रह्मा विष्णु तथा
शिव के लिये एक साथ प्रयुक्त किया गया है।
महाभारत के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से देवता,
ऋषि, नाग एवं असुरों का निर्माण हुआ था । उन चारों