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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

२४० राजतरंगिणी
अथ निष्कण्टको राजा कण्टकोत्साग्रहारदः ।
अभीर्बभूवाभिमन्युः शतमन्युरिवापरः ॥ १७४ ॥
१७४. तत्पश्चात् निर्भीक एवं निष्कंटक१ तथा कण्टकोत्स२ अग्रहार दाता द्वितीय इन्द्र
तुल्य अभिमन्यु३ राजा हुआ ।
से मुक्त होता है । अतएव उसके अभिधान निमित्त
शून्य शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने किया है ।
आर्य नागार्जुन के नाम से अनेक वैद्यक,
रसायन विद्या एवं तन्त्र के ग्रन्थ उपलब्ध हैं ।
दार्शनिक नागार्जुन को तान्त्रिक नागार्जुन से
अनेक विद्वान् भिन्न मानते हैं । इस भिन्नता को
प्रदर्शित करने के लिये तान्त्रिक नागार्जुन को सिद्ध
नागार्जुन के नाम से अभिहित किया जाता है ।
नागार्जुन का काल द्वितीय शती के उत्तरार्ध तथा
सिद्ध नागार्जुन का सातवी शती के समीप
रखा जाता है ।
आयुर्वेदाचार्य नागार्जुन सिद्धों की परम्परा
में हुए हैं । इनका समय आठवीं तथा नवी
शताब्दी है । प्रबन्ध चिन्तामणि से पता चलता
है कि नागार्जुन पादलिप्त सूरि के शिष्य है ।
इस पुस्तक के अनुसार पारद से स्वर्ण बनाने
में उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । भारत में
इन मुख्य तीनो नागार्जुनो के कार्य लेखन, गुण
एवं धर्म में अन्तर है । उन्हे प्राय मिलाकर
एक व्यक्ति मान लिया जाता है । बौद्ध दर्शन
माध्यमिककारिकाकार, आर्य नागार्जुन सबसे
पूर्व नागार्जुन नामक व्यक्ति हुए थे । वे अन्य
इसी नाम के प्रसिद्ध व्यक्तियो से भिन्न थे ।
आधुनिक युग में नागार्जुन के दर्शन का
पुनर्जागरण हुआ है । जापान के वर्तमान सामाजिक
जीवन मुख्यतया बौद्ध धर्मानुयायियों में इसने पुनः
स्थान प्राप्त किया है ।
कल्हण नागार्जुन के विषय में यह सत्य ही
लिखता है कि वह कुशान राजाओं के समय
हुआ था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७४ 'कण्टकोत्साम्र' का 'कण्ट-
कोत्सर्ग' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७४ (१) निष्कंटक : का अर्थ कंटकहीन होता
है । राजाओं के अनेक कंटक होते हैं । राज
मार्ग कण्टकाकीर्ण कहा गया है । राजा के पार्श्व
में रहने वाले, उसके दायाद, कुटुम्बों तथा सम्बन्धी
प्रथम कंटक होते हैं । उत्तराधिकार किंवा राजा
के पश्चात् राज्य, पद, सम्पत्ति आदि पाने के
इच्छुक राजा के सम्बन्धी अशुभ कामना करते हैं ।
कब राजा मरे और वे कब स्वयं राजा बन बैठें ।
यह मनोवृत्ति राजाओं के विरुद्ध षड्यन्त्र, विप्लव
गृहयुद्ध तथा हत्याओ में परिणत होता रहती है ।
महत्त्वाकांक्षी सेनापति तथा अमात्य जो राज्य-
लिप्सा से लिप्त होते हैं, अथवा स्वयं राज्य लेना
चाहते हैं इसी श्रेणी में आते हैं । कौटिल्य ने
इसीलिये राजा का एक महत्वपूर्ण कार्य कंटक-
शोधन कहा है ।
(२) कण्टकोत्स : वोरू परगना में यह
कन्कोर ग्राम है । हुरवलितर ग्राम से बहुत दूर
नहीं है ।
(३) अभिमन्यु : आईने अकबरी में नाम
अबेह्मुन दिया गया है । हसन अभिमन्यु के विषय
में लिखा है । राजा अभिमन्यु ने १८३४ क०
में लोगो की मरजी से ताज हुकूमत सर पर
रखकर पहला काम यह किया कि, बुध मजहब
को कत्तैयन जड से उखाड दिया । इन दिनों
चन्दर आचारज नाम एक निहायत ही फाजिल
बरहमन था । उसने हिन्दुस्तान में महावाश

प्रथम तरंग २४१
स्वनामाङ्कं शशाङ्काङ्कशेखरं विरचय्य सः ।
परार्ध्यविभवं श्रीमानभिमन्युपुरं व्यधात् ॥ १७५ ॥
१७५. इस श्रीमान् राजा ने अपने नाम पर परम वैभवशाली अभिमन्युपुर¹ नगर बसाकर
उसमें उस नगर का आभूषण शशांकांकशेखर² मन्दिर का निर्माण कराया ।


(महाभाष्य) किताब अपने हमराह लाकर यहाँ
के बरहगनों को तालीम दी और अपनी खुद
तसीफ करदा किताब 'चन्द व्याकरण' यहाँ पर
रायज कर दी । चूंकि (४३) नागसेन की
तालीम और परवार से वहाँ के बहुत से लोग
अपने मजहब बरगस्तर हो गये थे और बुध
मजहब अख्तियार कर लिये थे अपने खादती
अशगाल छोड़कर बड़े कामों में मुवतिला हो गये
थे इसलिये उसकी नहूसत से इस मुल्क में
बकसरत वरफ बरसना शुरू हो गयी । यहां तक कि
यहाँ के बादशाह मौसम सरमा में पंजाब और
(४४) वगैरह की तरफ हर साल जाने लगे ।
चन्दर आचारज हुस्न इसनाक और तालिफ कलूब
से काम लेकर लोगो को अपने पुराने बाप-दादो
के मजहब पर कायम रहने को तलकीम करता ।
इस वजह से यहाँ के बहुत से लोगों ने बुध
मजहब छोड़कर अपना पुराना आवाई मजहब
अख्तयार कर लिया । नीलमत पुराण किताब
पर अउसरे नव अमल पैदा होकर साबिक् रवाज
के मुताबिक नजर व खैरात करने लगे । इसकी
बरकत से बरफ की मुसीबत से निजात पाई ।
राजा अभिमन्यु ने परगना वागल में मौजा आम-
पुरा आवाद करके वरहगनों को बख्श दिया ।
चन्दर आचारज को खास एक जागीर देकर ताजीम
और तकरीम से उसकी परवरिश की । यह राजा
बौद्ध मजहब के पीरो के साथ मजलिसा मुना-
जिरह मुनकद्द कराता था । इसमे इस मजहब के
लोगों को बड़ी खराबी का सामना करना पड़ता था ।
३३ साल हकूमत करके इस दुनिया को छोड़ दिया ।


पुराण चश्मा नीलनाग से निकाली है । या खुद
तसनीफ की है । फकत अल्लाह ज्यादा जानता है ।
(पृष्ठ ४४)

पुरातन इतिहासकार छविलाकर की लुप्त
राजाओ की तालिका में यह अन्तिम नाम है ।
कल्हण ने इस राजा का वर्णन छविलाकर के
वर्णन के आधार पर किया है ।

अभिमन्यु कौन था । किस वंश का था ।
किस प्रकार कश्मीर का राजा हुआ इस पर
कल्हण ने कोई प्रकाश नहीं डाला है । कुशान
राजा वसुदेव की शक्ति क्षीण हो गयी थी । उसका
राज्य मथुरा मण्डल के समीप सीमित रह गया
था । नाग जाति के उपद्रवों के कारण कुशान
शक्तिहीन होकर अपना अधिकांश राज्य खो बैठे
थे । कल्हण ने हविष्क के पश्चात् कुशानवंशीय
और किसी राजा का वर्णन नहीं किया है । कुशान
राजाओ के प्रति किसी प्रबल विद्रोह एवं संघर्ष
की ओर कल्हण संकेत नहीं करता । निर्विवाद
मालूम होता है । वासुदेव तथा उसके पश्चात् के
राजा निर्बलता के कारण कनिष्क के साम्राज्य
को सम्हाल सकने में असमर्थ रहे । केन्द्रीय शक्ति
के क्षीण होने के कारण शासन सूत्र शिथिल
होकर टूट गया । प्रदेश तथा विजित भूखण्ड
स्वतन्त्र हो गये । निस्सन्देह यही प्रक्रिया कश्मीर
में हुई होगी ।

कश्मीर की व्यवस्था कुशान राजा न कर
सके । पंजाब तथा मथुरा के समीप उसकी शक्ति
नाग जाति के विद्रोह को दबाने में लग गयी ।
कश्मीर जैसे दूर पर्वतीय प्रदेश से सम्बन्ध विच्छेद
हो जाना स्वाभाविक था ।


गुलजार कश्मीर का मुसनिक लिखता है कि
यही चन्दर आचारज है जिसने किताब नीलमत
३१

२४२ राजतरंगिणी
चन्द्राचार्यादिभिर्लब्ध्वाऽऽदेशं तस्मात्तदाऽगमम्।
प्रवर्तितं महाभाष्यं स्वं च व्याकरणं कृतम् ॥ १७६ ॥
१७६. चन्द्राचार्यादि १ ने राजा के आदेश पर उस समय लुप्तप्राय भाष्य २ का जनता में
प्रचार किया । साथ ही साथ उन्होंने अपने स्वरचित व्याकरण ३ का भी प्रचार किया ।

अभिमन्यु इस स्थिति से लाभ उठाकर या तो
स्वयं कश्मीर मण्डल का राजा हो गया होगा
अथवा कश्मीर की जनता ने उसके गुणों के कारण
शासन निमित्त राजा चुना होगा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७५ में 'नामाङ्क' का 'नामाङ्क।'
'नामाङ्क' और 'शशाङ्काङ्क' का 'शशाङ्कार्थ' पाठ-
भेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७५ (१) अभिमन्युपुर : यह श्रीनगर के
नैऋत्यकोण में चार मील दूर विमयन ग्राम है ।
रानी दिद्दा द्वारा बसाया गया अभिमन्युपुर जिसका
वर्णन राज० तरं० ६: २९९ में किया है दूसरा
ग्राम है । दोनों को एक ही अभिमन्युपुर नहीं
मानना चाहिए ।
(२) शशांकांकशेखर : शशांक का अर्थ शशि
या चन्द्रमा होता है । शेखर का अर्थ शिर का
आभूषण है । शिर पर धारण की जाने वाली
किरीट तथा पुष्पमाला है । भगवान् शिव का
शिरोभूषण चन्द्रमा है । अतएव शशांकशेखर शंकर
का नाम पड़ा है। कल्हण ने शशांकशेखर अर्थात्
शिव के मन्दिर की समानता नगर के अलंकार से
की है। शशांक जिस प्रकार शिव का अलंकार
है उसी प्रकार अभिमन्युपुर नगर का आभूषण
किंवा अलंकार शशांकशेखर का मन्दिर था ।
कल्हण का तात्पर्य यह मालूम होता है कि मन्दिर
इतना सुन्दर था कि यह नगर का आभूषण
मालूम होता था ।
कल्हण ने इस मन्दिर के माध्यम से यह कहने
का प्रयास किया है कि राजा शिवभक्त था । कुशान
राजाओं द्वारा प्रचलित बुद्धधर्म को राजाश्रय प्राप्त
नहीं था । राजाश्रय प्राप्त हो गया था । वे शिवभक्त
किंवा सनातनधर्मी थे । कश्मीर ने चार धार्मिक
क्रान्तियों का सामना तीन शताब्दियों के अन्दर किया
था । पहली धार्मिक क्रान्ति बुद्धधर्म प्रचार की अशोक
ने की थी। उसकी विरोधी दूसरी क्रान्ति जलोक
ने सनातन धर्म को चलाकर की । तीसरी क्रान्ति
कुशान राजाओं ने बुद्ध धर्म की पुनःप्रतिष्ठा तथा
राजाश्रय देकर की । सनातन धर्म पृष्ठ भाग में रह
गया । चौथी क्रान्ति राजा अभिमन्यु ने पुनः बौद्धधर्म
के स्थान पर सनातन धर्म को स्थापित कर की
थी । एक प्रकार से सनातन तथा बौद्धधर्म के अनुयायी
राजा अपने धर्मों का प्रचार तथा राजाश्रय देते रहे ।
एक ही कश्मीर मण्डल जैसे लघु स्थान में धार्मिक
क्रान्तियां एक के पश्चात् दूसरी होती रही । परन्तु ये
राजविप्लव का रूप नहीं ले सकी । विचार आते रहे ।
जाते रहे । जनता समयानुकूल उनको स्वीकार तथा
अस्वीकार करती रही ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७६ में ' लब्ध्वाऽऽदेशं ' वा
'लब्ध्वादेश'; 'लब्ध्वादेशान्' 'लब्ध्यादेशं' 'लब्धादेशात्'
तथा 'स्वं च' का 'चन्द्र' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७६ (१) चन्द्राचार्य : इनका नाम चन्द्रगोमी
था । चन्द्राचार्य एवं चन्द्र नाम से इनकी ख्याति थी ।
इन्होंने पाणिनीय व्याकरण के आधार पर अपने
एक और व्याकरण की रचना की । उसमे 'स्वर
वैदिको' प्रकरण नहीं मिलता । इस आधार पर
विद्वानों का मत है कि ये बौद्ध थे । क्योकि बौद्ध
वेद को मान्यता नहीं देते ।

प्रथम तरंग २...

[बायाँ स्तम्भ]
इनका कहाँ जन्म हुआ था अनिश्चित है। कुछ
विद्वानों का मत है कि 'व तथा ब' में इन्होंने भेद
नहीं किया है। अन्तस्थ 'व'कारान्त पदों को भी
पवर्गोय 'ब'कारान्त प्रकरण में पढ़ा है। अतएव
कहा जाता है कि वे वंग (बंगाल) निवासी थे।
कारण यह दिया जाता है कि 'वंग' प्रदेशीय लोगों
में यह उच्चारण दोष पाया जाता है। इनके वंश
का विशेष परिचय नहीं मिलता है।
(२) महाभाष्य : यहाँ पतंजलि के महा-
भाष्य से अभिप्राय है। वह दूसरी शताब्दी ईसापूर्व
में हुआ था। पाणिनि पर उसने महाभाष्य लिखा
है। राजा जयापीड के समय (रा० त० ४४८८) में
इसी प्रकार का प्रयास किया गया था। राजा अभि-
मन्यु ने व्याकरण शास्त्र के लुप्त हो जाने के कारण
साहित्य को नवजीवन तथा एकरूपता देने के
लिये चन्द्राचार्य जिन्हें चन्द्रगोभिन भी कहा जाता
है। तथा अन्य विद्वानों को नियुक्त किया था। मालूम
होता है। उस समय काश्मीर में व्याकरणाचार्यों की
कमी हो गयी थी। शिक्षको के अभाव में उसने चन्द्रा-
चार्यादि की सहायता द्वारा लुप्तप्राय ज्ञान के पुनः
जीवन निमित्त प्रयास किया था। जयापीड के समय
में भी पतंजलि के महाभाष्य के प्रचार निमित्त पुनः
प्रयास होता दिखायी पड़ता है।
हिन्दू राजाओं के अतिरिक्त कश्मीर का सुलतान
बडशाह जैनुल आबदीन जो स्वयं संस्कृत का ज्ञाता
था। उसके निर्देश पर रामानन्द ने महाभाष्य पर
टीका लिखी थी। युद्धभट्ट स्वयं महाराष्ट्र में अथ-
र्ववेद के ज्ञानार्जन निमित्त गया था। वह बादशाह के
पास न्यायाधीश शिवाभट्ट की प्रेरणा पर भेजा गया
था। लुप्तप्राय वेद का ज्ञान प्राप्त कर, उसका प्रचार
कश्मीर में आकर करें। लगभग ५०० वर्ष पश्चात्
स्वर्गीय रणजीत सीताराम पण्डित के भाई स्वर्गीय श्री
एस. पी. पंडित को जब अथर्ववेद की पाण्डुलिपि
दक्षिण में प्राप्त नहीं हो सकी, तो कश्मीरी पाण्डु-
लिपियों को उन्होंने अपना आधार माना था।

[दायाँ स्तम्भ]
कल्हण ने पतंजलि का नाम महाभाष्य के साथ
नहीं लिखा है। परन्तु राजतरंगिणी के गवेषक
विद्वानो का मत है कि यहाँ कल्हण का तात्पर्य
पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य से ही है। उन्हें योग
सूत्र, चरक संहिता तथा व्याकरण महाभाष्य का
रचनाकार माना जाता है। परन्तु प्रथम दोनों
ग्रन्थ उपलब्ध है। तृतीय का लेखक भिन्न व्यक्ति
है इस प्रकार का मत कुछ विद्वानों ने प्रकट किया
है। परन्तु सत्रहवीं शताब्दी के वैयाकरण नागोजी
किंवा नागेश भट्ट ने अपने व्याकरण ग्रन्थ मंजूषायां
'इति चरके पतंजलि:' शब्द का प्रयोग किया है
तथापि आधुनिक विद्वान् चरक संहिता का संग्रह
योग सूत्रकार पतंजलि को नहीं मानते।
महाभाष्यकार पतंजलि का काल नितान्त
निश्चयात्मक रूप से निश्चित नहीं हो सका है। शुङ्ग
वंशीय राजा पुष्यमित्र के श्रौतयज्ञ में, कहा जाता
है, पतंजलि पुरोहित थे। 'इह पुष्यमित्रं याजयामः'
महाभाष्य से सिद्ध होता है। यवनों ने साकेत और
माध्यमिका पर आक्रमण किया था। पतंजलि उस
समय वर्तमान थे। इस प्रकार महाभाष्य तथा
पतंजलि दोनो का समय ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी
ठहरता है। इस आधार पर विद्वानो का मत है कि
ईसा पूर्व २०० वर्ष से १४० वर्ष के मध्य महाभाष्य
की रचना हुई थी।
महाभाष्य में 'मुनित्रय' को विशेष महत्त्व दिया
गया है। वह मुनित्रय अष्टाध्यायीकार पाणिनि,
वार्तिककार कात्यायन, तथा महाभाष्यकार पतंजलि
है। अष्टाध्यायी पर कात्यायन ने वार्तिकों की
रचना कर व्याकरण को अधिक व्यापक, पूर्ण, सुगम एवं
स्पष्ट किया है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य द्वारा
वातिको की व्याख्या को और आगे बढ़ाया है तथा
उसमें उन सूत्रों को भी विवेचना की गयी है जिन
पर कात्यायन ने लेखनी नहीं उठायी थी।
'वाक्यपदीय' कार भर्तृहरि ने महाभाष्य की
रचना का हेतु उपस्थित किया है। उनका मत है

२४४ राजतरंगिणी
तस्मिन्नवसरे बौद्धा देशे प्रबलतां ययुः ।
नागार्जुनेन सुधिया बोधिसत्त्वेन पालिताः ॥ १७७ ॥
१७७. सुधी बोधिसत्त्व नागार्जुन१ द्वारा पालित बौद्ध उस समय देश में प्रबल हो गये थे।
कि जिस समय व्याकरण के विद्वान् संक्षेप रुचि तथा
अल्पविद्यापरिग्रही हो गये तो 'संग्रह' ग्रन्थ का
सन्ध्या काल आ गया। उस समय तीर्थदर्शी मुनि
पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की। उसमें न्याय
बीजों का भी निबन्धन है। इससे स्पष्ट होता है।
'संग्रह' ग्रन्थ में व्याकरण सम्बन्धी अत्यन्त विस्तृत
विवेचन था।
महाभाष्य की शैली पाण्डित्यपूर्ण है। व्याख्या
शैली सरल है। गद्य अत्यन्त सरल है। अकृत्रिम है।
स्पष्ट है। धारा प्रवाहिक है। भर्तृहरि की टीका का
अधिकांश अबतक अनुपलब्ध है। विवादास्पद विषयों
का योग्यतापूर्वक निर्वाह किया है। पहले पूर्व पक्ष
को उपस्थित कर उसके पश्चात् उत्तर पक्ष को
उपस्थित किया है। अनन्तर उसने अपना मत प्रकट
किया है। यह शैली कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में भी
अपनायी है। महाभाष्य में दार्शनिक दृष्टि के साथ ही
सांख्य शब्दनित्यवाद किंवा शब्द ब्रह्मवाद का निर्देश
किया गया है। 'वाक्यपदीय' में भर्तृहरि ने इस पर
विस्तृत व्याख्या की है।
कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस
समय उपयुक्त तथा विज्ञ अध्यापकों तथा शुद्ध
पाठ के अभाव में उसका व्यवहार कम हो गया
था । शनैः शनैः उसे लोग भूल गये थे ।
(तरंग ४ : ४८८) राजा जयापीड के समय में
कल्हण पुनः वर्णन करता है कि महाभाष्य का
प्रायः लोप हो गया था । राजा ने कश्मीर
मण्डल के बाहर से विद्वानों को बुलाकर उन्हें
कश्मीर में रखा। महाभाष्य का पठन-पाठन पुनः
आरम्भ हुआ था।
(३) चान्द्र व्याकरण के (१:२:२६) के
'अजयत् जर्त्तो हूणान्' को परिवर्तित कर कुछ विद्वानों
ने 'जर्त्तो' के स्थान पर 'गुप्तो' कर दिया इसमें
अभिमन्यु का काल गुप्त सम्राटों के पश्चात् सिद्ध
करते हैं। किन्तु 'जर्त' शब्द का उल्लेख महाभारत
में प्राप्त है। यह शब्द राजा के लिये भी प्रयुक्त
किया गया है। उससे प्रकट होता है कि जर्त ने हूणों
को पराजित किया था। अतएव अभिमन्यु का काल
प्राचीन प्रतीत होता है। राजतरंगिणी में कल्हण
ने जो समय दिया है वह चन्द्राचार्य के वास्तविक
समय के बहुत निकट है।
१७७ (१) बोधिसत्त्व नागार्जुन : कल्हण
ने यहाँ पर नागार्जुन के लिये पुनः बोधिसत्त्व शब्द
का प्रयोग किया है। बौद्ध गण नागार्जुन द्वारा
पालित अर्थात् कश्मीर मण्डल में रक्षित थे। उनका
किसी प्रकार अनिष्ट नहीं हो सकता था। बोधिसत्त्व
स्वतः प्रबोधि प्राप्त के पश्चात् बुद्ध हो जाते हैं।
नागार्जुन के आध्यात्मिक शक्ति का उल्लेख यहाँ
पर कल्हण करता है। नागार्जुन यद्यपि कश्मीर
मण्डल के राजा नहीं थे परन्तु श्लोक संख्या १७७
में उसे भूमीश्वर कहा है। राजा यद्यपि शिव
उपासक था परन्तु वह मालूम पड़ता है, बौद्धों का
विरोध करने में असमर्थ था।
भगवान् बुद्ध की पूजा कल्हण के समय तक
प्रचलित थी। बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का कल्हण
उल्लेख करता है। बारहवी शताब्दी सन् ११११ ई०
की हादोग्राम में एक शिलालेख मिलता है। वह बुद्ध
अवलोकितेश्वर की स्तुति से आरम्भ होता है। परि-
हासपुर में बोधिसत्त्व तथा एक बुद्ध की मूर्ति मिली
थी। हुएनसांग १०० तथा ओकुक (सन् ७५९ ई०)
८०० विहारों के होने का उल्लेख करता है। प्रताप
सिंह संग्रहालय श्रीनगर में बोधिसत्त्व पद्मपाणि की
एक मूर्ति रखी है।

प्रथम तरंग २४५
ते वादिनः पराजित्य वादेन निखिलान्बुधान् ।
क्रियां नीलपुराणोक्तामच्छिन्दन्नागमद्विषः ॥ १७८ ॥
१७८. आगम द्वेषी१ उन बौद्धों ने अपने विरोधी निखिल विद्वानों को वाद में परास्तकर२
नीलमत पुराणोक्त धार्मिक क्रियाओं को उच्छिन्न३ कर दिया ।
१७८ (१) आगम : शब्द का अर्थ लिखित
प्रमाण ज्ञान, परम्परा गत सिद्धान्त, शास्त्र किंवा
विधि, वेद तथा न्याय के चार प्रकार के प्रमाणों में
अन्तिम प्रमाण है ।
आगम शास्त्र साधारणतया तन्त्र शास्त्र के नाम
से प्रसिद्ध हैं । निगमागम शब्द का प्रयोग बहुत
होता है । निगम जिस प्रकार वेद है उसी प्रकार
आगम तन्त्र भी है । निगम कर्म, ज्ञान तथा उपासना
का स्वरूप बनाता है। आगम उनके उपायभूत
साधनों का वर्णन करता है। वाराही तन्त्र के
अनुसार आगम का सात लक्षण यथा-सृष्टि, प्रलय
देवार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट् कर्म तथा
साधन और ध्यान योग है। षट्कर्म,-शान्ति, वशी-
करण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण हैं।
महानिर्वाण तन्त्र के अनुसार प्राणी पवित्रतया
अपवित्र अर्थात् मेध्य तथा अमेध्य है । विचारों
से प्राय. हीन होते हैं । प्राणियों के कल्याणार्थ
शंकर ने पार्वती को आगमों का उपदेश स्वयं दिया था
'कलि आगम सम्मत' अर्थात् कलियुग में आगम की
पूजा पद्धति उपयोगी एवं लाभप्रद कही गयी है।
वेद में बहुदेववाद का बहुल है। उनकी
भिन्नता के कारण उनके तीन प्रकार हो गये हैं ।
वैष्णव आगम अर्थात् पांचरात्र और वैखानस
आगम एवं शैव आगम में पाशुपत, शैव सिद्धान्ती
तथा त्रिक । तीसरा शाक्त आगम है। द्वैत द्वैता-
द्वैत एवं अद्वैत दृष्टियों से भी तीन भेद माने गये है।
अनेक आगम वेद मूलक हैं। अनेक तन्त्रों पर
आगम का बाह्य प्रभाव भी लक्षित होता है। बौद्ध
धर्म ने वैदिक सिद्धान्त के विरुद्ध आवाज उठायी
थी । वेद एवं ब्राह्मणों की समालोचना से बौद्ध-
साहित्य भरा पड़ा है। बौद्धों की इसी मनोवृत्ति की
ओर संकेत करते हुए कल्हण ने बौद्धों को आगम
द्वेषी रूप में यहाँ चित्रित किया है।
शिव तथा त्रिक सूत्र के पूर्व भी कश्मीर
में आगम तन्त्र शास्त्र का अस्तित्व मिलता है ।
मालिनी, विजय, स्वच्छन्द, विज्ञान भैरव, आनन्द-
भैरव, उच्छुस्म भैरव, मृगेन्द्र, मातंग, नेत्र, नव
स्वास, स्वयंभू एवं रुद्रयामल रूप मिलते है ।
(२) वाद : वाद का अर्थ वाणी, शब्द, वचन,
कथन, वर्णन, निरूपण, वाद-विवाद, शास्त्रार्थ,
तथा खण्डन मण्डन होता है । वाद प्रतिवाद का
अर्थ झगड़ा-बहस आज कल होता है। कल्हण
ने यहाँ वाद शब्द शास्त्रार्थ के अर्थ में प्रयुक्त
किया है। पराजित शब्द के 'वादेन' के पूर्व रखने
से स्पष्ट हो जाता है कि बौद्धों ने शास्त्रार्थ में
तत्कालीन विद्वानों को परास्त किया था। बौद्धों
ने आगमों का खण्डन कर अपने मत का मण्डन
किया था ।
(३) उच्छिन्न : कल्हण बौद्धों की प्रबल
बुद्धिप्रबलता का यहाँ उल्लेख करता है। सभी
कश्मीर मण्डल के विद्वानों को बौद्धों ने शास्त्रार्थ में
पाण्डित्य, अकाट्य तर्क, एवं विद्वत्ता के कारण
परास्त कर दिया था। उनके धर्म प्रचार का इतना
गम्भीर प्रभाव पड़ा कि कश्मीर में नील मत विहित
धार्मिक संस्कार आदि समूल नष्ट हो गये। यह एक
सामाजिक क्रान्ति थी। उसने समाज के ढाँचे को
बदल दिया । लोग प्राचीन सनातनधर्मी परम्पराओं
को स्वतः त्याग दिये । राजा इस सामाजिक एवं
धार्मिक क्रान्ति में सम्मिलित नहीं था परन्तु बौद्धों
के अनुशासन, विचार तथा प्रचार के कारण धार्मिक
कृत्य स्वतः उच्छिन्न हो गये थे ।

२४६ राजतरंगिणी
मण्डले विप्लुताचारे विच्छिन्नबलिकर्मभिः ।
नागैर्जनक्षयश्चक्रे प्रभूतहिमवर्षिभिः ॥ १७६ ॥
१७६. जब उस मण्डल में आचार विलुप्त हो गये, बलिकर्म¹ विच्छिन्न हो गये तो नागों²
द्वारा की गई प्रभूत हिम³ वर्षा द्वारा जन क्षय होने लगा।
हिमान्यां बौद्धबाधाय पतन्त्यां प्रतिवत्सरम् ।
शीते दार्वाभिमारादौ षण्मासान्पार्थिवोऽवसत् ॥ १८० ॥
१८०. बौद्धों को बाधा पहुँचाने के लिये प्रति वर्ष हिम वर्षा होने लगी। अतएव राजा शीत
काल में छः मास तक दार्वाभिसार⁴ में निवास करने लगा।

१७२ (१) बलि कर्म : अनेक प्रकार के बलि
कर्म एवं संस्कार नील मत पुराण में विहित हैं।
बौद्धों के कारण बलि कर्म बन्द हो गया था। बौद्ध
नाग पूजा, मूर्ति पूजा तथा देव पूजा में उस
समय तक विश्वास नहीं करते थे।
पंच महा यज्ञों में पाँचवाँ बलि है। बलि
अर्थात् जीवों को अन्न दानादि से सन्तुष्ट करने का
नाम भूतयज्ञ है। बलि का दूसरा प्रकार
पशुओं का वध किंवा बलिदान है। बलि का
बलिदान काल में पूर्वाभिमुख तथा खड्गधारी बलि
देने वाले का मुख उत्तर दिशा की ओर रहना
चाहिए। 'वैश्वदेव' कर्म करने के काल में जो
अन्न भाग अलग रख दिया जाता है। उसे प्रय-
मोक्त बलि कहा जाता है। यह अन्न भाग देव
यज्ञ के लक्ष्यभूत देव के प्रति एवं जल, वृक्ष,
गृहपशु इत्यादि देवताओं को समर्पित किया जाता
है। बलि का अन्न भाग अग्नि में नहीं डाला जाता।
भूमि पर फेंक दिया जाता है।
(२) नाग : नाग पूजा कश्मीर में अत्यन्त
प्राचीन काल से प्रचलित थी। ऑनिस क्रोटस सम्राट्
सिकन्दर के साथ यूनान से भारत में आया था।
उसके लेख का उल्लेख स्ट्राबों ने किया है—दर्भा-
भिसार के राजा का दूत दो बड़े नागों का पालन-
पोषण करता था। इसी प्रकार तक्षशिला के राजा ने
एक बड़ा भारी नाग दिखाया था। उसे वह बड़े स्नेह
से खिलाता था। उसकी पूजा देवता तुल्य करता था।

आइने अकबरी में अबुल फजल लिखता है—
"कश्मीर में नाग पूजा सम्राट् अकबर के समय तक
होती रही है। यद्यपि वहाँ के रहने वाले प्रायः
मुसलमान हो गये थे। इस समय ७०० नाग मूर्तियाँ
कश्मीर के विभिन्न स्थानों में पूजी जाती हैं। अबुल
फजल ने यह उद्धरण आइने अकबरी में पुण्यभट्ट
से लेकर दिया है।
नीलमत पुराण में भगवान् विष्णु ने नाग पूजा
के प्रसंग में कहा है—
नागस्य यस्य ये स्थाने निवसिष्यन्ति मानवाः ।
ते तं संपूजयिष्यन्ति पुष्पधूपानुलेपनैः ॥
नैवेद्यैर्विविधैर्गन्धैः प्रेक्षादानैश्च शोभनैः ।
त्वयोक्तं च सदाचारं पालयिष्यन्ति ये जनाः ॥
२८९-२९०

    • +
      तस्मादस्य सदा पूजां बलिं च विधिना बुधः ।
      क्षिप्त्यात्तत्प्रियामस्थैरभ्यर्च्याऽसौ सदा मुदा ॥
      २९७
      (३) हिमपात : प्रतीत होता है कि बौद्धों के
      प्राबल्य के पश्चात् कश्मीर में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं
      जिनका कारण बौद्धों के सर थोपा गया। लगातार
      कई वर्षों तक अकाल पड़ता रहा। हिमपात इतना
      होने लगा कि लोग व्याकुल हो गये थे। चन्द्रदेव,
      एक ब्राह्मण नेता ने प्रचार आरम्भ कर दिया कि
      इन सब अनर्थों का मूल कारण बौद्धों का प्रचार

प्रथम तरंग २४७
तथा प्राचीन सनातन धर्म से लोगों का विरत होना
था । नाग देवतागण अपनी पूजा बन्द हो जाने के
कारण क्रुद्ध हो गये थे । हिमपात इतना भयंकर होने
लगा था कि राजा दार्वाभिसार (कश्मीर के दक्षिण-
पश्चिम रजौरी क्षेत्र में ) किंवा नौशेरा और पुंछ
में जहाँ कुछ शीत कम पड़ती थी निवास करने लगा ।
१८० ( १ ) दार्वाभिसार : दार्वाभिसार का
उल्लेख पुराणों, महाभारत तथा बृहत् संहिता
में पंजाब की जातियों के वर्णन के सम्बन्ध
में आया है । यह रावी तथा झेलम ( वितस्ता )
नदियों के अधोभागीय मध्यवर्ती पर्वतीय
स्थान के लिए प्रयोग किया गया है । रजौरी का
पर्वतीय क्षेत्र दार्वाभिसार मण्डल में आता है । ( रा०
त० ८:१५३१, १८६१ ) । भीमवार इसी क्षेत्र के
मध्य में एक छोटा पर्वतीय राज्य था । डंगल वितस्ता
के समीप अधोभागीय पर्वतीय दुर्ग घग्घर को कहते
हैं । दार्वाभिसार उत्पलापीड के समय कश्मीर के
अन्तर्गत था । ( रा० त० ४:७१२ ) शंकर वर्मा ने
उसे पुनः उस समय जीता था जब वह गुजरात जो
भीमबर के दक्षिण था जीतने गया था ( रा० त०
४:१४१, ५:२०८ ) । यहाँ के लोगों के चरित्र के
विषय में कल्हण ने ( रा० त० ८.१५३१ में ) वर्णन
किया है ।
दार्वाभिसार का उल्लेख सिकन्दर के आक्रमण
के समय भी आया है । दार्वाभिसार के राजा ने
सिकन्दर की सहायता की थी ।
दर्वः एक जाति का नाम है । यह जाति
वल्लावर तथा जम्मू में रहती थी । दर्व जाति के
साथ ही अभिसार जाति आबाद थी । अतएव प्रदेश
का नाम दार्वाभिसार पड़ गया । चेनाव तथा रावी
का मध्यवर्ती पर्वतीय भाग दर्व जनपद था । मार्कण्डेय
पुराणादि के आधार पर कहा जा सकता है कि दर्व
लोग पंजाब की उत्तरीय दिशा की जातियों में से थे ।
उनका उल्लेख त्रिगर्त के साथ प्राय. आया है ।
महाभारत सभापर्व में दरद-दार्व-जाति का
उल्लेख आया है । ( सभापर्व ५१।१३ )
पुनः उल्लेख आया है ।
काश्मश्याः दरदा दार्वा शूरा कैम्कास्तथा ।
औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा बाह्लिकैः सह ॥
कश्मीराः कुन्दमानाश्च पौरका हंसकायनाः ।
शिवत्रिगर्तयौधेया राजन्याश्चन्द्रकेकयाः ॥
—सभा पर्व ४८:१२:१३
उशीनर की पत्नी का नाम दर्वा था । दविन
उशीनर का पुत्र वैष्णव मत के अनुसार था ।
अभिसार का उल्लेख बृहत् संहिता में वाराह-
मिहिर ने किया है । उसने अभिसार, दरद, दर्वी,
खस, कीर, कुलूत, कौलिन्द आदि जातियों का वर्णन
किया है । अभिसार जनपद झेलम चनाब के मध्य-
वर्ती प्रदेश का नाम था । अतएव निष्कर्ष ठीक होगा
दर्वा तथा अभिसार दो भिन्न जनपद थे । मारकण्डेय
पुराण में वर्णन आया है ।
कुन्दप्रायरणाश्चैव ऊर्णा दार्वाः सुकृद् गुहाः ।
त्रिगर्ताः जालवाश्चैव किरातास्तामरैः सह ॥
५७.५७
• बृहत् संहिता १४:२९, अल्बेरूनी १:३०३
दर्वा का उल्लेख पर्वताश्रयी देश के रूप में मार-
कण्डेय पुराण में आया है ।
अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ।
नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवी गुर्गणाः खशाः ॥
कुन्तप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः दार्वाः सकृद्गुहाः ।
त्रिगर्ताः भालयाश्चैव किरातास्तामरैः सह ॥
मारकण्डेय पुराण ५७।५६-५७
नागरहुंजा गिलगिट क्षेत्र में स्थान है । उसका
प्राचीन हंसमार्ग नाम था । हंस का अपभ्रंश हुंजा
हो गया है । यह प्राचीन दरद जनपद है । पुरातत्त्व
विद्वानों में अब भी मतभेद है कि वास्तव में हुंजा
हंसमार्ग ही है । मै स्वयं कुछ साधिकार नहीं कह
सकता क्योकि इस स्थान पर मैं आया नहीं हूँ और
यह नहीं देख सका हूँ कि ऋतु विशेष में हंस किंवा
पक्षी इस ओर से गमन करते है । यह स्थान इस

२४८ राजतरंगिणी
तदा प्रभावः कोऽप्यासीद्वलिहोमविधायिनाम् ।
नानश्यन्द्वशाद्विप्रा बौद्धाश्च निधनं गताः ॥ १८१ ॥
१८१. उस समय किसी अलौकिक शक्ति के प्रभाव के कारण जिन ब्राह्मणों ने बलि तथा
होम¹ विधिवत् किया उनका नाश न होकर केवल बौद्धों का निधन² हुआ था ।
समय पाकिस्तान में है। यहाँ पाकिस्तानी सैनिक
छावनियां है जाना सम्भव नहीं है।
मारकण्डेय पुराण में-'उर्णा दर्वास्तथैव च' 'उर्णा
दर्वास्तथैव च' ब्रह्माण्ड पुराण में ऊर्णा दर्वास्तथैव
च' उल्लेख आया है । पुराण काल में दर्व जाति तथा
दर्वा देश समझे जाते थे। भीष्म पर्व में जनपदों के
वर्णन मे दर्वा तथा अभिसार दोनों जनपदों का नाम
भारतवर्ष के जनपदों के अन्तर्गत भीष्म पितामह ने
गिनाया है।
अभीसारा उलूताश्च, शैवला वाहिकास्तथा ।
दार्वा च वानवा दर्वा वातजामरधोरगाः ॥
भीष्म पर्व ९:५४
सभा पर्व में अर्जुन के पर्वतीय देशों के विजय
के सम्बन्ध में तालिका दी गयी है। उसमें दार्वा का
नाम आया है । दार्वा दर्व प्रदेश किंवा जनपद है।
उसका वर्णन काश्मीर त्रिगर्त आदि देशों के साथ
ही क्रम से आया है।
ततस्तिगतां कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा ।
क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥
२७:१९
साथ ही दूसरे श्लोक में 'अभिसारी' शब्द आया
है। यह अभिसार प्रदेश तथा नगर का द्योतक है ।
अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः ।
उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेऽजयत् ॥
२७:१९
भीष्म पर्व में एक भारतीय जनपद के रूप में
'दर्व' शब्द का प्रयोग किया गया है।
अभीसारा उलूताश्च शैवला वाहिकास्तथा ।
दार्वा च वानवा दर्वा वातजामरधोरगाः ॥
९:५४
सभा पर्व में दर्व शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय जाति
के रूप में किया गया है। पूर्व वंशीय क्षत्रिय राज-
कुमारों ने युधिष्ठिर को बहुत धन उपहार स्वरूप
दिया था ।
कैराता दरदा दार्वाः शूरा वै यमकास्तथा ।
औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा बाह्लिकैः सह ॥
५२:१३ ।
दार्ब शब्द का प्रयोग दर्वदेशीय किंवा दर्व
जाति में उत्पन्न क्षत्रिय नरेश के रूप में किया
गया है ।
ततस्त्रिगर्त्ताः कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा ।
क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥
दार्वाभिसार शब्द एक म्लेच्छ जाति के लिये
प्रयुक्त किया गया है।
दार्वाभिसारा दरदाः पुण्ड्राश्चैव सहस्रशः ।
नेन शक्याः स्म संख्यातुं व्रात्याः शतसहस्रशः ॥
९३:४४ ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १८१ में 'विधायिनाम्' का
'विधायिनः' तथा 'नशन्' का 'नश्यन्' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१८१ (१) होम : देवताओ के उद्देश्य से अग्नि
में घृतादि डालकर हवन करने को होम कहते हैं । यह
पच महायज्ञों में से एक देवयज्ञ है। उस दान का
भी होम कहते हैं। जा श्राद्धादि के समय मंत्र पूर्वक
किया जाता है। मनुस्मृति ने होम को एक यज्ञ
माना है ।

प्रथमः तरंग
नीलमुद्दिश्य देशस्य रक्षितारमहीश्वरम् ।
काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यस्तपस्तेपे ततो द्विजः ॥ १८२ ॥
१८२. काश्यप गोत्रीय चन्द्रदेव¹ नामका द्विज नीलनाग को प्रसन्न करने के लिये तपस्या
करने लगा जो काश्मीर के नागों का राजा तथा रक्षक था ।
तस्य प्रत्यक्षतां यातो नीलस्तुहिनविप्लवम् ।
न्यवारयज्जगादापि स्वपुराणविधिं पुनः ॥ १८३ ॥
१८३. चन्द्रदेव के सम्मुख नील प्रसन्न हुए। तुहिन विप्लव शान्त किया। नील ने स्व
(नीलमत) पुराण की यज्ञादि विधियाँ¹ पुनः बतायीं ।
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥
३:७० ।
करता है। प्राचीन संस्कार बौद्धों के नवीन शासन
के कारण नष्ट प्राय हो गये थे अतएव उन्हें पुनः जारी
करने के लिये उसने तपस्या की ।
(२) निधन : बौद्धों के राजनीतिक उत्पीड़न
का श्लोक संख्या १८० तथा १८१ में एक मत से
कवित्वपूर्ण वर्णन कल्हण ने किया है। बौद्धों को
बाधा पहुँचाने के लिये हिम वर्षा तथा बलि एवं
होम के कारण ब्राह्मणों पर संकट न आकर बौद्धों
का निधन होने लगा यह पुरातन सनातन परम्परा-
नुसार बलि तथा होम की शक्ति तथा महत्ता
दिखाने के लिये यहाँ वर्णन किया गया है।
१८३ (१) विधि : प्रतीत होता है कि बौद्धों के
प्रभाव के कारण, बौद्धमतावलम्बी राजाओं के
लम्बे काल एवं प्रश्रय के कारण नीलमत पुराण
विहित संस्कार विधि कश्मीर में प्रायः लोग भूल
गये थे अथवा भूलने लगे थे। नील ने चन्द्रदेव ब्राह्मण
के सम्मुख प्रकट होकर नीलमत पुराण विहित विधियों,
धार्मिक संस्कारों आदि को पुनः बतायी। सम्भव हो
सकता है कि प्राचीन नीलमत पुराण लुप्त हो गया
हो। उसके स्थान पर नवीन नीलमत पुराण का
संस्करण चन्द्रदेव ब्राह्मण ने किया। अन्यथा यहाँ पुनः
नीलमत वर्णित बातों को बताने की आवश्यकता न
पड़ती।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १८२ में 'तारमहीश्वरम्' का
'तारं महेश्वरम्', 'तपस्तेपे' का 'वतस्तेपे' तथा 'ततो
द्विजः' का पाठभेद 'द्विजस्ततः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१८२ (१) चन्द्रदेव : इस तपस्वी के विषय में
विस्तृत बातें अप्राप्त हैं। यह ब्राह्मण थे। तपस्वी
थे। काश्मीर में हिम विप्लवादि समाप्त करने के
लिये काश्मीर के नागराज नील को प्रसन्न करने के
लिये तपस्या करने लगे। कश्मीर में यह प्रचलित
परम्परा है कि नील नाग कश्मीर का रक्षक है।
वही सब नागों का नेता किंवा राजा है। नीलमत
पुराण कश्मीर का पुराण तथा पूजा, उपासना,
बलि एवं धार्मिक संस्कारों की विधि निर्धारित
३२
श्री रणजीत सीताराम पण्डित 'रिवर आफ
किंग्स' पृष्ठ २६ पर श्री फाउचर के एक मन्तव्य का
उल्लेख करते हैं। श्री फाउचर ने कश्मीर के
ब्राह्मणों तथा मुसलमानों दोनों में नाग, पिशाच,
योग नियोग आदि के विषय में अनेक कथायें तथा
जनश्रुतियों का होना कहते हैं। जिनपर कश्मीर
उपत्यका की साधारण जनता विश्वास करती है।
उनका अभिप्राय है कि इस प्रकार की कथाओं,
किवदन्तियों का संग्रह करना अच्छा होगा।

२५० राजतरंगिणी
आद्येन चन्द्रदेवेन शमितो यक्षविप्लवः ।
द्वितीयेन तु देशेऽस्मिन्दुस्सहो भिक्षुविप्लवः ॥ १८४ ॥
१८४. आद्य चन्द्रदेव' ने यक्ष विप्लव का शमन किया था और द्वितीय चन्द्रदेव ने इस देश में
दुःसह भिक्षु विप्लव शान्त किया ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १८४ में 'यक्ष' का 'पक्ष', 'यज्ञ'
तथा 'भिक्षु' का 'धोक्ष' 'निद्य' तथा 'भिक्ष' ये पाठ
भेद मिलते हैं ।
पादटिप्पणियाँ :
१८४ (१) आद्य चन्द्रदेव : पिशाचोंसे आदि
चन्द्रदेव ने कश्मीर मण्डल की रक्षा की थी। नीलमत
पुराण में चन्द्रदेव ब्राह्मण नील समागम वर्णन है ।
उसमें आद्य चन्द्रदेव काश्यप वंशीय वृद्ध ब्राह्मण थे ।
शीत ऋतु एवं तुहिन पात के कारण लोग आमुज
मास में पुरानी परम्परा के अनुसार कश्मीर उप-
त्यका का त्याग करते थे ।
वृद्धावस्था के कारण चन्द्रदेव काश्मीर का त्याग न
कर सके । पिशाच उसके साथ क्रीड़ा करने लगे । उसे
सर्व प्रथम रज्जु से बाँधकर रखा । अनन्तर उसे मुक्त
कर दिया । उसे कुछ समझ में नही आ रहा था ।
कहाँ शरण ग्रहण करें । वह घूमने लगा । घूमते-घूमते
वह नील के निवास पर पहुँचा । नील को उसकी
दशा पर करुणा आयी । उसका आतिथ्य सत्कार
किया । उसने पिशाचों तथा शीत रक्षा निमित्त अनेक
क्रियाएँ बतायी ।
चैत्र मास मे हिमपात बन्द हो जाता है । भूमि
हिम विहीन हो जाती है । लोग पुनः कश्मीर उप-
त्यका मे लौट आते है । वृद्ध-चन्द्रदेव को प्रसन्न तथा
स्वस्थ देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ । उसे राजा
वीर्योदय के सम्मुख उपस्थित किया । चन्द्रदेव ने
पिशाच तथा नील के साथ हुई वार्तालाप तथा घट-
नाओं का वर्णन किया । नील द्वारा विहित पूजा विधि
बतायी । राजा तथा प्रजा उन्हें प्रसन्नतापूर्वक करने
के लिए तैयार हो गये । परिणाम स्वरूप कश्मीर
उपत्यका पिशाच-भय एवं उपद्रव विहीन हो गयी ।
अवश्युञ्ज्यामतीतायां निर्मानुषनिवा बहिः ।
काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यो वृद्धो ब्राह्मणपुंगवः ॥
निजंगाम निर्वेदाद्योधितोऽर्थेन मायिना ।
क्रीड़ानिमित्तं च भयान्निक्षुभ्रमस्य न यातिनः ॥
प्राप्रवेन पिशाचांस्तुश्चिक्रीडुस्तेन वै तदा ।
रज्ज्वाबद्धेन तु यथा यक्षिणा नृपदारकाः ॥
कल्पमानाः (१) पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ।
हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः शमीप्यमानो द्विजवृद्धवर्यः।
वभ्राम तत्रैव विमूढ़चेता भ्रमन्वयौ यत्र स नागराजः ॥
४२५-४२९
यहाँ कल्हण ने पिशाच के स्थान पर यक्ष शब्द
का प्रयोग किया है। दोनों शब्द को प्रायः समानार्थक
कुछ ऐतिहासिकों ने माना है । परन्तु यक्ष तथा
पिशाच दो भिन्न जातियां हैं। उनका उल्लेख यथा
स्थान किया गया है । मुझे नीलमत का मत कल्हण
की अपेक्षा अधिक तर्कसम्मत मालूम होता है ।
कश्मीर में यक्ष, गुह्यक तथा पिशाच तीनो जातियां
थी । यक्षों को कही धर्मविरोधी कार्य करते नही
दिखाया गया है । पिशाच धर्म विरोधी कार्य करते
थे । अतएव यहाँ पिशाच नाम यक्ष के स्थान पर
होना चाहिये । यक्षों को शिल्पी के रूप मे चित्रित
कल्हण ने किया है । वे निर्माण कार्य मे लगे दिखाई
देते हैं । चन्द्रदेव आख्यान से प्रतीत होता है ।
कश्मीर उपत्यका मे लोग ६ मास निवास करते थे ।
तुषारपात आरम्भ होने के पूर्व उपत्यका छोड़कर गर्म
स्थान मे चले जाते थे । इसी प्रकार तुषारपात बन्द
होने पर पुनः उपत्यका में लौट आते थे । अब भी

प्रथम तरंग २५१


शीत ऋतु प्रारम्भ होते ही पर्वतों पर रहने वाली
घूमन्तू जातियां मैदान में अपनी भेड़ों तथा पशुओं के
साथ शरण लेती हैं। सितम्बर मास में मैंने इस
प्रकार ऊँचे पर्वतों पर से आने वाले लोगों का समूह
कश्मीर की सड़को पर बहुत देखा है। कल्हण ने
यहाँ पुरानी गाथा की पुनरावृत्ति की है।
उक्त वर्णन से प्रकट होता है। पुरातन नीलमत
वर्णित संस्कारादि जो बौद्धो के कारण बन्द हो गये थे
पुनः आरम्भ किये गये। नाग पूजा पुनः कश्मीर में
प्रचलित हुई। कुछ विद्वानों का मत है। नीलमत
पुराण इसी समय की रचना है। नीलमत सिद्धान्त
लोग त्याग दिये थे। इससे यह भी प्रकट होता है कि
नीलमत पुराण का महत्व घट गया था। बौद्ध
सिद्धान्तों ने जोर पकड़ लिया था। बौद्ध धर्म के
विरुद्ध प्रतिक्रिया का काल था। कुछ लोगो का मत
है कि नीलमत ६ठी अथवा ७वीं शताब्दी के पूर्व का
ग्रन्थ नही है।
हसन चन्द्रदेव के विषय में लिखता है : एक दफा
का जिक्र है कि एक बूढ़ा खूसट ब्राह्मण चन्द्रदेव नाम
जो इल्म व अमल में मुमताज था कश्मीर के एक
गार में छुपकर याद खुदा में मसरूफ हो गया।
जरूरियात जिन्दगी की तमाम चीजें इस शख्स ने
अपने पास जमा कर लीं। जाड़े का मौसम था। बर्फ
व बारिश से तंग आकर देव फौज दर फौज इसके
पास जमा हो गये और उस बूढ़े खूसट ब्राह्मण को
अपनी खुफिया जगह से निकाल बाहर किया। बाद
अजा दो खतरनाक कवो हैंकल देव नील नाग के
चश्मा पर जो कोहस्तान नाघिम की तलहटी में वाका
हैं खड़े हो गये और वरहमन मजकूर को यह दोनों
एक दूसरे की बगल में डालकर हँसी ठट्ठा करने
लगे। इत्तफाक से गरीब ब्राह्मण का पाँव फिसल
गया। और चश्मे के अन्दर जा पड़ा। देखता है क्या
कि एक बड़ी वसीय व खराज दुनिया है जिसमे एक
आलीशान महल है और महल मे एक जर निगार
तख्त जिसपर एक बादशाह बड़ी शान व तमकुनत के
साथ जलसह्गर हैं। ब्राह्मण हाथ जोड़कर उसके


सामने खड़ा हो गया और बड़ी आाजिजी के साथ देवों
के मुजालिम और बर्फ की तकालीफ उससे बयान
करने लगा। यह बादशाह खुद नील नाग था। उसे
ब्राह्मण की हालत जार पर सख्त रहम आया और
अपने पास बुलाकर अपनी खुद तसनीफ करदा किताब
नीलमत पुरान उसको बख्श दी। साथ ही वसीयत
की कि किताब मजकूर को मुतर्वाक मुकामात पर
पढ़कर देवों और राक्षसों को खैरात व शदकान दिये
जाया करें। वह अमल और बज़ायक जो इस किताब
में दर्ज है बाजा़ब्तगी से हमेशा पढ़े जावें। अकसर
ओकात खुदाताला की इवादत व अताअत में मस-
रूफ रहा जाये। इस सूरत में लोग देवों और राक्षसों
की इज़ ज तकालीफ से महफूज रह सकेंगे। यह कह
कर बरहमन मजकूर को चशमा नील नाग के किनारे
पहुँचा दिया।
इबनदार बहार थी। लोग सरजमोन हिन्दु-
स्तान में खेती बाड़ी की गरज से फिर कश्मीर
आने लगे। यह देखकर उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ
कि एक बूढ़ा व नातवान ब्राह्मण सही हव मालम
मौजूद है। लोगों ने इसका सबब दरयाफ किया
जिसको उसने मन व अन से कह डाला। यह
सुन कर लोग बहुत खुश हुए। चुनाचः उसे और
उसकी किताब फाले नेक जानकर अपने अफसर
दरया देव नामी के पास ले गये। लोगो ने दरया
देव के हुक्म पर सरमबामत रखकर देवों और
शिद्दत वरफ वारा के आसोव से नजात हासिल
कर ली। उसी वक्त से कश्मीर मे विला इम्त-
याज मौसम मुस्तकिल तौर पर आबादी शुरू हो
गयी। नस्ले इन्सानी की दिन व दिन कसरत के
वापस दिहात व कस्बात वजूद में आ गये।
इब्दा में हर एक गावो का अलग हाकिम
होता था। फिर सरकशी और हिर्स के बढ़ जाने
को वजह से एक शख्स कई-कई दिहात दवा
बैठा। वाहमी मुदाफत और एक दूसरे के शर से
बचने के लिये इन लोगों ने छोटे-छोटे किलों की
बुनियाद डाल दी। जिन्हें कोट के नाम से पुकारा

आद्येन चन्द्रदेवेन शमितो यक्षविप्लवः ।
द्वितीयेन तु देशेऽस्मिन्दुस्सहो भिक्षुविप्लवः ॥ १८४ ॥
१८४. आद्य चन्द्रदेव ने यक्ष विप्लव का शमन किया था और द्वितीय चन्द्रदेव ने इस देश में
दुःसह भिक्षु विप्लव शान्त किया।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १८४ में 'यक्ष' का 'पक्ष', 'यज्ञ'
तथा 'भिक्षु' का 'बोद्ध' 'निष्ठ' तथा 'भिक्ष' ये पाठ
भेद मिलते हैं।
पादटिप्पणियाँ :
१८४ (१) आद्य चन्द्रदेव : पिशाचोंसे आदि
चन्द्रदेव ने कश्मीर मण्डल की रक्षा की थी। नीलमत
पुराण में चन्द्रदेव ब्राह्मण नील समागम वर्णन है।
उसमे आद्य चन्द्रदेव काश्यप वंशीय वृद्ध ब्राह्मण थे।
शीत ऋतु एवं तुहिन पात के कारण लोग आश्वुज
मास में पुरानी परम्परा के अनुसार कश्मीर उप-
त्यका का त्याग करते थे।
वृद्धावस्था के कारण चन्द्रदेव काश्मीर का त्याग न
कर सके। पिशाच उसके साथ क्रीड़ा करने लगे। उसे
सर्व प्रथम रज्जु से बाँधकर रखा। अनन्तर उसे मुक्त
कर दिया। उसे कुछ समझ में नही आ रहा था।
कहाँ शरण ग्रहण करें। वह घूमने लगा। घूमते-घूमते
वह नील के निवास पर पहुँचा। नील को उसकी
दशा पर करुणा आयी। उसका आतिथ्य सत्कार
किया। उसके पिशाचों तथा शीत रक्षा निमित्त अनेक
क्रियाएँ बतायी।
चैत्र मास मे हिमपात बन्द हो जाता है। भूमि
हिम विहीन हो जाती है। लोग पुनः कश्मीर उप-
त्यका में लौट आते है। वृद्ध-चन्द्रदेव को प्रसन्न तथा
स्वस्थ देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ। उसे राजा
वीर्योदय के सम्मुख उपस्थित किया। चन्द्रदेव ने
पिशाच तथा नील के साथ हुई वार्तालाप तथा घट-
नाओं का वर्णन किया। नील द्वारा विहित पूजा विधि
बतायी। राजा तथा प्रजा उन्हे प्रसन्नतापूर्वक करने
के लिए तैयार हो गये। परिणाम स्वरूप कश्मीर
उपत्यका पिशाच-भय एवं उपद्रव विहीन हो गयी।
अवश्युज्यामतीतायां निर्मथुमनिवा बहिः।
काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यो वृद्धो ब्राह्मणपुंगवः ॥
निर्जगाम निर्वेदाच्चोदितोऽथैन भाव्रिना।
क्रीडानििमत्तं च भयान्निरुग्मस्य न यातिलः ॥
प्राभ्रमेन पिशाचास्तुदित्यक्रीडंस्तेन वै तदा।
रज्जुबद्धेन तु पथा यक्षिणा नृपदारकाः ॥
कल्पमानाः (१) पिशाचैस्तु निर्वेधं परमं ययौ ।
हिमेन शीतेन तथा पिशाचैःसमीप्यमानो द्विजवृद्धवर्यः।
बभ्राम तत्रैव विमूढ़चेता भ्रमन्वयौ यत्र स नागराजः ॥
४२५-४२९
यहाँ कल्हण ने पिशाच के स्थान पर यक्ष शब्द
का प्रयोग किया है। दोनो शब्द को प्रायः समानार्थक
कुछ इतिहासकारों ने माना है । परन्तु यक्ष तथा
पिशाच दो भिन्न जातियाँ है। उनका उल्लेख यथा
स्थान किया गया है। मुझे नीलमत का मत कल्हण
की अपेक्षा अधिक तर्कसम्मत मालूम होता है।
कश्मीर में यक्ष, भुशुक तथा पिशाच तीनों जातियाँ
थी। यक्षों को कहीं धर्मविरोधी कार्य करते नही
दिखाया गया है। पिशाच धर्म विरोधी कार्य करते
थे। अतएव यहाँ पिशाच नाम यक्ष के स्थान पर
होना चाहिये। यक्षो को शिल्पी के रूप में चित्रित
कल्हण ने किया है। वे निर्माण कार्य में लगे दिखाई
देते हैं। चन्द्रदेव आख्यान से प्रतीत होता है।
कश्मीर उपत्यका मे लोग ६ मास निवास करते थे।
तुषारपात आरम्भ होने के पूर्व उपत्यका छोड़कर गर्म
स्थान में चले जाते थे। इसी प्रकार तुषारपात बन्द
होने पर पुनः उपत्यका मे लौट आते थे। भय भी

प्रथम तरंग २५१
शीत ऋतु प्रारम्भ होते ही पर्वतों पर रहने वाली
घूमन्तू जातियां मैदान में अपनी भेड़ों तथा पशुओं के
साथ शरण लेती हैं। सितम्बर मास में मैंने इस
प्रकार ऊँचे पर्वतों पर से आने वाले लोगों का समूह
कश्मीर की सड़कों पर बहुत देखा है। कल्हण ने
यहाँ पुरानी गाथा की पुनरावृत्ति की है।
उक्त वर्णन से प्रकट होता है। पुरातन नीलमत
वर्णित संस्कारादि जो बौद्धों के कारण बन्द हो गये थे
पुनः आरम्भ किये गये। नाग पूजा पुनः कश्मीर में
प्रचलित हुई। कुछ विद्वानों का मत है। नीलमत
पुराण इसी समय की रचना है। नीलमत सिद्धान्त
लोग त्याग दिये थे। इससे यह भी प्रकट होता है कि
नीलमत पुराण का महत्व घट गया था। बौद्ध
सिद्धान्तों ने जोर पकड़ लिया था। बौद्ध धर्म के
विरुद्ध प्रतिक्रिया का काल था। कुछ लोगों का मत
हैं कि नीलमत ६वीं अथवा ७वीं शताब्दी के पूर्व का
ग्रन्थ नहीं है।
हसन चन्द्रदेव के विषय में लिखता है- एक दफा
का जिक्र है कि एक बूढ़ा खूसट ब्राह्मण चन्द्रदेव नाम
जो इल्म व अमल में मुमताज था कश्मीर के एक
गार में छुपकर याद खुदा में मसरूफ हो गया।
जरूरियात जिन्दगी की तमाम चीजें इस शख्स ने
अपने पास जमा कर ली। जाड़े का मोसम था। बर्फ
व बारिश से तंग आकर देव फौज दर फौज इसके
पास जमा हो गये और उस बूढ़े खूसट ब्राह्मण को
अपनी खुफिया जगह से निकाल बाहर किया। बाद
अजा दो खतरनाक कवो हैकल देव नील नाग के
चश्मा पर जो कोहस्तान नागम की तलहटी में बाका
हैं खड़े हो गये और बरहमन मजकूर को यह दोनो
एक दूसरे की बगल में डालकर हँसी ठट्ठा करने
लगे। इत्तफाक से गरीब ब्राह्मण का पाँव फिसल
गया। और चश्मे के अन्दर जा पड़ा। देखता है क्या
कि एक बड़ी वसीम व खराज दुनिया है जिसमे एक
आलीशान महल है और महल में एक जर निगार
तख्त जिसपर एक बादशाह बड़ी शान व तमकुनत के
साथ जलसगह है। ब्राह्मण हाथ जोड़कर उसके
सामने खड़ा हो गया और बड़ी आजिजी के साथ देवों
के मुजालिम और बर्फ की तकलीफ उससे बयान
करने लगा। यह बादशाह खुद नील नाग था। उसे
ब्राह्मण की हालत जार पर सख्त रहम आया और
अपने पास बुलाकर अपनी खुद तसनीफ करदा किताब
नीलमत पुरान उसको बख्श दी। साथ ही वसीयत
की कि किताब मजकूर को मुतर्वाक मुकामात पर
पढ़कर देवो और राक्षसों को खैरात व शदकान दिये
जाया करें। वह अमल और वजाइक जो इस किताब
में दर्ज हैं वाजाफ्तगी से हमेशा पढ़े जायें। अक्सर
ओकात खुदाताला की इबादत व अताअत में मस-
रूफ रहा जाये। इस मूरत में लोग देवों और राक्षसों
की ईजा व तकलीफ से महफूज रह सकेंगे। यह कह
कर बरहमन मजकूर को चशमा नील नाग के किनारे
पहुँचा दिया।
ऐवनदार बहार थी। लोग सरजमीन हिन्दु-
स्तान में खेती बाड़ी की गरज से फिर कश्मीर
आने लगे। यह देखकर उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ
कि एक बूढ़ा व मातवान ब्राह्मण सही हथ मालम
मौजूद है। लोगों ने इसका सबब दरयाफ्त किया
जिसको उसने मन व अन्न से कह डाला। यह
सुन कर लोग बहुत खुश हुए। चुनांचः उसे और
उसकी किताब फाले नेक जानकर अपने अफसर
दरया देव नामी के पास ले गये। लोगों ने दरया
देव के हुक्म पर सरभताग्रत रखकर देवों और
शिद्दत वरफ बारां के आसेब से नजात हासिल
कर ली। उसी वक्त से कश्मीर में विला इम्त-
याज मोसम मुस्तकिल तौर पर आवादी शुरू हो
गयी। नस्ले इन्सानी की दिन व दिन कसरत के
वायस दिहात व कस्वात वजूद में आ गये।
इब्दा में हर एक गाँव का अलग हाकिम
होता था। फिर सरकशी और हिर्स के बढ जाने
की वजह से एक शख्स कई-कई दिहात दबा
बैठा। बाहमी मुदाफत और एक दूसरे के शर से
बचने के लिये इन लोगों ने छोटे-छोटे किलों की
बुनियाद डाल दी। जिन्हें कोट के नाम से पुकारा

२५२ राजतरंगिणी
राजा तृतीयगोनन्दः प्राप्तराज्यस्तदन्तरं ।
यात्रायागादि नागानां प्रावर्तयत पूर्ववत् ॥ १८५ ॥
१८५. तदन्तर गोनन्द तृतीय^१ राजा हुआ। उसने पूर्ववत् नागयात्रा, नागयज्ञादि^२
प्रवर्तित किया।

जाता है। चुनांच आज भी यह राय मुन्दरज
जेल मुकामों के नामों से दुरुस्त साबित होती है-
अन्दर कोट, जोन कोट, शीदरह कोट, दूर-
कोट, पट कोट और स्यालकोट। तारीख में
इस दौर को कोट राज (या तवायोफ अलमलूकी)
के नाम से ताबीर किया जाता है। कश्मीर में
यह दौर काफी मुद्दत तक जारी रहा। उस जमाना
में कोट हाकिम को मन्सब (सरदार) कहा जाता था।

'अपनी असली दौलत पर काना न होकर
इन कोट राजों ने एक दूसरे पर चढ़ाई शुरू कर
दी। नतीजा मगलूब हुक्मरान को राजा जम्मू की
तरफ मुतवज्जह होना पड़ा। उसने अपने बेटे
कुअर दयाकरन की सरकर्दगी में एक बड़ी भारी
फौज भेज दी। जिससे बहुत थोडे अरसा में
अमन और अमान बहाल हो गया। उसी वक्त
से राजा जम्मू की हकूमत भी कश्मीर में दाग-
बेल पडी। कहा जाता है कि इस राजा के खानदान
के पचीस आदमियों ने छ सौ तिरपन साल तक
सर जमीन कश्मीर पर हकूमत की। लेकिन इन
बादशाहों के नाम की उनकी मुद्दत हकूमत और
उनके कारनामो की तशरीह कोई मीरख भी
न कर सका।
हसन तारीख कश्मीर पृष्ठ ११-१२

पाठभेद :
श्लोकसंख्या १८५ में 'गोनन्दः' का 'गोनर्दः'
तथा 'प्राप्तराज्यस्त' का 'प्राप्तो राज्ये तद' पाठ-
भेद मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
१८५ (१) गोनन्द : आइने अकबरी में
नाम राजा मेनुन्द तथा राज्यकाल ३५ वर्ष दिया
गया है।
बेबुद्दीन कहता है । गोनन्द राजा बनाया
गया था। वह अभिमन्यु का पुत्र नहीं था। वह
यह भी लिखता है। राजा के सेनापति नन्दराम
ने नर्मदा तक हिन्दुस्तान का फतह किया था।
किन्तु सेणक के मत का कहीं से समर्थन नहीं
मिलता है। इस राजा ने नर्मदा तक विजय किया
था। इसका भी प्रमाण नहीं मिलता।
हसन कहता है - राजा गोनन्द सोयम राजा
सर के कबीले में से था। क० संवत् १८४२ में
ताज हकूमत सर पर रखकर अद्दल व एहसान और
मखलूक खुदा की फलाह व बहबूद में दिल व जान
से काशा रहकर उन्हें आराम आसाइश पहुँचाई।
सलोश की उमदगी और अच्छे कामों की बदौलत
सरजमीन कश्मीर से मजहब जैन का गलबा और
शिद्दत बरफबारी खतम हो गयी। ३५ बरस
बादशाह रहकर इस दारेफानी से रुखसत हुआ।
हुस्न नीयत की बरकत से बहुत से पोते पड़पोते
उसकी ज़रीयत से इस मुल्क के हाकिम हुए।
इसके खान्दान के हुक्मरानो का कुल मुद्दत हकूमत
दो हजार छह सौ मुतएन की गयी है। पृष्ठ ४४
हसन की काल गणना अत्यन्त दोषपूर्ण है।
(२) गोनन्द तृतीय : गोनन्द तृतीय कौन
था? उसकी वंश परम्परा क्या थी? उसे राज्य
कैसे प्राप्त हुआ? आदि इन बातो की ओर
किंचित् मात्र संकेत कल्हण नही करता। राजा
अभिमन्यु प्रथम के समान गोनन्द ने अपने भाग्य अथवा
पराक्रम से कश्मीर मण्डल का राज्य प्राप्त किया
होगा। राजा अभिमन्यु के किसी वंशज, सम्बन्धी
आदि का कोई वर्णन कल्हण ने नही दिया है।

प्रथम तरंग २५१
राज्ञा प्रवर्तिते तेन पुनन्नीलोदिते विधौ ।
भिक्षवो हिमदोषाश्च सर्वतः प्रशमं ययुः ॥ १८६ ॥
१८६. राजा द्वारा नीलोक्त विधि को पुनः प्रवर्तित करने पर भिक्षु तथा हिम दोष सर्वतः
शान्त हो गये ।
काले काले प्रजापुण्यैः संभवन्ति महीभुजः ।
यैर्मण्डलस्य क्रियते दूरोत्सन्नस्य योजनम् । १८७ ॥
१८७. प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव१ होता है जो अत्यन्त
छिन्न-भिन्न हुए राज्य का योजन (पुनर्संघटन) करते हैं ।

मालूम होता है । बौद्धों के विरुद्ध हुए आन्दो-
लन तथा पुरातन धर्म के पुनःस्थापन निमित्त गोनन्द
ने विशेष प्रयास किया होगा । अतएव या तो
अभिमन्यु ने गोनन्द को स्वयं अपना उत्तराधिकारी
बनाया होगा । अथवा सन्तान हीन उसके मरने पर
प्रजा ने गोनन्द को राजा निर्वाचित कर लिया होगा ।
(३) नाग यात्रा नाग यज्ञ : नील मत पुराण
द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १८६ मे 'हिमदोषाश्च' का 'हिम-
दोषाञ्च' तथा 'हि सदोषाश्च' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१८६ (१) दोष शान्ति : कल्हण ने प्राकृतिक
प्रकोप किस प्रकार रोका गया था तथा रोका जा
सकता है । उसका वहाँ उल्लेख किया है । तपस्या,
पूजा, पाठ, यज्ञादि एवं नीलमत विहित संस्कारों तथा
कर्मों के कारण बौद्ध तथा हिमपात दोनों का
समय हो गया ।
१८७ (१) सम्भव : यहाँ गीता की ओर
लक्ष्य कल्हण करता है । धर्म की जब जब हानि
होती है तो भगवान् का अवतार सम्भव होता है
उसी प्रकार प्रजा यदि पुण्य कार्य करती है तो राज्य
को समृद्धिशाली, सुगठित बनाने के लिये सुयोग्य
नृपो का जन्म सम्भव होता है । गीता के धार्मिक
सिद्धान्त 'सम्भवामि युगे-युगे' को कल्हण ने राजनीति
क्षेत्र में 'संभवन्ति महीभुज ' कह कर दोनो की समा-
नता की है । वह प्रजा को पुण्य कर्मी होने के लिये
संकेत करता है । प्रजा के पुण्य के कारण उत्तम
राजाओ का आविर्भाव सम्भव होता है । प्रजा के
पाप के कारण क्रूरकर्मा राजा उत्पन्न होते हैं ।
कल्हण ने कर्म सिद्धान्त को राजनीति में लागू
किया है ।
'मैन एण्ड टेक्नीक' में थी स्पेंग्लर ने इस
कर्म सिद्धान्त को घोर लक्ष्य किया है । उसमें प्राचीन
भारतीय कर्म सिद्धान्त की झलक मिलती है । वह
कहता है । यह हमारी शक्ति में नहीं है कि हम यह
चुनें कि हम तीन सहस्र वर्ष पूर्व किसी मिस्री
कृषक, किसी ईरानी राजा, अथवा आधुनिक जगत्
के अवारो की सन्तान बनें । यह भाग्य कुछ इस
प्रकार का है कि हमे स्वीकार करना पड़ेगा । यह
हमे किस परिस्थिति, विचार एवं कार्य की ओर प्रवृत्त
करता है । जिसके विषय में दार्शनिक बातें करते हैं ।
किन्तु केवल समय के आदमी होते हैं, स्थान के आदमी
होते हैं जाति के आदमी होते हैं, व्यक्तिगत वर्गों के
आदमी होते हैं जो समरागण में एक निर्दय द्वित्व में
सन्तोष करते हैं और जीतते या हारते हैं जब कि
उनके चारो तरफ विश्व शनैः शनैः गतिशील ईश्वर
के निर्लिप्त भाव तुल्य रहता है । यह संघर्ष जीवन
है निःसन्देह जीवन नीत्से के भाव में एक निर्दय-
दयाहीन है जिसमे इच्छा द्वारा शक्ति प्राप्ति के संघर्ष
का कोई स्थान नहीं है ।

२५४
राजतरंगिणी
ये प्रजापीडनपग्ने विनश्यन्ति सान्वयाः ।
नष्टं तु ये योजयेयुस्तेषां वंशानुगाः श्रियः॥ १८८ ॥
१८८. जो प्रजापीड़क राजा होते हैं वे कुलसहित नष्ट हो जाते हैं और जो नष्ट गत को
सुव्यवस्थित करते हैं, उनके वंश का अनुगामिनी श्री होती है।
इत्येतत्प्रतिवृत्तान्तं देशेऽस्मिन्वीक्ष्य लक्षणम् ।
भाविनां भूमिपालानां प्राज्ञैर्ज्ञेयं शुभाशुभम् ॥ १८६ ॥
१८९। विज्ञ जन राजाओं न इन प्रतिवृत्तान्तों को देखकर भावी भूपालों के शुभाशुभ कर्म
को समझ लेते हैं।
नवीकृतवतो देश तस्य वंश्यैरियं मही।
सिद्धैः प्रवरसेनार्थेद्धिरं भुक्ता सुकर्मभिः ॥ १८० ॥
१८०. देश को नवीकृत करने वाले उस राजा (गोनन्द) के वंशज, प्रवरसेन आदि सिद्ध
थे तथा अपने सुकर्मों द्वारा पृथिवी का चिरकाल तक भोग किये।
कल्हण इसी ओर संकेत करता है। हम चाहते उनके द्वारा उसके यश, कुल तथा राज्य की भी-
कुछ हैं। होता कुछ है। यह क्या होता है ? इसे वृद्धि होती है। अन्यथा सब कुछ नष्ट हो जाता है।
कर्म का फल कहा जाता है। कल्हण जनता को व्यास ने १८ पुराणों को लिखने के पश्चात् अपना
सचेत करता है। यदि यह पुण्यशाला होगी तो अच्छा निष्कर्ष निकाला है।
आदर्श नृपों का राज्यसूत्र परिपालन सम्भव है अष्टादश पुराणेषु ... सारमुक्तम् ।
अन्यथा क्रूर होने पर पापी क्रिया दूषित होने पर परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
उसे उसके कर्मानुसार उसी प्रकार के अवांछित
राजाओं की प्राप्ति होगी।
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोक संख्या १८८ में 'विनश्यन्ति सान्वयाः' श्लोक संख्या १८९ में 'देशे' का 'दैवे' तथा
का पाठभेद 'नश्येयुः सहानुया' मिलता है। 'दैवी' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ :
१८८ (१) श्री : कल्हण ने सूत्रवत् यहाँ १८९ (१) शुभाशुभ कर्म : कल्हण राजा के
राजाओं के भाग्य तथा उनके भविष्य की तरफ जीवन चरित्र तथा उनके शुभाशुभ कर्मों पर
लक्ष्य कर इस श्लोक से चेतावनी दी है। पाप पूरा प्रकाश डालता उन्हें चेतावनी देता है। पूर्व-
का परिणाम सर्वनाश है। पुण्य का परिणाम श्री वर्ती राजाओं का इतिहास एवं वृत्तान्त उनके कर्मों
की प्राप्ति करना है। राजा को पुण्याश्रयी होना पर आधारित रहता है। राज्य के घटना चक्र कर्मों
चाहिए। राज्य को सुव्यवस्थित करना, जनता का के कारण घटित होते हैं। यह घटना चक्र उनका
सन्तानवत् पालन करना, जनता के सुख-दुख को यह प्रतिवृत्तान्त भविष्य के भूपालों के लिए उदाहरण
अपना सुख-दुःख समझना, उनके निमित्त बड़ा से है। उनका भविष्य किसी अलौकिक शक्ति द्वारा
बड़ा त्याग करना यह राजा का पुण्य कार्य है। परिचालित नहीं होगा। अपितु वह नियन्त्रित
होगा। जीवन में मोड़ लेगा उनके कर्मों के द्वारा।
वही उनके भविष्य के शुभ तथा अशुभ का निर्णय

प्रथम तरंग २५५
गोनन्दान्वयिनामाद्यः स रघूणां रघुर्यथा ।
नृपतिः काश्यपीं वर्षान्पञ्चत्रिंशतिमन्वशात् ॥ १६१ ॥
१६१. यह राजा जो गोनन्द वंश में प्रथम राजा रघुवंशियों¹ में रघु तुल्य हुआ था । इस
काश्यपी² का पैंतीस वर्ष³ तक शासन किया ।
वर्षषष्टिं सषण्मासैः षड्भिर्वर्षैर्विवर्जिताम् ।
विभीषणाभिधोऽरक्षत्क्षितिं गोनन्दनन्दनः ॥ १९२ ॥
१९२. तत्पश्चात् गोनन्द नन्दन विभीषण नामक राजा ने तत्पश्चात् साठ वर्ष में ६ वर्ष ६
माह कम अर्थात् तिरपन वर्ष छह मास क्षिति की रक्षा की ।

करते हैं । यही उनके भाग्य का निर्णय करेगा ।
विद्वान् इनसे शिक्षा लेकर राजाओं को चेतावनी
देते रहे, जनता तथा राजा का मार्ग दर्शन करते
रहे यही अभिप्राय यहाँ कल्हण का है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १९० में 'वन्द्यं' का 'वंशं'
तथा 'सुकर्म' का पाठभेद 'स्वकर्म' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९० (१) नवीकृत : कल्हण का तात्पर्य यहाँ
सुधारने से है। गोनन्द वंशीय राजाओं ने कश्मीर
में सुधार किया था । शासन तथा शान्ति स्थापित
की थी । आध्यात्मिक विचारधारा, प्राचीन नील-
मत द्वारा विहित धर्म तथा संस्कारों की ओर
मोड़कर उनका देश में प्रचार किया था । हिमपात
तथा बौद्धो दोनों के प्रबल दोषों से कश्मीर मंडल
का उद्धार किया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १६१ में 'गोनन्दा' का 'गोनर्दा'
पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९१ (१) रघुवंश : रघु इक्ष्वाकु वंश में
एक अतिश्रेष्ठ राजा हुए हैं । यह भगवान् राम के
पूर्व पुरुष थे । राम का एक नाम रघुनाथ इसी
रघु के कारण पड़ा है । महाभारत में वर्णित
प्राचीन राजाओं की नामावली में रघु का नाम
लिया गया है । (म० आ० १ : १७२) भागवत,
विष्णु एवं वायु पुराणों के अनुसार रघु राजा
दीर्घबाहु का पुत्र था । राजा दिलीप खट्वांग के
पौत्र थे । किन्तु मत्स्य तथा पद्म पुराणों में रघु को
निघ्न राजा का पुत्र कहा गया है । (पद्म० सृ० . ८)
कालिदास ने रघुवंश में रघु को राजा दिलीप
का पुत्र कहा है । नन्दिनी धेनु के प्रसाद स्वरूप
रघु पुत्र राजा दिलीप को प्राप्त हुआ था । इक्ष्वाकु
वंश में सर्व श्रेष्ठ होने के कारण हरिवंश पुराण
(१ : १५) ने इसे अयोध्या का प्रथम राजा
माना है । इस कालान्तर में इक्ष्वाकु वंश रघुवंश
नाम से विख्यात हुआ है । रघुवंश (५) तथा
स्कन्द (२ : ८२) पुराण में रघु के दान एवं
गौरव का वर्णन किया गया है । रघु को अपने
पूर्वज युवनाश्व राजा द्वारा दिव्य खड्ग प्राप्त हुआ
था । इस खड्ग को उसने अपने वंशज हरिश्चाश्व
को दे दिया था । रघु के पुत्र अज थे । अज
के पुत्र दशरथ थे । दशरथ के पुत्र भगवान्
रामचन्द्र थे ।
कल्हण ने रघुवंश में जैसे रघु श्रेष्ठ थे ।
उनके नाम पर वंश चला था । उसी प्रकार
गोनन्द वंश में यह गोनन्द राजा सर्व श्रेष्ठ हुआ
था । उसी के नाम पर इस वंश की ख्याति
गोनन्द वंश से हुई । यहाँ कल्हण रघु वंश की
गोनन्द वंश तथा रघु की गोनन्द से तुलना करता है।

२५६ राजतरंगिणी
इन्द्रजिद्रावणावास्तां पितापुत्रौ नृपौ क्रमात् ।
पञ्चत्रिंशत्सहाद्धैश्च वर्षांस्त्रिंशद्ययोर्ययुः ॥ १५३ ॥
१५३. पिता तथा पुत्र इन्द्रजीत१ तथा रावण२ राजाओं ने क्रमशः ३५ वर्ष ६ मास तथा
तीस वर्ष राज्य किये।
बिन्दुरेखाच्छविर्यस्य दृष्टा भाव्यर्थशंमिनी ।
स रावणस्य पूजार्थं लिङ्गं भाति वटेश्वरः ॥ १५४ ॥
१५४. वटेश्वर नामक लिंग की रावण पूजा निमित्त उपयोग करता था। वह लिंग आज
भी चमकता है। लिंग के चमकते बिन्दु एवं रेखाएँ भविष्य की सूचना देती हैं।
( ) काश्यपी : कल्हण कश्मीर को यहाँ
काश्यपी अर्थात् कश्यप के देश के नाम से सम्बोधित
करता है ।
(३) काल उल्लेख : कल्हण गोनन्द तृतीय के
समय से क्रमबद्ध संवत् तथा राज्यकाल अपने
इतिहास राजतरंगिणी में देना आरम्भ करता है।
वह राजाओ का विधिवत् नाम देता है। उसने
कश्मीर मण्डल की क्रमानुसार वंशावली तथा राज्य
का वर्णन किया है।
जीत नाम तथा उसका राज्यकाल ३५ वर्ष ६ मास
दिया है ।
हसन के अनुसार राजा इन्द्रजीत क०
१९५१ में बाप की जगह तख्त नशीन होकर
कश्मीर और हिन्दुस्तान के आसपास के इलाकों
पर काबिज हुआ। बाप की सल्तनत को अदल
व इन्साफ से आबाद किया । ३५ वरस और ६ माह
हकूमत की सतरंज खेलकर जिन्दगी का बिस्तरा लपेट
लिया । पृष्ठ ४५.
पाठभेद :
श्लोक संख्या १९२ में 'गोनन्द' का 'गोनर्द'
पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९२ (१) आइने अकबरी में नाम विशन
तथा राज्यकाल ५३ वर्ष दिया गया है ।
विभीषण का राज्यकाल लौकिक वर्ष १९२६
होना चाहिए । कल्हण ने राज्याभिषेक का कोई
संवत् तथा काल नहीं दिया है ।
हसन के अनुसार—राजा बवीशान क ० १८९७
संवत् में बाप का जानशीन ताजशाही सर पर
रखा और रियाया की आसाइश और खुशहाली
में तिरपन साल बसर करके इस जहान से रुखसत
हुआ। पृष्ठ ४५।
१९३ (१) इन्द्रजीत : आइने अकबरी ने इन्दर-
(२) रावण : आइने अकबरी ने रावेन नाम
तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया है । गणना से
लौकिक वर्ष २०१७ आता है । हसन के अनुसार
राजा रावन बाप के मरने के बाद क० १९८६ में
ताजशाही सर पर रख कर हिन्दुस्तान की
सरज़मीन के बहुत से शहर फतह किये । तीस
साल तक हुक्मरा था। पूजा-पाठ के लिये
बटेश्वर का मन्दिर तामीर किया । मुमग्रफ
गुलतस्तए काश्मीर ने उसे बादशाह का मन्दिर ख्याल
किया है । हालांकि यह बिल्कुल गलत है । मतरजुम
रत्नाकर ने बड़शाह के मन्दिर का नाम सोकथी
बताया है । पृष्ठ ४५.
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १५४ में 'पूजार्थं' का पाठभेद
'पूजार्ह' मिलता है ।

प्रथम तरंग २५७
चतुःशालामठस्यान्तः कृतायाऽदायि भूभुजा ।
वटेश्वराय निखिलं तेन कश्मीरमण्डलम् ॥ १९५ ॥
१९५. चतुःशाला मठ¹ में स्थापित वटेश्वर पर उस राजा ने निखिल कश्मीर मण्डल चढ़ा दिया था।
पञ्चत्रिंशतमब्दानां क्ष्मां बुभोज महाभुजः ।
रावणक्षोणिभृत्सूनुः सार्धामन्यो विभीषणः ॥ १९६ ॥
१९६. रावण का पुत्र महाभुज विभीषण¹ राजा हुआ । उसने पैंतीस वर्ष छह मास पृथ्वी का राज्य किया ।
किंनरापरनामाऽथ किंनरैर्गीतविक्रमः ।
विभीषणस्य पुत्रोऽभून्नरनामा नराधिपः ॥ १९७ ॥
१९७. जिस नर¹ किंवा किन्नर राजा का विक्रम गीत किन्नर² गाते हैं। वह अपने पिता विभीषण के पश्चात् नराधिप हुआ ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १९५ में 'शाला' का 'शाल' तथा 'कश्मीर' का पाठभेद 'काश्मीर' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९५ (१) वटेश्वर तथा चतुःशाला मठ : इस अद्भुत वटेश्वर लिंग का पुनः राजतरंगिणी में कहीं उल्लेख नहीं करता । उनका स्थान किस दिशा अथवा स्थान में था । कल्हण के समय तक दोनों का अस्तित्व था । वे इतने प्रसिद्ध थे कि कल्हण ने उनके स्थानादि का वर्णन करना साधारण बात समझकर नहीं किया । आगरा से ३० मील दक्षिण-पूर्व यमुना के दक्षिण तट पर वटेश्वर है । आज भी बैलों का मेला लगता है । यह प्राचीन नगर है। यहाँ प्राचीन खण्डहर तथा ध्वंसावशेष हैं। यह वटेश्वर महादेव का स्थान है । तीर्थ है । इसी के आधार पर या मौलिक रूप से वटेश्वर के मन्दिर में वटेश्वर महादेव की स्थापना निमित्त निर्माण कराया गया होगा ।
काश्मीर मण्डल को राजाओं ने कई बार भगव-दर्पण किया है। कनिष्क ने समस्त कश्मीर धर्म हेतु अर्पित कर दिया था । मेवाड़ के राजा भी अपना राज्य एकलिंग का मानते थे । भारतीय स्वतन्त्रता
३३
के पूर्व स्वयं अपने को भगवान् का सेवक समझ राज्य की व्यवस्था करते थे ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १९६ में 'क्षोणि' का 'क्षोणि', 'क्षोणि' तथा 'सार्धा' का 'सार्धं' 'साधा' 'सार्ध्व' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९६ (१) विभीषण : आइने अकबरी ने नोयोबुन नाम तथा उसका राज्यकाल ३५ वर्ष ६ मास दिया है ।
गणन से राज्यारोहण का लौकिक वर्ष २०४८ आता है ।
वैबुद्दीन यहाँ एक दूसरे राजा इन्द्रायन को रखता है। उसे कैलाश सिंह का पुत्र बताता है ।
हसन कहता है- राजा वबोशन दोम रावन का बेटा था । क० २०१६ में तख्त शाही पर बैठा । चूंकि इल्म मौशीकी बखूबी सीखा था इसलिए हमेशा साजो सरोद और गाने बजाने में अपने औकात बसर करता था। तबियत मौजू पाई थी । इसलिए लोग इसे बहुत बड़ा शायर भी मानते हैं। ३६ वर्ष हकूमत में गुजारा । पृष्ठ ४५