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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 984 में से

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पृष्ठ 346

प्रथम तरंग २५१
राज्ञा प्रवर्तिते तेन पुनन्नीलोदिते विधौ ।
भिक्षवो हिमदोषाश्च सर्वतः प्रशमं ययुः ॥ १८६ ॥
१८६. राजा द्वारा नीलोक्त विधि को पुनः प्रवर्तित करने पर भिक्षु तथा हिम दोष सर्वतः
शान्त हो गये ।
काले काले प्रजापुण्यैः संभवन्ति महीभुजः ।
यैर्मण्डलस्य क्रियते दूरोत्सन्नस्य योजनम् । १८७ ॥
१८७. प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव१ होता है जो अत्यन्त
छिन्न-भिन्न हुए राज्य का योजन (पुनर्संघटन) करते हैं ।

मालूम होता है । बौद्धों के विरुद्ध हुए आन्दो-
लन तथा पुरातन धर्म के पुनःस्थापन निमित्त गोनन्द
ने विशेष प्रयास किया होगा । अतएव या तो
अभिमन्यु ने गोनन्द को स्वयं अपना उत्तराधिकारी
बनाया होगा । अथवा सन्तान हीन उसके मरने पर
प्रजा ने गोनन्द को राजा निर्वाचित कर लिया होगा ।
(३) नाग यात्रा नाग यज्ञ : नील मत पुराण
द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १८६ मे 'हिमदोषाश्च' का 'हिम-
दोषाञ्च' तथा 'हि सदोषाश्च' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१८६ (१) दोष शान्ति : कल्हण ने प्राकृतिक
प्रकोप किस प्रकार रोका गया था तथा रोका जा
सकता है । उसका वहाँ उल्लेख किया है । तपस्या,
पूजा, पाठ, यज्ञादि एवं नीलमत विहित संस्कारों तथा
कर्मों के कारण बौद्ध तथा हिमपात दोनों का
समय हो गया ।
१८७ (१) सम्भव : यहाँ गीता की ओर
लक्ष्य कल्हण करता है । धर्म की जब जब हानि
होती है तो भगवान् का अवतार सम्भव होता है
उसी प्रकार प्रजा यदि पुण्य कार्य करती है तो राज्य
को समृद्धिशाली, सुगठित बनाने के लिये सुयोग्य
नृपो का जन्म सम्भव होता है । गीता के धार्मिक
सिद्धान्त 'सम्भवामि युगे-युगे' को कल्हण ने राजनीति
क्षेत्र में 'संभवन्ति महीभुज ' कह कर दोनो की समा-
नता की है । वह प्रजा को पुण्य कर्मी होने के लिये
संकेत करता है । प्रजा के पुण्य के कारण उत्तम
राजाओ का आविर्भाव सम्भव होता है । प्रजा के
पाप के कारण क्रूरकर्मा राजा उत्पन्न होते हैं ।
कल्हण ने कर्म सिद्धान्त को राजनीति में लागू
किया है ।
'मैन एण्ड टेक्नीक' में थी स्पेंग्लर ने इस
कर्म सिद्धान्त को घोर लक्ष्य किया है । उसमें प्राचीन
भारतीय कर्म सिद्धान्त की झलक मिलती है । वह
कहता है । यह हमारी शक्ति में नहीं है कि हम यह
चुनें कि हम तीन सहस्र वर्ष पूर्व किसी मिस्री
कृषक, किसी ईरानी राजा, अथवा आधुनिक जगत्
के अवारो की सन्तान बनें । यह भाग्य कुछ इस
प्रकार का है कि हमे स्वीकार करना पड़ेगा । यह
हमे किस परिस्थिति, विचार एवं कार्य की ओर प्रवृत्त
करता है । जिसके विषय में दार्शनिक बातें करते हैं ।
किन्तु केवल समय के आदमी होते हैं, स्थान के आदमी
होते हैं जाति के आदमी होते हैं, व्यक्तिगत वर्गों के
आदमी होते हैं जो समरागण में एक निर्दय द्वित्व में
सन्तोष करते हैं और जीतते या हारते हैं जब कि
उनके चारो तरफ विश्व शनैः शनैः गतिशील ईश्वर
के निर्लिप्त भाव तुल्य रहता है । यह संघर्ष जीवन
है निःसन्देह जीवन नीत्से के भाव में एक निर्दय-
दयाहीन है जिसमे इच्छा द्वारा शक्ति प्राप्ति के संघर्ष
का कोई स्थान नहीं है ।