राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २४७
तथा प्राचीन सनातन धर्म से लोगों का विरत होना
था । नाग देवतागण अपनी पूजा बन्द हो जाने के
कारण क्रुद्ध हो गये थे । हिमपात इतना भयंकर होने
लगा था कि राजा दार्वाभिसार (कश्मीर के दक्षिण-
पश्चिम रजौरी क्षेत्र में ) किंवा नौशेरा और पुंछ
में जहाँ कुछ शीत कम पड़ती थी निवास करने लगा ।
१८० ( १ ) दार्वाभिसार : दार्वाभिसार का
उल्लेख पुराणों, महाभारत तथा बृहत् संहिता
में पंजाब की जातियों के वर्णन के सम्बन्ध
में आया है । यह रावी तथा झेलम ( वितस्ता )
नदियों के अधोभागीय मध्यवर्ती पर्वतीय
स्थान के लिए प्रयोग किया गया है । रजौरी का
पर्वतीय क्षेत्र दार्वाभिसार मण्डल में आता है । ( रा०
त० ८:१५३१, १८६१ ) । भीमवार इसी क्षेत्र के
मध्य में एक छोटा पर्वतीय राज्य था । डंगल वितस्ता
के समीप अधोभागीय पर्वतीय दुर्ग घग्घर को कहते
हैं । दार्वाभिसार उत्पलापीड के समय कश्मीर के
अन्तर्गत था । ( रा० त० ४:७१२ ) शंकर वर्मा ने
उसे पुनः उस समय जीता था जब वह गुजरात जो
भीमबर के दक्षिण था जीतने गया था ( रा० त०
४:१४१, ५:२०८ ) । यहाँ के लोगों के चरित्र के
विषय में कल्हण ने ( रा० त० ८.१५३१ में ) वर्णन
किया है ।
दार्वाभिसार का उल्लेख सिकन्दर के आक्रमण
के समय भी आया है । दार्वाभिसार के राजा ने
सिकन्दर की सहायता की थी ।
दर्वः एक जाति का नाम है । यह जाति
वल्लावर तथा जम्मू में रहती थी । दर्व जाति के
साथ ही अभिसार जाति आबाद थी । अतएव प्रदेश
का नाम दार्वाभिसार पड़ गया । चेनाव तथा रावी
का मध्यवर्ती पर्वतीय भाग दर्व जनपद था । मार्कण्डेय
पुराणादि के आधार पर कहा जा सकता है कि दर्व
लोग पंजाब की उत्तरीय दिशा की जातियों में से थे ।
उनका उल्लेख त्रिगर्त के साथ प्राय. आया है ।
महाभारत सभापर्व में दरद-दार्व-जाति का
उल्लेख आया है । ( सभापर्व ५१।१३ )
पुनः उल्लेख आया है ।
काश्मश्याः दरदा दार्वा शूरा कैम्कास्तथा ।
औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा बाह्लिकैः सह ॥
कश्मीराः कुन्दमानाश्च पौरका हंसकायनाः ।
शिवत्रिगर्तयौधेया राजन्याश्चन्द्रकेकयाः ॥
—सभा पर्व ४८:१२:१३
उशीनर की पत्नी का नाम दर्वा था । दविन
उशीनर का पुत्र वैष्णव मत के अनुसार था ।
अभिसार का उल्लेख बृहत् संहिता में वाराह-
मिहिर ने किया है । उसने अभिसार, दरद, दर्वी,
खस, कीर, कुलूत, कौलिन्द आदि जातियों का वर्णन
किया है । अभिसार जनपद झेलम चनाब के मध्य-
वर्ती प्रदेश का नाम था । अतएव निष्कर्ष ठीक होगा
दर्वा तथा अभिसार दो भिन्न जनपद थे । मारकण्डेय
पुराण में वर्णन आया है ।
कुन्दप्रायरणाश्चैव ऊर्णा दार्वाः सुकृद् गुहाः ।
त्रिगर्ताः जालवाश्चैव किरातास्तामरैः सह ॥
५७.५७
• बृहत् संहिता १४:२९, अल्बेरूनी १:३०३
दर्वा का उल्लेख पर्वताश्रयी देश के रूप में मार-
कण्डेय पुराण में आया है ।
अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ।
नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवी गुर्गणाः खशाः ॥
कुन्तप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः दार्वाः सकृद्गुहाः ।
त्रिगर्ताः भालयाश्चैव किरातास्तामरैः सह ॥
मारकण्डेय पुराण ५७।५६-५७
नागरहुंजा गिलगिट क्षेत्र में स्थान है । उसका
प्राचीन हंसमार्ग नाम था । हंस का अपभ्रंश हुंजा
हो गया है । यह प्राचीन दरद जनपद है । पुरातत्त्व
विद्वानों में अब भी मतभेद है कि वास्तव में हुंजा
हंसमार्ग ही है । मै स्वयं कुछ साधिकार नहीं कह
सकता क्योकि इस स्थान पर मैं आया नहीं हूँ और
यह नहीं देख सका हूँ कि ऋतु विशेष में हंस किंवा
पक्षी इस ओर से गमन करते है । यह स्थान इस