राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ राजतरंगिणी
चन्द्राचार्यादिभिर्लब्ध्वाऽऽदेशं तस्मात्तदाऽगमम्।
प्रवर्तितं महाभाष्यं स्वं च व्याकरणं कृतम् ॥ १७६ ॥
१७६. चन्द्राचार्यादि १ ने राजा के आदेश पर उस समय लुप्तप्राय भाष्य २ का जनता में
प्रचार किया । साथ ही साथ उन्होंने अपने स्वरचित व्याकरण ३ का भी प्रचार किया ।
अभिमन्यु इस स्थिति से लाभ उठाकर या तो
स्वयं कश्मीर मण्डल का राजा हो गया होगा
अथवा कश्मीर की जनता ने उसके गुणों के कारण
शासन निमित्त राजा चुना होगा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७५ में 'नामाङ्क' का 'नामाङ्क।'
'नामाङ्क' और 'शशाङ्काङ्क' का 'शशाङ्कार्थ' पाठ-
भेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७५ (१) अभिमन्युपुर : यह श्रीनगर के
नैऋत्यकोण में चार मील दूर विमयन ग्राम है ।
रानी दिद्दा द्वारा बसाया गया अभिमन्युपुर जिसका
वर्णन राज० तरं० ६: २९९ में किया है दूसरा
ग्राम है । दोनों को एक ही अभिमन्युपुर नहीं
मानना चाहिए ।
(२) शशांकांकशेखर : शशांक का अर्थ शशि
या चन्द्रमा होता है । शेखर का अर्थ शिर का
आभूषण है । शिर पर धारण की जाने वाली
किरीट तथा पुष्पमाला है । भगवान् शिव का
शिरोभूषण चन्द्रमा है । अतएव शशांकशेखर शंकर
का नाम पड़ा है। कल्हण ने शशांकशेखर अर्थात्
शिव के मन्दिर की समानता नगर के अलंकार से
की है। शशांक जिस प्रकार शिव का अलंकार
है उसी प्रकार अभिमन्युपुर नगर का आभूषण
किंवा अलंकार शशांकशेखर का मन्दिर था ।
कल्हण का तात्पर्य यह मालूम होता है कि मन्दिर
इतना सुन्दर था कि यह नगर का आभूषण
मालूम होता था ।
कल्हण ने इस मन्दिर के माध्यम से यह कहने
का प्रयास किया है कि राजा शिवभक्त था । कुशान
राजाओं द्वारा प्रचलित बुद्धधर्म को राजाश्रय प्राप्त
नहीं था । राजाश्रय प्राप्त हो गया था । वे शिवभक्त
किंवा सनातनधर्मी थे । कश्मीर ने चार धार्मिक
क्रान्तियों का सामना तीन शताब्दियों के अन्दर किया
था । पहली धार्मिक क्रान्ति बुद्धधर्म प्रचार की अशोक
ने की थी। उसकी विरोधी दूसरी क्रान्ति जलोक
ने सनातन धर्म को चलाकर की । तीसरी क्रान्ति
कुशान राजाओं ने बुद्ध धर्म की पुनःप्रतिष्ठा तथा
राजाश्रय देकर की । सनातन धर्म पृष्ठ भाग में रह
गया । चौथी क्रान्ति राजा अभिमन्यु ने पुनः बौद्धधर्म
के स्थान पर सनातन धर्म को स्थापित कर की
थी । एक प्रकार से सनातन तथा बौद्धधर्म के अनुयायी
राजा अपने धर्मों का प्रचार तथा राजाश्रय देते रहे ।
एक ही कश्मीर मण्डल जैसे लघु स्थान में धार्मिक
क्रान्तियां एक के पश्चात् दूसरी होती रही । परन्तु ये
राजविप्लव का रूप नहीं ले सकी । विचार आते रहे ।
जाते रहे । जनता समयानुकूल उनको स्वीकार तथा
अस्वीकार करती रही ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७६ में ' लब्ध्वाऽऽदेशं ' वा
'लब्ध्वादेश'; 'लब्ध्वादेशान्' 'लब्ध्यादेशं' 'लब्धादेशात्'
तथा 'स्वं च' का 'चन्द्र' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७६ (१) चन्द्राचार्य : इनका नाम चन्द्रगोमी
था । चन्द्राचार्य एवं चन्द्र नाम से इनकी ख्याति थी ।
इन्होंने पाणिनीय व्याकरण के आधार पर अपने
एक और व्याकरण की रचना की । उसमे 'स्वर
वैदिको' प्रकरण नहीं मिलता । इस आधार पर
विद्वानों का मत है कि ये बौद्ध थे । क्योकि बौद्ध
वेद को मान्यता नहीं देते ।