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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

२४६ राजतरंगिणी
मण्डले विप्लुताचारे विच्छिन्नबलिकर्मभिः ।
नागैर्जनक्षयश्चक्रे प्रभूतहिमवर्षिभिः ॥ १७६ ॥
१७६. जब उस मण्डल में आचार विलुप्त हो गये, बलिकर्म¹ विच्छिन्न हो गये तो नागों²
द्वारा की गई प्रभूत हिम³ वर्षा द्वारा जन क्षय होने लगा।
हिमान्यां बौद्धबाधाय पतन्त्यां प्रतिवत्सरम् ।
शीते दार्वाभिमारादौ षण्मासान्पार्थिवोऽवसत् ॥ १८० ॥
१८०. बौद्धों को बाधा पहुँचाने के लिये प्रति वर्ष हिम वर्षा होने लगी। अतएव राजा शीत
काल में छः मास तक दार्वाभिसार⁴ में निवास करने लगा।

१७२ (१) बलि कर्म : अनेक प्रकार के बलि
कर्म एवं संस्कार नील मत पुराण में विहित हैं।
बौद्धों के कारण बलि कर्म बन्द हो गया था। बौद्ध
नाग पूजा, मूर्ति पूजा तथा देव पूजा में उस
समय तक विश्वास नहीं करते थे।
पंच महा यज्ञों में पाँचवाँ बलि है। बलि
अर्थात् जीवों को अन्न दानादि से सन्तुष्ट करने का
नाम भूतयज्ञ है। बलि का दूसरा प्रकार
पशुओं का वध किंवा बलिदान है। बलि का
बलिदान काल में पूर्वाभिमुख तथा खड्गधारी बलि
देने वाले का मुख उत्तर दिशा की ओर रहना
चाहिए। 'वैश्वदेव' कर्म करने के काल में जो
अन्न भाग अलग रख दिया जाता है। उसे प्रय-
मोक्त बलि कहा जाता है। यह अन्न भाग देव
यज्ञ के लक्ष्यभूत देव के प्रति एवं जल, वृक्ष,
गृहपशु इत्यादि देवताओं को समर्पित किया जाता
है। बलि का अन्न भाग अग्नि में नहीं डाला जाता।
भूमि पर फेंक दिया जाता है।
(२) नाग : नाग पूजा कश्मीर में अत्यन्त
प्राचीन काल से प्रचलित थी। ऑनिस क्रोटस सम्राट्
सिकन्दर के साथ यूनान से भारत में आया था।
उसके लेख का उल्लेख स्ट्राबों ने किया है—दर्भा-
भिसार के राजा का दूत दो बड़े नागों का पालन-
पोषण करता था। इसी प्रकार तक्षशिला के राजा ने
एक बड़ा भारी नाग दिखाया था। उसे वह बड़े स्नेह
से खिलाता था। उसकी पूजा देवता तुल्य करता था।

आइने अकबरी में अबुल फजल लिखता है—
"कश्मीर में नाग पूजा सम्राट् अकबर के समय तक
होती रही है। यद्यपि वहाँ के रहने वाले प्रायः
मुसलमान हो गये थे। इस समय ७०० नाग मूर्तियाँ
कश्मीर के विभिन्न स्थानों में पूजी जाती हैं। अबुल
फजल ने यह उद्धरण आइने अकबरी में पुण्यभट्ट
से लेकर दिया है।
नीलमत पुराण में भगवान् विष्णु ने नाग पूजा
के प्रसंग में कहा है—
नागस्य यस्य ये स्थाने निवसिष्यन्ति मानवाः ।
ते तं संपूजयिष्यन्ति पुष्पधूपानुलेपनैः ॥
नैवेद्यैर्विविधैर्गन्धैः प्रेक्षादानैश्च शोभनैः ।
त्वयोक्तं च सदाचारं पालयिष्यन्ति ये जनाः ॥
२८९-२९०

    • +
      तस्मादस्य सदा पूजां बलिं च विधिना बुधः ।
      क्षिप्त्यात्तत्प्रियामस्थैरभ्यर्च्याऽसौ सदा मुदा ॥
      २९७
      (३) हिमपात : प्रतीत होता है कि बौद्धों के
      प्राबल्य के पश्चात् कश्मीर में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं
      जिनका कारण बौद्धों के सर थोपा गया। लगातार
      कई वर्षों तक अकाल पड़ता रहा। हिमपात इतना
      होने लगा कि लोग व्याकुल हो गये थे। चन्द्रदेव,
      एक ब्राह्मण नेता ने प्रचार आरम्भ कर दिया कि
      इन सब अनर्थों का मूल कारण बौद्धों का प्रचार