राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ राजतरंगिणी
तदा प्रभावः कोऽप्यासीद्वलिहोमविधायिनाम् ।
नानश्यन्द्वशाद्विप्रा बौद्धाश्च निधनं गताः ॥ १८१ ॥
१८१. उस समय किसी अलौकिक शक्ति के प्रभाव के कारण जिन ब्राह्मणों ने बलि तथा
होम¹ विधिवत् किया उनका नाश न होकर केवल बौद्धों का निधन² हुआ था ।
समय पाकिस्तान में है। यहाँ पाकिस्तानी सैनिक
छावनियां है जाना सम्भव नहीं है।
मारकण्डेय पुराण में-'उर्णा दर्वास्तथैव च' 'उर्णा
दर्वास्तथैव च' ब्रह्माण्ड पुराण में ऊर्णा दर्वास्तथैव
च' उल्लेख आया है । पुराण काल में दर्व जाति तथा
दर्वा देश समझे जाते थे। भीष्म पर्व में जनपदों के
वर्णन मे दर्वा तथा अभिसार दोनों जनपदों का नाम
भारतवर्ष के जनपदों के अन्तर्गत भीष्म पितामह ने
गिनाया है।
अभीसारा उलूताश्च, शैवला वाहिकास्तथा ।
दार्वा च वानवा दर्वा वातजामरधोरगाः ॥
भीष्म पर्व ९:५४
सभा पर्व में अर्जुन के पर्वतीय देशों के विजय
के सम्बन्ध में तालिका दी गयी है। उसमें दार्वा का
नाम आया है । दार्वा दर्व प्रदेश किंवा जनपद है।
उसका वर्णन काश्मीर त्रिगर्त आदि देशों के साथ
ही क्रम से आया है।
ततस्तिगतां कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा ।
क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥
२७:१९
साथ ही दूसरे श्लोक में 'अभिसारी' शब्द आया
है। यह अभिसार प्रदेश तथा नगर का द्योतक है ।
अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः ।
उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेऽजयत् ॥
२७:१९
भीष्म पर्व में एक भारतीय जनपद के रूप में
'दर्व' शब्द का प्रयोग किया गया है।
अभीसारा उलूताश्च शैवला वाहिकास्तथा ।
दार्वा च वानवा दर्वा वातजामरधोरगाः ॥
९:५४
सभा पर्व में दर्व शब्द का प्रयोग एक क्षत्रिय जाति
के रूप में किया गया है। पूर्व वंशीय क्षत्रिय राज-
कुमारों ने युधिष्ठिर को बहुत धन उपहार स्वरूप
दिया था ।
कैराता दरदा दार्वाः शूरा वै यमकास्तथा ।
औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा बाह्लिकैः सह ॥
५२:१३ ।
दार्ब शब्द का प्रयोग दर्वदेशीय किंवा दर्व
जाति में उत्पन्न क्षत्रिय नरेश के रूप में किया
गया है ।
ततस्त्रिगर्त्ताः कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा ।
क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ॥
दार्वाभिसार शब्द एक म्लेच्छ जाति के लिये
प्रयुक्त किया गया है।
दार्वाभिसारा दरदाः पुण्ड्राश्चैव सहस्रशः ।
नेन शक्याः स्म संख्यातुं व्रात्याः शतसहस्रशः ॥
९३:४४ ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १८१ में 'विधायिनाम्' का
'विधायिनः' तथा 'नशन्' का 'नश्यन्' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१८१ (१) होम : देवताओ के उद्देश्य से अग्नि
में घृतादि डालकर हवन करने को होम कहते हैं । यह
पच महायज्ञों में से एक देवयज्ञ है। उस दान का
भी होम कहते हैं। जा श्राद्धादि के समय मंत्र पूर्वक
किया जाता है। मनुस्मृति ने होम को एक यज्ञ
माना है ।