राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 341, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० राजतरंगिणी
आद्येन चन्द्रदेवेन शमितो यक्षविप्लवः ।
द्वितीयेन तु देशेऽस्मिन्दुस्सहो भिक्षुविप्लवः ॥ १८४ ॥
१८४. आद्य चन्द्रदेव' ने यक्ष विप्लव का शमन किया था और द्वितीय चन्द्रदेव ने इस देश में
दुःसह भिक्षु विप्लव शान्त किया ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या १८४ में 'यक्ष' का 'पक्ष', 'यज्ञ'
तथा 'भिक्षु' का 'धोक्ष' 'निद्य' तथा 'भिक्ष' ये पाठ
भेद मिलते हैं ।
पादटिप्पणियाँ :
१८४ (१) आद्य चन्द्रदेव : पिशाचोंसे आदि
चन्द्रदेव ने कश्मीर मण्डल की रक्षा की थी। नीलमत
पुराण में चन्द्रदेव ब्राह्मण नील समागम वर्णन है ।
उसमें आद्य चन्द्रदेव काश्यप वंशीय वृद्ध ब्राह्मण थे ।
शीत ऋतु एवं तुहिन पात के कारण लोग आमुज
मास में पुरानी परम्परा के अनुसार कश्मीर उप-
त्यका का त्याग करते थे ।
वृद्धावस्था के कारण चन्द्रदेव काश्मीर का त्याग न
कर सके । पिशाच उसके साथ क्रीड़ा करने लगे । उसे
सर्व प्रथम रज्जु से बाँधकर रखा । अनन्तर उसे मुक्त
कर दिया । उसे कुछ समझ में नही आ रहा था ।
कहाँ शरण ग्रहण करें । वह घूमने लगा । घूमते-घूमते
वह नील के निवास पर पहुँचा । नील को उसकी
दशा पर करुणा आयी । उसका आतिथ्य सत्कार
किया । उसने पिशाचों तथा शीत रक्षा निमित्त अनेक
क्रियाएँ बतायी ।
चैत्र मास मे हिमपात बन्द हो जाता है । भूमि
हिम विहीन हो जाती है । लोग पुनः कश्मीर उप-
त्यका मे लौट आते है । वृद्ध-चन्द्रदेव को प्रसन्न तथा
स्वस्थ देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ । उसे राजा
वीर्योदय के सम्मुख उपस्थित किया । चन्द्रदेव ने
पिशाच तथा नील के साथ हुई वार्तालाप तथा घट-
नाओं का वर्णन किया । नील द्वारा विहित पूजा विधि
बतायी । राजा तथा प्रजा उन्हें प्रसन्नतापूर्वक करने
के लिए तैयार हो गये । परिणाम स्वरूप कश्मीर
उपत्यका पिशाच-भय एवं उपद्रव विहीन हो गयी ।
अवश्युञ्ज्यामतीतायां निर्मानुषनिवा बहिः ।
काश्यपश्चन्द्रदेवाख्यो वृद्धो ब्राह्मणपुंगवः ॥
निजंगाम निर्वेदाद्योधितोऽर्थेन मायिना ।
क्रीड़ानिमित्तं च भयान्निक्षुभ्रमस्य न यातिनः ॥
प्राप्रवेन पिशाचांस्तुश्चिक्रीडुस्तेन वै तदा ।
रज्ज्वाबद्धेन तु यथा यक्षिणा नृपदारकाः ॥
कल्पमानाः (१) पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ।
हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः शमीप्यमानो द्विजवृद्धवर्यः।
वभ्राम तत्रैव विमूढ़चेता भ्रमन्वयौ यत्र स नागराजः ॥
४२५-४२९
यहाँ कल्हण ने पिशाच के स्थान पर यक्ष शब्द
का प्रयोग किया है। दोनों शब्द को प्रायः समानार्थक
कुछ ऐतिहासिकों ने माना है । परन्तु यक्ष तथा
पिशाच दो भिन्न जातियां हैं। उनका उल्लेख यथा
स्थान किया गया है । मुझे नीलमत का मत कल्हण
की अपेक्षा अधिक तर्कसम्मत मालूम होता है ।
कश्मीर में यक्ष, गुह्यक तथा पिशाच तीनो जातियां
थी । यक्षों को कही धर्मविरोधी कार्य करते नही
दिखाया गया है । पिशाच धर्म विरोधी कार्य करते
थे । अतएव यहाँ पिशाच नाम यक्ष के स्थान पर
होना चाहिये । यक्षों को शिल्पी के रूप मे चित्रित
कल्हण ने किया है । वे निर्माण कार्य मे लगे दिखाई
देते हैं । चन्द्रदेव आख्यान से प्रतीत होता है ।
कश्मीर उपत्यका मे लोग ६ मास निवास करते थे ।
तुषारपात आरम्भ होने के पूर्व उपत्यका छोड़कर गर्म
स्थान मे चले जाते थे । इसी प्रकार तुषारपात बन्द
होने पर पुनः उपत्यका में लौट आते थे । अब भी