राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग १९५
लोकालोकाद्रिपार्श्वस्थास्तामस्यः कृतिका वयम् ।
बोधिसत्त्वैकशरणाः काङ्क्षन्त्यस्तमसः क्षयम् ॥ १३७ ॥
१३७. 'हम लोकालोक' पर्वत के पार्श्व की तम² निवासिनी कृत्या³ हैं। तम मुक्ति की
आकांक्षा में बोधिसत्त्व के शरण में रहती हैं।'
लोके भगवतो लोकनाथादारभ्य केचन ।
ये जन्तवो गतक्लेशा बोधिसत्त्वानवेहि तान् ॥ १३८ ॥
१३८. 'भगवान् लोकनाथ' से आरम्भ होकर अबतक इस लोक में कुछ प्राणी गतक्लेश२
हो चुके हैं उन्हें ही बोधिसत्त्व कहा जाता है।
मान्यता हिन्दू और बौद्ध दोनों से दिलाता है। कृत्या
राजा के मास को स्पृहा करती थी। उसने स्वयं
स्वीकार किया। राजा जलोक बोधिसत्त्व है। कल्हण
ने काश्मीर में निवासित बौद्ध एवं हिन्दू दोनों धर्मों-
वलम्बियों के अवतार रूप में जलोक को उपस्थित
किया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३६ में 'हृत्या' का पाठभेद
'अहंकृत्या' मिलता है ।
श्लोक संख्या १३७ में 'तमसः' का पाठभेद
'तपसः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१३७ (१) लोकालोक पर्वत : पौराणिक गाथा
के अनुसार सातों समुद्रों को परिवेष्टित करने वाली
यह पर्वत श्रेणी है । 'लोकालोकश्चक्रवालः' पृथ्वी को
घेरने वाले दो पर्वत लोकालोक तथा चक्रवाल हैं ।
(अमरः शैल वर्गः ३:२) इसका अर्थ दृश्य एवं
अदृश्य लोक होता है। कृत्या का निवास स्थान यहाँ
वर्णन किया गया है। वे अदृश्य लोक अथवा अन्धकार
में निवास करनेवाली होती हैं । अतएव उन्हें स्पष्ट
नहीं देखा जा सकता ।
(२) तम : यहाँ तम शब्द तामस
प्रकृति, अन्धकार, तमोगुण एवं पाप के लिए प्रयुक्त
किया गया है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इस अर्थ
में मैं समझता हूँ कल्हण ने तम शब्द का प्रयोग
किया है। तमस् का अर्थ कूप नरक का अन्धकार
तथा केश भी होता है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त
(१०:१२०:३) में तमस् शब्द आया है। यहाँ
इसका अर्थ अन्धकार किया गया है। तम आसीत्
तमसा........? प्रारम्भ में तमस् ही तमस् था । सब-
कुछ तम से आवृत्त था।
(३) कृत्या : आभिचारिक कर्म के अर्थ में
अनेक स्थानों पर कृत्या शब्द का प्रयोग किया गया
है। (ऋ०:१०:८५:२८;२९) अथर्ववेद (५:१४:
११) में मनाया गया है कि कृत्या अपने कर्त्ता के
पास लौट जाय। अमरकोष में (नानार्थ वर्ग
३:१५८) में कृत्या का अर्थ दिया गया है-कृत्या
क्रियादेवतयोःस्त्रिपु भेद्ये धनादिभिः ।' कार्य, भूत प्रेत
आदि अधम देवता, धन, स्त्री, भूमि से भेद डाले जाने
वाले पराये राज्य के व्यक्ति इसका अर्थ किया गया
है। इसका उल्लेख एक देवी विशेष के अर्थ में भी
आता है। मारण कार्य के लिये विशेष रूप से
बलिदानादि द्वारा इसको पूजा की जाती है। यह
एक शक्ति विशेष अथवा देवी है। अभिचार क्रिया
द्वारा किसी का वध करने के लिये अनुष्ठान विशेष
द्वारा उत्पन्न की जाती है। कृत्या को तम शक्ति
भी संज्ञा दी गयी है।
१३८ (१) लोकनाथ : लोकनाथ से यहाँ
अर्थ भगवान् बुद्ध से है। इस शब्द का अर्थ ब्राह्मण,
विष्णु, शिव, राजा तथा बुद्ध होता है।
(२) क्लेश : कल्हण यहाँ भगवान् बुद्ध के
प्रसिद्ध शब्द 'दुःख' का उल्लेख न कर क्लेश शब्द
का प्रयोग करता है। यहाँ पर क्लेश का अर्थ दुःख
१९६ राजतरंगिणी
सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते ।
बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३९ ॥
१३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला
भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत
रहते हैं।
विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः ।
पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥
१४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की
प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों के दलन का आदेश दे दिया।
मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल
खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया
पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता,
राग, द्वेष तथा अभिनिवेश।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया',
'बोधिं' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'श्वोद्ध-
रणा' का 'श्यद्धरणो' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन
करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलोक
बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार
निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट
करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख
पुनः रा० त० १.१४०,१४१ में करता है। बौद्ध
विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के
पतन के साथ प्रारम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के
समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक
मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। भगवान् बुद्ध को अवतार मान-
कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा प्रारम्भ कर
दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ
पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की
प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में
शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की
प्रतिमायें स्थापित की जाती है। विहारों को हिन्दू
मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी
थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है।
कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो
जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा
नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के
प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ-
शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का
उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य
अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी
जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है।
बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में
अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य
के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ
काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था।
चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय-
मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों
तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म
प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर
संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह
विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो-
वृत्तियों के कारण राजा जलोक बौद्धधर्म विरोधी
हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को
प्रश्रय दिया था।
अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने
का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।
प्रथम तरंग १६७
'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया ।
तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥
अस्मद्गिरा प्रेषणीयो विहारकरणाय सः ।
दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥
तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् ।
तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥ १४३ ॥
क्रुद्धैर्वादिभिरनुध्याता त्वद्वधाय प्रधाविता ।
अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥
१४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा । आपके वध निमित्त मुझे भेजा । उस
समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया । निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि ! वह राजा महाशाक्य'
हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती । किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा ।
खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह
अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे । ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का
भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोषों का
इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा ।
कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था। यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है।
महासम्मत था। महावंश में उल्लेख है क्षत्रिय वंशों में शिरोमणि महासम्मत वंश में महामुनि (बुद्ध) ने जन्म लिया।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद 'महासत्त्व' मिलता है ।
श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद 'दत्वाम्ब हेम' मिलता है ।
श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' तथा 'सत्त्वं' का पाठभेद 'सत्यं' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१४१ ( १ ) महाशाक्य : एक मत है कि शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महाशाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश (२:२३) के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम
त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य वंशीय थे । देवदह शाक्य थे । उनके पुत्र सिंहहनु थे । सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे । शुद्धोधन के पुत्र गौतम अर्थात् बुद्ध थे । गौतम गोत्र था । शाक्य क्षत्रियों की एक शाखा थी। यह शाखा राजा इक्ष्वाकु के रक्त से सम्बन्धित थी । भगवान् बुद्ध शाक्य मुनि हैं। उन्हें शाक्य में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण उनको महाशाक्य की संज्ञा दी गयी है। महासम्मत शब्द का सम्बन्ध भगवान् बुद्ध के वंश किंवा जाति से था। महाशाक्य भगवान् का नाम शाक्यों में सर्व श्रेष्ठ किंवा महान् होने के कारण दिया गया था। वह विशेषण है। महाशाक्य शब्द का प्रयोग महासम्मत के स्थानपर अधिक उपयुक्त लगता है।
१९६ राजतरंगिणी
सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते ।
बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३६ ॥
१३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला
भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत
रहते हैं।
विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः ।
पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥
१४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की
प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों¹ के दलन का आदेश दे दिया।
मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल
खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया
पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता,
राग, द्वेष तथा अभिनिवेश ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया',
'बोधि' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'स्वोद्ध-
रणा' का 'स्वद्धरणो' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन
करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलौक
बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार
निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट
करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख
पुनः रा० त० १।८०,१८१ में करता है। बौद्ध
विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के
पतन के साथ आरम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के
समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक
मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। भगवान् बुद्ध को अवतार मान-
कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा आरम्भ कर
दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ
पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की
प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में
शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की
प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं। विहारों को हिन्दू
मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी
थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है।
कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो
जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा
नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के
प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ-
शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का
उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य
अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी
जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है।
बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में
अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य
के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ
काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था।
चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय-
मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों
तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म
प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर
संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह
विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो-
वृत्तियों के कारण राजा जलौक बौद्धधर्म विरोधी
हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को
प्रश्रय दिया था।
अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने
का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।
प्रथम तरंग १९७
'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया ।
तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥
अस्मद्गिरा प्रेरणीयो विहारकरणाय सः ।
दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥
तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् ।
तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥' १४३ ॥
क्रुद्धैर्विप्रैरनुज्ञाता स्वद्वधाय प्रधाविता ।
अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥
१४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा। आपके वध निमित्त मुझे भेजा। उस
समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया। निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि! वह राजा महाशाक्य*
हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती। किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा।
खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह
अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे। ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का
भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोनों का
इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा।
कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह महामम्मत था। महावंश में उल्लेख है इनके वंश
अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन में शिरोमणि महासम्मत वंश के अनुवर्ती बुद्ध
शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' ने जन्म लिया।'
अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था।
यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है। त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य क्षत्रिय
पाठभेद : थे। देवदह शाक्य देश इनके कुल विस्तार में...
श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे। शुद्धोधन के पुत्र
'महासत्त्व' मिलता है। गौतम इत्यादि हुए थे। रोहिणी नदी के उभय तटवर्ती
श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद क्षत्रिय ही इस वंश में आते थे। इस प्रकार
'दत्वाम्ब हेम' मिलता है। इक्ष्वाकु के वंशज महासम्मत हैं। महासम्मत ही
श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' इक्ष्वाकु हैं। इसी वंश में शाक्य, कोलीय, मोरिय
तथा 'सत्वै' का पाठभेद 'सन्यै' मिलता है। अन्य शाक्य गणराज्य भी गिने जाते हैं।
पादटिप्पणियाँ : शाक्य सूर्यवंशी थे। उनका सम्बन्ध महासम्मत से था।
१४१ (१) महाशाक्यः इस पाठ से अधिक दीर्घनिकाय के अनुसार शाक्य क्षत्रिय राजा
शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महा- ओक्काक के वंशीय थे। ओक्काक को पालि में
शाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश तथा दीपवंश इक्ष्वाकु का नामांतर ही माना गया है।
के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम महा- शाक्य उसी से सम्बन्धित थे। इस प्रकार शाक्य
सत्तम् ही मूल वंश था।
१९८ राजतरंगिणी
तस्मात्सत्त्वातिरेकस्ते मिषादेवं परीक्षितः ।
क्षीणपापाऽद्य संवृत्ता स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥” १४५ ॥
१४५. 'राजन् ! मैंने रूप परिवर्तन द्वारा आपके सत्व की परीक्षा ली थी। आपके
दर्शन द्वारा मेरे पाप क्षीण हो गये हैं। अब मैं जाती हूँ। स्वस्ति ! राजन् !'
कृतप्रतिश्रवे राज्ञि विहारकृतये पुनः ।
प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्यादेवी तिरोदधे ॥ १४६ ॥
१४६. राजा से विहार के पुनर्निर्माण का वचन लेकर प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्या अदृश्य
हो गयी।
'बौद्ध ग्रन्थों' के अनुसार महासम्मत शाक्यों के
आदि राजा थे। महासम्मत से बुद्ध तक वंश कभी
छिन्न नही हुआ था। वंशपरम्परा टूटी नहीं थी। वे
सूर्यवंशी थे। उन्हें महासम्मत इसलिए कहा जाता
था कि पृथ्वी पर जब अनाचार फैला तो जनता
ने सर्व सम्मति से उन्हे राजा निर्वाचित किया था।
महासम्मत के राज्य में ताड़ना, बहिष्कार, जुर्माना
आदि दण्ड के प्रकार अज्ञात थे। एक मत है।
महासम्मत मनु थे। श्रीलंका के राजा अपनी वंशा-
वली महासम्मत से सम्बन्धित करते थे।
१४३ (१) प्रायश्चित्त : भगवान् बुद्ध की करुणा
तथा क्षमा का वर्णन यहाँ कल्हण ने किया है। इन
श्लोकों से प्रकट होता है। कल्हण ने स्वयं विहार
उच्छेद के कार्यों को पसन्द नही किया था। राजा के
चरित्र में कालिमा न लगे इसलिये उसने कृत्या द्वारा
भगवान् स्वरूप बोधिसत्त्वों का सन्देश राजा को
दिया। उसने दोष किया था। दोष किंवा पापों का
निराकरण प्रायश्चित्त द्वारा हो सकता था। यदि
विहार उच्छेद जैसे दोष के कारण मन स्ताप होगा
तो वह भी दूर हो जायगा। प्रायश्चित्त का प्रकार
भी कल्हण ने बताया है। जिसका नाश किया उच्छेद
किया है उसे पूर्ववत् कर देने में दोष किंवा पाप
का प्रायश्चित्त हो जाता है।
कल्हण ने यहाँ यह भी प्रकट किया है। राजा
के पास हेम संभार अर्थात् प्रचुर स्वर्ण भण्डार था।
उसका कोश खाली नही था। पूर्ण था। वह सुयोग्य
राजा था। कोश बल पूर्ण था। राजा स्वर्ण भण्डार
का दान देकर दान के पुण्य का भागी बन सकता
था। बौद्ध धर्म में दान का बहुत महत्त्व है। बौद्ध
साहित्य में विहार, चैत्य, वन, शालादि निर्माण
कराने वालों की बड़ी प्रशंसा की गयी है। भगवान्
बुद्ध ने जेतवन निर्माणकर्त्ता अनाथपिण्डक, पूर्वाराम
निर्माणकर्त्री विशाखा, जीवक वन निर्माण कर्त्ता जीवक
आदि की बडी प्रशंसा की है। यहाँ कल्हण इसी
दान की ओर संकेत करता है। बोधिसत्त्व उसके अप-
राधों को इस प्रकार क्षमा कर देंगे। इसे स्पष्ट रूप
से यहाँ कहा गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४५ में 'पापा' का 'पापो'
'संवृत्ता' का 'संजाता' पाठभेद मिलता है।
१४५ (१) स्वस्ति : कल्हण ने यहाँ वैदिक शब्द
स्वस्ति का प्रयोग कृत्या से कराया है। वह महत्त्व-
पूर्ण है। बौद्ध धर्म वेद की मान्यता नही देता। उसकी
परम्परा में विशेष आस्था नही रखता। कश्मीर में
बौद्ध धर्म, वैदिक परम्परा तथा तत्कालीन हिन्दू धर्म
से इतना प्रभावित हो गया था कि दोनो में भेद नाम
मात्र का रह गया था। बुद्ध को अवतार मान लेने
पर रहा सहा भेद भी नष्ट हो गया था। स्वस्ति का
अर्थ कल्याण है। स्वस्ति शब्द का प्रथम उल्लेख
ऋग्वेद (१:१:९;१:३५:१;२:३२:८;१०:८;३:३१:
२१;२:३८:१;३:३८:९) में मिलता है। स्वस्ति
वाचन भारतीय परम्परा है। स्वस्ति का अर्थ जाति
प्रथम तरंग १९९
अथ कृत्याश्रमं कृत्वा विहारं वसुधाधिपः ।
तत्रैव क्षीणतमसं कृत्यादेवीमसन्धयत् ॥ १४७ ॥
१४७. तत्पश्चात् उस वसुधाधिप ने कृत्याश्रम^१ में विहार का निर्माण कराया। वहाँ
क्षीण तमस कृत्या देवी की राजा ने उपासना^२ की।
मात्र का प्रतीक है। चाहे वे हिन्दू, ईसाई या कोई
भी क्यों न हों ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४७ में 'श्रमं' का 'श्रये' 'मसन्ध-
यत्' का 'मवन्दयत' पाठभेद मिलता है।
१४७ ( १ ) कृत्याश्रम : बारहमूला से पांच
मिल अधोभाग में वितस्ता के वामतट पर वर्तमान
कित्सहोम ग्राम प्राचीन कृत्याश्रम का स्थान है।
चीनी पर्यटक ओ कुङ्ग (सन् ७५६-७६३ ई० )
कश्मीर पर्यटन काल में इस स्थान को देखा था ।
उसका उल्लेख किया है । कल्हण ने इसका पुनः
उल्लेख रा० ४.२४० में किया है। ओ कुङ्ग के
अनुसार वह एक गाँव था । बारहमूला के समीप
था। उसे किचाधम भी कहा गया है। ओ कुङ्ग ने
इसे कित्चे नाम से सम्बोधित किया है। ओं कुङ्ग
के पर्यटन काल में इस स्थान को किचा कहा जाता
था। उसे उसने अपनी भाषा में कित्चे लिखा है।
श्री स्तीन यहाँ मई सन् १८९६ ई० में आये
थे। यह ग्राम वितस्ता नदी तथा पर्वत बाहमूल के
मध्य स्थित है। यहाँ दो ग्रामीण मस्जिदें बनी हैं।
श्री स्तीन को मस्जिदों के समीप कुछ अलंकृत
शिला खण्ड दिखायी पड़े थे। उनमें कुछ मूर्ति खुदे
शिला खण्ड थे। उन्हें ग्राम के उत्तर ११५ वर्ग गज
पर प्राचीर अर्थात् दिवाल का आयताकार नींव चिन्ह
मिला था। इस हाता के केन्द्र में श्री स्तीन को एक
ऊँचा स्थान दिखाई दिया था। उसे वहाँ के लोग
गद्दी कहते थे। हाता के बाहर दक्षिण पूर्व के कोने
पर एक १५ फोट ऊँचा टीला अथवा डूहा था । श्री
स्तीन के मत से यह स्तूप का ध्वंसावशेष था । यहाँ
पर और ध्वंसावशेष तथा पत्थरादि न मिलने का
कारण स्तीन ने यह दिया है ।
यहाँ की उपत्यका में पठान शासन काल में पूर्व
दिशा में एक सीधी दिवाल कित्सहोम से बोयाई
मिल दूर पर बना दी गयी थी। इस दिवाल का
अस्तित्व सन् १८३५ ई० तक था। बैरन थी
हुजेल इस ओर आये थे। इस दिवाल को नदी के
पार से देखा था। यह दिवाल प्राचीन कृत्याश्रम के
ध्वंसावशेष से प्राप्त पत्थरों से बनायी गयी थी।
नवीन सड़क का निर्माण सन् १८८६ ई० के लगभग
होने लगा। उक्त दिवाल कृत्याश्रम से प्राप्त
पत्थरों और उक्त डूहे से बहुत पत्थर लिये गये थे।
यही कारण है कि राजा जलोक द्वारा निर्मित कृत्या-
श्रम विहार का स्पष्ट चिन्ह नहीं मिलता। जो कुछ
शिलाखण्ड शेष बच गये थे वे सड़क निर्माण में
लग गये ।
मैं यहाँ आ चुका हूँ। बारहमूला से उरी जाने
वाली सड़क पर अनेक मन्दिर बायें पार्श्व में बने
आज भी खड़े हैं। कुछ में तो छतें बिल्कुल नहीं है
और कुछ पर टिन आदि की छतें लगा दी गयी हैं।
दो एक टूटे मन्दिरों में मैंने दक्षिण भारतीय साधुओं
को निवास करते हुए पाया। ये उन टूटे देवस्थानों
में दीपक जलाते तथा पूजा करते थे।
मुझे कित्सहोम अथवा कृत्याश्रम में स्तीन द्वारा
वर्णित बातो के अतिरिक्त विशेष और देखने को कुछ
नहीं मिला। यदि यहाँ खनन कार्य हो तो कुछ
२०० राजतरंगिणी
विधाय सोऽश्मप्रासादं नन्दिक्षेत्रे क्ष्मापतिः ।
भूतेशाय समं कोशैः पूजां रत्नमयीं ददौ ॥ १४८ ॥
१४८. नन्दिक्षेत्र १ में राजा ने अश्म प्रासाद भूतेश २ निमित्त निर्माण कराया। उसने कोश के
साथ ही साथ रत्नों ३ द्वारा भगवान् की विधिवत् पूजा की ।
सामग्री मिल सकती है। इस समय यहाँ के समीपवर्ती
क्षेत्र मे सैनिक कैम्प लगे हैं । पाकिस्तान से रावल-
पिण्डी श्रीनगर आने वाली यही मुख्य सड़क हैं। इस
सडक पर बहुत लड़ाइयाँ हो चुकी हैं। उनके स्मारक
भारतीय सुरक्षा विभाग ने स्थान-स्थान पर बनवा
दिये हैं। यहाँ के शेष पत्थर आदि कुछ ही दिनों में
विकास योजनाओ मे लुप्त हो जायेंगे । ग्राम का
प्राचीन रूप बदल गया है ।
जलोक शैव था । जाति पांति हीन संघ एवं
समाज की जो स्थापना बौद्धों द्वारा हो रही थी वह
पुनः वर्णाश्रम आधारित समाज की ओर मुड़ रही थी,
राजा शैव होने पर भी कृत्या के नाम पर कृत्याश्रम
विहार की स्थापना किया था । निस्सन्देह वह विहार
ग्यारहवी शताब्दी तक कायम था । कल्हण के
समय चाहे इसका पूर्व गौरव लुप्त हो गया था परन्तु
विहार एवं स्तूप का आकार शेष था ।
क्षेमेन्द्र अपनी पुस्तक समयमातृका (सन् १०५०)
में नायिका कंकाली को इस विहार में ठहराता है।
इससे भी स्पष्ट है कि क्षेमेन्द्र काल में वह विहार
निवास करने योग्य था और उसका पूर्व गौरव
लुप्त नही हुआ था ।
बोध मूल ग्राम कृत्याश्रम के समीप है। जहाँ
पर बौद्ध कालीन वस्तुएँ पाई जाती है। बारहमूला
के समान कहा जाता है कि यहाँ भगवान् ने निवास
किया था ।
बारहमूला से कृत्याश्रम की ओर चलने पर
हुष्कपुर, गाण्डव विहार, आदि प्राचीन स्थानों के
क्षेत्र मिलते हैं ।
महाभारत में कृतिकाश्रम एक तीर्थ का वर्णन
मिलता है । अनुशासन पर्व में विस्तृत उल्लेख मिलता
है। महाभारत तथा कल्हण वर्णित कृत्याश्रम दोनो
ही जलाशय के पास थे । (म० अनु०; २५:२५)
महाभारत में कृत्या का उल्लेख मिलता है ।
दैत्यों ने आभिचारिक यज्ञ द्वारा एक राक्षसी को उत्पन्न
किया था। वह आमरण अनशनकारी दुर्योधन को
उठाकर रसातल ले गयी थी। (म. वन : २५२:
२१-२०) भीष्म पर्व महाभारत मे कृत्या नामक एक
नदी का भी उल्लेख मिलता है। (९:१८) महाभारत
वर्णित आश्रम तथा कृत्याश्रम दो भिन्न स्थान प्रतीत
होते हैं । अनुसन्धान का विषय है ।
(३) कृत्या उपासना : राजा की सहिष्णुता की
यहाँ पराकाष्ठा दिखाई गयी है। जिस कृत्या ने
राजा का मांस मांगा था, जिसने बौद्धो के उच्छेद
से राजा को विरत किया था, जिसने राजा का
स्वयं बोधिसत्त्व अर्थात् ईश्वर रूप दर्शन कर, तप
क्षम किया था, उसे ही राजा ने देवी मानकर उसकी
स्मृति में कृत्याश्रम विहार का निर्माण कराया था ।
राजा चाहे कट्टर वर्णाश्रम धर्मानुयायी क्यों न रहा
हो, उसने इस घटना के पश्चात् अपनी उग्रता
शिथिल कर दी थी। उसके विचारों में परिवर्तन
हुआ था । अन्यथा जिस बौद्ध धर्म को उच्छिन्न करने
पर तुला था, ठोस कदम उठाया था, उसी के प्रति
आदर प्रकट कर विहार का निर्माण न कराता ।
इससे यह बात प्रकट होती है कि राजा सभी पन्थो
के प्रति आदर करता था। आज कल के हिन्दुओं के
समान सभी देवी देवताओ को उपासना तथा पूजा
करने में संकोच नही करता था।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४८ में 'सोऽश्म' का 'गोप्य' 'समं'
का 'समा'; 'कोशैः' का 'कोषैः'; पूजा का 'प्रभां'
पाठभेद मिलता है ।
प्रथम तरंग २०१
चीरमोचनतीर्थान्तर्गणरात्र तपस्यता ।
ब्रह्मासननिविष्टेन ध्याननिष्पन्दमूर्तिना ॥१४६॥
१४९. राजा ने ब्रह्मासनस्थ¹ होकर स्पन्दन हीन मूर्तिवत् चीरमोचन तीर्थ² में ध्यान रत
होकर अनेक रात्रियाँ व्यतीत कीं ।
पादटिप्पणियाँ :
१४८ (१) नन्दिक्षेत्र. पाद टिप्पणी पृष्ठ ७६
रा० त० १.३६ द्रष्टव्य है ।
(२) भूतेश : पादटिप्पणी रा० त० १:१०७
पृष्ठ द्रष्टव्य है । यह भूतेश्वर के पूर्वीयद्वीप समूह का
मुख्य और बड़ा मन्दिर है ।
(३) रत्न पूजा . कश्मीर शिव पूजा पद्धति में
रत्न तथा मूल्यवान धातुओं को देवताओं पर चढ़ाने
तथा उनसे पूजा करने का उल्लेख मिलता है । यह
प्रथा अब भी प्रचलित है । शिव लिंग पर सुवर्ण,
रजत मुकुट अथवा रत्न जड़ित मुकुट, मेखला, माला,
शेष नाग, जलद्रोणी, अर्घा, पंचपात्र, आरती आदि
चढ़ाया जाता है । दक्षिण रामेश्वर में रत्न का एक
भण्डार ही है । विभिन्न पर्वों में विभिन्न रत्नों तथा
श्रृंगार विशेष से पूजा की जाती है । रामेश्वरादि
दक्षिण के मन्दिर में इन रत्नों को यात्रियो को
दिखाया भी जाता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४६ में 'चीर' का 'क्षीर';
निष्पन्द का नि स्पन्द, निस्पन्द पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१४९ (१) ब्रह्मासन : कल्हण राजा के योग
का वर्णन करता है । राजा को वीर, क्षमाशील,
दानी तथा धर्म परायण अब तक चित्रित करता
चला आया है । अब उसने राजा के योग का उल्लेख
कर उसे योगी रूप में चित्रित करने का प्रयास
किया है । पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिक आसन ध्यान
के लिये योगशास्त्रानुसार श्रेष्ठ कहे गये हैं। उनके
स्थान पर ब्रह्मासन का उल्लेख किया गया है ।
ब्रह्मासन वह योगो लगाता है जो ब्रह्मा का ध्यान
२६
करता है । राजा शैव था । विष्णु के अवतार बुद्ध
के प्रति भक्ति होने के कारण विष्णु भक्त तथा
अन्तिम काल में उसने ब्रह्मासन लगा कर ब्रह्मा की
उपासना की । ब्रह्मा का ध्यान किया जो विश्व का
कर्ता है । समस्त जीवन उसने विष्णु के अनुरूप रक्षा
का कार्य किया, शिव गुण के अनुरूप संहार का भी
कार्य किया । जीवन के अन्तिम अध्याय में उसने
जगत कर्ता ब्रह्मा का ध्यान किया ।
योग में ध्यान की मुद्रा मेरुदण्ड को सीधा रखकर
ध्यान लगाना है । मेरु दण्ड सीधा होने पर इड़ा ओर
पिंगला नाड़ियों से प्राण संचार बन्द हो कर सुषुम्ना
नाडी में प्रवेश करता है । सुषुम्ना में प्राण संचार के
कारण योगी का ध्यान लगता है । वह वायुहीन तैल
दीप की ज्योति के समान कम्पनहीन हो जाता है ।
वह इस ध्यान मुद्रा में आत्मा का साक्षात्कार करता
है। वह विदेह स्थिति प्राप्त करता है। वह आत्मा
और शरीर के सम्बन्ध को समझ जाता है । वह
आत्मानुभूति में रम जाता है । स्थूल जगत् से ऊपर
उठता है । उसे सविकल्प के पश्चात् निर्विकल्प समाधि
लग जाती है । राजा अनेक रात्रियों तक निस्पन्द
बैठा रहा । इसका स्पष्ट अर्थ है । वह समाधि में
ध्यानस्थ था । वह दृश्य, दर्शन, द्रष्टा, की स्थिति-से
ऊपर उठकर एकाकार हो गया था ! वह कर्ता,
कार्य, कारक की स्थिति से ऊपर उठ गया था । वह
भौतिक जगत् की सीमा पार कर आध्यात्मिक जगत्
में विचरण करता था । वह भूताकाश, चित्ताकाश
की स्थिति से चिदाकाश को स्थिति में आ गया था ।
वह कर्मेन्द्रियो एवं ज्ञानेन्द्रियों के प्रपंच एवं बन्धन को
छोड़ कर मुक्त हो चुका था । वह ब्रह्मासन पर बैठ-
कर ब्रह्मा में लीन होना चाहता था । ब्रह्मा के कारण
२०२ राजतरंगिणी
उसको रचना हुई थी यह उसी सर्जक ब्रह्मा के पास
पुनः लौट कर मुक्त होना चाहता था ।
(२) चीरमोचन : नीलमत पुराण के आधार
पर कहा जा सकता है कि चीरमोचन तीर्थ कनक-
वाहिनी नदी के समीप कहीं था । नीलमत पुराण
( श्लोक १३२५-१३२८ ) से चीर मोचन तीर्थ के
स्थान के सम्बन्ध में एक सूत्र मिल जाता है उससे
स्थान का पता लगाया जा सकता है। श्रीस्टीन ने
भी इस सम्बन्ध में प्रयास किया है । उन्होंने भी इस
तीर्थ के सम्बन्ध में अनुमान लगाया है ।
चीरमोचन तीर्थ का नामकरण सप्तर्षियों के
'चीराणि' अर्थात् वल्कल वस्त्र के कारण पड़ा था ।
इस तीर्थ पर सप्तर्षि गण अपना चीर त्याग कर
स्वर्गारोहण किये थे ।
नन्दि क्षेत्र माहात्म्य स्पष्टतया कनकवाहिनी नदी
का सम्बन्ध चीरमोचन तीर्थ से जोड़ता है। श्री
स्टीन जिस समय कश्मीर का पर्यटन कर रहे थे उस
समय कश्मीर के पण्डितों को चीरमोचन तीर्थ का
ज्ञान नहीं था । लम्बे काल एवं लम्बे मुस्लिम शासन
के कारण अन्य तीर्थों के समान वह स्थान भी लोग
भूल चुके थे । हरमुकुट के पुरोहितों से भी श्री
स्टीन ने जिज्ञासा की थी । परन्तु वे भी कुछ
प्रकाश नही डाल सके थे ।
नीलमत पुराण तीर्थों में स्नान के सम्बन्ध में
उल्लेख करते हुए कनकवाहिनी और सिन्धु-संगम
का उल्लेख श्लोक संख्या १३२५ में किया है । श्लोक
संख्या १३२६ में पावन तथा रजोविन्द नदियों में
स्नान करनेवाला पुण्डरीक तथा राजसूय फल का
भागी होता है कहा गया है। श्लोक संख्या १३२७ में
नीलमत पुराण कहता है कि वहाँ से चीरमोचन
तीर्थ तक विस्तृत क्षेत्र वाराणसी के समान
पवित्र है । श्लोक संख्या १३२८ में चीरमोचन का
उल्लेख करता पुराण कहता है । चीरमोचन का
पवित्र स्थान स्वर्ग मार्ग प्रशस्त करता है । वहाँ पर
सभी तीर्थ उपस्थित रहते हैं । श्लोक संख्या १०२६
में नामकरण का कारण उपस्थित करता है—यहाँ
सप्तर्षि अपना चीर त्याग कर स्वर्गारोहण किये थे ।
यहाँ स्नान करने पर पापी भी स्वर्ग गमन करते हैं।
श्लोक संख्या १३३० में सोदर तीर्थ का उल्लेख दिया
गया है ।
तयोः समागमे पुण्ये राजसूयफलं स्मृतम् ।
तस्माद्देशादारभ्य यावत्स्याच्चीरमोचनम् ॥
॥ १५४१ ॥
स्वर्गमार्गप्रदं प्रोक्तं तीर्थं चीरप्रमोचनम् ।
दिवमुत्सृज्य चीराणि यत्र सप्तर्षयो गताः ॥
॥ १५४३ ॥
नीलमत के अनुसार कनकवाहिनी सिन्धु
तत्पश्चात् पावन एवं रजोविन्दु नदियों के बाद और
सोदर तीर्थ के मध्य कहीं चीरमोचन तीर्थ होना
चाहिए ।
दूसरा सूत्र इस स्थान का पता लगाने का यह
मिलता है कि यह स्थान कनकवाहिनी नदी के समीप
था । वशिष्ठाश्रम अर्थात् वेगय चीरमोचन के ऊपर
कनकवाहिनी के तट पर था । सप्तऋषियों में एक
ऋषि वशिष्ठ भी हैं । चीरमोचन में सप्तऋषियों ने
स्वर्गारोहण किया था यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है ।
राजा जलोक भूतेश का उपासक था । नन्दिक्षेत्र
का उसके जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध था । चीरमोचन
से भूतेश्वर सीधे मार्ग से लगभग १० मिल और
वशिष्ठाश्रम लगभग आठ मिल पड़ता है। क्या कारण
है। राजा ने अपने प्रिय स्थान भूतेश्वर में जाकर
तपस्या नहीं की। उसने चीरमोचन तीर्थ ही
तपस्या निमित्त क्यो चुना ?
श्री स्टीन ने इस विषय में यथेष्ठ परिश्रम तथा
अनुमान लगाया है । हरमुकुट गंगा माहात्म्य में
कनकवाहिनी नदी का नाम करंक नदी दिया है ।
करंक तीर्थ को करंक ग्राम के समीप बताया गया हैं।
हरमुकुट सर की यात्रा के पूर्व इस तीर्थ में स्नान
आवश्यक माना गया है। श्री स्टीन को पुरोहितों
प्रथम तरंग [२०३]
[बायाँ स्तम्भ]
से मालूम हुआ था। यह स्थान प्रंग ग्राम के नीचे
सिंधु नदी के दक्षिण तट पर था। यह एक छोटे
गाँव लरी के समीप है। प्रंग ग्राम के कुछ मकानो
के पश्चात् एक छोटी धारा कनकवाहिनी की मुख्य
धारा से शाखा रूप वारबुल के समीप फूट कर सिन्धु
नदी में मिलती है। इस संगम स्थान पर करंक तीर्थ
में विहित श्राद्ध किया जाता है। यह स्थान प्राचीन
चीरमोचन तीर्थ श्री स्टीन ने माना है। उन्होंने
इसका कारण उपस्थित किया है। उनका मत है कि
हरमुकुट माहात्म्य प्राचीन ग्रंथ नहीं है। उसमें ग्रामों
तथा स्थानों के नवीन नाम मिलते हैं। वे प्राचीन
नामो के अपभ्रंश हैं। उसमें भूतेश्वर का नाम
वोधेश्वर दिया गया है। अमरेश्वर का नाम अम्बो-
रूह बना दिया गया है। वह वर्त्तमान अम्बुरहर
है। कनकवाहिनी नदी का नाम करंक नदी दिया
गया है। उसका वर्तमान नाम कंकनी नदी हो गया
है। इसी प्रकार प्राचीन चीरमोचन का नाम करंक
हो गया है।
नीलमत पुराण, नन्दि क्षेत्र माहात्म्य तथा राज-
तरंगिणी चीर मोचन का उल्लेख कनकवाहिनी के
समीप करती हैं। करंक तीर्थ के विषय में वे चुप
है। दूसरी तरफ हरमुकुट माहात्म्य जिसमें चीर-
मोचन तीर्थ का उल्लेख नहीं है। करंक तीर्थ को
कंकनी नदी के समीप बताता है।
नीलमत पुराण इस स्थान का तथा क्षेत्र का
निश्चित पता देता है। मैं वहाँ पर आया था। मुझे
वहाँ कोई प्राचीन चिह्न नहीं प्राप्त हुआ।
मेरे मन में यह तर्क उठा था। जलोक ने
तपस्या निमित्त इस स्थान को क्यो चुना था ? राजा
ने भूतेश्वर जैसे दुर्गम स्थान में जाना पसन्द न किया
होगा। दोनो स्थान देखने पर निस्सन्देह वर्तमान
चीरमोचन का स्थान अधिक शांत मालूम होता है।
भूतेश्वर में कनकवाहिनी या कंकरुल उग्र निनाद
होता रहता है। स्थान उत्तुङ्ग पर्वत से आवृत है।
तेज पर्वतीय हवा चलती है। भयंकर तुषारपात
[दायाँ स्तम्भ]
होता है। जंगली जन्तुओं का उपद्रव आज की अपेक्षा
उस समय और अधिक रहा होगा।
यह स्थान राजधानी श्रीनगर से लगभग पन्द्रह
मिल दूर है। श्रीनगर से चीरमोचन तक का मार्ग
पहाडी नहीं बल्कि समथर है। दिन मे आसानी से
व्यक्ति श्रीनगर से घोड़ो से पहुँच और लौट सकता
था। वह स्थान श्रीनगर के धुर उत्तर है। वहाँ से
वितस्ता सिंधु संगम अर्थात् प्रयाग लगभग बीस मिल
दक्षिण पश्चिम पड़ता है। काश्मीरी राजाओं का दाह
प्रयाग में होना पुण्य माना जाता रहा है। आज
भी यह प्रथा प्रचलित है। काश्मीरी ब्राह्मण या तो
यहाँ फूंका जाना पसन्द करते हैं अथवा उनका अस्थि
विसर्जन यहाँ किया जाता है। पंडित जवाहरलाल
नेहरू काश्मीरी ब्राह्मण थे। उनके भस्म के एक भाग
का यहाँ प्रवाह किया गया था।
राजा जलौक ने अपने स्वर्गारोहण निमित्त यह
स्थान उपयुक्त ही चुना था। स्थान राजधानी तथा
दाह स्थान दोनो से दूर थे। काल की दिशा दक्षिण
समझी जाती है। चीरमोचन से प्रयाग संगम दक्षिण
दिशा की ओर पड़ता है। स्वर्गारोहण के लिये उत्तर
दिशा श्रेष्ठ मानी गयी है। पाण्डवों ने उत्तर दिशा में
ही गमन किया था। भगवान् बुद्ध राजगृह से उत्तर
दिशा कुशीनगर में आये थे। राजा जलौक
स्वर्गारोहण निमित्त अपना राजप्रासाद त्याग कर
उत्तर दिशा चीरमोचन पहुँचा था।
राजाने प्रतीत होता है। इच्छामृत्यु प्राप्त की
थी। योग एवं ध्यान के लिये उस काल में जब चीर-
मोचन मे आबादी न रही होगी, स्थान शान्त,
प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों उपद्रवों तथा कोलाहलों
से दूर था। वह भूतेश्वर जैसे घोर पर्वतीय एवं
श्रीनगर जैसे जनाकीर्ण स्थानों के मध्य में था। वह
स्थान ध्यान .योग एवं समाधि के लिए उपयुक्त था।
सप्तर्षियो ने चीरमोचन मे स्वर्गारोहण किया था।
वशिष्ट ब्रह्मा के पुत्र हैं। राजा ने ब्रह्मासन लगाया
था। ब्रह्मा की उपासना की थी। चीरमोचन स्थान
२०४ राजतरंगिणी
राज्ञा कनकवाहिन्याः शुचिगत्पुण्यकर्मणा ।
नन्दीशस्पर्शनोत्कण्ठा तेनानीयत कुण्ठताम् ॥ १५० ॥
१५०. उस पवित्र पुण्यात्मा राजा की कुछ समय पश्चात् नन्दीश स्पर्श की प्रबल उत्कण्ठा
कनकवाहिनी २ नदी के कारण कुण्ठित हो गयी।
सप्तर्षियों के स्वर्गारोहण के कारण पवित्र माना जाता
था । अतएव ऐसे पुण्य स्थान का चयन भावना तथा
विवेक दोनों दृष्टियों से राजा ने उचित ही किया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४९ में 'कनकवाहिन्याः' का
'कनकवाहिन्या', 'स्पर्शनो' का 'स्पर्शने' तथा
'कुण्ठताम्' का पाठभेद 'कुण्ठनाम्' और 'कुण्डनाम्'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१५० (१) श्लोक १५० : यह श्लोक कुछ
स्पष्ट नहीं है। इसका अर्थ बैठता नहीं। कनक
वाहिनी के कारण राजा की उत्कण्ठा क्यों कुण्ठित
हुई समझ में नहीं आता ।
श्री स्टीन ने उक्त श्लोक को पादटिप्पणी में
श्लोक को स्पष्ट करने के लिए एक और अर्थ किया
है—राजा ने अपनी तपस्या द्वारा कनकवाहिनी
नदी की नन्दीश के स्पर्श की इच्छा धीरे-धीरे शिथिल
कर दिया ।
मैं इसका अर्थ यह लगाता हूँ कि राजा स्वयं
अवतार था। नन्दीश स्वरूप हो गया था। कनक-
वाहिनी नदी नन्दी क्षेत्र से प्रवाहित होती आती है।
उसने राजा के ही तपस्या के कारण नन्दीश स्वरूप
समझा। अतएव कनकवाहिनी नदी की नन्दीश
स्पर्श की कामना नहीं रह गयी। यदि इसका
अनुवाद वाला उक्त अर्थ मान लिया जाय तो उसका
भाष्य यही किया जा सकता है कि राजा अपनी
तपस्या के कारण इस स्तर पर पहुँच गया था कि
उसकी नन्दी स्पर्श की उत्कण्ठा कनकवाहिनी के
कारण इसलिए कुण्ठित हो गयी थी कि कनक-
वाहिनी नन्दी क्षेत्र का स्पर्श करती नित्य प्रति चली
आ रही थी । वह राजा कनकवाहिनी में स्नान
कर, उसके समीप तपस्या कर स्वयं अनुभव करता
रहा कि प्रत्येक जल बिन्दु नन्दिक्षेत्र से स्पर्श
करते चले आ रहे हैं। उनके माध्यम से नन्दीश का
स्पर्श कर चुका है। एतदर्थ नन्दीश स्पर्श की
जो कामना तिरोहित हो चुकी थी। वह तपस्या के
कारण नन्दीश का सांनिध्य प्राप्त कर चुका था।
(२) कनकवाहिनी : नीलमत पुराण (श्लोक
१३३०—१३३१) इस नदी का स्थान निश्चित कर
देता है। चोरमोचन के पश्चात् श्लोक संख्या
१३३० में नीलमत सोदर तीर्थ के स्थान का महत्त्व
बताता है। तत्पश्चात् श्लोक संख्या १. १२३१ में
कनकवाहिनी तथा कालोदया नदी के संगम में स्नान
करने का उल्लेख करता है।
संयोगं सिन्धुना यत्र गता कनकवाहिनी ।
गोसहस्रम् वाप्नोति धनवानपि जायते ॥
॥ १५३९ ॥
तथा कनकवाहिन्या संगम याति यो नरः ।
तथा कालोदया पुण्या नदी यत्रैव संगता ॥
॥ १५४० ॥
स्नात्वा तत्र दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः ।
सोदरे तु नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
॥ १५४१ ॥
एकमत है कि नीलमत वर्णित हिरण्या नदी
ही कनकवाहिनी नदी है । 'हरिणीनी पुण्यजला
नाम्ना' यह स्रोतस्विनी भूतेश्वर के नीचे से
बहती है। इसे आजकल कंकनी अथवा ककनई नदी
कहते हैं।
प्रथम तरंग ५०२
ह्लादोद्यान्नृत्तगीतक्षणे नर्तितुमुत्थितम् ।
प्रददौ ज्येष्ठरुद्राय सोऽवरोधवधुशतम् ॥ १५१ ॥
१५१. ज्येष्ठ रुद्र¹ के नृत्य एवं गान² के समय अन्तःपुर की स्त्रियों को नृत्य एवं गान
निमित्त खड़ी होती देखकर आह्लादित राजा ने एक शत स्त्रियाँ ज्येष्ठरुद्र को दे दीं ।
भूतेश्वर के ऊपर अर्थात् उत्तर तरफ अनेक
नाग पड़ते हैं। उनमें ब्रह्मसर भी एक नाग पड़ता है
उसके ऊपर कालोदक है । हरमुकुट गंगा का यह
अन्तिम तीर्थ स्थल है । प्रति वर्ष भाद्रपद में
तीर्थ यात्रा काल पड़ता है । वर्ष मे जो लोग
दिवंगत होते हैं, उनका अस्थि प्रवाह भी इसमें
किया जाता है । इस सर के कुछ नीचे एक दूसरा
सर है । उसे कालोदरू कहते हैं । नन्दीसर भी
उसकी एक संज्ञा है। गाथा है। काल तथा शिव
दोनों का यह निवास स्थान था। यही शिव के
नन्दी भी रहते थे। कनकवाहिनी नदी में इनका
तथा हरमुकुट पर्वत के पूर्व तथा दक्षिण पूर्व का जल
कनकवाहिनी में आता है। नीलमत पुराण के
अनुसार कनकवाहिनी का प्रवाह सोदर तीर्थ के
दक्षिण है । यह काश्मीर का मानचित्र देखने से
स्पष्ट होता है । वह उत्तर से बहती आती है।
भूतेश्वर के समीपस्थ भूखण्ड का स्पर्श करती नीचे
बहती दक्षिण की ओर चली जाती है। यदि सोदर
अर्थात् नरनाग अथवा भूतेश्वर मन्दिर पर खड़े होकर
देखें तो इन स्थानों के पूर्वीय अंचल का स्पर्श
करती भयंकर गर्त में, बहती दक्षिण दिशा की ओर
चली जाती है । कनकवाहिनी में हरमुकुट के गंगा
सरोवर अर्थात् गंगवल और पवित्र नन्द कोल के
जलस्रोत आकर मिलते हैं ।
(२) नृत्य एवं गान : मन्दिरों में देवताओ के
सम्मुख नृत्य एवं गान निमित्त स्त्रियो की नियुक्त
करने की प्रथा कश्मीर में प्राचीन काल से प्रचलित
थी । गान तथा नृत्य वंश परम्परा गत भी चलता
था। देव दासी प्रथा दक्षिण भारत की तरह इस
समय कश्मीर में प्रचलित नही थी परन्तु स्त्रियाँ स्वतः
अपने को देवता पर अर्पित कर देती थी। नृत्य एवं
संगीत कार्य पेशेवर स्त्रियो तक सीमित नही था।
मन्दिरो तथा देवालयों में घर गृहस्थो की भी स्त्रियाँ
नृत्य एवं गान में भाग लेतो थी ।
कल्हण ने (रा० त० ४:२६९-२७०) राजा
ललितादित्य के प्रसंग में वंशानुगत नृत्य एवं गान
की प्रथा का वर्णन किया है। राजा ललिता-
दित्य को एक वन में युवतियां नाचती और गाती
दिखायी पड़ी थी । राजा ने उनसे उस एकान्त स्थान
मे नृत्य एवं गान का कारण पूछा। युवतियो ने
राजा को सूचित किया कि इस स्थान पर अनादि
काल से उनके कुटुम्ब की कन्या किंवा युवतियों
निश्चित समय पर आती थी । नाचती थीं । गाती
थी । पुनः चली जाती थीं। राजा चकित हुआ । वहाँ
उनका नृत्य तथा गान सुनने अथवा देखने वाला कोई
नही था । प्रसंग वश उसे मालूम हुआ था । वहीं
कोई देव स्थान कभी था। राजा को कौतूहल हुआ ।
उसने उस स्थान पर खनन कार्य किया । भूमि के
नीचे केशव का मन्दिर मिला। वह शताब्दियों से
वही भूमिस्थ हो गया था। अथवा मिट्टी पड़ते-पड़ते
वह छिप गया था ।
वहाँ मन्दिर था। वह परम्परा किंवा जनश्रुति
चली आ रही थी। जिस कुटुम्ब के लोग मन्दिर में
गाते तथा नाचते रहे वे मन्दिर के भूमि में लोप
पाठभेद :
श्लोक संख्या १५१ में 'नृत्त' का 'नृत्य' तथा
'सोऽवरोध' का पाठभेद 'स्वावराध' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१५१ (१) ज्येष्ठरुद्र वादटिप्पणी १.११३
द्रष्टव्य है।
२०६ राजतरंगिणी
भुक्तवैश्वर्यं स पर्यन्ते प्रविष्टश्चीरमोचनम् ।
पत्न्या समं ययौ राजा सायुज्यं गिरिजापतेः ॥ १५२ ॥
१५२. ऐश्वर्य भोगकर राजा ने चीरमोचन में अपनी पत्नी १ के साथ प्रवेश किया । पत्नी सहित
उस राजा ने गिरिजापति के साथ सायुज्य २ प्राप्त किया ।
हो जाने पर भी नियमतः नृत्य एवं गान की परम्परा पाठभेद :
का निर्वाह करते चले आ रहे थे । श्लोक संख्या १५० में 'प्रविष्टश्चो' का पाठभेद
इसी तरंग के छत्तीसवं श्लोक में नोण वणिक् 'प्रतिष्ठं चो' तथा 'प्रविष्टञ्चो' मिलता है ।
का वर्णन मिलता है। उसने अपनी पत्नी को मन्दिर पादटिप्पणियाँ :
में गान एवं नृत्य निमित्त दान कर दिया था । १५२ (१) पत्नी : कल्हण ने राजा का चरित्र
कश्मीर में नृत्य एवं संगीत कला पुरा काल से पवित्रता तथा धार्मिक प्रवृत्ति से 'पूर्ण कर दिया है ।
ही विकसित थी। राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत में कल्हण यहाँ केवल एक ही पत्नी का उल्लेख करता
भाग लेते थे । इस तरंग के श्लोक ४२३ से पता है । प्रतीत होता है । राजा एक पत्नीव्रतधारी था ।
चलता है कि राजा जयापीड ने भरत मुनि कृत उसका आचरण अनुकरणीय था । पत्नी भौतिक सुख
नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। वह नृत्य तथा त्याग कर पति के साथ चीरमोचन तीर्थ में स्वर्गारोहण
संगीत का विद्वान् था । निमित्त आयी थी । पति का जीवन पर्यन्त साथ दिया
काश्मीर का राजा हर्ष स्वयं संगीत एवं नृत्य था । अन्तिम समय में भी साथ दिया । वह लोक में
विशारद था । उसके रचित गीत जनता गाती थी । साथ थी। परलोक साथ गयी ।
राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत की शिक्षा लोगों को पति के साथ पत्नी सती हुई इसका उल्लेख
देता था। युवराज काल में ही वह अपने पिता नहीं मिलता है। यदि वह सती होती तो कल्हण
राजा कलश की राज्य सभा में गीत की रचना उसका अवश्य उल्लेख करता । राजा ने जिस
करता था । उन्हें स्वयं गाता था । प्रकार अन्तिम काल में योग का आश्रय लिया और
इच्छा मृत्यु प्राप्त की। उसी प्रकार पत्नी ने भी
तरंग (७०६-७१०) में मदिरालय में वृद्धा मृत्यु प्राप्त किया होगा । राजा मृत्यु के आलिंगन की
वेश्या के नाचने का उल्लेख मिलता है । कर्णवती प्रबल उत्कण्ठा से चीरमोचन तीर्थ में प्रविष्ट हुआ
नर्तकी का उल्लेख (रा . त . ७ ० १४६० में) था । श्रीनगर राजप्रासाद में भौतिक प्रसाधनों के
मिलता है। कश्मीर की राजसभा के गायक तथा मध्य मरना उसे अच्छा नहीं लगा । वह सप्तर्षियों
नर्तकी समाज में विशिष्ट स्थान रखते थे । उनकी के समान स्वेच्छया स्वर्ग जाना चाहता था। कल्हण
तुलना यूनान के हेटेरेरा वर्ग से की जा सकती है । इसी ओर संकेत करता है कि राजा अपनी पत्नी के
कश्मीर में नृत्य, संगीत तथा काम कला बहुत साथ सायुज्य प्राप्त किया ।
विकसित थी । कुट्टनीमत जैसे ग्रन्थो का समाज (२) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्तियों में
में स्थान था । उसका रचनाकार स्वयं राजा यह एक प्रकार की मुक्ति है। एक दूसरे में इस
जयापीड का मंत्री दामोदर गुप्त था। उसके अध्ययन प्रकार मिल जाता कि परस्पर किसी प्रकार का
से कश्मीर के उत्साहपूर्ण, उल्लासपूर्ण, उमंगपूर्ण, भेद न रह जाय इस प्रकार की मुक्ति को
आह्लादपूर्ण मस्त जीवन की एक झाँकी मिलती है। सायुज्य कहते हैं ।
प्रथम तरंग २०७
कल्हण ने यहाँ शिव, शंकर, महादेव का नाम
न लेकर गिरिजापति का नाम लिया है । यह
विशेष महत्त्व रखता है । कल्हण संकेत करता है ।
राजा और रानी दोनों ने शरीर विसर्जन कर
सायुज्य प्राप्त किया । इसलिये कल्हण ने कवि दृष्टि
से गिरिजापति अर्थात् शिव शब्द का यहाँ प्रयोग
किया है । पत्नी पति की अर्द्धांगिनी होती है ।
इसी से अर्धनारीश्वर की कल्पना की गयी है ।
शिव का शरीर पत्नी एवं पति दोनों का योग अर्थात्
अर्धनारीश्वर है । एक भाग शिव तथा दूसरा भाग
पार्वती का है। गिरिजा और पति दोनों मिलकर
शिव हुए हैं । अतएव राजा जलोक अपनी पत्नी के
साथ सायुज्य प्राप्त किया । अर्थात् शिव में मिल
कर एकाकार हो गया । मुक्त हो गया । राजा का
अंश शिव तथा पत्नी का अंश गिरिजा में मिलकर
एक ही अर्धनारीश्वर के शरीर में साथ ही विलीन
हो गये । पुरुष मिल गया पुरुष भाग में और स्त्री
मिल गई स्त्री भाग में ।
सायुज्य शब्द का प्रयोग कल्हण ने बहुत
समझ और तौलकर यहाँ किया है । राजा ब्रह्मासन
पर बैठा था । उसे ब्रह्मलीन होना न कहकर
गीरोपति अर्थात् शिव में सायुज्य प्राप्त करना
लिखता है। ब्रह्मलीन केवल ऋषि तथा ब्राह्मणो का
होना पुरानी परम्परा के अनुसार कहा गया है।
राजा जलोक ब्राह्मण नहीं था । राजर्षि था । ऋषि
नही था । अतएव कल्हण पुरानी परम्परा का
निर्वाह करते हुए सायुज्य का उल्लेख करता है ।
कल्हण स्वयं शैव था अतएव उसकी दृष्टि में शिव के
सायुज्य को विशेष महत्त्व था ।
मूल्यांकनः
जलोक का चरित्र चित्रण भारतीय इतिहास
में शून्यवत् है । उसका उल्लेख सर्वत्र अशोक के एक
पुत्र के सन्दर्भ में किया गया है ।
राजा जलोक का चरित्र इतना महान् एवं
आदर्श है कि उसके जैसे चरित्रवान राजा विश्व में
इने गिने मिलेंगे ।
कल्कि अवतार का वर्णन पुराणों में मिलता है ।
म्लेच्छों के नाश तथा धर्म के पुन.स्थापना निमित्त
कल्कि अवतार होने की भविष्यद् वाणी की गयी है ।
कल्कि के काल्पनिक रूप एवं क्रिया कलाप से जलोक
का क्रिया कलाप मिलता है । सम्भव है जलोक का ही
कल्कि अवतार की कल्पना रूप में चित्रण किया गया
हो । परन्तु इस विवाद में यहाँ पड़ना उचित नहीं है ।
जलोक कल्कि अवतार के समान महान् सेनानी था ।
उसने म्लेच्छों से भूमि से विहीन किया । कल्हण के
शब्दों में वह स्वयं अवतार था । बौद्धों के शब्दों में
यह बोधिसत्त्व था । तत्कालीन सनातन धर्म तथा बौद्ध
धर्म दोनों मतावलम्बियों ने उसे अवतार चाहे न
भी हो अवतार के समकक्ष माना है ।
जलोक महान् सेनानी के अतिरिक्त, आदर्श
राजा, विद्वान्, द्रष्टा, संगठन कर्ता, चरित्रमान, उदार,
सहिष्णु, सरल, धर्मभीरु, दानी, एक पत्नीव्रतधारी,
कर्मठ एवं योगी था । उसने इच्छा मृत्यु पाकर, स्वयं
योग द्वारा शरीर त्याग कर, अपनी श्रेष्ठता तथा
अलौकिकता की छाप लगायी है ।
राजा ने विदेशियों से कश्मीर मण्डल को मुक्त
किया । कश्मीर की सैनिक शक्ति का संगठन किया ।
उसने कश्मीर वीरों को फौलाद की दीवाल तुल्य
बना दिया । उन्हें विश्व के यूनानी जैसे वीर सैनिकों
के सामने खड़ा कर दिया। वह राज्य पाकर बैठा
नहीं रहा । ऐश्वर्य में डूबा नहीं । उसने एक विज्ञ
कर्मशील राजा तुल्य अस्त्र उठाया । अभियान किया ।
भूखण्ड विजय किया । किन्तु उपनिवेशवाद का वरण
नहीं किया । उसने विजय करने के पश्चात् भी
कश्मीर मण्डल के अतिरिक्त अन्य भूखण्डों पर राज्य
नहीं किया । उन्हें अपने राज्य में सम्मिलित नहीं
किया । उनमें मित्रता स्थापित की । जिनका राज्य
था उन्ही को वहाँ रहने दिया ।
उसने कश्मीर का सामरिक एवं सुरक्षा दृष्टि से
अध्ययन किया । चतुर सेनापति के समान वह समझ
गया । कश्मीर की सुरक्षा उसके संकट या द्वार
२०८ राजतरंगिणी
अर्थात् दरों की रक्षा पर अवलम्बित है। यह प्रथम
कश्मीरी राजा था जिसने एक ठोस सैनिक नीति
की स्थापना की। उसने भविष्य के राजाओं को
चेतावनी दी जबतक कश्मीर के द्वारों की दृढ़ता पूर्वक
रक्षा होती रहेगी, कश्मीर की स्वतन्त्रता कायम रहेगी।
राजा ने द्वारों अर्थात् दरों की मोर्चेबन्दी की।
वहीं सैनिक चौकियां तथा शिविर स्थापित किया।
और उसकी रानी ईशान देवी ने द्वारों की रक्षा के
निमित्त आध्यात्मिक शक्ति मातृ चक्रों की स्थापना
की। यदि पति ने भौतिक शक्ति को उत्साहित किया
तो पत्नी ने आध्यात्मिक शक्ति का कश्मीर मण्डल
की रक्षा के लिये आश्रय लिया।
वह धर्म निरपेक्ष किंवा लौकिक राजा था। उसने
सभी धर्मों के प्रति समभाव रखा। बौद्धों के प्रति
उसका रोष स्वाभाविक था। बौद्धों का संघटन,
राष्ट्र के प्रति निसंकोच निष्ठा भावना का अभाव,
प्रारम्भ में उसे उनका विरोधी बना दिया था।
उसने सनातन धर्म की पुनः स्थापना की।
कल्कि अवतार तुल्य उसने सनातन धर्म का कश्मीर
मण्डल में उद्धार किया। परन्तु समय आते ही वह
सहिष्णु हो गया।
कृत्या के साथ हुआ उसका संवाद उसके चरित्र
को ऊपर उठा देता है। वह बौद्धों के प्रति झुकता
है। उनके विहारों की स्थापना करता है। उनके प्रति
क्रोध, उग्र व्यवहार सबको तिरोहित कर देता है।
स्वमांस देने की घटना उसे पौराणिक आदर्श राजाओं
की श्रेणी में बैठा देती है।
राजा लोकप्रिय था। लोकनायक था। लोक
वीर था। अनेक लोकविजेता था। लोकनाथ था।
अनेक लोकप्रिय गाथाएं उसके जीवन के साथ
सम्बन्धित कर दी गयी थीं। उसकी महानता प्रमाणित
करने के लिये अनेक अलौकिक घटना पूर्ण गाथाएं
उसके नाम के साथ जोड़ दी गयी हैं।
राजा ने कश्मीर मण्डल को ऊपर उठाया।
तत्कालीन ऐतिहासिक जगत् में उसका स्थान बनाया।
उसने अनेक उपनिवेश कश्मीर मण्डल में बसाये।
जनजीवन को उन्नत किया। समाज को विकसित
करने के लिये विद्या का आश्रय लिया। जनता में नव
चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया। उसने कश्मीर
मण्डल में नव क्रान्ति की। जिसने कश्मीर जीवन
में एक नवीन प्रेरणा का सूत्रपात किया। निष्क्रियता
से लोगों को उठाकर कर्मशीलता की ओर प्रेरित किया।
राजशास्त्र का राजा विद्वान् था। राजशास्त्र का
अध्ययन किया था। यह उसके प्रशासनिक सुधारों से
स्पष्ट प्रतीत होता है। उसने रूढ एवं जड़ता प्राप्त
प्राचीन शासन पद्धति में आमूल परिवर्तन किया। उसे
समयोपयोगी बनाया। शासन के ढाँचे को वैज्ञानिक
ढंग पर ढाला। शासन पद्धति का नवीनीकरण
किया। पुनःसंघटन किया। शासन को जनता के
लिए उपयोगी बनाया। जनता की सुविधा, कार्यों
की सरलता, समृद्धि का ध्यान रखते हुए राज्ययन्त्र
को सुशासित, समयोपयोगी एवं मुनियोजित किया।
अशोक ने भेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष
किया था। उसके पुत्र जलोक ने भेरी घोष किया,
धर्मघोष किया और विवेक घोष का आश्रय लिया।
उसने अपना जीवन एकांगी नहीं बनाया। उसने
अपने जीवन को राज्योपम सन्तुलित रखा। किसी
का त्याग, किसी का नितान्त विसर्जन, किसी का
सम्पूर्ण ग्रहण, उसने नहीं किया। राज्य के लिए,
लोक के लिये, जब जिस समय, जो उपयोगी सिद्ध
हुआ, उसे एक राजर्षि तुल्य निस्संकोच ग्रहण किया।
सन्त अवधूत ने अपने पाण्डित्य से बौद्धों को
शास्त्रार्थ में परास्त किया था। लोक ने इन खण्डन
मण्डन से स्वयं निष्कर्ष निकाला। अपना मार्ग
सुनिश्चित किया।
शैवमतावलम्बी होते हुए भी वह सहिष्णु था।
कृत्या की घटना से स्पष्ट करती है। बौद्धों के प्रति
जो भी कुछ विरोधी भाव था उसे वर्णाश्रम धर्म प्रचार
भावना की प्रबलता होते ही क्षण मात्र में त्याग
दिया। उसने विनष्ट विहारों का पुनर्निमाण, राजकोश
प्रथम तरंग २०९
से कराया । उसने मिथ्या राजकीय मान एवं
प्रतिष्ठा का आश्रय नहीं लिया । बौद्धो के प्रति आदर
का भाव प्रकट किया । वर्णाश्रम धर्मप्रचारार्थ
शक्ति का आश्रय नहीं लिया । शास्त्रार्थ द्वारा मत
परिवर्तन के लोक तान्त्रिक प्रणाली का अनु-
करण किया !
राजा के विरोधी बौद्धो ने अन्त में उसे स्वयं
बोधिसत्त्व मानकर आदर किया । उसे सर्वश्रेष्ठ उपाधि
किंवा पद, जो बौद्ध जगत् में हो सकता था, दिया ।
विश्व में इस प्रकार के कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ
अपने विरोधियों से इतना आदर एक व्यक्ति ने
पाया हो ।
विश्व में अपनी जनता का जितना विश्वास
तथा आदर राजा जलौक ने पाया है उस तरह
के उदाहरण कम मिलते हैं । हिन्दुओं ने उसे
अवतार तुल्य माना और बौद्धों ने बोधिसत्त्व तुल्य ।
इस प्रकार तत्कालीन दो विरोधी धर्मानुयायियों का
राजा आदर्श हो गया । परस्पर विरोधी विचारों,
विरोधी दर्शनों, विरोधी मतों सबका उसने विश्वास
प्राप्त किया था ।
राजा वास्तव में राजर्षि था । विदेह था ।
कृत्या ने राजा से ठीक ही कहा था । वह बोधिसत्त्व
था । इस एक शब्द बोधिसत्त्व का प्रयोग कर
कल्हण ने राजा के पवित्र आदर्श चरित्र का चित्रण
कर दिया है ।
शिव विजयेश, नन्दीश के उपासक रूप में उसे
चित्रित कर कल्हण ने उसे साधारण मानव तल
से उठाकर अलौकिक पुरुष की श्रेणी में रख दिया
है । तथापि लोक, समाज, नित्य एवं नैमित्तिक
कर्मों से उसे कल्हण ने अलग रखने का प्रयास नहीं
किया है ।
राजा कार्यपटु था । दृढ़निश्चयी था । कृत-
संकल्प था । भूतेशवर तथा विजयेश्वर के दर्शन
की प्रतिज्ञा का निर्वाह करता था । उसकी इस
निष्ठा को देखकर नाग भी द्रवीभूत हो गया था ।
राजा में अहंकार नहीं था । कल्हण उसमें
कोई दोष नहीं निकाल सका है । कल्हण ने निष्पक्ष
भाव से राजाओं के दोष एवं गुण का वर्णन किया है
किन्तु राजा जलौक का चरित्र शुद्ध जल तुल्य
निर्मल था ।
राजा सुधार करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं
करता था । वह पाखण्ड एवं आडम्बरों से धर्म
एवं समाज को दूर रखना चाहता था । उसके समय
मन्दिरों तथा विहारों में बेढंगे रूप से वाद्य बजते
थे । धार्मिक कृत्यों में, उपासना में, इनका क्या
स्थान हो सकता था ? वे जनता की निद्रा में, स्थान
की शान्ति में बाधक होते थे । राजा इस पाखण्ड
के कारण विहारों से चिढ़ गया । प्रतीत होता है ।
आजकल के समान बेडौल रूप घण्टा-घड़ियाल,
झांझ, शंख घोंगे तथा लाउड स्पीकर, रेडियो बजते
थे । राजा को यह अप्रिय लगा । उसने इनका
कोई उपयोग नहीं देखा ।
किन्तु दूसरी ओर देवस्थानों के जीवन को सरस
तथा कलात्मक बनाने के लिये राजा ने निःसंकोच
एक शत नृत्य गान निपुण ललनाओं को मन्दिरों के
लिये दे दिया था । वह स्वयं मन्दिरों के सांस्कृतिक
कार्य क्रमों में भाग लेता था । उसने मन्दिरों में नृत्य,
संगीत शास्त्र कला विशारदों को रखकर, देवस्थानों
को जन जीवन का एक अंग बना दिया । उसके
प्रति लोक में रुचि उत्पन्न किया । सरसता का
सृजन किया । उन्हें केवल पूजा के स्थान पर
जन-जीवन का, सामाजिक कार्य-क्रमों का, एक
महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना दिया । उसने ललित
कलाओं में भी आध्यात्मिकता की भावना भर कर
उन्हें पवित्र बनाने का प्रयास किया । देवस्थानों में
बाल, युवा, वृद्ध नर-नारी सभी एकत्रित होकर नृत्य,
एवं संगीतादि के साथ अध्यात्म का दर्शन कर
सकते थे । ललित कला, नृत्य संगीत नाटकादि
को विलास की सामग्री न बनाकर उन्हें देवस्थानों
से सम्बन्धित कर उन्हें आध्यात्मिकता का चोला
पहनाकर मानव को विकासोन्मुख करते हुए, देखो
२७
२१० राजतरंगिणी
जीवन का अविच्छिन्न अंग बना दिया था । संगीता-
दिकला पेशा न होकर, क्रय-विक्रय की सामग्री न
होकर, भगवान् के मनोरंजन, उनके प्रति श्रद्धा
भक्ति प्रकट करने, उनके सानिध्य में रहने का एक
साधन हो गयी । कला जीविकोपार्जन का साधन न
होकर मानव विकास का सोपान बन गयी ।
राजा ने राजकोश का प्रयोग अपने विलास के
लिये नहीं किया । जनता का धन जनता के जीवन
स्तर को उठाने के लिये, सार्वजनिक कार्यों के
लिये खर्च किया । उसने मन्दिरों पर दान चढ़ाया ।
विहारों का निर्माण कराया । मन्दिरों का निर्माण
कराया । जनता को उनके लिये सक्रिय किया ।
उनके सम्मुख दान का आदर्श रखा ।
राजा की देश-भक्ति संकुचित नहीं थी । वह
प्रतिक्रियावादी नहीं था । उसने कश्मीर मण्डल का
सामाजिक ढाँचा शिथिल देखा । रूद्ध देखा । जड़
देखा । विद्या की कमी देखी । उसने सोत्साह
कश्मीर के बाहर से विद्वानों को बुलाया । उन्हें
सब तरह की सुविधा देकर कश्मीर को समृद्ध करने
की ओर उन्हें प्रेरित किया । निश्चित योजनानुसार
चलाने का स्तुत्य प्रयास किया ।
राजा का व्यक्तिगत चरित्र बड़ा निर्मल था ।
वह राज्य कार्य में व्यस्त रहने पर भी धार्मिक कर्म
से विरत नहीं हो सका । उसने भौतिक तथा आध्या-
त्मिक दोनों कार्य-कलापों को एक समान तुला के
दोनों पलड़ों की तरह रखा ।
राजा स्वयं योगी था । उसने चारपाई पर
राज्य प्रासाद में रोग ग्रस्त होकर मरना उचित नहीं
समझा । उसने राज सुख त्याग दिया । उसने शरीर
तथा इन्द्रियों के शिथिल होने के पूर्व शरीर त्याग
देना उचित समझा । उसने एक ऋषि तुल्य अपने
परलोक की यात्रा निमित्त स्वयं यात्रा मार्ग प्रशस्त
किया । वह चोर मोचन तीर्थ में आकर बैठ गया ।
योग का आश्रय लिया । अपनी पत्नी जिसका
पाणिग्रहण किया था । जिसे सप्तपदी के समय वचन
दिया था कि इसे सर्वदा साथ रहेगा विलग नहीं
होगा, उसने एक अंग से स्वर्ग जाना पसन्द नहीं
किया । अपनी अर्धांगिनी को भी साथ लिया । दोनों
पति-पत्नी ने एक साथ संसार का त्याग किया ।
उसने तपस्वियों एवं ऋषियों जैसी मृत्यु आलिंगन की
भूमिका तैयार की ।
पद्मासन लगाया । निश्चेष्ट अवस्थित धूप
हीन ज्योति तुल्य निश्चल ध्यानरत हो गया ।
इसी रूप से उसने सायुज्य प्राप्त किया ।
राजा जलोक का व्यक्तित्व इतना ऊँचा है कि
कवि की वाणी, लेखक की वाणी उसके वर्णन में,
उस तक पहुँचने में असमर्थता का बोध
करती है । कश्मीर मण्डल के राजाओं की लम्बी
श्रृंखला में इतना महान्, समर चतुर, सेनानी, दानी,
राजनीतिज्ञ, कलाप्रेमी, शास्त्रज्ञ, तपस्वी, निर्मल
चरित्र, राजा का दर्शन नहीं मिलता । उसने अपने
लिये अपने सुख के लिये कुछ नहीं किया । जो
कुछ किया कश्मीर मण्डल के लिये किया । वहाँ
की जनता के लिये किया ।
मुसलिम इतिहासकार भी जलोक के जीवन
से अत्यन्त प्रभावित थे । उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित
करने के लिये अबुल फजल उसको विजय समुद्र पर्यन्त
होना लिखता है । आजम, वंबुद्दीन उसे उत्तरौय
ईरान का विजेता मानते हैं । हसन उसे
कन्धार और बलख तक पहुँचा देते हैं । कन्नौज और
बिहार तक उसे पहुँचाना हसन के लिये साधारण
बात थी । कन्नौज तक उसका आना प्रमाणित होता
है । इन वर्णनों का इतना महत्त्व अवश्य है कि जलोक
को सभी एक महान् विजेता समझते थे और विजेता
रूप में उसका चित्रण करते हैं । वह पहला कश्मीरी
राजा था जो गोनन्द के पश्चात् कश्मीरी सेना लेकर
कश्मीर मण्डल के बाहर विजयर्थ निकला था ।
लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् कश्मीर-वाहिनी ने
मथुरा युद्ध के बाद पुनः अपना पराक्रम प्रदर्शित
किया था ।
प्रथम तरंग २११
अथाऽशोककुलोत्पन्नो यद्वाऽन्याभिजनोद्भवः ।
भूमिं दामोदरो नाम जुगोप जगतीपतिः ॥ १५३ ॥
१५३. तत्पश्चात् अशोक कुलोत्पन्न अथवा अन्य कुलोद्भव दामो र नामक राजा भूमि-
रक्षक हुआ ।
ऋद्ध्या जाज्वलितस्योच्चैर्माहेश्वरशिखामणेः ।
अद्यापि श्रूयते यस्य प्रभावो भुवनाद्भुतः॥ १५४ ॥
१५४. ऋद्धि से जाज्वल्यमान, माहेश्वर२ शिवउ सकों में शिखामणि, जिस राजा के
अद्भुत प्रभाव की गाथा भुवन मे आज भी सुनी जाती है ।
जलोक योगी अवधूत का शिष्य था । उसने योगा-
भ्यास किया । जल का बांधन, उसके अन्दर प्रवेश
कर रहना यौगिक क्रियाओ से सम्बन्ध रखता है ।
उसका अन्तिम समय में योग द्वारा प्राण विसर्जन
करना उसे राज योगी के साथ ही साथ राजर्षियो की
श्रेणी में रख देता है ।
१५३ (१) दामोदर द्वितीय : आइने अकबरी
ने राजा का नाम दामोदर दिया है । उसके अनुसार
कुछ लोंगो का कहना है वह अशोक का वंशज था ।
कुछ कहते हैं, वह अन्य वंश का था । राजा धार्मिक
था । एक भक्त को अपमानित करने के कारण
उसके शाप द्वारा सर्प हो गया था ।
कल्हण ने दामोदर द्वितीय की इतिहास सामग्री
छविल्लकार से ली है। तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो,
शिलालेखों, अग्रहारो एवं मन्दिरों में प्राप्त कुछ संग्रहों
पर दामोदर द्वितीय का वर्णन किया है ।
मुहम्मद आजिम इतिहासकार के अनुसार
दामोदर उद्र वह स्थान है, जहाँ ब्राह्मणो ने राजा को
सर्प होने का शाप दिया था। यह सरोवर राजधानी
मे ७ मील पर है । यहाँ अब भी कथा प्रचलित है
कि राजा सर्प के रूप में इस स्थान पर प्रकट.
होता है ।
हुसन लिखता है—दामोदर राजा जलोक का
भाई था । पसन्दी और उमद. खूबियो में उसका
हमसर था । तख्त सल्तनत पर बैठकर मख्लूक खुदा
को अद्ल और अहसान के जरिए आराम असाइश
बख्शी । मौजा 'गोट सवू' इसी राजा का बनाया हुआ
है । करेवा दामोदर पर अपनी राजधानी के लिए
कशोर इमारतो वाला एक शहर तामीर किया ।
कैफियत-एक दिन श्राद्ध के तकरीब पर दरयाए
झेलम पर गुशल के लिए जाता था । रास्ते में दो
बरहमनो ने उससे खाना माँगा । राजा ने कहा ।
गुशल और श्राद्ध के बाद मैं तुम्हें खीर कर दूँगा ।
इस पर इन बरहमनो ने राजा के हक में दुआए बद
कर दी । इसके नतीजे में राजा की शक्ल साँप की
हो गयी । बरसो तक राजा मजकूर जंगलों में
परेशान था । इस वांकया की पूरी तफसील करेवा
दामोदर के जिकर में गुजर चुकी है । राजा दामोदर
की मुद्दत सल्तनत ३२ साल थी ।
हसन के वर्णन का कोई आधार तथा सत्यता
नही हैं । कल्हण निश्चित नही कहता कि दामोदर
कौन था । ? उसकी वंश परम्परा क्या थी ? इतना
अवश्य निश्चयपूर्वक उसके वर्णन से निष्कर्ष निकाला
जा सकता है । वह जलोक का पुत्र नही था । अशोक
का वंशज हो भी सकता है और नहीं भी । इसका
केवल मात्र अनुमान किया जाता है । प्रत्यक्ष प्रमाण
अभी तक नही मिल सका है । हसन का यह कहना
कि वह राजा जलोक का भाई था किसी प्रमाण से
अबतक सिद्ध नही हो सका है ।
वह किस कुल का था ? किस प्रकार कश्मीर
का राज्य प्राप्त किया ? उसके उत्तराधिकार का रूप
क्या था ? सभी कुछ अज्ञात इतिहास के गर्भ में है ।
२१२ राजतरंगिणी
हरप्रसादपात्रेण सच्चरित्रानुरागिणा ।
बबन्ध सुखिना सख्यं येन वैश्रवणः स्वयम् ॥ १५५ ॥
१५५. उस हर प्रसाद पात्र एवं सच्चरित्रानुरागी सुखी राजा से स्वयं वैश्रवण १ मैत्री
सूत्र में बँधे थे।
कुबेर इव यो राज्ञामग्र्यः स्वाज्ञाविधायिनः ।
आदिश्य गुह्यकान्दीर्घं गूढसेतुमबन्धयत् ॥ १५६ ॥
१५६. कुबेर तुल्य राजाओं में अग्र उसने आज्ञानुवर्ती गुह्यकों को आदेश देकर दीर्घ गूढ
सेतु २ बँधवाया।
यदि वह अशोक वंशोत्पन्न होता तो भारत य इतिहास
इस पर प्रकाश अवश्य डालता । अब तक की प्राप्त
सामग्रियों के आधार पर अशोक के किसी दामोदर
पौत्र का होना नही मिलता है।
१५४ (१) माहेश्वर : कल्हण ने राजा को
यहाँ पर शिव के उपासक रूप में उपस्थित किया है।
उसने महेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। कल्हण ने
श्लोक संख्या १३५ में भी जलोक के लिये माहेश्वर
शब्द का प्रयोग किया है। यह राजा निस्सन्देह अपने
पूर्व राजा जलोक के समान महेश किंवा शिव का
उपासक था। अन्यथा उसे उत्तराधिकार मिलना
कठिन होता ।
यह जनता अथवा मन्त्रिमण्डल द्वारा निर्वाचित
राजा था। अथवा जलोक कुलावतंस था। यह सब
अप्रकट है। यहाँ केवल एक कड़ी माहेश्वर शब्द उसे
जलोक से जोडती है। यह श्लोक और श्लोक
संख्या १३५ इस बात को प्रमाणित करते है कि
जलोक तथा दामोदर दोनो का मत एक था। वे
एक ही देव के उपासक थे ।
माहेश्वर शिव के एक अवतार हुए हैं। शिव के
अडतालीस नामो में एक नाम महेश्वर है। आठ
मातरः में एक माहेश्वरी है।
१५५ (१) वैश्रवण : अथर्ववेद (८.२० २६) में
कुबेर वैश्रवण का उल्लेख मिलता है। शतपथ
ब्राह्मण (१७:४.१ १०) के अनुसार कुबेर वैश्रवण
एक राजा है। राक्षस उनकी प्रजा है। तैत्तिरीय
अरण्यक (१.३१.३) ने कुबेर को एक देवता रूप में
प्रस्तुत किया है। वे नमस्करणीय है। प्रार्थित है।
वैवस्वत मन्वन्तर में विश्रवा ऋषि का इसे
पुत्र कहा गया है। इनकी माता इडविटा थी।
उनकी माता का नाम मंदाकिनी भी मिलता है।
धनपतित्व के निमित्त इसने तपस्या की। कुबेर
हो गया। जिस स्थान पर तपस्या की थी वह
महाभारत (श. ४६:२२) के अनुसार कौबेर तीर्थ
हो गया। देवी पार्वती की ओर इसने एक बार
देखा तो इसका बांया नेत्र नष्ट हो गया। दक्षिण
भाग पीला पड़ गया। इसलिये उसका नाम एकाक्ष
पिंग्लू हो गया।
उत्तर दिशा का अधिपति माना गया है।
उत्तरस्थित यक्ष लोक में निवास करता है। यक्षों
के अधिपतित्व प्राप्त की कामना से इसने तपस्या
की थी। तपस्या स्थान कावेरी नर्मदा संगम
माना गया है। गन्धमादन पर्वत शिखर पर इसका
निवास स्थान है। मेरु पर्वत के उत्तर विभावरी
भी इसका एक निवास स्थान है। वृद्धि तथा ऋद्धि
इसकी शक्तियां है। इसकी सभा का नाम कुबेर
सभा है। कुबेर की एक पत्नी का नाम भद्रा है।
इसकी पूरी का नाम अलकापुरी है। पूर्व जन्म से
कापिल्य नगरी में अग्निहोत्री यज्ञदत्त का गुणनिधि
नामक पुत्र था। मुचकुंद से इसका संवाद, ब्राह्मण
क्षत्रिय एकता होने पर राज्य सुख की वृद्धि होतो