राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १९९
अथ कृत्याश्रमं कृत्वा विहारं वसुधाधिपः ।
तत्रैव क्षीणतमसं कृत्यादेवीमसन्धयत् ॥ १४७ ॥
१४७. तत्पश्चात् उस वसुधाधिप ने कृत्याश्रम^१ में विहार का निर्माण कराया। वहाँ
क्षीण तमस कृत्या देवी की राजा ने उपासना^२ की।
मात्र का प्रतीक है। चाहे वे हिन्दू, ईसाई या कोई
भी क्यों न हों ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४७ में 'श्रमं' का 'श्रये' 'मसन्ध-
यत्' का 'मवन्दयत' पाठभेद मिलता है।
१४७ ( १ ) कृत्याश्रम : बारहमूला से पांच
मिल अधोभाग में वितस्ता के वामतट पर वर्तमान
कित्सहोम ग्राम प्राचीन कृत्याश्रम का स्थान है।
चीनी पर्यटक ओ कुङ्ग (सन् ७५६-७६३ ई० )
कश्मीर पर्यटन काल में इस स्थान को देखा था ।
उसका उल्लेख किया है । कल्हण ने इसका पुनः
उल्लेख रा० ४.२४० में किया है। ओ कुङ्ग के
अनुसार वह एक गाँव था । बारहमूला के समीप
था। उसे किचाधम भी कहा गया है। ओ कुङ्ग ने
इसे कित्चे नाम से सम्बोधित किया है। ओं कुङ्ग
के पर्यटन काल में इस स्थान को किचा कहा जाता
था। उसे उसने अपनी भाषा में कित्चे लिखा है।
श्री स्तीन यहाँ मई सन् १८९६ ई० में आये
थे। यह ग्राम वितस्ता नदी तथा पर्वत बाहमूल के
मध्य स्थित है। यहाँ दो ग्रामीण मस्जिदें बनी हैं।
श्री स्तीन को मस्जिदों के समीप कुछ अलंकृत
शिला खण्ड दिखायी पड़े थे। उनमें कुछ मूर्ति खुदे
शिला खण्ड थे। उन्हें ग्राम के उत्तर ११५ वर्ग गज
पर प्राचीर अर्थात् दिवाल का आयताकार नींव चिन्ह
मिला था। इस हाता के केन्द्र में श्री स्तीन को एक
ऊँचा स्थान दिखाई दिया था। उसे वहाँ के लोग
गद्दी कहते थे। हाता के बाहर दक्षिण पूर्व के कोने
पर एक १५ फोट ऊँचा टीला अथवा डूहा था । श्री
स्तीन के मत से यह स्तूप का ध्वंसावशेष था । यहाँ
पर और ध्वंसावशेष तथा पत्थरादि न मिलने का
कारण स्तीन ने यह दिया है ।
यहाँ की उपत्यका में पठान शासन काल में पूर्व
दिशा में एक सीधी दिवाल कित्सहोम से बोयाई
मिल दूर पर बना दी गयी थी। इस दिवाल का
अस्तित्व सन् १८३५ ई० तक था। बैरन थी
हुजेल इस ओर आये थे। इस दिवाल को नदी के
पार से देखा था। यह दिवाल प्राचीन कृत्याश्रम के
ध्वंसावशेष से प्राप्त पत्थरों से बनायी गयी थी।
नवीन सड़क का निर्माण सन् १८८६ ई० के लगभग
होने लगा। उक्त दिवाल कृत्याश्रम से प्राप्त
पत्थरों और उक्त डूहे से बहुत पत्थर लिये गये थे।
यही कारण है कि राजा जलोक द्वारा निर्मित कृत्या-
श्रम विहार का स्पष्ट चिन्ह नहीं मिलता। जो कुछ
शिलाखण्ड शेष बच गये थे वे सड़क निर्माण में
लग गये ।
मैं यहाँ आ चुका हूँ। बारहमूला से उरी जाने
वाली सड़क पर अनेक मन्दिर बायें पार्श्व में बने
आज भी खड़े हैं। कुछ में तो छतें बिल्कुल नहीं है
और कुछ पर टिन आदि की छतें लगा दी गयी हैं।
दो एक टूटे मन्दिरों में मैंने दक्षिण भारतीय साधुओं
को निवास करते हुए पाया। ये उन टूटे देवस्थानों
में दीपक जलाते तथा पूजा करते थे।
मुझे कित्सहोम अथवा कृत्याश्रम में स्तीन द्वारा
वर्णित बातो के अतिरिक्त विशेष और देखने को कुछ
नहीं मिला। यदि यहाँ खनन कार्य हो तो कुछ