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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 984 में से

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पृष्ठ 298

प्रथम तरंग २०९
से कराया । उसने मिथ्या राजकीय मान एवं
प्रतिष्ठा का आश्रय नहीं लिया । बौद्धो के प्रति आदर
का भाव प्रकट किया । वर्णाश्रम धर्मप्रचारार्थ
शक्ति का आश्रय नहीं लिया । शास्त्रार्थ द्वारा मत
परिवर्तन के लोक तान्त्रिक प्रणाली का अनु-
करण किया !
राजा के विरोधी बौद्धो ने अन्त में उसे स्वयं
बोधिसत्त्व मानकर आदर किया । उसे सर्वश्रेष्ठ उपाधि
किंवा पद, जो बौद्ध जगत् में हो सकता था, दिया ।
विश्व में इस प्रकार के कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ
अपने विरोधियों से इतना आदर एक व्यक्ति ने
पाया हो ।
विश्व में अपनी जनता का जितना विश्वास
तथा आदर राजा जलौक ने पाया है उस तरह
के उदाहरण कम मिलते हैं । हिन्दुओं ने उसे
अवतार तुल्य माना और बौद्धों ने बोधिसत्त्व तुल्य ।
इस प्रकार तत्कालीन दो विरोधी धर्मानुयायियों का
राजा आदर्श हो गया । परस्पर विरोधी विचारों,
विरोधी दर्शनों, विरोधी मतों सबका उसने विश्वास
प्राप्त किया था ।
राजा वास्तव में राजर्षि था । विदेह था ।
कृत्या ने राजा से ठीक ही कहा था । वह बोधिसत्त्व
था । इस एक शब्द बोधिसत्त्व का प्रयोग कर
कल्हण ने राजा के पवित्र आदर्श चरित्र का चित्रण
कर दिया है ।
शिव विजयेश, नन्दीश के उपासक रूप में उसे
चित्रित कर कल्हण ने उसे साधारण मानव तल
से उठाकर अलौकिक पुरुष की श्रेणी में रख दिया
है । तथापि लोक, समाज, नित्य एवं नैमित्तिक
कर्मों से उसे कल्हण ने अलग रखने का प्रयास नहीं
किया है ।
राजा कार्यपटु था । दृढ़निश्चयी था । कृत-
संकल्प था । भूतेशवर तथा विजयेश्वर के दर्शन
की प्रतिज्ञा का निर्वाह करता था । उसकी इस
निष्ठा को देखकर नाग भी द्रवीभूत हो गया था ।
राजा में अहंकार नहीं था । कल्हण उसमें
कोई दोष नहीं निकाल सका है । कल्हण ने निष्पक्ष
भाव से राजाओं के दोष एवं गुण का वर्णन किया है
किन्तु राजा जलौक का चरित्र शुद्ध जल तुल्य
निर्मल था ।
राजा सुधार करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं
करता था । वह पाखण्ड एवं आडम्बरों से धर्म
एवं समाज को दूर रखना चाहता था । उसके समय
मन्दिरों तथा विहारों में बेढंगे रूप से वाद्य बजते
थे । धार्मिक कृत्यों में, उपासना में, इनका क्या
स्थान हो सकता था ? वे जनता की निद्रा में, स्थान
की शान्ति में बाधक होते थे । राजा इस पाखण्ड
के कारण विहारों से चिढ़ गया । प्रतीत होता है ।
आजकल के समान बेडौल रूप घण्टा-घड़ियाल,
झांझ, शंख घोंगे तथा लाउड स्पीकर, रेडियो बजते
थे । राजा को यह अप्रिय लगा । उसने इनका
कोई उपयोग नहीं देखा ।
किन्तु दूसरी ओर देवस्थानों के जीवन को सरस
तथा कलात्मक बनाने के लिये राजा ने निःसंकोच
एक शत नृत्य गान निपुण ललनाओं को मन्दिरों के
लिये दे दिया था । वह स्वयं मन्दिरों के सांस्कृतिक
कार्य क्रमों में भाग लेता था । उसने मन्दिरों में नृत्य,
संगीत शास्त्र कला विशारदों को रखकर, देवस्थानों
को जन जीवन का एक अंग बना दिया । उसके
प्रति लोक में रुचि उत्पन्न किया । सरसता का
सृजन किया । उन्हें केवल पूजा के स्थान पर
जन-जीवन का, सामाजिक कार्य-क्रमों का, एक
महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना दिया । उसने ललित
कलाओं में भी आध्यात्मिकता की भावना भर कर
उन्हें पवित्र बनाने का प्रयास किया । देवस्थानों में
बाल, युवा, वृद्ध नर-नारी सभी एकत्रित होकर नृत्य,
एवं संगीतादि के साथ अध्यात्म का दर्शन कर
सकते थे । ललित कला, नृत्य संगीत नाटकादि
को विलास की सामग्री न बनाकर उन्हें देवस्थानों
से सम्बन्धित कर उन्हें आध्यात्मिकता का चोला
पहनाकर मानव को विकासोन्मुख करते हुए, देखो
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