राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १९७
'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया ।
तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥
अस्मद्गिरा प्रेरणीयो विहारकरणाय सः ।
दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥
तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् ।
तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥' १४३ ॥
क्रुद्धैर्विप्रैरनुज्ञाता स्वद्वधाय प्रधाविता ।
अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥
१४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा। आपके वध निमित्त मुझे भेजा। उस
समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया। निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि! वह राजा महाशाक्य*
हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती। किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा।
खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह
अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे। ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का
भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोनों का
इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा।
कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह महामम्मत था। महावंश में उल्लेख है इनके वंश
अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन में शिरोमणि महासम्मत वंश के अनुवर्ती बुद्ध
शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' ने जन्म लिया।'
अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था।
यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है। त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य क्षत्रिय
पाठभेद : थे। देवदह शाक्य देश इनके कुल विस्तार में...
श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे। शुद्धोधन के पुत्र
'महासत्त्व' मिलता है। गौतम इत्यादि हुए थे। रोहिणी नदी के उभय तटवर्ती
श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद क्षत्रिय ही इस वंश में आते थे। इस प्रकार
'दत्वाम्ब हेम' मिलता है। इक्ष्वाकु के वंशज महासम्मत हैं। महासम्मत ही
श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' इक्ष्वाकु हैं। इसी वंश में शाक्य, कोलीय, मोरिय
तथा 'सत्वै' का पाठभेद 'सन्यै' मिलता है। अन्य शाक्य गणराज्य भी गिने जाते हैं।
पादटिप्पणियाँ : शाक्य सूर्यवंशी थे। उनका सम्बन्ध महासम्मत से था।
१४१ (१) महाशाक्यः इस पाठ से अधिक दीर्घनिकाय के अनुसार शाक्य क्षत्रिय राजा
शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महा- ओक्काक के वंशीय थे। ओक्काक को पालि में
शाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश तथा दीपवंश इक्ष्वाकु का नामांतर ही माना गया है।
के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम महा- शाक्य उसी से सम्बन्धित थे। इस प्रकार शाक्य
सत्तम् ही मूल वंश था।