राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २०१
चीरमोचनतीर्थान्तर्गणरात्र तपस्यता ।
ब्रह्मासननिविष्टेन ध्याननिष्पन्दमूर्तिना ॥१४६॥
१४९. राजा ने ब्रह्मासनस्थ¹ होकर स्पन्दन हीन मूर्तिवत् चीरमोचन तीर्थ² में ध्यान रत
होकर अनेक रात्रियाँ व्यतीत कीं ।
पादटिप्पणियाँ :
१४८ (१) नन्दिक्षेत्र. पाद टिप्पणी पृष्ठ ७६
रा० त० १.३६ द्रष्टव्य है ।
(२) भूतेश : पादटिप्पणी रा० त० १:१०७
पृष्ठ द्रष्टव्य है । यह भूतेश्वर के पूर्वीयद्वीप समूह का
मुख्य और बड़ा मन्दिर है ।
(३) रत्न पूजा . कश्मीर शिव पूजा पद्धति में
रत्न तथा मूल्यवान धातुओं को देवताओं पर चढ़ाने
तथा उनसे पूजा करने का उल्लेख मिलता है । यह
प्रथा अब भी प्रचलित है । शिव लिंग पर सुवर्ण,
रजत मुकुट अथवा रत्न जड़ित मुकुट, मेखला, माला,
शेष नाग, जलद्रोणी, अर्घा, पंचपात्र, आरती आदि
चढ़ाया जाता है । दक्षिण रामेश्वर में रत्न का एक
भण्डार ही है । विभिन्न पर्वों में विभिन्न रत्नों तथा
श्रृंगार विशेष से पूजा की जाती है । रामेश्वरादि
दक्षिण के मन्दिर में इन रत्नों को यात्रियो को
दिखाया भी जाता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४६ में 'चीर' का 'क्षीर';
निष्पन्द का नि स्पन्द, निस्पन्द पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१४९ (१) ब्रह्मासन : कल्हण राजा के योग
का वर्णन करता है । राजा को वीर, क्षमाशील,
दानी तथा धर्म परायण अब तक चित्रित करता
चला आया है । अब उसने राजा के योग का उल्लेख
कर उसे योगी रूप में चित्रित करने का प्रयास
किया है । पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिक आसन ध्यान
के लिये योगशास्त्रानुसार श्रेष्ठ कहे गये हैं। उनके
स्थान पर ब्रह्मासन का उल्लेख किया गया है ।
ब्रह्मासन वह योगो लगाता है जो ब्रह्मा का ध्यान
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करता है । राजा शैव था । विष्णु के अवतार बुद्ध
के प्रति भक्ति होने के कारण विष्णु भक्त तथा
अन्तिम काल में उसने ब्रह्मासन लगा कर ब्रह्मा की
उपासना की । ब्रह्मा का ध्यान किया जो विश्व का
कर्ता है । समस्त जीवन उसने विष्णु के अनुरूप रक्षा
का कार्य किया, शिव गुण के अनुरूप संहार का भी
कार्य किया । जीवन के अन्तिम अध्याय में उसने
जगत कर्ता ब्रह्मा का ध्यान किया ।
योग में ध्यान की मुद्रा मेरुदण्ड को सीधा रखकर
ध्यान लगाना है । मेरु दण्ड सीधा होने पर इड़ा ओर
पिंगला नाड़ियों से प्राण संचार बन्द हो कर सुषुम्ना
नाडी में प्रवेश करता है । सुषुम्ना में प्राण संचार के
कारण योगी का ध्यान लगता है । वह वायुहीन तैल
दीप की ज्योति के समान कम्पनहीन हो जाता है ।
वह इस ध्यान मुद्रा में आत्मा का साक्षात्कार करता
है। वह विदेह स्थिति प्राप्त करता है। वह आत्मा
और शरीर के सम्बन्ध को समझ जाता है । वह
आत्मानुभूति में रम जाता है । स्थूल जगत् से ऊपर
उठता है । उसे सविकल्प के पश्चात् निर्विकल्प समाधि
लग जाती है । राजा अनेक रात्रियों तक निस्पन्द
बैठा रहा । इसका स्पष्ट अर्थ है । वह समाधि में
ध्यानस्थ था । वह दृश्य, दर्शन, द्रष्टा, की स्थिति-से
ऊपर उठकर एकाकार हो गया था ! वह कर्ता,
कार्य, कारक की स्थिति से ऊपर उठ गया था । वह
भौतिक जगत् की सीमा पार कर आध्यात्मिक जगत्
में विचरण करता था । वह भूताकाश, चित्ताकाश
की स्थिति से चिदाकाश को स्थिति में आ गया था ।
वह कर्मेन्द्रियो एवं ज्ञानेन्द्रियों के प्रपंच एवं बन्धन को
छोड़ कर मुक्त हो चुका था । वह ब्रह्मासन पर बैठ-
कर ब्रह्मा में लीन होना चाहता था । ब्रह्मा के कारण