राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० राजतरंगिणी
जीवन का अविच्छिन्न अंग बना दिया था । संगीता-
दिकला पेशा न होकर, क्रय-विक्रय की सामग्री न
होकर, भगवान् के मनोरंजन, उनके प्रति श्रद्धा
भक्ति प्रकट करने, उनके सानिध्य में रहने का एक
साधन हो गयी । कला जीविकोपार्जन का साधन न
होकर मानव विकास का सोपान बन गयी ।
राजा ने राजकोश का प्रयोग अपने विलास के
लिये नहीं किया । जनता का धन जनता के जीवन
स्तर को उठाने के लिये, सार्वजनिक कार्यों के
लिये खर्च किया । उसने मन्दिरों पर दान चढ़ाया ।
विहारों का निर्माण कराया । मन्दिरों का निर्माण
कराया । जनता को उनके लिये सक्रिय किया ।
उनके सम्मुख दान का आदर्श रखा ।
राजा की देश-भक्ति संकुचित नहीं थी । वह
प्रतिक्रियावादी नहीं था । उसने कश्मीर मण्डल का
सामाजिक ढाँचा शिथिल देखा । रूद्ध देखा । जड़
देखा । विद्या की कमी देखी । उसने सोत्साह
कश्मीर के बाहर से विद्वानों को बुलाया । उन्हें
सब तरह की सुविधा देकर कश्मीर को समृद्ध करने
की ओर उन्हें प्रेरित किया । निश्चित योजनानुसार
चलाने का स्तुत्य प्रयास किया ।
राजा का व्यक्तिगत चरित्र बड़ा निर्मल था ।
वह राज्य कार्य में व्यस्त रहने पर भी धार्मिक कर्म
से विरत नहीं हो सका । उसने भौतिक तथा आध्या-
त्मिक दोनों कार्य-कलापों को एक समान तुला के
दोनों पलड़ों की तरह रखा ।
राजा स्वयं योगी था । उसने चारपाई पर
राज्य प्रासाद में रोग ग्रस्त होकर मरना उचित नहीं
समझा । उसने राज सुख त्याग दिया । उसने शरीर
तथा इन्द्रियों के शिथिल होने के पूर्व शरीर त्याग
देना उचित समझा । उसने एक ऋषि तुल्य अपने
परलोक की यात्रा निमित्त स्वयं यात्रा मार्ग प्रशस्त
किया । वह चोर मोचन तीर्थ में आकर बैठ गया ।
योग का आश्रय लिया । अपनी पत्नी जिसका
पाणिग्रहण किया था । जिसे सप्तपदी के समय वचन
दिया था कि इसे सर्वदा साथ रहेगा विलग नहीं
होगा, उसने एक अंग से स्वर्ग जाना पसन्द नहीं
किया । अपनी अर्धांगिनी को भी साथ लिया । दोनों
पति-पत्नी ने एक साथ संसार का त्याग किया ।
उसने तपस्वियों एवं ऋषियों जैसी मृत्यु आलिंगन की
भूमिका तैयार की ।
पद्मासन लगाया । निश्चेष्ट अवस्थित धूप
हीन ज्योति तुल्य निश्चल ध्यानरत हो गया ।
इसी रूप से उसने सायुज्य प्राप्त किया ।
राजा जलोक का व्यक्तित्व इतना ऊँचा है कि
कवि की वाणी, लेखक की वाणी उसके वर्णन में,
उस तक पहुँचने में असमर्थता का बोध
करती है । कश्मीर मण्डल के राजाओं की लम्बी
श्रृंखला में इतना महान्, समर चतुर, सेनानी, दानी,
राजनीतिज्ञ, कलाप्रेमी, शास्त्रज्ञ, तपस्वी, निर्मल
चरित्र, राजा का दर्शन नहीं मिलता । उसने अपने
लिये अपने सुख के लिये कुछ नहीं किया । जो
कुछ किया कश्मीर मण्डल के लिये किया । वहाँ
की जनता के लिये किया ।
मुसलिम इतिहासकार भी जलोक के जीवन
से अत्यन्त प्रभावित थे । उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित
करने के लिये अबुल फजल उसको विजय समुद्र पर्यन्त
होना लिखता है । आजम, वंबुद्दीन उसे उत्तरौय
ईरान का विजेता मानते हैं । हसन उसे
कन्धार और बलख तक पहुँचा देते हैं । कन्नौज और
बिहार तक उसे पहुँचाना हसन के लिये साधारण
बात थी । कन्नौज तक उसका आना प्रमाणित होता
है । इन वर्णनों का इतना महत्त्व अवश्य है कि जलोक
को सभी एक महान् विजेता समझते थे और विजेता
रूप में उसका चित्रण करते हैं । वह पहला कश्मीरी
राजा था जो गोनन्द के पश्चात् कश्मीरी सेना लेकर
कश्मीर मण्डल के बाहर विजयर्थ निकला था ।
लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् कश्मीर-वाहिनी ने
मथुरा युद्ध के बाद पुनः अपना पराक्रम प्रदर्शित
किया था ।