राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ राजतरंगिणी
भुक्तवैश्वर्यं स पर्यन्ते प्रविष्टश्चीरमोचनम् ।
पत्न्या समं ययौ राजा सायुज्यं गिरिजापतेः ॥ १५२ ॥
१५२. ऐश्वर्य भोगकर राजा ने चीरमोचन में अपनी पत्नी १ के साथ प्रवेश किया । पत्नी सहित
उस राजा ने गिरिजापति के साथ सायुज्य २ प्राप्त किया ।
हो जाने पर भी नियमतः नृत्य एवं गान की परम्परा पाठभेद :
का निर्वाह करते चले आ रहे थे । श्लोक संख्या १५० में 'प्रविष्टश्चो' का पाठभेद
इसी तरंग के छत्तीसवं श्लोक में नोण वणिक् 'प्रतिष्ठं चो' तथा 'प्रविष्टञ्चो' मिलता है ।
का वर्णन मिलता है। उसने अपनी पत्नी को मन्दिर पादटिप्पणियाँ :
में गान एवं नृत्य निमित्त दान कर दिया था । १५२ (१) पत्नी : कल्हण ने राजा का चरित्र
कश्मीर में नृत्य एवं संगीत कला पुरा काल से पवित्रता तथा धार्मिक प्रवृत्ति से 'पूर्ण कर दिया है ।
ही विकसित थी। राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत में कल्हण यहाँ केवल एक ही पत्नी का उल्लेख करता
भाग लेते थे । इस तरंग के श्लोक ४२३ से पता है । प्रतीत होता है । राजा एक पत्नीव्रतधारी था ।
चलता है कि राजा जयापीड ने भरत मुनि कृत उसका आचरण अनुकरणीय था । पत्नी भौतिक सुख
नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। वह नृत्य तथा त्याग कर पति के साथ चीरमोचन तीर्थ में स्वर्गारोहण
संगीत का विद्वान् था । निमित्त आयी थी । पति का जीवन पर्यन्त साथ दिया
काश्मीर का राजा हर्ष स्वयं संगीत एवं नृत्य था । अन्तिम समय में भी साथ दिया । वह लोक में
विशारद था । उसके रचित गीत जनता गाती थी । साथ थी। परलोक साथ गयी ।
राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत की शिक्षा लोगों को पति के साथ पत्नी सती हुई इसका उल्लेख
देता था। युवराज काल में ही वह अपने पिता नहीं मिलता है। यदि वह सती होती तो कल्हण
राजा कलश की राज्य सभा में गीत की रचना उसका अवश्य उल्लेख करता । राजा ने जिस
करता था । उन्हें स्वयं गाता था । प्रकार अन्तिम काल में योग का आश्रय लिया और
इच्छा मृत्यु प्राप्त की। उसी प्रकार पत्नी ने भी
तरंग (७०६-७१०) में मदिरालय में वृद्धा मृत्यु प्राप्त किया होगा । राजा मृत्यु के आलिंगन की
वेश्या के नाचने का उल्लेख मिलता है । कर्णवती प्रबल उत्कण्ठा से चीरमोचन तीर्थ में प्रविष्ट हुआ
नर्तकी का उल्लेख (रा . त . ७ ० १४६० में) था । श्रीनगर राजप्रासाद में भौतिक प्रसाधनों के
मिलता है। कश्मीर की राजसभा के गायक तथा मध्य मरना उसे अच्छा नहीं लगा । वह सप्तर्षियों
नर्तकी समाज में विशिष्ट स्थान रखते थे । उनकी के समान स्वेच्छया स्वर्ग जाना चाहता था। कल्हण
तुलना यूनान के हेटेरेरा वर्ग से की जा सकती है । इसी ओर संकेत करता है कि राजा अपनी पत्नी के
कश्मीर में नृत्य, संगीत तथा काम कला बहुत साथ सायुज्य प्राप्त किया ।
विकसित थी । कुट्टनीमत जैसे ग्रन्थो का समाज (२) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्तियों में
में स्थान था । उसका रचनाकार स्वयं राजा यह एक प्रकार की मुक्ति है। एक दूसरे में इस
जयापीड का मंत्री दामोदर गुप्त था। उसके अध्ययन प्रकार मिल जाता कि परस्पर किसी प्रकार का
से कश्मीर के उत्साहपूर्ण, उल्लासपूर्ण, उमंगपूर्ण, भेद न रह जाय इस प्रकार की मुक्ति को
आह्लादपूर्ण मस्त जीवन की एक झाँकी मिलती है। सायुज्य कहते हैं ।