राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
१४६ राजतरंगिणी
जीर्णं श्रीविजयेशस्य विनिवार्य्य सुधामयम्।
निष्कल्मषेणाश्ममयः प्राकारो येन कारितः ॥१०५॥
१०५ उस निष्कल्मष राजा ने विजयेश्वर १ के पवित्र देव स्थान के जीर्ण हुए चूने आदि
से बने प्राकार के स्थान पर नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया ।
'कहा जाता है। यह नगर एक समय मीलों में
विस्तृत था। उसमें दर्शनीय भवन थे। अशोक ने
एक देवस्थान निर्माण कराया था। उसमें भगवान्
बुद्ध का एक धातु रखा गया था। इस समय उस
पवित्र देव स्थान का पता नहीं है। उस गौरवशाली
प्राचीन काल की स्मृति को जीवित रखने के लिये, इस
एक मन्दिर के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह
गया है। यह मन्दिर सरोवर के मध्य में है। इसके
चारों ओर विलों के उद्यान हैं। अतएव इसके
भीतर क्या है । बहुत लोग इसके अन्दर जाकर देख
नहीं सके हैं। (पृष्ठ २३६)
विजयेश्वर का मन्दिर राजा अनन्तदेव के समय
में भस्म हो गया था। राजा कलश ने उसका
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ७.५२४) पुराना
आकार अथवा सुधामय सम्भवतः ईंट अथवा पत्थरों
के ढोको का बना था। अशोक ने पत्थरों से उसका
निर्माण कराया था।
नीलमत पुराण में दो स्थानों पर विजयेश का
उल्लेख मिलता है। पहला वर्णन शक्र संशय तथा
दूसरा वितस्ता माहात्म्य के वर्णन के सन्दर्भ में
मिलता है। दोनों से कल्हण की बातों की पुष्टि
होती है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०५ में 'सुधामयम्' का पाठभेद
'सोधम्' और 'प्राकारो' का पाठभेद 'प्रासादो' तथा
'कारितः' का 'निर्मितः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०५ (१) विजयेश्वर. काल शिव विजयेश्वर का
प्रसिद्ध देवालय वर्तमान बिजवोर तथा उसके आस-
पास का क्षेत्र था। इसे विजयेश्वर क्षेत्र कहते थे।
स्थानीय पुरोहितों के अनुसार विजयेश्वर का प्राचीन
मन्दिर लगभग ४०० गज नदी तट से दूर वितस्ता
सेतु के दूसरी तरफ था। यहाँ से कश्मीर के डोगरा
राजा रणवीर सिंह ने अपने नवीन मन्दिर निर्माण
निमित्त बहुत सामग्री प्राप्त की थी। यहाँ स्टीन
सन् १८८९ में आये थे। मन्दिर के अधिष्ठान के
पास कुछ टूटे हुए पत्थर तथा मलवे मिले थे। यहाँ
पर कुछ निर्माण किया गया है। नवीन मन्दिर के
समीप कुछ मूर्तियाँ जो पुरानी नही मालूम होती,
रखी थी। यह मन्दिर नदी के ऊपर कुछ दूर पर
बना है।
विशोकां विजयेशं च वितस्तां सिन्धुसंगमम् ।
एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥
1056 : १२४०
'—विशोका, विजयेश, वितस्ता, सिन्धु संगम
पार करते हुए वह भरतगिरि पर पहुँचा ।
विजयेशाग्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते ।
रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते सुखम् ॥
1303 : १५१६,१५१७
'महीपते ! विजयेश्वर के सम्मुख वितस्ता में
स्नान करने वाला अपने कुल का उद्धार करता स्वयं
रुद्रलोक प्राप्त कर सुख भोगता है ।
उक्त उद्धरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं।
विजयेश्वर तीर्थ था। विजयेश्वर घाटपर स्नान करने
पर मुक्ति मिलती थी । कुल का उद्धार होता था ।
सुख की प्राप्ति होती थी । विजयेश का महत्त्व सिन्धु
संगम जैसा महत्त्वपूर्ण था । उसकी गणना पवित्र
स्थानों में थी । इन आध्यात्मिक महत्त्व के साथ
दूसरा भौगोलिक महत्त्व भी प्रकट होता है। वितस्ता
प्रथम तरंग १४७
सभायां विजयेशस्य समीपे च विनिर्ममे ।
शान्तावसादः प्रासादावशोकेश्वरसंज्ञितौ ॥१०६॥
१०६. उस शान्त एवं अवसाद रहित राजा ने विजयेश्वर के समीप दो प्रासादों¹ का
निर्माण सभा² स्थान में कराया उनका नाम अशोकेश्वर³ था।
तटपर विजयेश तीर्थ था। वर्तमान बिजन्नोर अथवा
ब्रिजवेहरा किंवा व्रजब्रारी ही पूर्वकालीन विजयेश्वर
क्षेत्र था। वहाँ के मन्दिर में एक विजयेश का
मन्दिर था। अशोकेश्वर का वर्णन नीलमत पुराण में
नहीं आता है। इस अभाव के दो कारण हो सकते
हैं। पहला कारण यह हो सकता है कि नीलमत
पुराण अशोक के पूर्व लिखा गया हो अथवा विजयेश
यहाँ के प्राचीन नगर देवता थे अतएव उनका महत्त्व
काशी के देवता काशी विश्वनाथ की तरह था।
नीलमत पुराण ने विजयेश को ही तीर्थ तथा तीर्थ
का प्रधान देवता माना होगा। अन्य देवताओं का
उल्लेख विजयेश क्षेत्र में नहीं मिलता।
बिजन्नोर अर्थात् विजयेश्वर श्रीनगर से १९
मील दूर स्थित है। कल्हण के अनुसार इस मन्दिर
की स्थापना विजयराज ने की थी। (राज० त०
२:६२) सिकन्दर बुतशिकन ने इसे नष्ट किया था।
यहाँ पर बड़ी मसजिद के समीप कुछ ध्वंसावशेष पाये
जाते हैं। इस मन्दिर का स्तम्भ रतन हाजी की
मसजिद में तथा प्रसाद चढ़ाने का बड़ा शिलाखण्ड
मसजिद के बाहर पड़ा है। कथा है कि इस मन्दिर
के नष्ट होने का समय शिलालेख पर पहले ही
लिखकर रख दिया गया था। उस पर लिखा था
'बिस्मिल्लाह मन्त्रेण भग्नन्त विजयेश्वर।'
विजयेश्वर का उल्लेख जोन आदि की राज-
तरंगिणी (दत्त पृष्ठ ११, ८८, १२०, १३२,
१४०, १४६, १४७, ३२२, ३७२, ३८१, ४०८) में
विशेष रूप से किया गया है।
१०६ (१) प्रासाद : प्रासाद शब्द से किंचित्
भ्रम उत्पन्न हो सकता है। आजकल प्रासाद शब्द
मन्दिरों के लिये प्रयोग नहीं किया जाता। संस्कृत
में प्रासाद का अर्थ—राजभवन, विशाल भवन,
देवालय एवं मन्दिर है । ‘प्रासादो देवभूभुजाम्।’
अर्थात् देवालय एवं महल दोनो का अर्थ प्रासाद है।
अमर कोष (२:२:९)
(२) सभा : आज भी यह प्रथा प्रचलित है।
बड़े मन्दिरों में राजा तथा श्रीसम्पन्न लोग
छोटे-छोटे मन्दिर अपने नाम से स्थापित करा देते
हैं। काशी विश्वनाथ के मन्दिर में इस प्रकार
कितने ही शिव लिंगों की स्थापना लोगों ने करायी
है। छोटे-छोटे मन्दिर दीवारों तथा खाली स्थानों
में बनवा दिये जाते हैं। दक्षिण भारत की यात्रा
में भी मैंने विशाल मन्दिरों में यह प्रथा प्रचलित
पायी है। अशोक ने भी इसी प्रकार पुण्यार्जन
निमित्त विजयेश्वर जैसे पवित्र धाम में उसके सभा
स्थल अर्थात् प्राकार के भीतर मन्दिर निर्माण
कराया होगा।
सभा का अर्थ यहाँ सभामण्डप तथा विशाल
मन्दिर का प्राकार दोनो लगाया जा सकता है।
सभा का अर्थ वास, कुटी, शाला, सभा, सभाभवन,
सभासद् तथा परिषद् होता है। (अमर कोष २:२.७
तथा ३:१:१३७) सभामण्डप छाया हुआ सभा
का स्थान होता है। गर्भ गृह के सम्मुख ढके स्थान
को सभामण्डप कहते हैं। यह सभी मन्दिरों में
होता है। यहाँ पर अर्थ सभा अर्थात् विस्तृत प्राकार
वेष्टित स्थान लगाना उचित प्रतीत होता है। यद्यपि
मन्दिर के सभा मण्डप में भी लोग अपने नाम से
दीवालों या किसी कोने में मूर्तियाँ स्थापित कर
देते हैं। अशोक के निर्मित मन्दिर निश्चय ही
विजयेश्वर प्राकार के अन्तर्गत भिन्न मन्दिर थे।
(३) अशोकेश्वर : विजयेश्वर के प्रसंग में
लिखा जा चुका है कि मन्दिर का पता नहीं चलता।
१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशात्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलौक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे । अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । वह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है । यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे । परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी । मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिड्डामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पांडुचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है । पांडुचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है ।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है । (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
होता है । बोधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है ।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
मर्यादाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः गद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छः ... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है । उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है । भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है । यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है । शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है । जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है । (श० ब्रा० ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।
प्रथम तरंग
साधी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे । उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था ।
काश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे । वे
बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे । वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे ।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया । उस समय
काफिरिस्तान के निवासियों का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर में काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्दुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इसलाम धर्म स्वीकार नहीं किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्तयु म्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों मे अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेशवर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है । तरंग आठ में भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८ः२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कहीं भी
निवास करते थे । उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था ।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है । महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत में चारों दिशाओं में थे । महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छों ने ग्रहण किया था । अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था ।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तू प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८ः४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७:२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१:१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शाश्व० : ९१:२५; म० क० : १४.१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी । कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतों में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश तत्व आते हैं । अमरकोप-
कार भूत का अर्थ करता है—लब्धं प्राप्तं विन्नं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्
१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशत्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलोक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।
मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे। अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । यह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है। यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे। परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी। मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिद्दामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पाण्ड्रचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है। पाण्ड्रचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है। (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)
कल्हण के समय अशोकेश्वर का मन्दिर
वर्तमान था। उसने स्पष्ट उल्लेख किया है। जयसिंह
की रानी रड्डादेवी ने अशोकेश्वर मन्दिर का
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ८:३२९१)
१०७ (१) म्लेच्छ : म्लेच्छ का अर्थ—अनार्य,
जंगली भाषा बोलने वाले, असंस्कृत भाषाभाषी,
शास्त्रों को न मानने वाले, जाति बहिष्कृत आदि
होता है। बौधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः तद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छ ...... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है। उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रस्थन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है। भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है। यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है। शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है। जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है। (श० ब्रा. ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।
ऊँची सभ्यता वाले ईरानियों को भी 'अजम' अर्थात्
गूँगा अर्थात् बात न समझने वाला कहते थे।
चन्द्रगुप्त के समय भारत पर अलकसन्दर,
किंवा अलक्षेन्द्र (अलेकजेंडर), सिकन्दर, का आक्रमण
हुआ था। दार्वाभिसार के राजा आभी का सम्पर्क
सिकन्दर से था। यूनानियों के लौट जाने तथा
सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसने अनेक यूनानी
प्रथम तरंग
साथी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे। उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था।
कश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे। वे
बीसवी शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे। वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया। उस समय
काफिरिस्तान के निवासियो का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर मे काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्बुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्त्युम्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों में अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेश्वर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है। तरंग आठ मे भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८:२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कही भी
निवास करते थे। उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है। महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत मे चारो दिशाओं में थे। महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छो ने ग्रहण किया था। अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तृ प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८:४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७.२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१.१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शास्व० : ९१:२५; म० क० : १४:१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ मे म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी। कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतो में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश सत्त्व आते हैं। अमरकोष-
कार भूत का अर्थ करता है—लक्ष्यं प्राप्तं वृत्तं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्
१५० राजतरंगिणी .
सब्य प्राप्त, विघ्न, भावित, आसादित, बोर भूत
हैं। पुनः (३:३.७७) में अर्थ किया गया है।
अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च।
युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥
अर्थ होता है अत्याहितं —महाभय, साहसी कर्म,
व्याप्य, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, गत्य, प्राणी,
बीता समय।
ब्रह्माण्ड पुराण के मतानुसार भूतों की उत्पत्ति
भूत तत्त्व से हुई थी। इनका भोजन पिशित था।
(२८ ३९-४०) 'पिशित' का अर्थ होता है मांस-
भक्षी, राक्षस, पिशाचादि।
इनका वर्णन अद्भुत है। वे कृशांग अर्थात् छोटे
कद के थे। लंबकर्ण थे। प्रलम्बोष्ठ थे। लम्बे दाँत
युक्त थे। नखिन् अर्थात् नख रखते थे।
स्थूलपिण्डक अर्थात् स्थूल शरीर वाले थे। बभ्रु व
अर्थात् लम्बी भौ वाले थे। हरि तथा मु ज केश थे।
ठिगने थे। वर्ण नीललोहित था। पिंगल वर्ण भी
होता था।
सगोत्र विरोधी होते थे। शक्तिशाली होते थे।
सर्प यज्ञोपवीत धारण करते थे। शरीर को अनेक रंगों
के लेप द्वारा सज्जित करते थे। केशों को मुकुट तुल्य
बाँध कर रखते थे। हाथी का चमड़ा धारण करते
थे, अथवा नग्न रहते थे। इनके आयुध, शूल, धनुष,
निषंग, वरूथ तथा असि थे। यह वर्णन अफ्रीका
तथा आस्ट्रेलिया की घोर जंगली जातियों से
मिलता है।
पूर्व काल मे अत्यन्त जंगली जाति थे। किन्तु
असुर एवं देवों के सम्पर्क के कारण इनकी स्थिति
में विशेष सुधार हो गया था। असुरों के सम्पर्क के
कारण नृत्य एवं संगीत इन्होंने सीखा। एक तरह की
सामाजिक व्यवस्था में इन्होंने अपने को संघटित
किया। उनकी मूल सामाजिक व्यवस्था क्या थी।
पुराणो आदि मे विस्तार से वर्णन नही मिलता।
स्वायम्भुव मन्वन्तर के पूर्व युग में भारतवर्ष
में ये निवास करते थे। इनका निवासस्थान
हिमाचल का पर्वतीय प्रदेश था। धुर उत्तरीय
हिमालय भाग में रहते थे। भारतवर्ष के सबमे
पुराने रहनेवाले थे। मूल निवासी थे।
असुरों तथा भूत जाति में प्रायः संघर्ष होता
रहा। उत्तर से असुरों का दबाव पड़ने लगा। ये
अपनी रक्षा निमित्त विन्ध्य की पहाड़ियों में चले
आये। यही रहने लगे थे।
शंकर भगवान् तथा अन्धकासुर के युद्ध में भूतों
ने शंकर के पक्ष में रहकर युद्ध किया था। इस युद्ध
में विनायक भूत ने सर्वप्रथम अन्धकासुर पर
आक्रमण किया था। अंधक ने विनायक को परास्त
कर दिया। अनन्तर नंदी तथा विनायक दोनों ने
अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। उस युद्ध में
अन्धकासुर पराजित हो गया था। अंधक शंकर
की शरण में आ गया। शंकर ने उसे भूतगण
का गणपति बनाया। उसका नाम भृंगी पड़ा।
भूत एक जाति थी। यह पर्वतीय जाति थी।
पिशाच एवं नाग जाति की तरह उत्तर पश्चिम
भारतीय सीमा के आस-पास रहते थे।
कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के संघर्ष के कारण
आर्यों का वहाँ आगमन हुआ। उसी प्रकार प्रतीत
होता है। भूत तथा असुरों के संघर्ष के कारण
कालान्तर में दुर्बल होने पर भूत जाति उत्तर से
दक्षिण की ओर बढ़ने लगी। अन्त में विन्ध्य की
पहाड़ियों में शरण ली। वैवस्वत मन्वन्तर के
काल तक उनका स्थानान्तरण उत्तर से दक्षिण
की ओर पूर्ण हो गया था। (वायु पुराण
३०:८९-१०१, वामनपुराण ६७:१-२३;
ब्रह्माण्ड: १:३२:८८-८९; २:३:२-३४ २:८.३९-४०;
२:९:६८-७८;)
भूतों को प्रेतों की संज्ञा कालान्तर मे दे दी
गयी। उन्हे शरीरहीन मृतको के जीव रूप में मान
लिया गया। बात इसके विपरीत है। भूत को
प्रथम तरंग
१५१
एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया
है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं ।
वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग
तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई
साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों
के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता
है ।
पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव
जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के
चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा
(३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा ।
धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी ।
ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी
प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह
प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि
प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है ।
(ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७)
पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक
देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा
गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद्
कहा गया है ।
रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही
थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक
स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया
है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष
एवं सभापति से भिन्न थे ।
उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान
व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता
था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में
इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है ।
वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था ।
(वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम
नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का
नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२)
वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह
करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि
प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों
का विस्तृत वर्णन किया गया है ।
उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन
किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख'
कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य'
एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग
आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी
पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक
गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम
से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण :
६७:१-२३)
भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात्
वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह
पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि
कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका
वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य
में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया
गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली
जातियों से मिलता है ।
बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत
को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत
व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही
मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है ।
वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त
करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी
गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को
पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत
वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख
मिलता है ।
मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों
के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह
पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे
प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय
१५२ राजतरंगिणी
आया । नाग जाति ने उन्हें उद्वासित किया होगा ।
भूतों के नागो का यज्ञोपवीत पहनने का दो अर्थ
हो सकता है। एक तो मुण्डमाला के समान नागों
की हत्या का प्रतीक होगा दूसरा नागों से उनमें
किसी प्रकार सन्धि हो गयी थी । प्रतीक स्वरूप
हृदय स्थान पर यज्ञोपवीत धारण करते थे । शंकर
किंवा रुद्र दोनों का अधिपति होकर भूतेश तथा
नागेश हो गये । भूतगण नागगण उनके गण
बन गये ।
भूत शब्द शायद इसलिये प्रयोग किया गया कि
ये भूत की एक जाति थे। उनका मिश्रण पिशाच,
नाग तथा आर्यों में हो गया अतएव उनका जाति
का चाहे जो भी नाम रहा हो उसकी संज्ञा भूत की
रख दी गयी । अर्थात् वह जाति जो भूत काल में
थी । आजकल आदिवासियों में अनेक जाति तथा
भाषा-भाषियों तथा धर्मावलम्बियों का बोध होता
है । वास्तव में आदिवासी किस अनुसूचित कोई
एक वर्ग नहीं है । इसी प्रकार भूत शब्द वर्ग तथा
समष्टि वाचक है ; उससे एक वर्ग का बोध होता
है । उसमें कितनी ही जातियाँ तथा उपजातियाँ
क्यों न रही हों । नाग जाति के लोप हो जाने पर
भी जैसे नागेश्वर, पिशाच जाति के लुप्त होने पर
पिशाचमोचन तथा पिशाचेश्वर है। उसी प्रकार
भूत जाति के लुप्त हो जाने पर भी भूतेश्वर उस
लुप्त जाति का एक प्रतीक है ।
प्रचलित किवदन्ती के अनुसार व्यक्ति मरने
के पश्चात् भूत हो जाता है । शरीर विहीन प्राण
अन्तरिक्ष में विहार करता है । शिव संहारक देवता
हैं । इस शरीर के संहार के पश्चात् काया हीन
प्राण शेष रह जाता है । वह भूत है । उसके देवता
जिसके कारण शरीरस्थ प्राण अशरीरस्थ हो जाता है ।
भूत के नेता भूतेश हो जाते है। भूतेश्वर की पूजा
का प्रचलित रूप यही है । वह भूतो के देवता है ।
शिव के नाना रूपो मे यह भी एक रूप है ।
केवल हिन्दू धर्म की गाथाओ में प्रेतादि का
वर्णन नही परन्तु बौद्ध ग्रन्थों मे भी खूब वर्णन
मिलता है । बौद्ध पुनर्जन्म मानते है । कर्म के अनुसार
मनुष्य जन्म लेता है । मुगलिम कथानकों मे भी जिनों
का वर्णन मिलता है ।
भूतेश : कश्मीर में प्राचीन काल से शिव
भूतेश की पूजा प्रचलित है । उसने कश्मीर के
सामाजिक, राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जीवन को
प्रभावित किया है ।
हिन्दू शास्त्रों में द्वादश ज्योतिलिगों और उनके
साथ उपलिंगों का उल्लेख मिलता है । भूतेश एक
ज्योतिरुपलिंग है। द्वादश ज्योतिलिंग (१) सोमेश्वर,
(२) मल्लिकार्जुन, (३) महाकालेश्वर (४)
ओंकारेश्वर (५) केदारेश्वर (६) भीम शंकर (७)
काशी विश्वनाथ (८) त्र्यम्बकेश्वर (९) वैद्यनाथ
(१०) नागेश्वर (११) रामेश्वर तथा (१२)
घुश्मेश्वर हैं ।
केदारेश्वर के उपलिंग भूतेश हैं । उनका स्थान
यमुना तट है यथा—'केदारेदारवमद्भूतं भूतेशं यमुना-
तटे ।' भूतेश ज्योतिलिंग नागेश्वर के भी उपलिंग
हैं । यह झिल्लिका सरस्वती तट पर स्थित है ।
झिल्लिकासारस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम्—'
भारतवर्ष में बावन शक्तिपीठ हैं । उनमें
शक्ति पीठ 'त्रिसन्ध्या' कश्मीर मे है । यहाँ पर देवी
सती का अंग कंठ गिरा था। देवी का यहाँ नाम
महामाया पड़ा था। कहा गया है। भैरवी त्रिसन्ध्येश्वर
है। इसी प्रकार देवी सती का केशजाल वृन्दावन
में गिरा था । देवी का नाम उमा तथा भैरव का
नाम भूतेश है ।
कंकणी नदी का संकीर्ण गर्त शैल वाह
के दक्षिण दिशा में प्रवाहित है । कंकणी के तट
पर वह वेगथ ( वसिष्ठाश्रम ) ग्राम से तीन मील
ऊर्ध्व दिशा मे भूतेश है । वहाँ पर सत्तरह मन्दिरो के
भग्नावशेष मिलेंगे । इनका उल्लेख बिशप कोवी ने
सन् १८६६ मे अपनी पुस्तक के पृष्ठ १०१ तथा
मेजर कोल ने एनसिएण्ट बिल्डिंग इन कश्मीर पृष्ठ
११ पर किया है ।
प्रथम तरग १५३
उक्त मन्दिर समय समय पर कश्मीर के राजाओं द्वारा निर्माण कराये गये थे। भूतेश्वर जाते समय एक ऊर्ध्व पर्वतीय खण्ड मिलता है। उसे भरतगिरि कहते हैं। यहाँ एक लघु सरोवर है। उसे ब्रह्म सर कहते हैं। नीलमत पुराण के के अनुसार हरमुकुट, नन्दिपर्वत, भरतगिरि, अमरेश्वर, महादेव गिरि, धनद तथा वैश्रवण, इन्द्र कील, गौरीशिखर, उशोरिका, पंचालधारा, बर्हिगिरी, धन्तगिरी, पर्वतों की श्रेणियों में आते हैं।
श्रीनगर सोन मार्ग राजपथ पर वूसन से एक सड़क फूटकर पर्वतीय ग्राम वांगथ की ओर जाती है। यह वांगथ नाला के पार्श्व से चलती है। स्थल सघन देवदार तथा फर पादपावली से हरित है। चारो ओर उत्तुंग पर्वतमालाएँ हैं। नरनाग का उत्तुंग शिखर जैसे इस यात्रा का अन्तिम स्थान है। सात किंवा आठ मील की यात्रा समाप्त कर यात्री नरनाग पहुँचता है। नरनाग मन्दिरों का समूह है। उसे वांगथ मन्दिर समूह की संज्ञा विदेशी पर्यटकों ने दी है। वांगथ ग्राम से तीन मील दूर मन्दिर समूह हैं।
मैंने पहली वार यहाँ की यात्रा की थी। मार्ग कष्टप्रद था। कुछ दूर तक सड़क नाम मात्र के लिये बनी थी। तत्पश्चात् पगडण्डी का आश्रय लेना पड़ा था। दूसरी बार सन् १९६४ की यात्रा में सडक नरनाग तक करीब बन चुकी थी। वहाँ ठहरने के लिये डाक बंगला बन रहा था। पहली यात्रा मैंने सन् १९५६ में की थी। उस समय कश्मीर सरकार से कहा था। इस स्थान तक पहुँचने का मार्ग सुगम बना दिया जाय। उस समय मेरे साथ पचास संसद् सदस्यों का दल कश्मीर गया था। किन्तु भूतेश्वर जाने का कोई साहस नहीं कर सका। मैने यह यात्रा श्री गुलाम बख्शी तत्कालीन कश्मीर के मुख्य मन्त्री के प्रबन्ध की सुविधा के कारण की थी। अन्यथा यात्रा असम्भव थी। अब सड़क
२०
बन गयी है। डाक बंगला तैयार हो गया है। छोटी कार अथवा जिप से सुगमता पूर्वक जाया जा सकता है।
यह स्थान मुझे कश्मीर मे बहुत ही आकर्षक, भव्य तथा जीवनमय मिला। स्थान जागृत है। जैसे जैसे व्यक्ति भूतेश्वर के समीप पहुँचता चलता है, उसके मन पर स्थान की भव्यता का गम्भीर प्रभाव पडता जाता है।
मुझे वांगथ से नरनाग तक दूसरी बार की यात्रा में पैदल चलना पड़ा था। पैदल चलने में विचित्र आनन्द का अनुभव होता है। बढ़ते चलिये उतने ही प्राकृतिक दृश्य की सुन्दरता बढ़ती मिलेगी।
नाला किंवा कंकणी नदी के तट से मार्ग चलता है। एक ओर नदी का कलकल निनादिन प्रवाह तथा दूसरी ओर देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की सघन छाया, नदी के गर्त के दोनों ओर ऊँचे होते जाते अत्यन्त हरित पादपपूर्ण पर्वतों की श्रेणी, उनपर वृक्षों का वायु प्रवाह में झूमना, हृदय पर अपना विचित्र प्रभाव छोड़ता है। स्थान निर्जन होने पर भी मन उचटता नहीं। नदी का निनाद मन बहलाता रहता है। एकान्त का तीव्र अनुभव नहीं होने देता।
भूतेश्वर की ओर चलते रहने पर सम्मुख हिमाच्छादित हरमुकुट पर्वत जैसे ऊँचा उठता जाता है। पृष्ठ भाग में उपत्यका को घेर कर बन्द कर देता है। पहले हरित तत्पश्चात् हिमाच्छादित पर्वत मन पर सौन्दर्य मिश्रित भय उत्पन्न करता है।
मन्दिर से दो फर्लांग पहले वांगथ की ओर एक नाला पड़ता है। नाला पर लकड़ी का पुल बना है। उस पर खड़े होकर वाम पार्श्व में देखने पर एक विचित्र दृश्य मिलता है। दो हरित शिखरों के मध्य एक हिमाच्छादित पादप हीन शिखर झांकता दिखायी पड़ता है। उसके तीन छोटे छोटे शिखर त्रिमूर्ति तुल्य लगते हैं।
१५४ राजतरंगिणी
मन्दिर समूह के समीप पहुँचते ही मार्ग का
श्रम स्थान की अभिरामता के कारण तिरोहित हो
जाता है। चारों ओर उत्तुंग शिखरमाला खड़ी
मिलती है। पर्वतमालायें शिखर से मूल तक
अत्यधिक हरित हैं। उनका दृश्य मन को मुग्ध कर
देता है। विश्व में इतना सुन्दर पर्वतीय दृश्य
दुर्लभ है।
प्राचीन काल में वसिष्ठाश्रम (वैगथ) से लेकर
मन्दिर समूह तक तपस्वियों के आश्रम थे। तीर्थ
यात्रा पथ के दोनों ओर ब्राह्मण रहते थे। परन्तु
इस समय यहाँ गूजरों की आबादी है। कृषि में
मक्का यहाँ की मुख्य उपज है। गूजर हिन्दू तथा
मुसलमान दोनों होते हैं। यहाँ के आबाद गूजर
मुसलमान हैं।
यह स्थान जंगल है। सम्भव है कालान्तर में
पर्यटक-केन्द्र बन जाने पर पुष्ट और विकसित हो
जाय।
वन में भालू हैं। ये मक्का खा जाते हैं। उनसे
रक्षा का विचित्र उपाय ग्रामीणों ने निकाल रखा
है। शेर से भालू भय खाता है। शेर की आँखें
अन्धकार में चमकती हैं। अतएव ग्रामीण दो स्थानों
पर करीब-करीब आग जला देते हैं। दूर से मालूम
होता है। शेर खड़ा है। उसकी आँखें चमक रही
हैं। भालू भयभीत हो जाता है। समीप नहीं
आता।
शेर से भी सुरक्षा की तरकीब ग्रामीणों ने
ने निकाल ली है। शेर आग से डरता है। ग्रामीण
घास की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं। शेर पास नहीं
आता। भाग जाता है। सड़क निर्माण तथा पर्यटकों
के आवागमन के कारण भालू तथा शेर से स्थान
निरापद हो गया है। वे दूर जंगलों में चले
गये हैं।
सन् १८६९ में लेफ्टिनेण्ट कर्नल श्री हेनरी एच.
कोल ने (सुपरिटेण्डेण्ट आर्केयालोजिकल विभाग
उत्तर पश्चिम मंडल) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एन
सिण्ट विल्डिङ्ग इन कश्मीर' लण्डन में प्रकाशित
करवायी थी। वह उपलब्ध है। उसमें यहाँ के
मन्दिर समूहों का चित्र दिया गया है। उस समय
मन्दिरों की क्या अवस्था थी उन चित्रों के देखने से
पता चलता है।
श्री कोल ने यहाँ के मन्दिर समूहों को दो वर्गों
में विभक्त कर उनका नामकरण किया है। एक
का नाम राजदैन बल तथा दूसरे का नाम वन मन्दिर
समूह रखा है। प्रथम मन्दिर समूह की संज्ञा राजदैन
बल तथा पीछे वाले मन्दिर समूह को संज्ञा नागबल
दिया है। बिशप कोब्री ने नागबल को पूर्वीय तथा
राजदैन बल को पश्चिमी मन्दिर समूह कहा है।
बिशप कोब्री के समय मन्दिरों पर घास, फूल बहुत
जमे थे। (जे० एम० वी० १८६६ पृष्ठ १०१) पूर्वीय
मन्दिर समूह अर्थात् नाग बल किंवा भूतेश मन्दिर
के प्राकार की उत्तर पूर्व दिशा में एक छोटा सरोवर
है। इस सरोवर को नारान नाग कहते हैं।
नीलमत पुराण तथा कल्हण के अनुसार यह
सरोवर प्रसिद्ध सोदर तीर्थ है। इस तीर्थ से बीस
गज पश्चिम बड़े मन्दिर के प्राकार के बाहर उत्तरा-
भिमुख एक और मन्दिर था। यह मन्दिर भैरव का
मन्दिर था। नागबल अर्थात् पूर्वीय मन्दिर समूह
में बड़ा मन्दिर शिव भूतेश का था। राजदैन बल
अर्थात् पश्चिमी मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव
ज्येष्ठेश का था। इस मन्दिर के पश्चिम दक्षिण कोण
बिशप कोब्री को शिवलिंग का अधिष्ठान दिया धरथा
मिला था जिसपर शिव लिंग स्थापित किया जाता
है। वह शिव अधिष्ठान ज्येष्ठेश का था। मैंने चारों
ओर लगभग एक घण्टा तक उसे खोजा। परन्तु वह
मुझे मिला नहीं। अतएव नहीं कह सकता कि उसका
रूप क्या था। यदि वह मिल जाता तो शिव लिंग
किस स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाता है उसकी घेरे,
गहराई तथा आकार से कल्पना की जा सकती थी
कि शिवलिंग का प्रकार तथा आकार क्या था।
कर्नल श्री कोल श्रीनगर से दो पड़ाव चलकर
यहाँ पहुँचे थे। पहला पड़ाव १० मील तथा दूसरा
प्रथम तरंग
१५५
१५ मील पर डाला था। आज से १०० वर्ष हो
गये। उस समय वेगथ का मार्ग इतना संकीर्ण था
कि यात्रा कठिनता से हो सकती थी। मार्ग में चीड़
तथा फर के इतने वृक्ष थे कि उन्हें काट कर श्री
कोल यहाँ तक पहुँच सके थे।
ज्येष्ठेश्वर तथा भूतेश्वर के मन्दिरों के मध्य
लगभग २०० गज का अन्तर है। ज्येष्ठेश्वर मन्दिर
के पृष्ठ भाग में सर्व प्रथम आयताकार एक चबूतरा
१०० फीट लम्बा तथा ६७ फीट चौड़ा मिलता है।
उसके पश्चात् भूतेश मन्दिर का ध्वंसावशेष
पड़ता है।
वेगथ की ओर से पहुँचने पर प्रथम ध्वंसावशेष
ज्येष्ठेश्वर किंवा राजदेन बल समूह का मन्दिर पड़ता
है। इसका मुख्य मन्दिर श्री कोल के समय आज ही
जैसा खड़ा था। उसका प्राकार १७६ फीट लम्बा
उत्तर-दक्षिण तथा १३० फीट चौड़ा पूरब-पश्चिम
है। प्राकार की नींव का आकार आज भी अक्षुण्ण है।
यद्यपि पत्थर लोग उठा ले गये हैं। नींव के पत्थर
शेष रह गये हैं। उनसे प्राकार के आकार का
अनुमान होता है।
ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर २४ वर्ग फीट में है।
इसका बहिर्वेदान चारों तरफ ३ x १५ फीट ६ इंच
है। मन्दिर चौकोर है। मन्दिर के पूरब तथा
पश्चिम दोनों ओर आमने सामने दो द्वार हैं। द्वार
अलंकृत हैं। उनमें देवी तथा देवताओं के चित्र
खोदे गये थे। इस समय उन मूर्तियों की एक प्रकार
से छाया मात्र ही रह गयी हैं।
मन्दिर के दक्षिण तथा उत्तर की दिवालें बन्द
हैं। बन्द दीवारों के बाहरी तरफ बड़े गवाक्ष बने
हैं। उनमें पूर्व काल में मूर्तियाँ स्थापित थीं।
नागबल अर्थात् भूतेश्वर मन्दिर की अपेक्षा ज्येष्ठेश्वर
का मन्दिर अधिक अच्छी हालत में है। इसकी छत
शिखर सुरक्षित है। वह मन्दिर की रचना तथा
तत्कालीन स्थापत्य पर प्रकाश डालता है। छत
तथा शिखर पत्रकी बनी है। मन्दिर के प्रांगण में
पड़े शिलाखण्डों का रूप काल प्रभाव के कारण कुछ
विकृत हो गया है। कहना कठिन है। शिला स्तम्भ
गोले थे, अठपहले थे अथवा चौपहले थे। स्तम्भों
के अधिष्ठान यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं।
कर्नल कोल ने इस मन्दिर का प्लान पृष्ठ ७:६८
तथा मन्दिर का चित्र ८:६८ तथा ९:६८ पृष्ठों पर
दिया है। उसमें ज्येष्ठेश्वर मन्दिर को लेकर ६
मन्दिर प्रदर्शित किये गये हैं। पुस्तक के चित्र देखने
से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मन्दिरों पर वृक्षादि जम
गये थे। उनकी रक्षा तथा मरम्मत का भी प्रबन्ध
नहीं किया गया। मुद्रित चित्र देखने से मन में भय
का संचार होता है। मन्दिर वास्तव में भूतों का
निवास होगा धारणा अनायास उत्पन्न हो जाती है।
प्रांगण में घास, झाड़ियाँ तथा पेड़ लग गये हैं।
वह एक उपेक्षित वन का रूप प्रकट करता है।
सब कुछ बिखरा, अस्त-व्यस्त, टूटा-फूटा तथा भयंकर
रूप से उपेक्षित तथा विघटित है।
जिस समय मैं दूसरी बार पहुँचा तो घास-पात
वृक्षादि साफ कर दिये गये थे। बड़े मन्दिर का
उपयोग गूजर वर्षा तथा तुषारपात से रक्षा निमित्त
करते हैं। उनमें अपने पशु बाँधते हैं। मन्दिर की
मूर्ति जहाँ थी वहाँ गोबर तथा कीचड़ सड़ रहा
था। मन्दिर में किसी प्रकार की मूर्ति तथा अधिष्ठान
नहीं है। जिस समय यह मन्दिर नष्ट किया गया
होगा, उस समय लिंग किंवा मूर्ति कंकणी नदी में
या तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दी गयी होगी।
कर्नल कोल ने ६ मन्दिरों का उल्लेख किया
है। परन्तु मैंने यहाँ पर छोटे-बड़े मिलाकर ११
मन्दिरों का आकार देखा। श्री कोल का प्लान अधूरा
है। तत्कालीन समय में पेड़ों की झुरमुट और सघन
झाड़ियों के कारण, श्री कोल को सबका पता नहीं
लग सका था। बड़े मन्दिरों को ही वे लक्ष्य कर
सके थे।
ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की उत्तर दिशा में ६ मन्दिर
हैं। दक्षिण दिशा में एक भी मन्दिर नहीं है। उत्तर
१५६ राजतरंगिणी
तरफ मन्दिर की नीव से प्रांगण ९२ फीट है। किन्तु
दक्षिण तरफ केवल ३५ फीट है। कोई भी मन्दिर
इस प्रकार अपने मूल रूप में जब कि भारतीय
स्थापत्य, वास्तु तथा मूर्तिकला इतनी विकसित हो
चुकी थी, त्रुटि नही उपस्थित कर सकता। कश्मीर
के प्रायः सब मन्दिर प्रांगण की मध्य रेखा पर ही
मिलेंगे। भूतेश्वर का मन्दिर भी ऐसा ही है।
परन्तु ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर उत्तर-दक्षिण के प्रांगण
खण्ड के मध्य मे नही है। अतएव निश्चय ही दक्षिण
मन्दिर का भाग कंकणी नदी के गर्त मे चला
गया है।
मेरा निश्चित मत है। दक्षिण का भाग कंकणी
नदी मे गिर कर नष्ट हो गया है। ज्येष्ठेश्वर के
उत्तर दिशावर्ती लघु मन्दिर किसी सिधायी मे नही
बने हैं। अतएव मुख्य मन्दिर के निर्माण के पश्चात्
समय-समय पर काश्मीर के राजाओं ने यहाँ मन्दिर
निर्माण कराया था। यह प्रथा प्रायः समस्त भारत में
आज भी प्रचलित है। लोग विशाल मन्दिरों के प्रांगण
में अपने नामो से लघु मन्दिरो का निर्माण कर उसमें
मूर्तियो किंवा लिंगो की प्रतिष्ठा करते हैं।
जनरल श्री कनिंघम के मतानुसार इस मन्दिर
का निर्माण ईसापूर्व २५० वर्ष मे हुआ होगा।
कर्नल कोल इसका निर्माण काल सन् ईसवी का
हो आरम्भिक काल मानते हैं।
ज्येष्ठेश्वर ने मन्दिर के पृष्ठ भाग में तथा
विश्राम अथवा पाठ, किंवा कथा स्थान या वर्तमान
लम्बे चौड़े चबूतरे के ध्वंसावशेष के मध्य मुझे
ने दो ढूंढे तुल्य स्थान मिले। उनमे लम्बे-चौड़े विशाल
भाग शिलाखण्ड लगे हैं। ये भी मन्दिर ही रहे होंगे।
आट का वर्णन किसी अन्य पर्यटक तथा यात्री ने नही
के आ या है।
निरापद वहाँ ध्वंसावशेष होने का सरल अर्थ है। मन्दिर
गये हैं। वे टूटे। उनके मलवा का ढूढ़ा बना जो अब
सन् १८ पात से ढका पड़ा है। यह धारणा मेरी
कोल ने (सुपुर् दृढ़ हो गयी कि वहाँ पर अलंकृत
उत्तर पश्चिम १. णी मन्दिरो में लगाये जाते थे। बिखरे
पड़े थे। वे इस मन्दिर के ही रहे होंगे अन्यथा यहाँ
पर उनके अस्तित्व का कोई अर्थ मालूम नहीं होता।
इस मन्दिर तथा भूतेश्वर के मध्य उक्त चबूतरा
है। यह पूजा पाठ करने तथा विश्राम निमित्त
बरामदा किंवा अलिन्द था। मण्डप शिला स्तम्भों की
अवलियो पर निर्मित था। दोनों मन्दिरों के मध्य
में होने के कारण दोनों मन्दिरो के उपासक, पुजारी
तथा भक्त उससे लाभ उठा सकते थे।
कर्नल कोल को यहाँ बहुत नकाशीदार किंवा
अलंकृत स्तम्भ मिले थे। स्तम्भों के अधिष्ठाने भी अपने
स्थानों पर मिले थे। मुझे इस समय दो चार स्तम्भ
तथा दो ही चार अधिष्ठान मिल सके। उनका व्यास
दो फीट था। शेष गायब थे। इससे २० फीट पूर्व
भूतेश्वर के मन्दिर का प्राकार है।
नागबल किंवा पूर्वीय या द्वितीय मन्दिर समूह
का नाम भूतेश किंवा भूतेश्वर मन्दिर समूह दिया
गया है। इसके प्रांगण का पता दिवाल पर
स्तम्भावली के अधिष्ठान के चिन्हों द्वारा लगाया जा
सकता है। यह १५५ फीट वर्गाकार है। इसका
कोई भाग कंकणी नदी की धारा में ध्वस्त होकर
नही गिरा है। चहार दिवारो का आकार तथा उनकी
नीव मे लगे पत्थर वर्तमान हैं।
मेजर कोल ने मन्दिर के प्रांगण में भूतेश्वर के
विशाल मन्दिर को लेकर केवल सात मन्दिरों की
गणना की है। उन्होंने अपने प्लान में पृष्ठ ६:६६
पर इसे प्रदर्शित किया है। उसमें मन्दिर की उत्तर
दिशा में मन्दिर के मुख्य द्वार के समीप रखी टंकी
किंवा एक ही पत्थर में खोदा हौज है। यह वास्तव
में एक ही पत्थर की आश्चर्यजनक रचना है। यह
२२ फीट लम्बा तथा ७ फीट चौड़ा है। लगभग
इतना ही मोटा है। मानव बुद्धि इस विशालकाय
शिला मे खुदी टंकी को देखकर चकित हो जाती है।
इस दुर्गम स्थान में इतना विशाल शिलाखण्ड किस
प्रकार उठा कर लाया गया होगा सरल मानव बुद्धि
में कौतूहल उत्पन्न करता है।
प्रथम तरंग १५७
यह टंकी अत्यन्त विलक्षण तथा कलापूर्ण शैली
से बनायी गयी है। आज तक टूटी नहीं है। अनेक
भूचाल आये होंगे। उसे तोड़ने का प्रयास किया गया
होगा। परन्तु वह यथावत् स्थिति में स्थित है।
यहाँ के ग्रामीण बन्धु कहते हैं। इसका जल सर्वदा
एक जैसा रहता है।
तोरण द्वार चहार दिवारी में पश्चिमाभिमुख
बना है। मन्दिर में केवल एक द्वार है। यह भी
पश्चिमाभिमुख है। अतएव वह स्वयं इस बात का
प्रमाण है। यह मन्दिर शिव का था। शास्त्रानुसार
शिव, शंकर, रुद्र के मन्दिरों का द्वार पश्चिम तथा
दक्षिण होता है।
कर्नल कोल ने अपने प्लान पृष्ठ ७:८८ में
भूतेश्वर मन्दिर सहित कुल ७ मन्दिरों को दिखाया
है। किन्तु मुझे प्रांगण में भूतेश मन्दिर सहित कुल
१२ मन्दिरों के भग्नावशेष मिले। सम्भव है। कोल
की यात्रा के समय शेष मन्दिर मलबों तथा घास-
फूस के अन्दर छिपे रहे हों। शताब्दियों से पड़ती
धूल, वृक्ष, तुषारपात आदि के जम जाने के कारण
श्री कोल को पता न चला हो।
भूतेश्वर का मन्दिर प्रांगण के दक्षिण उत्तर
की लम्बाई के मध्य में है। मन्दिर की उत्तर दिशा
के पार्श्व में ५ तथा दक्षिण दिशा के पार्श्व में ६
मन्दिर हैं। दक्षिण पार्श्व के मन्दिरों में पूर्व में तीसरे
मन्दिर के सम्मुख एक और मन्दिर बना है। यह
निर्माण बहुत समय पश्चात् का मालूम होता है। वह
उत्तर तथा दक्षिण मन्दिरों की सीध में नहीं आता।
मैं समझता हूँ कि एकादश रुद्र की कल्पना पर
ग्यारह मन्दिरों की रचना की गयी थी। अन्यथा
दोनो पार्श्वों में छह-छह मन्दिर होने चाहिए थे। भूतेश
रुद्रेश हैं। कल्पना की गयी है। यह अनुमान लगाया
गया है। मुख्य मन्दिर भूतेश की रचना के पश्चात्
कालान्तर में राजा मन्दिर निर्माण करते गये।
यह तर्क सम्मत नहीं है। सामने वाला मन्दिर
बनाने वाला पाँचवें मन्दिर के पश्चात् छठा मन्दिर
बनवाकर उसको पंक्ति पूरा करता। वह मन्दिरों को
पंक्ति के बाहर जाकर मन्दिर का निर्माण न कराता।
अतएव यह मन्दिर एकादश रुद्र कल्पना पर बना
है। भूतेश का मन्दिर ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की अपेक्षा
सादा है। अतएव ज्येष्ठेश्वर मन्दिर के पूर्व की रचना
मालूम पड़ती है।
नरनाग किंवा नारायण नाग का कुण्ड भूतेश्वर
मन्दिर की उत्तर दिशा से पहाड़ों द्वारा जल स्रवित
होकर आता है। उस कुण्ड किंवा सर से निकलता
स्पष्ट दिखायी पड़ता है। वह बहता कंकणी नदी में
गिर जाता है। जल अत्यन्त निर्मल है। हल्का है।
कर्नल कोल ने इसीलिए इसे नाग कहा है। नाग का
अर्थ जल स्रोत होता है।
कुण्ड के दो ओर पूर्वकाल की बनी सीढियाँ
अपनी पूर्वावस्था में वर्तमान हैं। इस कुण्ड की
सफाई नहीं हुई है। चारो ओर मुस्लिम गूजरों की
आबादी है। अतएव कुण्ड की सफाई नहीं है। उसमे
पत्ती, टूटी लकड़ी तथा पहाड़ों पर से गिरे कंकड
पत्थर पड़े थे। पत्तियों के सड़ने के कारण कुण्ड का
स्तर साफ नहीं था। जल निरन्तर कुण्ड में आता
और निकलता रहता है अतएव वह साफ लगता है।
इस कुण्ड का निर्मल जल तथा यहाँ की मनो-
मुग्धकारी प्राकृतिक दृश्यावली देखकर जलपान
के लोभ का संवरण नहीं कर सका। मैने जल
पीया। बहु मधुर तथा शीतल था। उसमे मुझे जैसे
जीवन मिला। इस कुण्ड किंवा सर को सोदर तीर्थ
कहते थे। इसके जल का बड़ा ही विशद वर्णन किया
गया है। इसके नाम पर एक दूसरा सोदर तीर्थ
श्रीनगर के समीप निर्माण कराया गया था। उसका
यथा स्थान वर्णन किया है।
इस सरोवर के समीप एक विशाल शिलाखण्ड
पड़ा मिला। यह १५ फीट लम्बा ८ फीट चौड़ा तथा
६ फीट मोटा था। यह शिलाखण्ड मूर्ति का अधि-
ष्ठान है।
कंकणी नदी में आध मील दूर धारा के मध्य
एक शिलाखण्ड है। उस पर एक कोठरी बनी है।
१५८ राजतरंगिणी
सोऽथ भूभृज्जलोकोऽभूद् भूलोकसुरनायकः ।
यो यशस्सुधया शुद्धं व्यधाद्ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥१०८॥
जलौक१
१०८. अस्तु 'जलौक राजा हुआ। वह भूलोक पर इन्द्र के तुल्य था। उसने अपने धवल
यश द्वारा ब्रह्माण्ड मण्डल को शुद्ध कर दिया था।
चार व्यक्ति उसमें निवास कर सकते हैं। इसके
मध्य में एक शिवलिंग का स्थान है। एक दिवाल
में मूर्ति रखने का ताखा बना है। मैं जब यहाँ आया
तो किसी ने इस मन्दिर का पता मुझे नहीं बताया।
शिवयोगी के निवास योग्य वह आदर्श स्थान
माना जायगा। योगियों के योग तथा ध्यानियों के
ध्यान करने के लिये सुरम्य, एकान्त, जलाशय एवं
पादप पूर्ण वनथीययुक्त स्थान आदर्श कहा जायगा।
दुर्बल हृदय व्यक्ति दिन में चाहे जितना यहाँ
के प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द उठा ले, परन्तु सन्ध्या
होते ही स्थान की सुन्दरता अन्धकार की गम्भीरता
के साथ भयंकर रूप धारण कर लेती है। आधुनिक
.... योजनाओं के योग से वह
.... कता
.... अथवा
.... रूप
.... होती
.... लगता
.... हैं।
यहाँ पर अ.. .... ललेख
नहीं मिला है। यदि क.. .... स्थान
के काल निर्णय में सहायता मि.. स्थापत्य
ी के आधार पर काल निर्णय का अनु लगाया
सकता है। शिलालेख मिलने पर कश्मीर के
आर तूव वास्तु कला शैली तथा उसके विकास के
के भा अच्छा प्रकाश पड़ सकता है। पुरातत्त्व-
निरापद स्थान पर आकर अध्ययन तथा
गये हैं। चाहिए। अन्यथा यहाँ इस समय
सन् १८ सामग्रियां बिखरी पड़ी हैं, नष्ट
कोल ने (सुप...।
उत्तर पश्चिम ...
कल्हण ने पुनः भूतेश का उल्लेख राजा जलौक
के सन्दर्भ में (त० १:१५८) किया है। उसमें
नन्दि क्षेत्र में एक सुदृढ़ पाषाण मन्दिर निर्माण कराने
का उल्लेख मिलता है। यह मन्दिर जलौक द्वारा
उन्नत भूतेश मन्दिर है। नरेन्द्रदित्य के सन्दर्भ में
कल्हण ने (त० १:३०७) में इसका उल्लेख किया
है। ललितादित्य के सन्दर्भ में इसका उल्लेख कल्हण
ने (त० ४.१८९ में) किया है। अवन्तिवर्मा ने
(त० ५:४६) यहाँ दानादि किया था।
अशोक के समय में भूतेश नाम से स्थान प्रसिद्ध
था। छोटा मन्दिर या केवल शिवलिंग रहा होगा।
जलौक ने उस स्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण कराया
जिसके भग्नावशेष का अस्तित्व आज वर्तमान है जो
देखा जा सकता है। इसका उल्लेख पुनः तरंग
५.५५-५९ में किया गया है। राजा उच्छल के
सन्दर्भ में (त० ८:७७-११०) इसका उल्लेख
किया गया है। कल्हण ने इस मन्दिर का अन्तिम
बार उल्लेख (त० २७:५६, ३३-५६) में किया
है। भूतेश की कृपा एवं उनके प्रसाद से अशोक
का पुत्र जलौक हुआ था। अतएव यह उचित
प्रतीत होता है। जलौक ने भूतेश मन्दिर का
निर्माण कराया।
जोन, प्रज्ञाभट्ट एवं थीवर की राजतरं-
गिणियों में भूतेश्वर का विस्तृत वर्णन नहीं
मिलता। जिससे इस विषय पर और प्रकाश
पड़ सकता।
अबुल फज़ल आइने अकबरी में इस मन्दिर का
उल्लेख नहीं करता। हैदर मलिक भूतेश्वर का
भूनिसर किया बुथगर नाम से उल्लेख करता है।
प्रथम तरंग १५९
हरिमुकुट यात्रा से लौटते समय भूतेश मन्दिर
का स्थान मार्ग पर पड़ता है। परन्तु इस पर विशेष
ध्यान कभी नहीं दिया गया था। मालूम होता है
मन्दिर के नष्ट भ्रष्ट हो जाने के कारण इसका महत्त्व
लोग भूल गये थे।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०८ में 'साध्य' का पाठभेद
'मोधो' तथा 'ज्वलोको' का 'उजलोको' तथा 'गुधया'
का 'श्रद्धया' मिलता है।
१०८ (१) जलोक : आइने अकबरी में नाम
ज्यूलोक दिया है। अबुल फजल के अनुसार—'राजा
ने समुद्र तक विजय प्राप्त किया था। विजय यात्रा
से लौटते समय वह कन्नौज गया था। उस समय
कन्नौज (कान्यकुब्ज) हिन्दुस्तान की राजधानी
थी। जलोक कन्नौज से अनेक गुणी तथा विद्वानों
को कश्मीर लाया। उनमें सात को चुनकर विभिन्न
विभागों का मुख्याधिकारी नियुक्त किया। उनमें
एक ज्योतिष विभाग था।
'उसके आदेश पर सर्पों का एक बहुत बड़ा
समूह चलता था। उन्हीं पर आरूढ होकर राजा
लम्बी जल यात्रा करता था। राजा किसी समय
युवा और किसी समय वृद्ध बन जाता था। उसके
सम्बन्ध में अनेक चमत्कारिक बातें कही जाती है।
इस राजा के समय बुद्ध धर्म मानने वालों के साथ
सहिष्णुता का व्यवहार किया जाता था।'
अबुल फजल ने राजतरंगिणी के फारसी अनुवाद
तथा प्रचलित जनश्रुति पर राजा जलोक का उल्लेख
किया है। जलोक के समय कन्नौज भारतवर्ष की
राजधानी नहीं था। पाटलीपुत्र राजधानी
था। यहाँ सर्पों का तात्पर्य नागो से अबुल फजल
का मालूम होता है।
इतिहासकार आज़म ने लिखा है :—कश्मीर
पर एक नया धर्म लादा गया। उश्ट्रि टिम्ब से
अशोक के पुत्र जलोक ने म्लेच्छों को निकाल बाहर
किया। राजा देश-विजय हेतु निकला। उसने
उत्तरी ईरान जीत लिया।
उत्तरी ईरान जीतने का कोई साधिकार प्रमाण
नहीं मिलता। विदेश यात्रा का अर्थ आज़म ने
उत्तरी ईरान लगाया है। आज़म ने यह तथ्य कहाँ
से पाया कोई प्रमाण नहीं देता।
बैदुद्दीन इतिहासकार लिखता है :—'ईरान का
राजा इस समय 'दोराव' था। ईरान के विजय के
पश्चात् उसने कन्नौज जीता था।'
आज़म तथा बैदुद्दीन की बातें यदि मान ली
जाँय तो नवीन धर्म पारसियों की अग्नि पूजा हो
सकती है। कश्मीर में बुद्ध तथा सनातन धर्म दोनों
उस समय प्रचलित थे। दोनों में विरोध नहीं था।
ईरान से सम्पर्क में आने पर इसी की सम्भावना
हो सकती है।
अग्नि पूजक पंजाब के उत्तर तथा पश्चिमी
भाग में एक समय आबाद थे। किन्तु कश्मीर में
अग्नि पूजा पारसियों की शैली की कभी प्रचलित
नहीं थी। हवन, यज्ञ, पञ्चाग्नि, अग्निहोत्र आदि
सनातन धर्म के अंग थे। आर्य धर्म में परम्परा से
यज्ञ होता आया है। वह यज्ञ वेदी तक सीमित था।
महात्मा जरदस्तू द्वारा प्रसारित तथा प्रचलित
अग्नि पूजा का चिह्न कश्मीर में अभी तक मिल
नहीं सका है।
किसी अग्निकुण्ड, अग्निमन्दिर किंवा अग्नि
वेदी का उल्लेख नीलमत पुराण एवं राजतरंगिणी
में नहीं मिलता। जलोक ने ईरान विजय के पश्चात्
एक नवीन धर्म कश्मीर पर लादा वह भ्रामक एवं
तथ्यहीन है।
हसन लिखता है :—'जलोक राजा अशोक का
दूसरा बेटा था। कलिसंवत् १७२६ मुखालिफों का
किला फतह करके सखावत और इन्साफ परवरी में
१६० राजतरंगिणी
नेकनामी हासिल की। मुल्क की आबादी में हद
दरजा कोशा रहा। लार में मौजा बारहमूला उसी
की तासीरात में से है। कल्हण पण्डित ने उसे
फरिश्ता सीरत जानकर अच्छी अच्छी खूबियों से
मुत्तसफ इंसान साबित किया है। पण्डित उद्भट्ट जो
अपने वखत का एकता था उसी के तरतीययाफ्तो
में से था। उसके कहने सुनने से राजा जलौक ने
फोरन् बुद्धमजहब छोड़ दिया। और अपने बाप के
बर खिलाफ शेव मजहब अख्तियार कर लिया।
विजयेश्वरी और नन्दह किशोर मन्दिरों की पूजा
पाठ अपने ऊपर लाजिम कर ली। सख्त रियाजतो
और वहानी सफाई और करावतो के पेश नजर
अपने जमाना का एकता था।
कफ—'कहते हैं कि हर दिन वाडू वेजवारह
और बारहमूला के मन्दिरो की पूजा-पाठ के लिए
घोड़ो पर सवार होकर जाया करता था। एक सांप
तावा किया हुआ था। जिस पर हर दिन सवार
होकर जहाँ चाहता था पहुँचता था। यह साँप उसे
बाकी सांपो से भी बचाता था। शिवजी के तमाम
मन्दिरो को निहायत उम्दगी से सजाया। इसके
जमाने मे बुद्धमजहब की कोई रौनक न रही।
'मशहूर है कि एक औरत ने उससे सवाल
किया कि मुझे कुछ बतौर खैरात के दे। राजा
ने कहा कि जो मांगेगी दूँगा। इसके बाद औरत
मजकूर देवी की शक्ल में मुतशक्ल हो गयी।
और राजा से इन्सान का गोश्त मांगा। राजा
किसी इन्शान के कतल पर राजी न हुआ। और
खुद उसके हवाला कर दिय'। देखकर उस औरत
ने इन्तहाई खुशी के साथ राजा के हक में तौफीक
इबादन की दुआ माँगो—फकत।
'बाद अजई राजा ने मुल्को के फतह करने का
पुख्त. इरादा कर लिया। सर जमीन हिन्दुस्तान मुल्क
में कन्नोज और बिहार तक के बहुत से शहर अपने
कब्जा अख्तियार मे कर लिये। तिमिर नाशक के
कोल के मुताबिक कन्दहार और वाख्तर तक के
बहुत से शहरो पर अपना कब्जा और इक्तदार जमा लिया। गाम गाम के मुल्को और इलाको की फतह
के बाद जब अपने मुल्क को लोटा तो बहुत से दस्तकार
और अहल पेशा आदमी उमरे साथ थे। अपने मुल्क
की दौलतमन्दी और शान व शोकत इम दरजा तक
पहुँचा दी कि दूर दराज के इलाको के रहने वाले
लोगो के दिल उसे सुनकर बाग बाग हो जाते थे।
उसके वखत तक कश्मीर में मुल्की ओहदेदारों का
इन्तजाम न था। राजा ने मुल्की मुआमलात के
इन्तजाम को चलाने के लिए अजखुद आफ़िसर
मुकर्रर किये। भोर उन्हें अपने फराइज का जवाब
देह करार दिया। जो ओहदेह जात इस राजा ने पैदा
किये उनकी तफसोल हस्व जैल है।
(१) उहदा दिवानी—इसके जिम्मा मुल्को लेन
देन का इन्तजाम था।
(२) उहदा खानसामानी—इसके जिम्मा खजानो
की हिफाजत और आमदनियों का हिसाव व
किताब था।
(३) दारोगा फोरखाना—इसका काम फौज
के हथियार, लिवाम और सामान वगैरह को हिफाजत
था।
(४) बख्शी—फौज की इन्तजाम के लिये।
(५) वजारत—बादशाह की राय और मशविरा
के लिए।
(६) दारोगा मदर—खैरात और सदकात की
तक्सीम के लिए।
(७) नकीब—सिपाहियो और किसानो की
खबरगोरो के लिये।
अलगरज हकूमत के इन्तजाम को पुस्तगो और
अद्दल व इन्साफ, सखावत और रास्त बाजी में
लाशानी था। कहते हैं कि गोटी नीद नाम की एक
दवाई पाई थी। जिससे सोना बनाया करता था।
इल्म सीमया बखूबी जानता था। आखिर कार कपाल
मोचन के मुकाम जो कसवा सूपियान में सोनगुल
नहर का मुन्बथ है राहे बहक हो गया। उसको वीवी
ईशान देवी इन्तहाई दरजा की रियाजत कीश भोर
बाहिम्मत औरत थी। उसके मादर चकर और हस्त
प्रथम तरंग १६१
यस्य दिव्यप्रभावस्य कथाः श्रुतिपथं गताः ।
आश्चर्याच्चपलतां यान्ति नियतं द्युपदामपि ॥ १०९ ॥
१०९. राजा के दिव्य प्रभाव की कथा जब देवताओं के कानों तक पहुँची तो वे आश्चर्य
चकित स्तम्भित हो गये ।
कोटिवेधिनि सिद्धे हि स रसे हाटकार्पणैः ।
असीसुषिरतां हर्तुं हेमाण्वस्य ध्रुवं क्षमः ॥ ११० ॥
११०. कोटिवेधिनो रस की सिद्धि द्वारा करोड़ों वस्तुओं को सुवर्ण में परिणत कर शून्य
गगन मण्डल को सुवर्ण दान द्वारा भर देने में राजा सक्षम था ।
हाल बनाकर गरीबों और मसकीनों को बख्श दिये ।
शामदेव के शागिर्द से नन्दी पुराण पढ़कर नन्दीश्वर
का मजहब अपने ऊपर अख्तयार कर लिया । बुद्ध
मजहब फजहवन् तर्क कर दिया । राजा जलोक की
कुल हुकूमत साठ साल थी ।' (पृष्ठ ३९४०)
हसन ने अपने पूर्व के मुस्लिम इतिहासकार
तथा कल्हण सब के द्वारा वर्णित घटनाओं का
समन्वय कर लिया है । सब की बात मान
ली है ।
उसने 'इतिहास तिमिर नाशक' का उल्लेख
किया है। काशी के राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द'
ने भारत का एक अत्यन्त संक्षिप्त इतिहास लिखा
था । मैंने उसे अपनी बाल्यावस्था में पढ़ा था। वह
हिन्दी तथा शायद उर्दू दोनों भाषाओं में छपा था।
हसन ने यही इतिहास पढ़ा था। इतिहास तिमिर
नाशक साधारण लोगों के पढ़ने के लिये उन्नीसवीं
शताब्दी में लिखा गया था। मेरे पास इसकी मूल
प्रति थी । वह 'कलकतिया नागरी' मोटे टाइप में
धार्ट कागज पर छपा था । उन दिनों उसका मूल्य
था । क्योंकि कोई और इतिहास भाषा में उपलब्ध
नहीं था । राजा शिवप्रसाद नागरी और हिन्दी
भाषा के महान् पक्षपातियों एवं उन आन्दोलकों में
थे जिन्होंने हिन्दी को उर्दू से भारत में बचाया था।
उन दिनों हिन्दी के स्थान पर उर्दू चलाने का प्रचार
तेजी पर था। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा की
स्थापना तथा तत्कालीन हिन्दी आन्दोलन की यही
पीठिका थी । हसन का ऐतिहासिक ज्ञान कितना
सीमित था यह इसी एक बात से प्रमाणित होता है
कि उसने अपने मत की पुष्टि इतिहास तिमिर नाशक
का उद्धरण देकर करना चाहा है; जिसका ऐतिहासिक
महत्त्व साधारण है। जलोक सम्बन्धी हसन के मत
को मैं उसी प्रकार मान्यता देने में अपने को असमर्थ
पा रहा हूँ जैसे अबुल फजल, आजम तथा हैदुद्दीन
को ।
जलोक का वर्णन कल्हण ने कवि श्री छविलाकर
के आधार पर किया है। श्री छविलाकर ने जैसा
वर्णन किया होगा उसे ही कल्हण ने अपनी पुस्तक
राजतरंगिणी में स्थान दिया है। इस सम्बन्ध में
विस्तारपूर्वक वर्णन परिशिष्ट 'जलोक' में द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०९ में 'आश्चर्याच्च' का
'आश्चर्याश्च' और 'नियतं' का 'निश्चयं' और
'द्युपदां' का 'द्युसदां' पाठभेद मिलता है ।
श्लोक संख्या ११० में 'वेधिनि' का 'वेदिनि';
'सुषिरताम्' का 'सुस्वितताम्' और 'हर्तुं' का 'कर्तु'
और 'हेमाण्वस्य' का 'हेमांगस्य' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११० (१) कोटिवेधिनि रस : कल्हण ने धातुओं
से सुवर्ण बनाने का उल्लेख राजा ललितादित्य (रा०
त० ४ : २४६ तथा ३६३) और सिकन्दर बुतशि-
कन के वर्णन प्रसंग में; जोनराज ने अपनी राज-
तरंगिणी (श्लोक संख्या ५७८) में किया है।
२१
१६२ राजतरंगिणी
संस्तम्भ्याम्भःप्रविष्टेन तेन नागसरोऽन्तगम् ।
तारुण्यं फणिकन्यानां निन्ये संभोगभज्यताम् ॥ १११ ॥
१११ अपना तारुण्य फणि कन्याओं के संभोग में सफल करने के निमित्त राजा नाग-
'सरोवरों में जल स्तम्भित कर प्रवेश करता था ।
भारत में प्राचीनकाल से यह कथा प्रचलित
चली आती है । साधु महात्मा तथा चामत्कारिक
पुरुष स्वर्ण बनाने की सिद्धि प्राप्त करते हैं । मुख्यतया
पारा सिद्ध कर उसके द्वारा सोना बनाया जाता है ।
इसी प्रकार यह कथा भी प्रचलित है । पारस
पत्थर के स्पर्श कराने से धातुएँ तथा लोहा सोना
बन जाता है । इस प्रकार चामत्कारिक बातें माधु
महात्मा तथा महान् पुरुषों की महत्ता वृद्धि के निमित्त
उनके जीवन से सम्बन्धित कर दी जाती हैं ।
कोटिवेधिनी रस का कल्हण ने उल्लेख यहाँ
किया है । यह रस क्या था ? कैसे बनता था ? इसका
प्रयोग किस प्रकार किया जाता था ? इस पर अब
तक प्रकाश नही पड़ सका है । यह किसी प्रकार का
रस था । जिसके सिद्ध करने से सुवर्ण तैयार हो
जाता था ।
१११ (१) नागसरोऽन्तरम्ः यहाँ यह अर्थ
करना समीचीन मालूम होता है। नाग अर्थात् झरनों,
प्रपातों एवं सरोवरों का जल स्तम्भित, अर्थात् रोककर
राजा नागकन्याओं के साथ भोग कर अपना यौवन
सुफल करता था । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर
कश्मीर में नागो के स्थान माने गये हैं । वे प्रत्येक
सरोवर तथा प्रपातो एवं स्रोतों में निवास करते हैं ।
यहाँ पर नागकन्याओ का रहना स्वाभाविक है ।
जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर को स्तम्भित करने का
अर्थ जल शान्त करना है । उन्हें अपने काम प्रसग
निमित्त हलचलहीन बनाना है । अत्यन्त एकान्त
वातावरण उत्पन्न करना है । यहाँ पर कल्हण ने
किसी सरोवर, स्रोत एवं प्रपात विशेष का उल्लेख
नही किया है । उसका मन्तव्य मालूम होता है। राजा
किसी नाग किंवा सर विशेष की नागकन्या के स्नेह
सूत्र द्वारा ही सीमित नहीं था । वह इच्छानुसार
कश्मीर के अगणित नागों तथा सरों में प्रवेश कर
अनेकानेक नागकन्याओं से सम्बन्ध स्थापित करता
था । वह किसी एक स्थान से बँधा नही था ।
कल्हण इस प्रकार राजा जलोक की ऋद्धि का
वर्णन गौण रूप से कर देता है । राजा ऋद्धि
सम्पन्न था । वह नागो तथा सरों के जलो को बाँध
देता था । जल बाँध देने की कथा योगियो के जीवन
से सम्बन्धित की जाती हैं । योगी नदी के जल को
स्तम्भित किंवा बाँधकर नदी पार पैदल चला जाता
है । जल बाँधकर अपना चमत्कार दिखाता है ।
चामत्कारिक कथानको से साहित्य भग पड़ा है ।
कल्हण राजा जलोक के कोटिवेधिनी रस तुल्य उसके
दूसरे चमत्कार का वर्णन करता है ।
कल्हण एक तीसरे चमत्कार को और राजा के
जीवन से सम्बन्धित करता है । राजा जल मे प्रवेश
करता था । जल में डूबने अथवा रहने पर साधारण
प्राणी प्राणवायु के अभाव मे मर जाता है । परन्तु
राजा जलोक वहाँ नागकन्याओ के साथ विहार
करता था । राजा की दिव्य शक्ति का जो उल्लेख
कल्हण ने श्लोक संख्या १०९ मे किया है उन्ही का
यहाँ विस्तार करता है । राजा में इतना अधिक दैवी
गुण किंवा प्रभाव था कि मनुष्य होते हुए भी वह
देवताओं तुल्य अद्भुत कार्य करता था । राजा का
जल के अन्दर बिना प्राणवायु प्राप्त किये विहार
करना स्वतः एक चमत्कार की बात थी । कल्हण ने
राजा के दिव्य प्रभाव का यह तीसरा उदाहरण
दिया है ।
प्रथम तरंग १६३
तत्कालप्रबलप्रौढबौद्धादिसमूहजित् ।
अवधूतोऽभवत्सिद्धस्तस्य ज्ञानोपदेशकत् ॥ ११२ ॥
११२. राजा का ज्ञानोपदेशक एक तेजस्वी दार्शनिक अवधूत था, जिसने कश्मीर मण्डल में
सफलता से फूल कर प्रबल हो उठे बौद्ध 'समूह को शास्त्रार्थ में परास्त किया था।
११२ (१) बौद्ध : अशोक के कारण बौद्धधर्म
का प्रचार प्रबल हो उठा था। संघ का भी संगठन
सुदृढ़ हो गया था। अशोक ने कश्मीर सीमान्त पर
(१) मानसेहरा, (२) शहबाज गढ़ी, तथा (३)
धौली में लगे शिला अभिलेख में धर्म प्रचार तथा संघ
संघटन का निर्देश दिया है। धौली में कश्मीर के
सीमान्त स्थान तक्षशिला का भी उल्लेख किया
गया है।
अशोक ने धर्म प्रचारार्थ पंच वर्षीय योजना
बनायी थी। शहबाज गढ़ी तृतीय अभिलेख में उसने
स्पष्ट लिखा है—वदष षषभिषितेन... अणपितं ।
सवत्रमअ विजिते युत रजिको प्रदोशक पंचषु पंचषु
५ वषेपु अनुसंयनं निक्रमंतु एताम्ये वो करण इमिस
धंमनुशस्तिये थ अनयेपि क्रमये।' अभिलेख के बारह
वर्ष (पश्चात्) मेरे द्वारा ऐसी आज्ञा दी गयी। सर्वत्र
मेरे राज्य में, युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक पाँच-पाँच (५)
वर्ष पर इस कार्य के लिये, इस धर्मानुष्ठान के लिये
तथा, अन्य कार्य के लिए दौरे पर जाँय।'
मानसेहरा तृतीय अभिलेख में पुनः लिखा गया
है ' देवनं प्रिये प्रियदशि रज एथ अह (१) दुवड
शवष भिपितेन में इयं अणपयिते (२) सवत्र विजि
तसि .......तरनु प्रदेशिके पंचसु ५ वषेषु
' अनुसंयनं निक्रमन्तु एतये अ अध्रये इमये धमनु
शस्तिये यथ अग्रये पि क्रमणे (३) सधुमत पितृप्य
मित्र संस्तुत............
'अतिकिनं च श्रमण भ्रममणं सधुदने प्रणन
अनरंभे सधु अपव्यत अपभडत मधु (४) परिप वि
थ युतनि गणनसि अण पयि शति हेतुने च । वियंज
न ते च ।
देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा
द्वादश वर्षाभिषिक्त मुझने ऐसा आज्ञा हुआ। राज्य
में सर्वत्र मेरे युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक (नामक राज्य
कर्मचारी) पाँच-पाँच (५) वर्षों में दौरे पर निकलें।
इस प्रयोजन के लिए इस धर्मानुशासन के लिए तथा
अन्य भी कार्य के लिए। ... परिषद् युक्तों को हेतु
(कारण) और व्यञ्जन (अक्षरशः अर्थ) के साथ (इन
नियमों की) गणना करने के लिए आज्ञा देंगी।
उक्त दोनों स्थानों के पंचम अभिलेखों में धर्म
महामात्र की नियुक्ति के साथ अपने पुत्र, प्रपौत्र आदि
के लिये अभिषेक के तेरहवें वर्ष में अशोक ने आदेश
दिया।
'११. देवनं प्रियो प्रियदसि रय एवं अहति
कलणं दुकरं यो आदि करो कलणस सो दुकरं करोति
सो मय बहुकलं किटुं तं मअ पुत्र च नतरो च तंन
ये मे अपचं वक्षन्ति अवकप॑ तथ ये अनु वटिशन्ति ते
सुकटं कर्पति यो चु अ तो ... ...कं प हये शदि सो
दुक्टं कवति पयं हि सुकरं स अति क्रतं अतर नो भुत
पुव धंम महमत्र नम सो तोदश वषभिसितेन १२
मम धम महमत्र किट ते सत्र प्रपंड़ेषु वषट धमं धिध
नये व धम वडिय हिद सुखये च धमयुतसं.........।'
[ देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा।
जो कल्याण का प्रारम्भ करता है वह दुष्कर कार्य
करता है किन्तु मुझसे बहुत कल्याण किया गया।
यदि मेरे पुत्र, नाती और उनके परे मेरे अपत्य कल्प
के अन्त तक (इसका) अनुसरण करेंगे ये कुछ सुकृत
करेंगे। जो यहाँ (इस देश में) इसका एक अंश भी
नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा। पाप सुकर है। बहुत
समय बीता। भूतकाल में धर्म महामात्र नाम (का
अधिकारी) नही थे। किन्तु राज्याभिषेक के तेरह वर्ष
पश्चात् मेरे द्वारा धर्म महामात्र (नियुक्त) किये गये।