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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 984 में से

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पृष्ठ 242

प्रथम तरंग १५७
यह टंकी अत्यन्त विलक्षण तथा कलापूर्ण शैली
से बनायी गयी है। आज तक टूटी नहीं है। अनेक
भूचाल आये होंगे। उसे तोड़ने का प्रयास किया गया
होगा। परन्तु वह यथावत् स्थिति में स्थित है।
यहाँ के ग्रामीण बन्धु कहते हैं। इसका जल सर्वदा
एक जैसा रहता है।
तोरण द्वार चहार दिवारी में पश्चिमाभिमुख
बना है। मन्दिर में केवल एक द्वार है। यह भी
पश्चिमाभिमुख है। अतएव वह स्वयं इस बात का
प्रमाण है। यह मन्दिर शिव का था। शास्त्रानुसार
शिव, शंकर, रुद्र के मन्दिरों का द्वार पश्चिम तथा
दक्षिण होता है।
कर्नल कोल ने अपने प्लान पृष्ठ ७:८८ में
भूतेश्वर मन्दिर सहित कुल ७ मन्दिरों को दिखाया
है। किन्तु मुझे प्रांगण में भूतेश मन्दिर सहित कुल
१२ मन्दिरों के भग्नावशेष मिले। सम्भव है। कोल
की यात्रा के समय शेष मन्दिर मलबों तथा घास-
फूस के अन्दर छिपे रहे हों। शताब्दियों से पड़ती
धूल, वृक्ष, तुषारपात आदि के जम जाने के कारण
श्री कोल को पता न चला हो।
भूतेश्वर का मन्दिर प्रांगण के दक्षिण उत्तर
की लम्बाई के मध्य में है। मन्दिर की उत्तर दिशा
के पार्श्व में ५ तथा दक्षिण दिशा के पार्श्व में ६
मन्दिर हैं। दक्षिण पार्श्व के मन्दिरों में पूर्व में तीसरे
मन्दिर के सम्मुख एक और मन्दिर बना है। यह
निर्माण बहुत समय पश्चात् का मालूम होता है। वह
उत्तर तथा दक्षिण मन्दिरों की सीध में नहीं आता।
मैं समझता हूँ कि एकादश रुद्र की कल्पना पर
ग्यारह मन्दिरों की रचना की गयी थी। अन्यथा
दोनो पार्श्वों में छह-छह मन्दिर होने चाहिए थे। भूतेश
रुद्रेश हैं। कल्पना की गयी है। यह अनुमान लगाया
गया है। मुख्य मन्दिर भूतेश की रचना के पश्चात्
कालान्तर में राजा मन्दिर निर्माण करते गये।
यह तर्क सम्मत नहीं है। सामने वाला मन्दिर
बनाने वाला पाँचवें मन्दिर के पश्चात् छठा मन्दिर
बनवाकर उसको पंक्ति पूरा करता। वह मन्दिरों को
पंक्ति के बाहर जाकर मन्दिर का निर्माण न कराता।
अतएव यह मन्दिर एकादश रुद्र कल्पना पर बना
है। भूतेश का मन्दिर ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की अपेक्षा
सादा है। अतएव ज्येष्ठेश्वर मन्दिर के पूर्व की रचना
मालूम पड़ती है।
नरनाग किंवा नारायण नाग का कुण्ड भूतेश्वर
मन्दिर की उत्तर दिशा से पहाड़ों द्वारा जल स्रवित
होकर आता है। उस कुण्ड किंवा सर से निकलता
स्पष्ट दिखायी पड़ता है। वह बहता कंकणी नदी में
गिर जाता है। जल अत्यन्त निर्मल है। हल्का है।
कर्नल कोल ने इसीलिए इसे नाग कहा है। नाग का
अर्थ जल स्रोत होता है।
कुण्ड के दो ओर पूर्वकाल की बनी सीढियाँ
अपनी पूर्वावस्था में वर्तमान हैं। इस कुण्ड की
सफाई नहीं हुई है। चारो ओर मुस्लिम गूजरों की
आबादी है। अतएव कुण्ड की सफाई नहीं है। उसमे
पत्ती, टूटी लकड़ी तथा पहाड़ों पर से गिरे कंकड
पत्थर पड़े थे। पत्तियों के सड़ने के कारण कुण्ड का
स्तर साफ नहीं था। जल निरन्तर कुण्ड में आता
और निकलता रहता है अतएव वह साफ लगता है।
इस कुण्ड का निर्मल जल तथा यहाँ की मनो-
मुग्धकारी प्राकृतिक दृश्यावली देखकर जलपान
के लोभ का संवरण नहीं कर सका। मैने जल
पीया। बहु मधुर तथा शीतल था। उसमे मुझे जैसे
जीवन मिला। इस कुण्ड किंवा सर को सोदर तीर्थ
कहते थे। इसके जल का बड़ा ही विशद वर्णन किया
गया है। इसके नाम पर एक दूसरा सोदर तीर्थ
श्रीनगर के समीप निर्माण कराया गया था। उसका
यथा स्थान वर्णन किया है।
इस सरोवर के समीप एक विशाल शिलाखण्ड
पड़ा मिला। यह १५ फीट लम्बा ८ फीट चौड़ा तथा
६ फीट मोटा था। यह शिलाखण्ड मूर्ति का अधि-
ष्ठान है।
कंकणी नदी में आध मील दूर धारा के मध्य
एक शिलाखण्ड है। उस पर एक कोठरी बनी है।