राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ राजतरंगिणी
सोऽथ भूभृज्जलोकोऽभूद् भूलोकसुरनायकः ।
यो यशस्सुधया शुद्धं व्यधाद्ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥१०८॥
जलौक१
१०८. अस्तु 'जलौक राजा हुआ। वह भूलोक पर इन्द्र के तुल्य था। उसने अपने धवल
यश द्वारा ब्रह्माण्ड मण्डल को शुद्ध कर दिया था।
चार व्यक्ति उसमें निवास कर सकते हैं। इसके
मध्य में एक शिवलिंग का स्थान है। एक दिवाल
में मूर्ति रखने का ताखा बना है। मैं जब यहाँ आया
तो किसी ने इस मन्दिर का पता मुझे नहीं बताया।
शिवयोगी के निवास योग्य वह आदर्श स्थान
माना जायगा। योगियों के योग तथा ध्यानियों के
ध्यान करने के लिये सुरम्य, एकान्त, जलाशय एवं
पादप पूर्ण वनथीययुक्त स्थान आदर्श कहा जायगा।
दुर्बल हृदय व्यक्ति दिन में चाहे जितना यहाँ
के प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द उठा ले, परन्तु सन्ध्या
होते ही स्थान की सुन्दरता अन्धकार की गम्भीरता
के साथ भयंकर रूप धारण कर लेती है। आधुनिक
.... योजनाओं के योग से वह
.... कता
.... अथवा
.... रूप
.... होती
.... लगता
.... हैं।
यहाँ पर अ.. .... ललेख
नहीं मिला है। यदि क.. .... स्थान
के काल निर्णय में सहायता मि.. स्थापत्य
ी के आधार पर काल निर्णय का अनु लगाया
सकता है। शिलालेख मिलने पर कश्मीर के
आर तूव वास्तु कला शैली तथा उसके विकास के
के भा अच्छा प्रकाश पड़ सकता है। पुरातत्त्व-
निरापद स्थान पर आकर अध्ययन तथा
गये हैं। चाहिए। अन्यथा यहाँ इस समय
सन् १८ सामग्रियां बिखरी पड़ी हैं, नष्ट
कोल ने (सुप...।
उत्तर पश्चिम ...
कल्हण ने पुनः भूतेश का उल्लेख राजा जलौक
के सन्दर्भ में (त० १:१५८) किया है। उसमें
नन्दि क्षेत्र में एक सुदृढ़ पाषाण मन्दिर निर्माण कराने
का उल्लेख मिलता है। यह मन्दिर जलौक द्वारा
उन्नत भूतेश मन्दिर है। नरेन्द्रदित्य के सन्दर्भ में
कल्हण ने (त० १:३०७) में इसका उल्लेख किया
है। ललितादित्य के सन्दर्भ में इसका उल्लेख कल्हण
ने (त० ४.१८९ में) किया है। अवन्तिवर्मा ने
(त० ५:४६) यहाँ दानादि किया था।
अशोक के समय में भूतेश नाम से स्थान प्रसिद्ध
था। छोटा मन्दिर या केवल शिवलिंग रहा होगा।
जलौक ने उस स्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण कराया
जिसके भग्नावशेष का अस्तित्व आज वर्तमान है जो
देखा जा सकता है। इसका उल्लेख पुनः तरंग
५.५५-५९ में किया गया है। राजा उच्छल के
सन्दर्भ में (त० ८:७७-११०) इसका उल्लेख
किया गया है। कल्हण ने इस मन्दिर का अन्तिम
बार उल्लेख (त० २७:५६, ३३-५६) में किया
है। भूतेश की कृपा एवं उनके प्रसाद से अशोक
का पुत्र जलौक हुआ था। अतएव यह उचित
प्रतीत होता है। जलौक ने भूतेश मन्दिर का
निर्माण कराया।
जोन, प्रज्ञाभट्ट एवं थीवर की राजतरं-
गिणियों में भूतेश्वर का विस्तृत वर्णन नहीं
मिलता। जिससे इस विषय पर और प्रकाश
पड़ सकता।
अबुल फज़ल आइने अकबरी में इस मन्दिर का
उल्लेख नहीं करता। हैदर मलिक भूतेश्वर का
भूनिसर किया बुथगर नाम से उल्लेख करता है।